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ज़ी प्राइम का मन नई आकाशगंगा में फैला हुआ था और वह उसमें बिखरे असंख्य तारों की घुमावदार संरचनाओं को हल्की रुचि के साथ देख रहा था। उसने इस आकाशगंगा को पहले कभी नहीं देखा था। क्या वह कभी उन सभी को देख पाएगा? उनकी संख्या अत्याधिक थी, और प्रत्येक में मानवता का अपना समुदाय बसा हुआ था। लेकिन अब वह समुदाय लगभग एक बेकार बोझ जैसी थी। मनुष्यों का वास्तविक सार अब शरीरों में नहीं, बल्कि यहाँ अंतरिक्ष में विद्यमान था।
मन, शरीर नहीं! मानवों के अमर शरीर तो ग्रहों पर ही रहते थे, युगों-युगों तक सुप्त अवस्था में। कभी-कभी वे भौतिक गतिविधियों के लिए जागते थे, लेकिन यह अब पहले से भी अधिक दुर्लभ होता जा रहा था। नए व्यक्तियों का जन्म भी बहुत कम हो रहा था, जो इस अकल्पनीय विशाल मानव समुदाय में शामिल हो सकें; किंतु उससे क्या अंतर पड़ता था? ब्रह्माण्ड में नए व्यक्तियों के लिए अब बहुत कम स्थान बचा था।
ज़ी प्राइम अपने विचारों में खोया हुआ था कि तभी उसे किसी दूसरे मन की हल्की सी मौजूदगी महसूस हुई।।
“मैं ज़ी प्राइम हूँ,” उसने कहा। “और तुम?”
“मैं डी सब वन हूँ। तुम्हारी आकाशगंगा?”
“हम उसे केवल ‘आकाशगंगा’ कहते हैं। और तुम?”
“हम भी अपनी को यही कहते हैं। सभी लोग अपनी आकाशगंगा को बस ‘आकाशगंगा’ ही कहते हैं, और कुछ नहीं। क्यों नहीं?”
“सही है। क्योंकि सभी आकाशगंगाएँ एक जैसी हैं।”
“सभी नहीं। एक विशेष आकाशगंगा ऐसी है जहाँ मानव जाति का उद्गम हुआ था। इससे वह अन्य सभी से भिन्न हो जाती है।”
ज़ी प्राइम ने पूछा, “कौन-सी?”
“मैं नहीं कह सकता। यूनिवर्सल AC जानता होगा।”
“क्या हम उससे पूछें? मुझे अचानक जानने की उत्सुकता हो रही है।”
ज़ी प्राइम की चेतना फैलने लगी। आकाशगंगाएँ स्वयं सिकुड़कर एक विशाल पृष्ठभूमि पर बिखरी धूल जैसी प्रतीत होने लगीं। सैकड़ों अरब आकाशगंगाएँ थीं, प्रत्येक में अमर प्राणी थे, और प्रत्येक बुद्धिमान मनों का भार वहन कर रही थी जो स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में विचरण करते थे। और फिर भी, उनमें से एक आकाशगंगा सबसे अलग थी क्योंकि वही मूल आकाशगंगा थी। उनमें से एक आकाशगंगा ऐसी थी, जहाँ बहुत पहले एक समय ऐसा था जब सिर्फ़ उसी आकाशगंगा पर मानव रहते थे।
ज़ी प्राइम में उस आकाशगंगा को देखने की उत्सुकता जाग उठी और उसने आवाज़ दी: “यूनिवर्सल AC! किस आकाशगंगा पर मानवों की उत्पत्ति हुई थी?”
