रेत, नदी और तारे: अफ्रीका में विज्ञान की अनकही कहानी


रात का समय था। आकाश में असंख्य तारे ऐसे चमक रहे थे जैसे किसी प्राचीन गणितज्ञ ने उन्हें अदृश्य सूत्रों में बाँध रखा हो। मैं अपने आँगन में बैठा था, और गार्गी तथा अनुषा मेरी दोनों ओर। अभी कुछ ही दिन पहले हमने चीन की महान वैज्ञानिक परंपराओं की यात्रा पूरी की थी,कागज़, बारूद, खगोल यंत्र, और गणना की अद्भुत विधियाँ।

गार्गी ने उत्सुकता से पूछा, “पापा, क्या विज्ञान केवल मेसोपोटामिया, चीन, भारत, अमरीका और यूनान जैसी महान सभ्यताओं में ही विकसित हुआ था?”

मैं मुस्कुराया, “नहीं, विज्ञान की कहानी उससे कहीं अधिक विशाल है।”

मैने कहा, जब तुम दोनों छोटे थे तब तुम्हे एक प्रसिद्ध बाल कविता सुनाया करता था,

इब्न-बतूता पहन के जूता

निकल पड़े तूफ़ान में

थोड़ी हवा नाक में घुस गई

घुस गई थोड़ी कान में

– सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

गार्गी ने पूछा ,” इस कविता का विज्ञान से क्या संबंध है?”

मैने उत्तर दिया, “इस कविता में जो इब्न बतूता है, वो अफ्रीका के महान यात्री थे। वो मोरक्को से निकल कर 30 साल तक यात्रा करते रहे, और कुल 117,000 किमी की यात्रा की। यात्रा के अंत में वे माली के शहर टिम्बकटू पहुंचे थे।”

“आज हम एक ऐसे महाद्वीप की यात्रा पर चलेंगे, जिसे अक्सर इतिहास में कम समझा गया,लेकिन जिसने मानव ज्ञान को गहराई से आकार दिया, अफ्रीका।”

अनुषा ने धीरे से कहा, “क्या हम एक बार फिर से मिस्र से शुरुआत करेंगे?”

मैंने सिर हिलाया, “हाँ, लेकिन याद रखना,अफ्रीका केवल मिस्र नहीं है। यह सहारा के पार की सभ्यताएँ, नील की घाटी, इथियोपिया के उच्च प्रदेश, नूबिया, माली, और अनगिनत ज्ञान परंपराओं का संगम है। हम कालक्रम में चलेंगे, सबसे पहले उस समय से जब मनुष्य ने गिनती करना सीखा।” पढ़ना जारी रखें रेत, नदी और तारे: अफ्रीका में विज्ञान की अनकही कहानी

अंतिम प्रश्न : आइजैक आसिमोव


समय 21 मई, 2061 , जब दो मित्रों के मध्य हंसी मजाक में “अंतिम प्रश्न” पूछा गया था, ऐसे समय में जब मानवता पहली बार वास्तव में प्रकाश के युग में प्रवेश कर रही थी। यह प्रश्न दो मित्र द्वारा ‘हाईबॉल*’ पीते हुए पाँच डॉलर की शर्त के दौरान उठा था। अलेक्जेंडर एडेल और बर्ट्राम लुपोव, मल्टीवैक के समर्पित परिचालक थे। ये दोनों वे किसी भी मानव की तुलना में उस विशाल कंप्यूटर मल्टीवैक के उदासीन, तेज प्रतिक्रिया देने वाले चमकीले मीलों लंबे चेहरे के पीछे के राज को बेहतर समझते थे। उन्हें मल्टीवैक के रिले और सर्किट के संयोजन का कम से कम थोड़ा-बहुत अंदाज़ा तो था, जोकि अब इतना विशाल और जटिल हो चुका था कि कोई भी अकेला मानव उसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता था। (* एक शराब पेय)

