भारत का लिएनार्दो दा विंची : होमी जहाँगीर भाभा


होमी जहाँगीर भाभाभारत के वैज्ञानिक सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण होमी जहाँगीर भाभा को भारत का लिएनार्दो दा  विंची कहा करते थे। अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी। वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं। “आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्पोरेरी हिस्ट्री” की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, “मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे। यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था। जानेमाने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था। उनका कहना है कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। प्रोफ़ेसर यशपाल बताते हैं,

“संगीत में उनकी बहुत रुचि थी… चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत। किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए.. फ़र्नीचर कैसा बनना है.. हर चीज़ के बारे में बहुत गहराई से सोचते थे वह। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को कोलोकियम हुआ करता था और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम मिस किया हो। इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है।”

“एक प्रचलित कहावत है कि महापुरुष किसी परम्परागत पथ पर नहीं चलते बल्कि वह अपना लक्ष्य और पथ स्वयं तय करते हैं।”

"एक प्रचलित कहावत है कि महापुरुष किसी परम्परागत पथ पर नहीं चलते बल्कि वह अपना लक्ष्य और पथ स्वयं तय करते हैं।"

“एक प्रचलित कहावत है कि महापुरुष किसी परम्परागत पथ पर नहीं चलते बल्कि वह अपना लक्ष्य और पथ स्वयं तय करते हैं।”

यही पथ आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श पथ के रूप में स्थापित हो जाता है। आजकल तो युवा वर्ग विदेश जाने और वहाँ पर काम करने की ख्वाहिश से ही पढ़ाई कर रहा है। आज से करीब 50 वर्ष पूर्व एक युवक ने विपरीत दिशा में यात्रा की, तब वह युवक 29 वर्ष का था और उपलब्धियों भरे 13 वर्ष इंग्लैंड में बिता चुका था। उस समय कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था। वहाँ पर इस युवक ने न केवल पढ़ाई की बल्कि कार्य भी करने लगा था। जब अनुसंधान के क्षेत्र में इस युवक के उपलब्धियों भरे वर्ष बीत रहे थे तभी स्वदेश लौटने का अवसर आया। तब इस युवक ने अपने वतन भारत में रहकर ही कार्य करने का निर्णय लिया। उसे सिर्फ अपनी काबिलियत के दम पर प्रतिष्ठा पाने की इच्छा नहीं थी बल्कि उसके मन में अपने देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांति लाने का जुनून था। यह युवक कोई और नहीं, हमारे देश में परमाणु कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ. होमी जहाँगीर भाभा थे। यह डॉ. भाभा के उत्सर्गिक प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विश्व के सभी विकसित देश भारत के नाभिकीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा मानने लगे हैं।

आइन्सटाइन के साथ भाभा(एकदम दायें)

आइन्सटाइन के साथ भाभा(एकदम दायें)

होमी जहांगीर भाभा (30 अक्तूबर, 1909 – 24 जनवरी, 1966) भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसन्धान आरम्भ किया। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान में तब कार्य आरम्भ किया जब अविछिन्न शृंखला अभिक्रिया का ज्ञान नहीं के बराबर था और नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है। भाभा का जन्म मुम्बई के एक सभ्रांत पारसी परिवार में हुआ था। उनकी कीर्ति सारे संसार में फैली। भारत वापस आने पर उन्होंने अपने अनुसंधान को आगे बढ़ाया। भारत को परमाणु शक्ति बनाने के मिशन में प्रथम पग के तौर पर उन्होंने 1945 में मूलभूत विज्ञान में उत्कृष्टता के केंद्र टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआइएफआर) की स्थापना की। डा. भाभा एक कुशल वैज्ञानिक और प्रतिबद्ध इंजीनियर होने के साथ-साथ एक समर्पित वास्तुशिल्पी, सतर्क नियोजक, एवं निपुण कार्यकारी थे। वे ललित कला व संगीत के उत्कृष्ट प्रेमी तथा लोकोपकारी थे। 1947 में भारत सरकार द्वारा गठित परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। 1953 में जेनेवा में अनुष्ठित विश्व परमाणुविक वैज्ञानिकों के महासम्मेलन में उन्होंने सभापतित्व किया। भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक का 24 जनवरी सन 1966 को एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था।

 

