चंद्रमा पर मानव के 50 वर्ष विशेष : मानव का यह एक नन्हा कदम, मानवता की एक लम्बी छलांग है।


20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर पहली बार मानव के कदम पड़े। नासा के अभियान अपोलो-11 से नील आर्मस्ट्रॉन्ग, माइकल कॉलिन्स और एडविन एल्ड्रिन पहली बार चंद्रमा पर पहुंचे। मानव को चंद्रमा पर पहुंचाने की पहली कोशिश के तहत 16 जुलाई 1969 को अमेरिका के केप कैनेडी स्टेशन से अपोलो 11 यान तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर रवाना हुआ था।

भूतपूर्व सोवियत संघ ने 12 अप्रैल 1961 के दिन विश्व को स्तब्ध कर दिया था। उसने मानव इतिहास में पहली बार अपने एक वायुसैनिक विमान चालक यूरी गगारिन को अंतरिक्ष में भेजने का कारनामा कर दिखाया। अमेरिका तब तक ऐसा कोई चमत्कार नहीं कर पाया था। सोवियत संघ से पिछड़ जाने की इस कड़वाहट को उससे अगड़ जाने की मिठास में बदलने के लिए अमेरिका ने निश्चय किया कि चंद्रमा पर सबसे पहले उसी का कोई नागरिक पहुंचेगा। चंद्रमा ही पृथ्वी का सबसे निकट पड़ोसी होने के नाते हमारे कौतूहल का प्रमुख विषय रहा है।

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनडी ने गगारिन की अंतरिक्षयात्रा के एक ही महीने बाद 25 मई 1961 को, अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को संबोधित करते हुए कहा,

‘अब समय आ गया है एक लंबी छलांग का। एक बड़े अमेरिकी कार्य का … मैं समझता हूं कि हमारे देश को इस दशक के पूरा होने से पहले ही चंद्रमा पर आदमी को उतारने और उसे पृथ्वी पर सुरक्षित वापस लाने का लक्ष्य प्राप्त कर लेना चाहिये।’

और इसी के साथ स्पर्धा आरंभ हो गई। ‘अपोलो’ नाम के नये अंतरिक्षयानों के द्वारा चंद्रमा तक पहुंचने की एक नयी योजना बनी। अपोलो यान चंद्रमा के पास पहुंच कर उसकी परिक्रमा करते और दो यात्रियों वाले अपने साथ के ‘ल्यूनर मॉड्यूल’ (अवतरणयान) को उसकी सतह पर उतारते। चंद्रमा पर पैर रखने वाले दोनों य़ात्री वहां कुछ अवलोकन-परीक्षण करते और वहां की मिट्टी तथा कंकड़-पत्थर के नमूने जमा कर अपने साथ ले आते।

इस अभियान के लिये निम्नलिखीत पर्याय थे

  1. सीधी उडा़न : एक अंतरिक्षयान एक इकाई के रूप में चन्द्रमा तक सीधी उड़ान भरेगा, उतरेगा और वापिस आयेगा। इसके लिये काफी शक्तिशाली राकेट चाहीये था जिसे नोवा राकेट का नाम दिया गया था।
  2. पृथ्वी परिक्रमा केंद्रीत उडा़न: इस पर्याय में दो सैटर्न V राकेट छोडे़ जाने थे, पहला राकेट अंतरिक्षयान को पृथ्वी की कक्षा के बाहर छोड़ने के बाद अलग हो जाता जबकि दूसरा राकेट उसे चन्द्रमा तक ले जाता।
  3. चन्द्र सतह केंद्रीत उडा़न: इस पर्याय में दो अंतरिक्ष यान एक के बाद एक छोडे़ जाते। पहला स्वचालित अंतरिक्षयान इंधन को लेकर चन्द्रमा पर अवतरण करता, जबकि दूसरा मानव अंतरिक्ष यान उसके बाद चन्द्रमा पर पहुंचता। इसके बाद स्वचालित अंतरिक्ष यान से इंधन मानव अंतरिक्षयान में भरा जाता। यह मानव अंतरिक्षयान पृथ्वी पर वापिस आता।
  4. चन्द्रमा कक्षा केंद्रीत अभियान : इस पर्याय में एक सैटर्न राकेट द्वारा विभीन्न चरणो वाले अंतरिक्ष यान को प्रक्षेपित करना था। एक नियंत्रण यान चन्द्रमा की परिक्रमा करते रहता, जबकि चन्द्रयान चन्द्रमा पर उतरकर वापिस नियंत्रण यान से जुड़ जाता। अन्य पर्यायो की तुलना में इस पर्याय में चन्द्रयान काफी छोटा था जिससे चन्द्रमा की सतह से काफी कम द्रव्यमान वाले यान को प्रक्षेपित करना था।

1961 में नासा के अधिकतर विज्ञानी सीधी उड़ान के पक्ष में थे। अधिकतर अभियंताओ को डर था कि बाकि पर्यायो की कभी जांच नहीं की गयी है और अंतरिक्ष में यानो का विच्छेदीत होना और पुनः जुड़ना एक खतरनाक और मुश्किल कार्य हो सकता है। लेकिन कुछ विज्ञानी जिसमे जान होबाल्ट प्रमुख थे, चन्द्रमा परिक्रमा केंद्रीत उडानो की महत्त्वपूर्ण भार में कमी वाली योजना से प्रभावित थे।

जॉन ह्यूबोल्ट ने लूनार आर्बिट रेंडेवू (एलओआर) नज़रिया दिया, जिसमें कहा गया कि एक मदरशिप होगा जो चंद्रमा की कक्षा के चक्कर लगाएगा और एक छोटा अंतरिक्ष यान उससे अलग होकर सतह पर लैंड करेगा। ह्यूबोल्ट के मुताबिक़ इस नज़रिए से समय और ईंधन दोनों बचेगा। इसके साथ ही अंतरिक्ष उड़ान के विभिन्न चरणों जैसे राकेट के विकास, जांच, टेस्टिंग, निर्माण, अंतरिक्ष यान को खड़ा करना, उल्टी गिनती और प्रक्षेपण सब आसान हो जाएंगे। होबाल्ट ने सीधे सीधे इस कार्यक्रम के निदेशक राबर्ट सीमंस को एक पत्र लिखा। उन्होने इस पर्याय पर पूरा विचार करने का आश्वासन दिया।