मल्टीवैक खुद को समायोजित करने और उसमे उत्पन्न त्रुटियों को ठीक करने में सक्षम था। मल्टीवैक के सकुशल संचालन के लिए यह अत्यावश्यक था ; क्योंकि कोई भी मानव उसे इतनी तेज़ी से या ठीक से समायोजित या ठीक नहीं कर सकता था। इसलिए एडेल और लुपोव उस विशालकाय मशीन की देखभाल बस हल्के-फुल्के और सतही तौर पर ही करते थे. उनका यह कार्य मानवीय सीमाओं में ही था, उससे अधिक करना किसी भी मानव के लिए संभव नहीं था। वे उसे आँकड़े प्रदान करते थे, उसकी ज़रूरतों के हिसाब से प्रश्न बदलते थे और उससे मिलने वाले उत्तरो का अनुवाद और विश्लेषण करते थे। लेकिन यह एक तथ्य था कि वे और उनके जैसे दूसरे लोग, मल्टीवैक की कामयाबी का श्रेय पाने के पूरी तरह हकदार थे।

कई दशकों तक मल्टीवैक ने चाँद, मंगल और शुक्र तक पहुँच सकने वाले अंतरिक्ष यानो को डिज़ाइन करने और मार्ग निर्धारण में मदद की थी, जिसकी वजह से मानव चाँद, मंगल और शुक्र तक पहुँच पाया था। मंगल से आगे, पृथ्वी के सीमित संसाधन इन मानव यात्रीयों वाले अंतरिक्ष यानो के लिए पर्याप्त नहीं थे; लंबी यात्राओं के लिए बहुत ज़्यादा ऊर्जा की ज़रूरत थी। पृथ्वी पर तकनीकी विकास ने ऊर्जा के लिए ईंधन जैसे कोयले और यूरेनियम का प्रयोग तेजी से और बेहतर तरीके से किया था, लेकिन दोनों ही सीमित मात्रा में थे।

धीरे-धीरे मल्टीवैक ने इतना ज्ञान अर्जित कर लिया कि वह अधिक गहरे और मूलभूत प्रश्नों का उत्तर दे सके। और फिर 14 मई 2061 को, जो अब तक केवल सिद्धांत था, वह वास्तविकता बन गया।

मल्टीवैक द्वारा डिजाइन की गई नई ऊर्जा तकनीकों से सूरज की ऊर्जा को संरक्षित किया गया, उसे दूसरे रूप में बदला गया और इस ऊर्जा को पूरे ग्रह के स्तर पर प्रयोग किया जाने लगा था। इस नए ऊर्जास्रोत के कारण धीरे धीरे पूरी पृथ्वी ने जलते हुए कोयले और विखंडन वाले यूरेनियम का इस्तेमाल बंद कर दिया। अब सारी पृथ्वी पर अंतरिक्ष में स्थित एक मील व्यास के उपग्रह से ऊर्जा प्राप्त हो रही थी। यह उपग्रह पृथ्वी से चन्द्रमा की आधी दूरी पर स्थित कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था और सूर्य की अदृश्य किरणों से पृथ्वी की समस्त ऊर्जा आवश्यकता पूरी कर रहा था था।

यह ऊर्जा सप्ताह के सातों दिनों निर्बाध रूप से उपलब्ध थी। आखिरकार एक दिन एडेल और लुपोव ने  सार्वजनिक कार्यक्रमों से बचकर एक शांत जगह पर छुट्टी मनाने की सोची। एक ऐसी जगह जहाँ कोई उन्हें ढूंढने के बारे में सोच भी नहीं सकता था, वे ज़मीन के नीचे बने सुनसान कमरों में से एक ऐसे कमरे में पहुंचे जहाँ वे मल्टीवैक के विशाल जमीन के नीचे दबे हुये शरीर को देख सकते थे। इस समय तक मल्टीवैक भी इतना आत्मनिर्भर हो गया था कि वह भी बिना किसी देखभाल के, आराम से, डेटा को इत्मीनान से और सुस्ती भरी आवाज़ के साथ विश्लेषण कर सकता था। मल्टीवैक भी अब इतना कार्यकुशल हो गया था कि वह भी छुट्टी मना सकता था और वे एडेल और लुपोव यह बात समझते थे। शुरू में उनका मल्टीवैक को नए प्रश्नो द्वारा परेशान करने का कोई इरादा नहीं था।