यूनिवर्सल AC ने उसकी पुकार सुनी। प्रत्येक संसार पर और पूरे अंतरिक्ष में उसके संवेदक (रिसेप्टर) मौजूद थे, और प्रत्येक रिसेप्टर हाइपरस्पेस के माध्यम से किसी अज्ञात स्थान तक पहुँचता था, जहाँ यूनिवर्सल AC स्वयं को सबसे अलग रखता था।
ज़ी प्राइम केवल एक ऐसे मनुष्य को जानता था जिसकी चेतना यूनिवर्सल AC के निकट तक पहुँच पाई थी। उसने बताया था कि उसे केवल दो फुट व्यास का एक चमकता हुआ गोला दिखाई दिया था, जिसे देखना भी कठिन था।
‘‘लेकिन क्या यूनिवर्सल AC बस इतना ही हो सकता है?” ज़ी प्राइम ने पूछा था।
“इसका ज़्यादातर हिस्सा,” जवाब मिला, “हाइपरस्पेस में है। वहाँ वह किस रूप में है, इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।”
और कोई भी नहीं कर सकता था। वह युग बहुत पीछे छूट चुका था जब किसी मनुष्य का यूनिवर्सल AC के निर्माण में कोई योगदान होता था। प्रत्येक यूनिवर्सल AC अपने उत्तराधिकारी को स्वयं डिज़ाइन और निर्मित करता था। अपने दस लाख वर्षों या उससे अधिक के जीवनकाल में वह इतना डेटा एकत्र कर लेता था कि अपने से अधिक जटिल, अधिक सक्षम उत्तराधिकारी का निर्माण कर सके, जिसमें उसका अपना डेटा-संग्रह और व्यक्तित्व समाहित हो जाता था।
यूनिवर्सल AC ने ज़ी प्राइम के भटकते विचारों को शब्दों से नहीं, बल्कि मार्गदर्शन द्वारा रोका। उसकी चेतना को आकाशगंगाओं के धुंधले सागर में ले जाया गया और उनमें से एक विशेष आकाशगंगा बड़ी होती गई, यहाँ तक कि उसके तारे स्पष्ट दिखाई देने लगे।
फिर एक विचार आया, जो बहुत दूर से था, लेकिन एकदम साफ़ था। “यह मानवों की मूल आकाशगंगा है।”
लेकिन आख़िरकार यह बाकी आकाशगंगा जैसी ही थी और ज़ी प्राइम ने अपनी निराशा को दबा लिया।
डी सब वन, जिसका मन दूसरे के साथ था, अचानक बोला, “और क्या इनमें से कोई तारा मानवों का मूल तारा है?”
यूनिवर्सल AC ने कहा, “मानवों का मूल तारा नोवा बन चुका है। अब वह एक सफ़ेद बौना तारा (white dwarf) है।”
“क्या उस पर रहने वाले मानव मर गए?” ज़ी प्राइम ने चौंककर और बिना सोचे-समझे पूछा।
यूनिवर्सल AC ने कहा, “नहीं , जैसा कि ऐसे सभी मामलों में होता है , समय रहते ही उस ग्रह पर रहने वाले मानवों के लिए एक नई दुनिया बनाई गई थी, उस दुनिया में उनके भौतिक शरीर रहते है।”
“हाँ, ठीक है,” ज़ी प्राइम ने कहा, परंतु फिर भी उसे कुछ खोने का एहसास हुआ। उसने अपनी चेतना को मानवता की मूल आकाशगंगा से हटा लिया और उसे पुनः दूरस्थ धुँधले प्रकाश-बिंदुओं के बीच खो जाने दिया। वह उसे फिर कभी नहीं देखना चाहता था।
डी सब वन ने पूछा, “क्या हुआ?”
“तारे मर रहे हैं। मानवता का मूल तारा भी मर चुका है।”
“सभी तारों को एक दिन मरना ही है। इसमें आश्चर्य क्या है?”
“लेकिन जब सारी ऊर्जा समाप्त हो जाएगी, तब हमारे शरीर भी अंततः मर जाएँगे और उनके साथ तुम और मैं भी।”
“उसमें अभी अरबों वर्ष लगेंगे।”
“मैं नहीं चाहता कि ऐसा अरबों वर्षों बाद भी हो। यूनिवर्सल AC! तारों को मरने से कैसे रोका जा सकता है?”
डी सब वुन मुस्कराया।
“तुम पूछ रहे हो कि एंट्रॉपी की दिशा को कैसे उलटा जा सकता है।”
और यूनिवर्सल AC ने जवाब दिया:
“THERE IS AS YET INSUFFICIENT DATA FOR A MEANINGFUL ANSWER.(सार्थक उत्तर देने के लिए अभी पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।)”
ज़ी प्राइम के विचार तुरंत अपनी स्वयं की आकाशगंगा की ओर लौट गए। उसने डी सब वुन के बारे में फिर नहीं सोचा, जिसका शरीर शायद एक खरब प्रकाश-वर्ष दूर किसी अन्य आकाशगंगा में हो, या फिर ज़ी प्राइम के अपने तारे के पड़ोस में। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता था।
उदास मन से ज़ी प्राइम ने तारों के बीच फैली हाइड्रोजन गैस को एकत्र करना शुरू किया, ताकि वह अपना एक छोटा-सा तारा बना सके। यदि एक दिन सभी तारों को मरना ही था, तो कम-से-कम तब तक कुछ नए तारे बनाए जा सकते थे।