इन सभी पर्यायो पर विचार करने के लिये गठित गोलोवीन समिती ने होबाल्ट के प्रयासो को सम्मान देते हुये पृथ्वी परिक्रमा केंद्रीत पर्याय और चन्द्रमा केन्द्रीत पर्याय दोनो के मिश्रीण वाली योजना की सीफारीश की। 11 जुलाई 1962 को इसकी विधीवत घोषणा कर दी गयी।

‘अपोलो चंद्र अभियान’ अभियान में जर्मन अभियंताओं की भूमिका

‘अपोलो’ यानों को चंद्रमा की दिशा में प्रक्षेपित करने के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के सौ से अधिक जर्मन इंजीनियरों एवं तकनीशियनों की सहायता से सैटर्न V नाम के महाशक्तिशाली रॉकेटों की एक नयी श्रृंखला विकसित की गयी। उस समय शायद ही कोई जानता था कि इन जर्मनों ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों में हिटलर के लिए वी-2 (फ़र्गेल्टुंग्स वाफ़े/प्रतिशोध अस्त्र) नाम का रॉकेट बनाया था। 1945 में जर्मनी के पराजित होते ही एक गोपनीय अभियान चला कर हिटलर की गोपनीय रॉकेट योजना मे कार्यरत वेर्नहेर फ़ॉन ब्राउन और आर्थर रूडोल्फ जैसे उन सौ से अधिक जर्मन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को जमा किया और अमेरिका ले जाया गया। चंद्रमा पर सबसे पहले पहुंचने का अमेरिकी सपना, रॉकेट बनाने में कुशल इन जर्मनों के बिना शायद ही साकार हो पाया होता।

अंतरिक्षयान की बनावट

अपोलो अंतरिक्ष यान के तीन मुख्य हिस्से और दो अलग से छोटे हिस्से थे। नियंत्रण कक्ष(नियंत्रण यान) वह हिस्सा था जिसमे अंतरिक्ष यात्री अपना अधिकतर समय (प्रक्षेपण और अवतरण के समय भी) बीताने वाले थे। पृथ्वी पर सिर्फ यही हिस्सा लौटकर आने वाला था। सेवा कक्ष में अंतरिक्षयात्रीयो के उपकरण, आक्सीजन टैंक और चन्द्रमा तक ले जाने और वापिस लाने वाला इंजन था। नियंत्रण और सेवा कक्ष को मिलाकर नियंत्रण यान बनता था।

चन्द्रयान चन्द्रमा पर अवतरण करने वाला यान था। इसमे अवरोह और आरोह चरण के इंजन लगे हुये थे जो कि चन्द्रमा पर उतरने और वापिस मुख्य नियंत्रण यान से जुड़ने के लिये काम में आने वाले थे। ये दोनो इंजन भी नियंत्रण यान से जुड़ने के बाद मुख्य यान से अलग हो जाने वाले थे। इस योजना में चन्द्रयान का अधिकतर हिस्सा रास्ते में ही छोड़ दिया जानेवाला था, इसलिये उसे एकदम हल्का बनाया जा सकता था और इस योजना में एक ही सैटर्न V राकेट से काम चल सकता था।

अपोलो 1 : दुर्घटना के साथ शुरुवात

शहीद अंतरीक्ष योद्धा : गस इवान ग्रासीम, एडवर्ड एच व्हाईट द्वीतिय और रोजर बी कैफ़ी(“Gus” Ivan Grissom, Edward H. White II and Roger B. Chaffee)

शहीद अंतरीक्ष योद्धा : गस इवान ग्रासीम, एडवर्ड एच व्हाईट द्वीतिय और रोजर बी कैफ़ी(“Gus” Ivan Grissom, Edward H. White II and Roger B. Chaffee)

इस अभियान के लिये जांच उड़ानो की योजना नही बनाई गई थी। किसी ने भी इस बारे में सोचा ही नहीं था कि यान में 100 फीसदी शुद्ध ऑक्सीजन के 1.1 बार दबाव वाले वातावरण में यदि कहीं से कोई चिंगारी आ गयी तो क्या होगा!’

27 जनवरी 1967 शाम को एक ऐसी ही दुर्घटना आख़िर हो ही गयी। हुआ यह कि अपोलो यान के कमांडो कैप्सूल के साथ ज़मीन पर ही एक परीक्षण के समय उसमें आग लग गई। कैप्सूल में सामान्य हवा की जगह शुद्ध ऑक्सीजन भरी थी और उसका दबाव भी औसत वायुमंडलीय दबाव से अधिक था। कैप्सूल के भीतर बिजली की एक चिंगारी से आग लग गयी और उसमें बैठे तीनों अंतरिक्षयात्री विर्गील ग्रीसम, एड व्हाईट और रोजर कैफी एक मिनट के भीतर ही जलकर भस्म हो गये।

अपोलो 7 तक के सभी यान चंद्रमा तक की उड़ान से पहले किसी न किसी प्रकार के परीक्षण से गुजरे थे। अपोलो 8 और 10 ने तीन यात्रियों के साथ चंद्रमा की केवल परिक्रमा की और वापस लौट आये। अपोलो 11 ऐसा पहला यान था, जिसके जरिये तीन अंतरिक्षयात्री पहली बार चंद्रमा तक पहुंचे। नील आर्मस्ट्रांग और एडविन ‘बज़’ एल्ड्रिन, चंद्रमा पर उतर कर चले-फिरे। तीसरे यात्री माइक कॉलिंस को ‘कोलंबिया’ नाम वाले मुख्य नियंत्रण यान में रह कर चंद्रमा की परिक्रमा करनी पड़ी, ताकि नीचे उतरे दोनों अंतरिक्षयात्रियों तथा अमेरिका में ह्यूस्टन के ‘मिशन कंट्रोल सेंटर’ में बैठे वैज्ञानिकों व इंजीनियरों के साथ रेडियो-संपर्क बना रहे।