वे अपने साथ एक शराब की बोतल और बर्फ लाए थे और उस समय उनका एकमात्र इरादा एक-दूसरे के साथ आराम से समय बिताना था।

एडेल ने कहा, “अब हम इस ऊर्जा मशीन के बारे में सोचते हैं तो यह बहुत अद्भुत मशीन लगती है।” उसके चौड़े चेहरे पर थकान की लकीरें थीं और वह धीरे-धीरे एक चम्मच से अपनी ड्रिंक हिला रहा था, और ग्लास में बर्फ के टुकड़ों को बेढंगे ढंग से इधर-उधर घूमते हुए देख रहा था।

“हमारे पास इतनी ऊर्जा उपलब्ध है कि हम उसे कभी भी मुफ्त में इस्तेमाल कर सकते हैं। इतनी ऊर्जा कि अगर हम चाहें, तो पूरी पृथ्वी को पिघला कर एक लोहे की एक बड़ी बूंद में बदल सकते सकते हैं, और फिर भी हमें ऊर्जा की कोई कमी महसूस नहीं होगी। इतनी सारी ऊर्जा जिसे हम हमेशा, हमेशा और हमेशा के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।”

लुपोव ने अपना सिर एक तरफ झुकाया। जब वह किसी बात से सहमत नहीं होता तो वह अपना सर एक और झुका देता था। वह एडेल से सहमत नही था क्योंकि अब भी उसे कुछ कार्य मानवीय श्रम के रूप में करने पड़ते थे जैसे वह इस पार्टी के लिए ग्लास और बर्फ लाड कर लाया था। उसने कहा, “नहीं, हमेशा के लिए ऊर्जा उपलब्ध नहीं है ।” पढ़ना जारी रखें अंतिम प्रश्न : आइजैक आसिमोव

रोमन सभ्यता: इंजीनियरिंग की ज्यामिति


संध्या का समय था। आकाश में हल्की लालिमा फैल चुकी थी और घर की छत पर ठंडी हवा बह रही थी। मैं कुर्सी पर बैठा था, और मेरी पुत्री गार्गी और भतीजी अनुषा, मेरे पास आकर बैठ गईं। उनके हाथों में वही पुरानी नोटबुक थी जिसमें वे सभ्यताओं की कहानियाँ लिखती थीं।

“पापा,” गार्गी ने उत्सुकता से पूछा, “आपने हमें यूनान के वैज्ञानिकों, पायथागोरस, अरस्तू और टॉलेमी के बारे में बताया था। अब आगे क्या हुआ? क्या रोमनों ने भी गणित और विज्ञान को आगे बढ़ाया?”

मैं मुस्कुराया। “यही तो आज की कहानी है,” मैंने कहा। “आज हम जानेंगे कि कैसे यूनान की ज्ञान-परंपरा ने रोमन साम्राज्य में प्रवेश किया और वहाँ एक नए रूप में विकसित हुई।”

अनुषा ने तुरंत पूछा, “क्या रोमनों ने नए सिद्धांत बनाए, या सिर्फ यूनानियों की नकल की?”

मैंने धीरे से उत्तर दिया, “यही समझना सबसे रोचक है। रोमनों ने शायद यूनानियों की तरह गहरे सैद्धांतिक गणित का विकास नहीं किया, लेकिन उन्होंने विज्ञान को व्यवहारिक जीवन में उतारने की कला विकसित की और यही उनकी सबसे बड़ी देन है।”

आकाश में धीरे-धीरे तारे चमकने लगे थे। मैंने ऊपर देखते हुए कहा, “जब यूनान में टॉलेमी ब्रह्मांड का मॉडल बना रहे थे, उसी समय रोम एक विशाल साम्राज्य के रूप में उभर रहा था। उनका ध्यान केवल सिद्धांतों पर नहीं था, वे सड़कों, पुलों, जलसेतुओं और सैन्य संरचनाओं पर केंद्रित थे।”

गार्गी ने कहा, “मतलब उनका विज्ञान अधिक ‘प्रैक्टिकल’ था?”