उन्होंने मुंबई से कैथड्रल और जॉन केनन स्कूल से पढ़ाई की। फिर एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रोयाल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी पास किया। मुंबई से पढ़ाई पूरी करने के बाद भाभा वर्ष 1927 में इंग्लैंड के कैअस कॉलेज, कैंब्रिज इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने गए। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में रहकर सन् 1930 में स्नातक उपाधि अर्जित की। सन् 1934 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। जर्मनी में उन्होंने कास्मिक किरणों पर अध्ययन और प्रयोग किए। हालांकि इंजीनियरिंग पढ़ने का निर्णय उनका नहीं था। यह परिवार की ख्वाहिश थी कि वे एक होनहार इंजीनियर बनें। होमी ने सबकी बातों का ध्यान रखते हुए, इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूर की, लेकिन अपने प्रिय विषय भौतिकी से भी खुद को जोड़े रखा। नाभिकिय भौतिकी के प्रति उनका लगाव जुनूनी स्तर तक था। उन्होंने कैंब्रिज से ही पिता को पत्र लिख कर अपने इरादे बता दिए थे कि भौतिकी ही उनका अंतिम लक्ष्य है।

सी वी रामण के साथ भाभा

सी वी रामण के साथ भाभा

डॉ. भाभा जब कैम्ब्रिज में अध्ययन और अनुसंधान कार्य कर रहे थे और छुट्टियों मे भारत आए हुए थे तभी सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। यह वही दौर था जब हिटलर पूरे यूरोप पर तेजी से कब्जा करता जा रहा था और इंग्लैंड पर धावा सुनिश्चित दिखाई पड़ रहा था। इंग्लैंड के अधिकांश वैज्ञानिक युद्ध के लिये सक्रिय हो गए और पूर्वी यूरोप में मौलिक अनुसंधान लगभग ठप्प हो गया। ऐसे हालात में इंग्लैंड जाकर अनुसंधान जारी रखना डॉ. भाभा के लिए संभव नहीं था। ऐसी परिस्थिति में डॉ. भाभा के सामने यह प्रश्न स्वाभाविक था कि वे भारत में क्या करें? उनकी प्रखर प्रतिभा से परिचित कुछ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया। अंततः डॉ. भाभा ने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग मे प्राध्यापक के पद पर पदस्थ हुए। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण परिवर्तन साबित हुआ। डॉ. भाभा को उनके कार्यों में सहायता के बतौर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने एक छोटी-सी राशि भी अनुमोदित की। डॉ. भाभा के लिए कैम्ब्रिज की तुलना में बैंगलोर में काम करना आसान नहीं था। कैम्ब्रिज में वे सरलता से अपने वरिष्ठ लोगों से सम्बंध बना लेते थे परंतु बैंगलोर में यह उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे भारतीय सहयोगियों से संपर्क भी बनाना शुरू किया। उन दिनों भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर में सर सी. वी. रामन भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे। सर रमन ने डॉ. भाभा को शुरू से ही पसंद किया और डॉ. भाभा को ‘फैलो आफ रायल सोसायटी’ (FRS) में चयन हेतु मदद की।

यद्यपि बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य कर रहे थे परंतु वे देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में चिंतित थे। उनकी चिंता का मूल विषय था कि क्या भारत उस गति से प्रगति कर रहा है जिसकी उसे जरूरत है? देश में वैज्ञानिक क्रांति लाने का जो सपना उनके मन में था उसे पूरा करने के लिए बैंगलोर का संस्थान पर्याप्त नहीं था। अतः डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक अलग संस्थान बनाने का विचार बनाया और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट से एक बार फिर मदद माँगी। यह सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए वैज्ञानिक चेतना एवं विकास का एक निर्णायक मोड़ था।