विडंबना थी कि चंद्रमा पर पहुंचने के अपोलो कार्यक्रम के प्रणेता राष्ट्रपति कैनेडी अपने सपने को साकार होते देखने के लिए जीवीत नहीं थे। एक हत्यारे ने 22 नवंबर 1963 को उनकी हत्या कर दी थी। अपोलो कार्यक्रम पर काम तब भी पहले की तरह चलता रहा। दिसंबर 1968 में अपोलो का वाहक रॉकेट ‘सैटर्न5’ उड़ान के लिए तैयार था। अपोलो 10 और 17 के यूजीन सेर्नन ने एक साक्षात्कार में बताया, ‘हमने सीआईए से सुना था कि रूसी चंद्रमा की परिक्रमा के लिए समानव यान भेजने वाले हैं, ताकि हम नंबर दो रह जायें। रूसियों ने यदि हमारे वहां उतरने से पहले चंद्रमा की समानव परिक्रमा कर ली होती, तो हम एक बार फ़िर से पिछड़ गए होते।’

अपोलो 14 के एडगर मिचेल के शब्दों में

‘हमने अपोलो 8 की अपनी योजना बदल दी। पृथ्वी की परिक्रमा के बदले अब हम सीधे चंद्रमा पर जाना चाहते थे। यह एक जोखिमों भरी बहुत ही दुस्साहसिक बात रही होती। लेकिन, वह समय ही ऐसा था कि हम बैल को उसके सींग से पकड़ने को भी तैयार थे।’ अपोलो 8 को पृथ्वी से परे पहली बार दूर अंतरिक्ष में जाना था, पर उसे चंद्रमा पर उतरना नहीं, बल्कि उसकी परिक्रमा करके लौट आना था। चंद्रमा की दो और परीक्षणात्मक परिक्रमा उड़ानों के बाद नासा को लगा कि अब चंद्रमा पर किसी को उतारा भी जा सकता है।

अपोलो 11 की उड़ान से एक दिन पहले, 15 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए अपने सहयोगियों से कहा,

‘अपोलो 11 के यान यात्रीयों को कल मानव द्वारा किसी अन्य आकाशीय पिंड पर पहुंचाने के संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रथम प्रयास के प्रतिनिधित्व का सौभाग्य मिलेगा।’

अपोलो 11 की उड़ान

2940 टन भारी उस समय अमेरिका का सबसे शक्तिशाली रॉकेट ‘सैटर्न5’, अपोलो 11 को ले कर 16 जुलाई 1969 को जब उड़ा, तब भारत में शाम के सात बज कर दो मिनट हुए थे। उड़ान से पहले के समय को याद करते हुए एडविन ‘बज़’ एल्ड्रिन का कहना था,

‘जहां तक मैं याद कर पाता हूं, अभियान के आरंभ से कोई तीन सप्ताह पहले मैंने सिगरेट छोड़ दी। तीन दिन पहले अपना अंतिम ड्रिंक लिया। मैं समझता हूं कि उड़ान से पहले हममें से कोई भी ठीक से सो नहीं पाया। ऐसे समयों पर हम यही सोचते हैं कि हमारे सामने जो काम है, हमसे जो अपेक्षा है, उसे जहां तक हो सके पूरा कर सकें … हम लिफ्ट से प्रक्षेपण मंच की तरफ बढ़े। मेरे पास 10 मिनट का समय था सूर्योदय को और समुद्र तट पर ठांठे मारती लहरों को देखने का। वहां भारी संख्या में दर्शक जमा हो गये थे। मैंने अपने आप से कहा, इस क्षण को याद कर लो।’

अपोलो 11 में ‘बज़’ एल्ड्रिन के साथी माइक कॉलिंस ने उस दिन का याद करते हुए कहा है,

‘प्रक्षेपण वाले दिन अन्य दिनों से कुछ अलग ही होते हैं। आप एक मिनी बस से प्रक्षेपण मंच के पास पहुंचते हैं। लेकिन जब आप दैत्याकार मंच के पैर के पास खड़े होते हैं, तो कोई आदमी नहीं दिखता। एकदम निर्जनता। अन्यथा तो वहां लोगों के हुजूम लगे रहते हैं। बड़ी चहल-पहल, बड़ी भीड़-भाड़ रहती है। और तब, जब अचानक कोई दिखता ही नहीं, तो आप सोचने लगते हैं, कहीं ऐसा तो नहीं है कि दूसरे ऐसा कुछ जानते हैं जो आप नहीं जानते? मुझे लग रहा था कि सारी दुनिया हमारे ऊपर नज़र गड़ाए हुए है। ऐसा नहीं था कि हमसे ग़लतियां हो सकती थीं। संकोच इस बात का था कि हर ग़लती का नतीजा दुनिया के तीन अरब लोगों के सामने होगा।’

प्रक्षेपण का टेलीविज़न पर सीधा प्रसारण हो रहा था। योजना के मुताबिक ‘लिफ्ट ऑफ़’ (प्रक्षेपण) स्थानीय समय के अनुसार 13 बजकर 32 मिनट पर था। नौ सेकंड पहले रॉकेट के इंजन की प्रज्वलन कड़ी शुरू हुई…3, 2, 1, 0 … आग का एक ज़बर्दस्त गोला रॉकेट के निचले भाग से फूट पड़ा। कान फाड़ देने वाले शोर के बीच रॉकेट उठने लगा।

‘अब हम ज़मीन पर नहीं हैं’