“बिल्कुल,” मैंने कहा। “जहाँ यूनानियों ने पूछा ‘यह क्यों होता है?’, वहीं रोमनों ने पूछा ‘इसे हम कैसे उपयोग कर सकते हैं?’”

मैंने कहानी को आगे बढ़ाया, रोमन सभ्यता में विज्ञान का विकास किसी एक व्यक्ति या एक ग्रंथ के कारण नहीं हुआ, बल्कि यह उनके व्यावहारिक जीवन की आवश्यकताओं से उत्पन्न हुआ। जब रोम एक छोटे नगर से एक विशाल साम्राज्य में बदल रहा था, तब उसे सड़कों, जल-प्रबंधन, सैन्य योजना और प्रशासन के लिए गणित और विज्ञान की आवश्यकता थी।

अनुषा ने पूछा, “क्या उन्होंने खुद गणित विकसित किया?”

मैंने उत्तर दिया, “कुछ हद तक, लेकिन उन्होंने अधिकतर ज्ञान यूनान से लिया और उसे अपने तरीके से ढाला। उदाहरण के लिए, उन्होंने यूनानी ज्यामिति का उपयोग कर  सटीक निर्माण तकनीकें विकसित कीं।”

गार्गी ने अपनी नोटबुक खोलते हुए पूछा, “पापा, क्या रोमन संख्या प्रणाली उन्नत थी?”

मैंने थोड़ा गंभीर होकर कहा, “यही वह जगह है जहाँ रोमन गणित की कमजोरी सामने आती है।”

मैंने जमीन पर उंगली से लिखते हुए कहा, I, V, X, L, C, D, M

“यह है रोमन संख्या प्रणाली,” मैंने समझाया।

अनुषा ने तुरंत कहा, “स्कूल में पढ़ा था लेकिन इसमें तो जोड़-घटाना मुश्किल होगा!”

“बिल्कुल,” मैंने कहा। “यही कारण है कि रोमनों ने जटिल गणितीय सिद्धांत विकसित नहीं किए। उनकी संख्या प्रणाली स्थानमान (place value) पर आधारित नहीं थी, जो कि बाद में भारत में विकसित हुआ था।”

गार्गी ने उत्साहित होकर कहा, “मतलब भारतीय शून्य और दशमलव ने बाद में गणित को आगे बढ़ाया!”

मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया, “हाँ, लेकिन वह कहानी हम आगे सुनेंगे।”

हवा थोड़ी तेज़ हो गई थी। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा ऊँचा किया, “रोमन सभ्यता की सबसे बड़ी ताकत थी, उनकी इंजीनियरिंग।”

मैंने कहा, “उन्होंने ऐसे-ऐसे निर्माण किए जो आज भी खड़े हैं। जैसे कोलोसियम, विशाल जलसेतु (Aqueducts), और सैकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कें।”

अनुषा ने आश्चर्य से पूछा, “इतनी सटीकता कैसे संभव थी?”

“ज्यामिति,” मैंने उत्तर दिया। “उन्होंने त्रिभुजों, कोणों और मापों का उपयोग करके संरचनाएँ बनाई। भले ही उन्होंने नए प्रमेय नहीं खोजे, लेकिन उन्होंने पुराने सिद्धांतों को अद्भुत स्तर तक लागू किया।”

गार्गी ने आसमान की ओर देखते हुए पूछा, “तो क्या रोमनों ने खगोल विज्ञान में कुछ नया किया?”

मैंने उत्तर दिया, “रोमनों का खगोल विज्ञान मुख्यतः यूनानी परंपरा पर आधारित था। उन्होंने टॉलेमी के भूकेन्द्रीय (Geocentric) मॉडल को अपनाया, जिसमें पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया था।”

अनुषा ने पूछा, “क्या उन्होंने इसे चुनौती नहीं दी?”