‘बज़’ एल्ड्रिन याद करते हैं,

‘रॉकेट के उठने के क्षण हमारे कैप्सूल के भीतर डिस्प्ले पर तरह-तरह के आंकड़े दिखायी पड़ने लगे। आवाज़ें भी सुनाई पड़ रही थीं। वायरलेस सेट पर हमें बताया गया कि हम उठ चुके हैं। लेकिन हम महसूस क्या कर रहे थे? मैं समझता हूं, ठीक उस समय हमारे मन में यही विचार आया कि अब हम ज़मीन पर नहीं हैं। एक हल्का-सा डगमगाहट भी महसूस हुई, जो शायद मार्ग नियंत्रण प्रणाली (गाइडेन्स सिस्टम) के कारण था।’

माइक कॉलिंस के शब्दों में

‘हम अपने नीचे रॉकेट के इंजनों की प्रचंड शक्ति को और सही दिशा में बने रहने की उसके प्रयासों को महसूस कर रहे थे। इतना बड़ा रॉकेट उठते समय किसी पेंसिल की नोक की तरह अपना संतुलन बनाये रखने की कोशिश करता है। इंजनों की इन हरक़तों को हम अपनी सीट पर महसूस कर रहे थे। आप केवल यही सोचते हैं कि रॉकेट कहीं इस या उस तरफ न झुक जाये।’

रॉकेट का तीसरा चरण उससे अलग होने के बाद पहली परिक्रमा कक्षा आई। एक साक्षात्कार में माइक कॉलिंस याद करते हैं,

‘हम एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। करने के लिए बहुत कुछ होता है, क्योंकि हम चाहते हैं कि चंद्रमा की दिशा में आगे बढ़ने से पहले सब कुछ ठीक से काम करे। जब तीसरे चरण के इंजन को चालू करने का आदेश मिलता है, तो इसका मतलब है कि अब सीधे चंद्रमा की तरफ जाना है। अब आपको कोई रोक नहीं सकता।’

गहन अंधकार के मध्य पृथ्वी

तीसरे चरण का इंजन चालू होते ही यान की गति 35 हज़ार फुट प्रति सेकेंड हो गयी। पृथ्वी की परिक्रमा कक्षा में क्षितिज बहुत हल्का-सा घुमाव लेता दिखता है। लेकिन सीधे चंद्रमा की दिशा में बढ़ते रहने पर यह घुमाव बढ़ता जाता है और एक समय पूरी पृथ्वी दिखायी पड़ने लगती है। अपोलो 16 के चार्ली ड्यूक याद करते हैं,

‘महासागर नीले और महाद्वीप भूरे रंग के दिखते हैं। बादलों और बर्फ का रंग चमकीला सफ़ेद हो जाता है। लगता है, पृथ्वी शून्यमय कालिमा के बीच किसी आभूषण जैसी लटकी हुई है।’

माइक कॉलिंस के शब्दों में

‘वह (पृथ्वी) बहुत शांत, स्वस्थिर और खुश लगती है। साथ ही बहुत ही भंगुर भी। बात अजीब-सी है लेकिन मन में जो पहला विचार आया, वह यही था कि हे भगवान, वह नन्हीं-सी चीज़ वहां कितनी क्षणभंगुर है!’ अपोलो 14 के यात्री रहे एडगर मिचेल का कहना था, ‘चंद्रमा जितना निकट आता है, पृथ्वी उतनी ही छोटी दिखने लगती है। यह सब (ईश्वर के प्रति) बहुत ही विनम्रतापूर्ण सम्मान से ओतप्रोत कर देता है। हम मन ही मन पृथ्वी से विदा लेने और चंद्रमा का अभिनंदन करने लगते हैं।’

अपोलो 11 अपने तीन यात्रियों के साथ तीन लाख 84 हजार 403 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 76 घंटे बाद चंद्रमा की परिक्रमा कक्षा में पहुंचा। भारतीय समय के अनुसार, 20 और 21 जुलाई के बीच की मध्यरात्रि को एक बजकर 47 मिनट और 40 सेकंड पर अवतरण यान ‘ईगल’, नील आर्मस्ट्रांग और एडविन ‘बज़’ एल्ड्रिन को ले कर चंद्रमा पर उतरा। उनके तीसरे साथी माइक कॉलिंस को परिक्रमायान ‘कोलंबिया’ में ही बैठे रह कर पृथ्वी और चंद्रमा के बीच रेडियो संपर्क बनाये रखना था। यह संपर्क उन क्षणों में बहुत ही निर्णायक सिद्ध होता है, जब कोई समस्या खड़ी हो जाये। अपोलो 11 के साथ भी एक ऐसी ही समस्या पैदा हुई थी, जो सारे किये-धरे पर पानी फेर सकती थी।

जब कंप्यूटर अलार्म बजाने लगा

अंतरिक्षयात्रियों को कब क्या करना होता है इसकी हर बारीक़ी के साथ उन्हें एक ‘चेकलिस्ट’ दी जाती है। अपोलो 11 के मुख्य कमांडर नील आर्मस्ट्रांग वैसे तो बहुत ही सूझबूझ से काम करने वाले व्यक्ति थे। लेकिन जब उन्हें चंद्रमा की सतह पर उतरने के उड़नखटोले ‘ईगल’ को परिक्रमायान ‘कोलंबिया’ से अलग करने की प्रक्रिया शुरू करनी थी, तब उन्होंने ‘ईगल’ के नीचे उतरने के अवतरण राडार और ‘कोलंबिया’ के पास वापसी के पुनर्मिलन राडार, दोनों को एक साथ सक्रिय कर दिया।

इससे ‘ईगल’ के नीचे उतरने के दौरान ‘कोलंबिया’ पर लगे बोर्ड-कंप्यूटर पर इतना बोझ पड़ गया कि वह गड़बड़ी का अलार्म बजाने लगा। आर्मस्ट्रांग ने सोचा था कि नीचे उतरने के दौरान यदि अचानक कोई समस्या पैदा होती है और उन्हें ‘कोलंबिया’ के पास तुरंत लौटना पड़ता है, तो दोनों राडार का एक साथ काम करना बेहतर रहेगा। यह बात पहले किसी ने सोची ही नहीं थी कि कभी दोनों राडार एक साथ चालू रखने पड़े, तब क्या होगा? इस विकट स्थिति में आर्मस्ट्रांग को सीधे ह्यूस्टन से मिल रहे मार्गदर्शन के अनुसार नीचे उतरना पड़ा।

‘ईगल’ के इंजन के लिए ईंधन इतना नपातुला था कि उतरने की सुरक्षित जगह का निर्णय भी कुछेक पलों में ही करना था। माइक कॉलिंस याद करते हैं, ‘वहां किसी कार जितनी बड़ी चट्टानें थीं। यदि ईगल का एक पैर ऐसी किसी चट्टान पर होता और दूसरा किसी गड्ढे में, तब तो और भी मुश्किल हो जाती।’

अंतरिक्षयात्रा के इतिहास का अमर वाक्य

‘ईगल’ चार पायों वाले किसी भद्दे उड़नखटोले के समान था। आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन को चंद्रमा पर उतरने के बाद ‘ईगल’ में क़रीब पांच घंटे तक बैठे रह कर परिक्रमायान कोलंबिया की तरफ वापसी के लिए आवश्यक तैयारियां करनी और ‘ईगल’ की खिड़कियों के पीछे से आस-पास की दृश्यावली के फ़ोटो लेने थे। यह सब करने के बाद, 21 जुलाई 1969 को, भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बज कर 26 मिनट पर, नील आर्मस्ट्रांग ‘ईगल’ से बाहर निकले। उनके शब्द थे,

‘मैं अब सीढ़ी से नीचे उतर रहा हूं। फेरी (ईगल) के पैर 3-4 सेंटीमीटर मिट्टी में धंस गये लगते हैं। (चंद्रमा की) ऊपरी सतह बहुत ही महीन रेत की बनी हुई लगती है। इतनी बारीक है कि पाउडर जैसी दिखती है….. अब मैं सीढ़ी से परे हटूंगा।’

और तब नील आर्मस्ट्रांग ने वह वाक्य कहा, जो अंतरिक्षयात्रा के इतिहास का अमर वाक्य बन गया हैः

मानव का यह एक नन्हा कदम, मानवता की एक लम्बी छलांग है। (One small step for man; one giant leap for mankind.)

20 मिनट बाद बज़ एल्ड्रिन ने भी ‘ईगल’ से बाहर निकल कर चंद्रमा की मिट्टी पर अपने पैर रखे। उनके शब्दों में

‘हमने (अमेरिका का) ध्वज खोला और उसका डंडा मिट्टी में गाड़ा, हालांकि हमने इससे पहले इसका अभ्यास नहीं किया था। हम चंद्रमा पर खड़े थे और मुझे महसूस हुआ कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ होगा कि केवल दो आदमियों को इतने सारे लोग देख रहे हों। और यह भी पहले कभी नहीं हुआ होगा कि दूरी की दृष्टि से ही नहीं, हर तरह से (पृथ्वी से) जितनी दूर हम थे, उतनी दूर दूसरा कोई गया हो। इस मरुस्थल से अपने घर लौटने तक हमारे सामने अभी ढेर सारी चुनौतियां भी थीं।’

मानवता झूम उठी

चंद्रमा की सतह पर पड़ते किसी धरतीवासी के पहले क़दमों को देख कर सारा विश्व झूम उठा। नील आर्मस्ट्रांग में विश्व ने किसी अमेरिकी को नहीं, एक धरतीवासी को देखा। चंद्रमा की रेतीली ज़मीन पर पैर रखते ही वे पूरी मानवजाति का प्रतिनिधि बन गये। पृथ्वी के इस सुनसान-वीरान उपग्रह के बारे में आर्मस्ट्रांग के शब्द थे,

‘यहां अपने ढंग की एक अनोखी सुंदरता पसरी हुई है, कुछ वैसी ही, जैसी अमेरिका के पहाड़ी मरुस्थलों में दिखती है। दोनों की तुलना नहीं हो सकती, फिर भी बहुत ही सुंदर।’

आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन, दोनों ने वहां कई वैज्ञानिक उपकरण आदि रखे और पृथ्वी पर लाने के लिए कुछ मिट्टी और 21 किलो 600 ग्राम कंकड़-पत्थर जमा किये। चंद्रमा की धरती पर यह पहला विचरण दो घंटे 31 मिनट चला। इस दृश्य की सजीव तस्वीरें टेलीविज़न पर प्रसारित हो रही थीं। लोग चंद्रयात्रियों और ह्यूस्टन स्थित मिशन कंट्रोल के लोगों के बीच बातचीत भी सुन सकते थे। अपोलो 15 के डेव स्कॉट याद करते हैं, ‘विज्ञान फ़तांशी के जिन लेखकों ने चंद्रमा पर उतरने की जो भी कथा-कहानियां लिखीं हैं, उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि इस तरह के अवतरण को सारी दुनिया उसी क्षण देख भी रही होगी।’

इस सारे समय माइक कॉलिंस कोलंबिया में अकेले बैठे चंद्रमा की परिक्रमा करते रहे। उनके शब्दों में

‘मैंने सुना कि मुझे पूरे ब्रह्मांड में सबसे अकेला आदमी बताया गया। एकदम बकवास! मैं तो कहूंगा कि नियंत्रण केंद्र सारे समय मुझे से बातें करता रहा। मुझे अच्छा लग रहा था। मैं भलीभांति जानता था कि (परिक्रमायान में) मैं अकेला था। मैं उस समय चंद्रमा के पृष्ठभाग में था। मैं सोच रहा था, दूसरी ओर (पृथ्वी पर) तीन अरब लोग रहते हैं, दो आदमी वहां नीचे कहीं चंद्रमा पर हैं, और यहां मैं हूं। मैं न तो एकाकी था और न डरा-सहमा, बल्कि पूरी गहनता के साथ सचेत था, प्रफुल्लित था कि सब कुछ ठीक चल रहा था। मुझे वाकई बहुत अच्छा लग रहा था। मेरे कमान-कैप्सूल में सब कुछ बिना किसी गड़बड़ी के बढ़िया चल रहा था। वह मेरा अपना एक छोटा-सा घरौंदा था। रोशनी थी। मुझे मज़ा आ रहा था।’