“नहीं,” मैंने कहा, “रोमन वैज्ञानिक अधिकतर ज्ञान के संरक्षक (preservers) थे, वे नवप्रवर्तक (innovators) नही थे।” पढ़ना जारी रखें रोमन सभ्यता: इंजीनियरिंग की ज्यामिति

संख्याओं से तारों तक : यूनानी विज्ञान की कथा


हम लोग सपरिवार बैंगलोर से निकल कर छुट्टियां बिताने कुर्ग क्षेत्र में घूम रहे थे , कावेरी के किनारे एक ग्रामीण बांस से बना घर किराए पर लिया हुआ था।

कावेरी के तट पर शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। सूर्य की अंतिम किरणें जल की सतह पर ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी प्राचीन ग्रंथ के स्वर्ण अक्षर। हवा में हल्की ठंडक थी और आकाश में एक-एक करके तारे दिखाई देने लगे थे।

मैं आँगन में बैठा था। सामने मिट्टी की वेदी पर दीपक जल रहा था। मेरी बेटी गार्गी और भतीजी अनुषा, आज फिर अपने प्रश्नों के साथ मेरे पास आ बैठीं।

गार्गी हमेशा की तरह उत्सुक थी। उसकी आँखों में वही चमक थी जो किसी नए रहस्य को जानने से पहले होती है।

“पापा ,” उसने धीरे से पूछा, “आपने हमें मिस्र, सुमेरिया और बेबीलोन के बारे में बताया था। लेकिन स्कूल में हमने सुना कि गणित और विज्ञान को व्यवस्थित रूप देने का काम यूनानियों ने किया था। क्या यह सच है?”

अनुषा भी पास आकर बैठ गई। उसने आकाश की ओर देखा और कहा, “और क्या वही लोग थे जिन्होंने तारों को समझने की कोशिश की?”

मैं मुस्कुराया। यह प्रश्न मुझे प्रसन्न कर देता था।

“हाँ,” मैंने कहा, “यूनान, जिसे हम ग्रीस कहते हैं, मानव इतिहास की उन अद्भुत भूमियों में से एक था जहाँ विचारों ने स्वतंत्र रूप से उड़ान भरी। वहाँ के लोग केवल ज्ञान इकट्ठा नहीं करते थे, बल्कि वे प्रश्न पूछते थे ‘क्यों?’ और ‘कैसे?’”

यूनान : समुद्र, सितारे और विचारों की भूमि

दोनों बेटियाँ ध्यान से सुनने लगीं।

“लेकिन,” अनुषा ने पूछा, “यूनान में ऐसा क्या खास था?”

मैंने आकाश की ओर देखा। दूर समुद्र की दिशा से हल्की हवा आ रही थी।

“यूनान की भूमि पहाड़ों और समुद्रों से घिरी हुई थी,” मैंने कहना शुरू किया। “छोटे-छोटे नगर-राज्य थे , एथेंस, स्पार्टा, मिलेटस, सामोस। ये शहर व्यापार करते थे, यात्रा करते थे और अलग-अलग सभ्यताओं से विचारों का आदान-प्रदान करते थे।”

गार्गी ने तुरंत पूछा, “क्या उन्होंने मिस्र और बेबीलोन से भी सीखा?”

“बिलकुल,” मैंने कहा। “यूनानी विद्वानों ने मिस्र से ज्यामिति सीखी और बेबीलोन से खगोलशास्त्र। लेकिन उन्होंने इन ज्ञानों को केवल उपयोग में नहीं लाया , उन्होंने इनके पीछे छिपे नियम खोजने शुरू किए।”

अनुषा ने मिट्टी पर उंगली से एक वृत्त बनाते हुए पूछा, “जैसे?”

मैंने उसकी बनाई आकृति को देखा।

“जैसे यह वृत्त,” मैंने कहा। “मिस्र के लोग वृत्त का उपयोग भूमि मापने में करते थे। लेकिन यूनानी विद्वानों ने पूछा ‘वृत्त क्या है? इसकी परिभाषा क्या है? इसके गुण क्या हैं?’”