घर वापसी

चंद्रमा पर घूमने-फिरने और अवतरणयान ‘ईगल’ में कुछ समय विश्राम करने के बाद दोनों चंद्रयात्रियों ने चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे ‘कोलंबिया’ से पुनर्मिलन के लिए ‘ईगल’ का इंजन चालू किया और क़रीब चार घंटे की उड़ान के बाद उससे जुड़ गये। दोनों ‘ईगल’ से निकल कर ‘कोलंबिया’ में चले गये। ‘ईगल’ को ‘कोलंबिया’ से अलग कर दिया गया और ‘कोलंबिया’ को वापसी के लिए पृथ्वी की दिशा में मोड़ दिया गया।

24 जुलाई 1969 को, भारतीय समय के अनुसार रात 10 बजकर 20 मिनट पर, ‘कोलंबिया’ अमेरिका के जॉन्स्टन द्वीप के पास प्रशांत महासागर में गिरा। वहां उसे एक अमेरिकी जहाज़ के हेलीकॉप्टर ने उठाया। इस डर से कि चंद्रयात्रियों के साथ कहीं कोई अज्ञात कीटाणु वगैरह न आ गये हों, उन्हें 17 दिनों तक सबसे अलग-थलग (क्वारन्टीन) रख कर उनकी जांच-परख की गई। इस के बाद ही वे देश-दुनिया के सामने आ सके और अपने अनुभव सुना सके।

1972 तक चंद्रमा पर उतरने और विचरण करने की कुल छह अपोलो उड़ानें हुईं। इनके जरिये कुल 12 अमेरिकी अंतिरक्षयात्रियों ने उसकी ज़मीन पर अपने पैर रखे। सभी के अनुभवों में कुछ समानताएं हैं तो कुछ अंतर भी हैं। चंद्रमा की धरती पर पहला क़दम रखने के सौभाग्यशाली नील आर्मस्ट्रांग 25 अगस्त 2012 को इस दुनिया से चल बसे। 21 दिसंबर 1968 से 18 दिसंबर 1972 के बीच कुल 24 अमेरिकी अंतरिक्षयात्री चंद्रमा तक गये, भले ही उस पर उतरे हो या न उतरे हों। मई 2019 तक उनमें से केवल 12 जीवित थे।

तय की गई जगहों पर उतरना था

अपोलो 12 के एलन बीन के शब्दों में

‘हम सबको शांति सागर (ट्रैंक्विलिटी मारे) में तय की गई जगहों पर उतरने के लिए तैयार किया जा रहा था। तीन क्रू (यात्रीदल) बनाए गए। अपोलो 11 को जुलाई में जाना था। यदि कोई गड़बड़ होती तो दो महीने बाद हमारी (एलन बीन और डेव स्कॉट की) बारी आती। यदि यह भी नहीं हो पाता, तो दो महीने बाद नवंबर में अपोलो 13 की बारी होती। यानी (1960 वाले) दशक के अंत तक चंद्रमा पर उतरने के हमारे पास तीन मौके होते। नील आर्मस्ट्रांग और माइक कॉलिंस को अपोलो 11 से जाना था। उन्हें पहला प्रयास करना था। वे बहुत ही कुशल क्रू थे और एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे। माइक निश्चिंत कि़स्म का आदमी था। वह चीज़ों को हल्के- से लेता था।’

अपोलो 11 के माइक कॉलिंस याद करते हैं,

‘मुझे दुख था कि मैं चंद्रमा की सतह पर उतरने वाले फेरी यान में नहीं जा सका। यह एक ऐसा निर्णय था, जो ऊपर से आया था। एक जने को कमान कैप्सूल में रहना था। बाक़ी दोनों को चंद्रमा पर उतरना था। इस तरह कैप्सूल-पायलट होने के नाते मैं (एक तरह से) कैप्सूल-क़ैदी था। चंद्रमा पर पैर रखने का अवसर तो मुझे नहीं मिला, लेकिन यह भी क्या कम है कि मुझे चंद्रयात्रा का और उस कर्मीदल का सदस्य होने का सुअवसर मिला, जो पहली बार चंद्रमा पर उतरा था।’

चंद्रमा पर क्रिसमस मनाया

अपोलो 14 के एडगर मिचेल ने याद करते हैं, ‘हमने पहली बार जब चंद्रमा को बिल्कुल पास से देखा, तब उसके क्रेटरों से केवल 60 मील की दूरी पर से चक्कर लगा रहे थे। हम इतने उत्तेजित थे कि अपने उड़ान कार्यक्रम को ही कुछ समय के लिए भूल गये। खूब फ़ोटो खींचे। वह प्रसिद्ध फ़ोटो भी खींचा जिसमें नीले रंग की पृथ्वी चंद्रमा के पीछे से उदय हो रही थी। क्रिसमस वाली रात चंद्रमा के पास होना एक रोमांचक अनुभूति थी।

अपोलो12 के एलन बीन के शब्दों में

‘यदि आप चंद्रमा पर पहुंच गये हैं और (यान से) बाहर उतरते हैं, तो वहां (आपके स्वागत के लिए) कोई नहीं होता। केवल हमारा फेरी यान और (उससे आये) हम दोनों जने ही वहां थे। दूर-दूर तक फैली उस मरुभूमि पर केवल हम दोनों ही थे! एक बहुत ही अजीब-सी अनुभूति थी वह। बहुत ही अजीब लग रहा था कि केवल हम दो लोग वहां हैं, बस!’

यात्रीयो का विनयभाव

अपोलो 16 के चार्ली ड्यूक याद करते हैं,

‘मुझे विधाता के प्रति गहरे विनयभाव की अनुभूति होती थी। चंद्रमा ऐसा सबसे सुंदर मरुस्थल है, जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं। पूरी तरह कौमार्यपूर्ण और अनछुआ। उसकी अपनी ही आभा है। चंद्रमा की अपनी दृश्यावली और उसके ऊपर छाये आकाश के बीच का विरोधाभास ऐसा अनोखा है कि हम बस ठगे-से रह जाते हैं।

अपोलो 17 के हैरिसन श्मिट के शब्दों में

‘हम विज्ञान की सेवा में शोधक थे। हम चीज़ें देख रहे थे, जिन्हें हम से पहले किसी ने नहीं देखा था। यदि देखा भी रहा होगा, तो हमारे दष्टिकोण से नहीं देखा होगा। हम चंद्रमा, अपनी पृथ्वी, सौरमंडल और समग्र ब्रह्मांड बीच एकत्व देख रहे थे।’

अपोलो 11 के माइक कॉलिंस याद करते हैं,

‘मुझे ऐसा नहीं लग रहा था कि हम कोई बड़ा काम कर पाये। हमने किसी हद तक कुछ किया है, पर मेरे लिए चंद्रमा पर उतरने की अपेक्षा वहां से वापसी की उड़ान कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी। चंद्रमा पर उतरने के फ़ेरी यान (ईगल) में केवल एक ही इंजन था। यदि वह चालू नहीं हो पाया होता तो दोनों जन ज़िंदा नहीं बचे होते। हमारे पास वहां से वापस आने का कोई विकल्प नहीं होता। भाग्य नहीं चाहता था कि जो पुरुष चंद्रमा का शांतपूर्ण अन्वेषण करने गये थे, उन्हें वहीं अंतिम शांति मिले। उनमें से हर एक, नील आर्मस्ट्रंग और एल्ड्रिन, अच्छी तरह जानते थे कि कि यदि कोई गड़बड़ी हुई, तो उनके उद्धार की कोई आशा नहीं है। पर वे यह भी जानते थे कि उनके बलिदान में संपूर्ण मानवजाति की आशा निहित है।’

पहले से ही रिकार्ड शोकसंदेश

चंद्रयात्रियों के लौट नहीं पाने या दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की स्थिति में रेडियो और टेलीविज़न के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की आवाज़ में एक शोकसंदेश पहले से ही रिकार्ड कर लिया गया था,

‘प्रिय देशवासियों, मैं संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति बोल रहा हूं। मैं आपको एक ऐसे तथ्य से परिचित कराने के लिए विवश हूं, जो बहुत से अमेरिकियों और विश्व के बहुत सारे लोगों को बहुत ही शोकसंतप्त कर देगा….’

अपोलो 11 के माइक कॉलिंस याद करते हैं,

‘जब वे (आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन) कमांडो मॉड्यूल (परिक्रमायान) में वापस आ गये, तो मैंने आ्रमस्ट्रांग को कानों के पास पकड़ा और उसे माथे पर चूमना चाहा। मुझे अच्छी तरह याद है। लेकिन तभी मेरे मन में विचार आय़ा कि यह शायद जंचेगा नहीं। मैं नहीं जानता कि मैने उसके कंधे थपथपाये, हाथ मिलाया या क्या किया। दूसरी ओर, पुनर्मिलन मनाने का हमारे पास समय भी नहीं था। हमें तुरंत पृथ्वी की तरफ़ वापसी की, घर जाने की तैयारी करनी थी।’

ब्रह्मांड के साथ मिलन और अपनत्व की अनुभूति

अपोलो 14 के एडगर मिचेल के शब्दों में

‘पृथ्वी की तरफ वापसी उड़ान सबसे सुखद अनुभूति थी। मैं कॉकपिट की खिड़की से हर दो मिनट पर पृथ्वी, चंद्रमा, सूर्य और 360 अंश के पूरे अंतरिक्ष का परिदृश्य देखा करता था। बहुत ही अभिभूत कर देने वाला परिदृश्य था। मुझे इस में भी कोई संदेह नहीं रहा कि मेरे शरीर के, हमारे अंतरिक्षयान के और मेरे साथियों के अणु-परमाणु अकल्पनीय चिरकाल पहले रचे-बनाये गये थे। यह ब्रह्मांड के साथ एकत्व और अपनत्व की एक गहरी अनुभूति थी। मैं, हम सभी, सब कुछ से जुड़े हैं। यह मेरे लिए यह परमानंद के समाऩ था। वह किसी धार्मिक-आध्यात्मिक सत्ता के दर्शन से कम नहीं था। एक नया ज्ञान-बोध था।

अपोलो 10 और 17 के यूजीन सेर्नन याद करते हैं,

‘(चंद्रमा पर होने की) वह एक ऐसी अनुभूति थी, मानो मैं अंतरिक्ष में कहीं वैज्ञानिकों और तकनीशियनों के बनाये किसी पठार पर खड़ा हूं। मुझे यह महसूस हुआ कि ठीक इन्हीं वैज्ञानिकों और तकनाशियनों के पास (हमारे) सबसे निर्णायक प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है। मैं यहां खड़ा था और पृथ्वी वहां थी, बहुत ही अभिभूत कर देने वाली थी। मुझे लगा कि यह दुनिया इतनी जटिल, इतनी तार्किक और सुंदर है कि यह हो नहीं सकता कि वह मात्र किसी संयोगवश बन गयी हो सकती है। ज़रूर कोई ऐसी सत्ता है जो आप से और मुझ से भी बड़ी है। मैं यह बात किसी धार्मिक अर्थ में नहीं, आध्यात्मिक अर्थ में कह रहा हूं। ज़रूर कोई सृष्टा भी है, जो धर्मों से ऊपर है, हमें बनाता है और हमारे जीवन को दिशा देता है।’