गार्गी मुस्कुराई।

“मतलब वे केवल काम नहीं करते थे , वे सोचते भी थे।”

“हाँ,” मैंने कहा, “और यही विज्ञान की असली शुरुआत है।”

आकाश अब गहरा नीला हो चुका था। कुछ चमकीले तारे दिखाई देने लगे थे।

अनुषा ने ऊपर देखते हुए पूछा, “क्या यूनानी लोग भी तारों को देखते थे?”

मैंने सिर हिलाया। “हाँ। और शायद उन्हीं ने पहली बार यह समझने की कोशिश की कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है।”

गार्गी ने उत्सुकता से पूछा, “सबसे पहले कौन था?”

मैंने थोड़ा सोचकर कहा, “अगर हम शुरुआत करें, तो हमें एक ऐसे नगर में जाना होगा जो एशिया माइनर के तट पर था , मिलेटस।”

“वहाँ एक व्यक्ति रहता था, एक व्यापारी, दार्शनिक और गणितज्ञ। उसका नाम था थेल्स।”

दोनों बेटियाँ चुप हो गईं। पढ़ना जारी रखें संख्याओं से तारों तक : यूनानी विज्ञान की कथा

प्रागैतिहासिक काल में गणित और विज्ञान


गार्गी ने आकाश की ओर देखते हुए पूछा, “पापा, क्या हमेशा से लोग इतने ज्ञानवान थे? क्या हमेशा से विज्ञान और गणित था?”

मेरे चहरे पर मुस्कुराहट आ गई , मेरी आँखे नदी के पार देखने लगी, जैसे समय के पार देख रहा हूँ , मैंने कहा, “नहीं, विज्ञान और गणित हमेशा से किताबों में नहीं थे, लेकिन उनके बीज मानव के भीतर हमेशा से थे। चलो, मैं तुम्हें उस समय की कहानी सुनाता हूँ जब मानव ने पहली बार सोचना शुरू किया था।”

दोनों बच्चे उत्सुकता से मेरी ओर झुक गए। मैंने कहना शुरू किया, “बहुत-बहुत पहले, जब न शहर थे, न खेत, न घर , तब मानव जंगलों में रहता था। वह शिकार करता था, फल इकट्ठा करता था, और हर दिन उसके लिए एक नई चुनौती होती थी। यही पाषाण युग था, जब पत्थर उसके सबसे बड़े साथी थे। लेकिन बेटी, उस समय भी मानव केवल जीवित रहने के लिए नहीं जी रहा था, वह प्रकृति को, समय को, और स्वयं को समझने की कोशिश कर रहा था।”

“क्या वह भी हमारी तरह सोचता था?” गार्गी ने पूछा।

“हाँ,” मैंने उत्तर दिया, “शायद और भी अधिक ध्यान से। वह हर चीज़ को देखता था कि सूरज कब उगता है, कब ढलता है, चाँद कैसे बदलता है, और तारे कैसे हर रात एक ही रास्ते पर चलते हैं। उसने देखा कि जब ठंड बढ़ती है, तो कुछ जानवर गायब हो जाते हैं और कुछ नए आ जाते हैं। उसने समझना शुरू किया कि यह सब किसी नियम के अनुसार हो रहा है। यही विज्ञान की शुरुआत थी, प्रकृति के नियमों को समझने की कोशिश।”

अनुषा ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “तो विज्ञान का मतलब सिर्फ किताबें नहीं हैं?”

मैंने शाम के लिए अलाव जलाने के लिए तैयारी शुरू कर दी थी, लकडीयो को जलाने के लिए एक ढेरी के रूप में जमा रहा था।

मैंने माचिस की तीली से आग जलाते हुए उत्तर दिया,, “बिल्कुल नहीं। विज्ञान का मतलब है प्रश्न पूछना। और उस समय मानव हर चीज़ पर प्रश्न करता था। जब उसने पहली बार देखा कि दो पत्थरों को टकराने से चिंगारी निकलती है, तो उसने सोचा, क्या इससे कुछ और हो सकता है? उसने कोशिश की, बार-बार की, और एक दिन आग जल उठी। इसी तरह जैसे मैंने तीली को माचिस की इस सतह से रगड़ कर उसे जलाया।” पढ़ना जारी रखें प्रागैतिहासिक काल में गणित और विज्ञान