जीवन बदल गया

अपोलो 11 के बज़ एल्ड्रिन याद करते हैं,

‘मुझे पता था कि चंद्रमा पर गये हम पहले लोगों की वापसी पर हमारा ज़ोरदार स्वागत होगा। मिशन के दौरान यह बोध एक अजीब-सा बोझ था। लेकिन वापसी के बाद जीवन भर के लिए सब कुछ बदल गया था। हम युद्धक विमान के पायलट भर नहीं रह गये थे, जिसने सब कुछ शायद ठीक-ठाक ही किया था, बल्कि वह आदमी थे, जिसने चंद्रमा पर अपने पैर रखे थे। मेरे साथ यह विशेषण अब मेरे बाक़ी सारे जीवनकाल के लिए जुड़ा रहेगा, में चाहे जो काम करूं।

अपोलो 12 के एलन बीन के शब्दों में

‘सच- सच कहूं, तो मैं नहीं जानता कि मुझे किस बात के लिए नील आर्मस्ट्रांग की आलोचना करनी चाहिये। मुझे इस बात की सचमुच बहुत खुशी है कि वही चंद्रमा पर सबसे पहले अपने पैर रखने वाला पहला मनुष्य था। वह अंतर्मुख़ी क़िस्म का ज़रूर था, पर यही उसके व्यक्तित्व के साथ सबसे अधिक फ़बता भी था। हां, मुझे थोड़ी ईर्ष्या भी ज़रूर होती है, लेकिन यह ठीक ही था कि वही सबसे पहला था। मैं उसकी जगह नहीं लेना चाहता। यह कोई आसान बात नहीं है।’

वापसी के बाद विश्व-यात्रा

अपोलो 11 के माइक कॉलिंस याद करते हैं,

‘अपनी वापसी के बाद हम तीनों विश्व-यात्रा पर निकले। जहां कहीं हम गये, लोगों ने कहा, यह ‘हमारी’ उपलब्धि है न कि अमेरिकियों की। हमारी, हमारी, इस दुनिया के ‘हम मनुष्यों’ की यह सफलता है। मैंने इससे पहले कभी नहीं सुना था कि विभिन्न देशों के इतने सारे लोग इतने हर्षोल्लास के साथ हम-हम कह रहे हों, चाहे वे यूरोपीय हों या एशियाई या फिर अफ्रीकी। सब जगह यही कहा जा रहा था कि ‘हमने’ इसे कर दिखाया। यह भावविभोर कर देने वाला था, बहुत ही सुखद अनुभव था।’

अपोलो 11 के तीनों अंतरिक्षयात्री 26 अक्टूबर 1969 को मुंबई (तब बंबई) भी पहुंचे। हवाई अड्डे से ताज महल होटल जाने के 20 किलोमीटर लंबे रास्ते पर कड़ी धूप और गर्मी में 10 लाख से अधिक लोगों ने उनका अभिनंदन किया।

अपोलो अभियान का अंत और उसके परिणाम

अपोलो कार्यक्रम की तीन उड़ाने अपोलो 18,19,20 भी प्रस्तावित थी जिन्हे रद्द कर दिया गया था। नासा का बजट कम होते जा रहा था जिससे द्वितिय चरण के सैटर्न 5 राकेटो का उत्पादन रोक दिया गया था। इस अभियान को रद्द कर अंतरिक्ष शटल के निर्माण के लिये पैसा उपलब्ध कराने की योजना थी। अपोलो कार्यक्रम के यान और राकेटो के उपयोग से स्कायलैब कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। लेकिन इस कार्यक्रम के लिये एक ही सैटर्न 5 राकेट का प्रयोग हुआ, बाकि राकेट प्रदर्शनीयो मे रखे हैं।

नासा के अगली पीढी के अंतरिक्ष यान ओरीयान जो अंतरिक्ष शटल के 2010 मे रीटायर हो जाने पर उनकी जगह लेंगे, अपोलो कार्यक्रम से प्रभावित है। ओरीयान यान सोवियत सोयुज यानो की तरह जमीन से उड़ान भरकर जमीन पर वापिस आयेंगे, अपोलो के विपरीत जो समुद्र मे गीरा करते थे। अपोलो की तरह ओरीयान चन्द्र कक्षा आधारीत उड़ान भरेंगे लेकिन अपोलो के विपरीत चन्द्रयान एक दूसरे राकेट अरेस 5 से उड़ान भरेगा, अरेस 5 अंतरिक्ष शटल और अपोलो के अनुभवो से बना है। ओरीयान अलग से उड़ान भरकर चन्द्रयान से पृथ्वी की निचली कक्षा मे जुड़ेगा। अपोलो के विपरित ओरीयान चन्द्रमा की कक्षा मे मानव रहित होगा जबकि चन्द्रयान से सभी यात्री चन्द्रमा पर अवतरण करेंगे।
अपोलो अभियान पर कुल खर्च 135 अरब डालर था(2006 की डालर किमतो के अनुसार)(25.4 अरब डालर 1969 किमतो के अनुसार)। अपोलो यान के निर्माणखर्च 28 अरब डालर था जिसमे 17 अरब डालर नियंत्रण यान के लिये और 11 अरब डालर चन्द्रयान के लिये थे। सैटर्न 1ब और सैटर्न 5 राकेट का निर्माण खर्च 46 अरब डालर था। सभी खर्च 2006 की डालर किमतो के अनुसार है।

इस तरह मानव को पृथ्वी के बाहर किसी अन्य जमीन पर ले जाने वाला यह महान अभियान समाप्त हुआ!

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2 विचार “चंद्रमा पर मानव के 50 वर्ष विशेष : मानव का यह एक नन्हा कदम, मानवता की एक लम्बी छलांग है।&rdquo पर;

  1. आपके इस लेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
    प्रश्न – अभी हमारे देश ने चंद्रयान -२ लॉन्च किया है,इसका प्रमुख उद्देश्य क्या होगा?
    प्रश्न – क्या इसरो ने कभी अपने वैज्ञानिकों को भी चंद्रमा की सतह तक पहुंचाया है?अथवा पहुंचाने का प्रयास किया है?
    प्रश्न – यदि अपोलो 11 के समय नील आर्म स्ट्रॉन्ग फिसलते या गिरते तो क्या होता?

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