यज्ञ वेदी से दशमलव तक: भारतीय गणित और विज्ञान की अद्भुत विरासत


शाम हो चुकी थी, पश्चिम में लालिमा फ़ैलना शुरू हो चुकी थी, पक्षी अपने घोंसलों की और लौटा रहे थे। गार्गी और अनुषा दोनों मेरे पास आँगन में बैठे थे , उनकी आँखों में जिज्ञासा चमक रही थी।

“पापा ,” गार्गी ने पूछा, “क्या प्राचीन भारत में सच में विज्ञान इतना विकसित था? या यह सिर्फ कथाएँ हैं?”

पिता मुस्कुराए, “यह केवल कथाएँ नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है। आज मैं तुम लोगों एक ऐसी यात्रा पर ले चलूँगा जहाँ यज्ञ वेदी, तारे, गणित, चिकित्सा सब एक साथ जुड़ते हैं।”

मैंने कहा, “कल्पना करो, गंगा नदी के किनारे एक आश्रम है। वहाँ एक आचार्य अपने शिष्यों के साथ यज्ञ वेदी बना रहे हैं।”

पुत्री ने पूछा, “क्या वे सिर्फ पूजा के लिए बना रहे थे?”

“हां भी और नहीं भी,” मैंने कहा “ वह पूजा के लिए अवश्य था लेकिन उस वेदी के निर्माण में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया छुपी थी।”

“कैसे?”

“वे रस्सी (शुल्ब) से मापते थे, गांठों से दूरी तय करते थे, और 3-4-5 के त्रिभुज से समकोण बनाते थे। यह वही सिद्धांत है जिसे बाद में पाइथागोरस प्रमेय कहा गया। और हमने इसके पहले भी देखा है, ये मिस्र और मेसोपोटामिया के लोग भी जानते थे।”

अनुषा उत्साहित हो गई, “तो गणित वहीं से शुरू हुआ?”

मैंने आगे कहा “गणित जीवन से जुड़ा था। शुल्बसूत्र में इन सभी विधियों का विवरण मिलता है।”

“और वेदी के आकार?”

“वर्ग, वृत्त, बाज के आकार की शेनचिति हर आकार का अर्थ था। उस समय यह केवल संरचना नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का प्रतीक था।”

शाम हो गई थी। आकाश तारों से भर गया।

अनुषा ने पूछा, “ताऊजी, क्या प्राचीन लोग सच में जानते थे कि पृथ्वी घूमती है?”

मैंने उत्तर दिया ,“हाँ, और यह आर्यभट्ट ने बताया था।”

“उन्होंने क्या कहा था?”

“उन्होंने कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, और दिन-रात उसी से होते हैं। उन्होंने ग्रहणों का कारण भी वैज्ञानिक रूप से समझाया।”

“और कौन थे ऐसे विद्वान?”

मैंने गाथा आगे बढ़ाई,“वराहमिहिर ने ग्रहों, नक्षत्रों और मौसम का गहन अध्ययन किया।”

“क्या वे भविष्य बता सकते थे?”

मै मुस्कराया “ प्राचीन भारत में ज्योतिष का अर्थ था ज्योति पिंडो की गति का अध्ययन , वे गणना के आधार पर ग्रहो की स्तिथि, सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का समय बता देते थे। ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों की स्थिति और ग्रहण का समय निकालने के सूत्र दिए। लेकिन इन सब गणनाओ के आधार पर मानव का भविष्य बताना बाद में ज्योतिष में आया। ”

“और आगे?”

“भास्कराचार्य ने इन सबको और आगे बढ़ाया और गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति का भी उल्लेख किया। यह गुरुत्वाकर्षण जैसी किसी शक्ति के आस्तित्व के ज्ञान का आरंभिक रूप था, जिसे आधुनिक युग में न्यूटन और आइंस्टाइन ने गणितीय आधार और सार्वभौमिकता दी।” पढ़ना जारी रखें यज्ञ वेदी से दशमलव तक: भारतीय गणित और विज्ञान की अद्भुत विरासत