BARC

BARC

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया था और दुनिया भर के वैज्ञानिक अपने रुके हुए अनुसंधान को गतिमान बनाने में जुट गए। 1 जून 1945 को डॉ. भाभा द्वारा प्रस्तावित ‘टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR)’ की एक छोटी-सी इकाई का श्रीगणेश हुआ। 6 महीने बाद ही भाभा जी ने इसे मुम्बई में स्थानांतरित करने का विचार बनाया। अब समस्या यह थी कि इस नए संस्थान के लिए इमारत इत्यादि की व्यवस्था कैसे हो? उस समय संस्थान के नाम पर टाटा ट्रस्ट से 45,000 रूपये, महाराष्ट्र सरकार से 25,000 रूपये तथा भारत सरकार द्वारा 10,000 रूपये प्रतिवर्ष की धनराशि निर्धारित की गई थी। डॉ. भाभा ने पेडर रोड में ‘केनिलवर्थ‘ की एक इमारत का आधा हिस्सा किराये पर लिया। यह इमारत उनकी चाची श्रीमती कुंवर पांड्या की थी। संयोगवश डॉ. भाभा का जन्म भी इसी इमारत में हुआ था। TIFR ने उस समय इस इमारत के किराए के रूप में हर महीने 200 रुपये देना तय किया था। सन् 1949 तक केनिलवर्थ स्थित संस्थान छोटा पड़ने लगा था। अतः इस संस्थान को प्रसिद्ध ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के पास एक इमारत में पहुँचा दिया गया जो उस समय ‘रायल बाम्बे यॉट क्लब’ के अधीन थी। हालांकि संस्थान का कुछ कार्य तब भी केनिलवर्थ में कई वर्षों तक चलता रहा। आज भी ‘परमाणु ऊर्जा आयोग’ का कार्यालय ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के पास इसी इमारत ‘अणुशक्ति भवन‘ में कार्यरत है जो ‘ओल्ड यॉट क्लब’ (OYC) के नाम से जाना जाता है। संस्थान का कार्य इतनी तेजी से आगे बढ़ने लगा था कि ‘ओल्ड यॉट क्लब’ की जगह भी जल्दी ही कम पड़ने लगी। अतः डॉ. भाभा पुनः जगह की तलाश में लग गए। इस बार वह ऐसी जगह चाहते थे जहाँ संस्थान की एक स्थायी इमारत बनायी जा सके। इस बार डॉ, भाभा की नजर कोलाबा के एक बहुत बड़े भूखंड पर पड़ी जिसका अधिकांश हिस्सा रक्षा मंत्रालय के कब्जे में था। कोलाबा का यह क्षेत्र करीब 25,000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की अनेक छावनियों से घिरे इस इलाके के बीच एक अनुसंधान दल पहुँच गया। डॉ. भाभा ने अपनी वैज्ञानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ TIFR की स्थायी इमारत का भी जिम्मा उठाया। भाभा ने इसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों की बराबरी में खड़ा करने का सपना संजोया। उन्होंने अमेरिका के जाने-माने वास्तुकार को इसकी योजना तैयार करने के लिये आमंत्रित किया। इसकी इमारत का शिलान्यास 1954 में नेहरू जी ने किया। डॉ. भाभा ने इमारत निर्माण के हर पहलू पर बारीकी से ध्यान दिया। अंततः 1962 में इस इमारत का उद्घाटन नेहरू जी के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। सन् 1966 में डॉ. भाभा के अकस्मात निधन से देश को गहरा आघात पहुँचा। यह तो उनके द्वारा डाली गई नींव का असर था कि उनके बाद भी देश में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम अनवरत विकास के मार्ग पर अग्रसर रहा। डॉ. भाभा के उत्कृष्ट कार्यों के सम्मान स्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रॉम्बे (AEET) को डॉ. भाभा के नाम पर ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ नाम दिया। आज यह अनुसंधान केन्द्र भारत का गौरव है और विश्व-स्तर पर परमाणु ऊर्जा के विकास में पथप्रदर्शक साबित हो रहा है।

होमी भाभा तथा जवाहरलाल नेहरू

पंडित नेहरू के साथ भाभा

पंडित नेहरू के साथ भाभा

डॉ. भाभा ने परमाणु ऊर्जा के जनहित अनुप्रयोग को पहले ही भाँप लिया था। यह डॉ. भाभा की दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि स्वतंत्रता पूर्व ही उन्होंने नेहरू जी का ध्यान इस ओर आकर्षित कर लिया था कि स्वतंत्र भारत में किस तरह परमाणु ऊर्जा उपयोगी सिद्ध होगी। होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफ़ी नज़दीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो उन्हें भाई कह कर पुकारते थे। इंदिरा चौधरी कहती हैं,

“नेहरू को सिर्फ़ दो लोग भाई कहते थे… एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा। हमारे आर्काइव में इंदिरा गांधी का एक भाषण है जिसमें वह कहती हैं कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फ़ोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे। एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे पैट्रिक बैंकेट जो डीआरडीओ के सलाहकार होते थे… उनका कहना था कि नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी।”

भाभा का सोचने का दाएरा काफ़ी विस्तृत था। वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे। जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एमजीके मेनन एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं, “एक बार मैं उनके साथ देहरादून गया था। उस समय पंडित नेहरू वहाँ रुके हुए थे। एक बार हम सर्किट हाउस के भवन से निकल कर उसके ड्राइव वे पर चलने लगे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप इस ड्राइव वे के दोनों तरफ़ लगे पेड़ों को पहचानते हैं। मैंने कहा इनका नाम स्टरफ़ूलिया अमाटा है। भाभा बोले मैं इसी तरह के पेड़ ट्रॉम्बे के अपने सेंट्रल एवेन्यू में लगाने वाला हूँ। मैंने कहा होमी आपको पता है इन पेड़ों को बड़ा होने में कितना समय लगता है। उन्होंने पूछा कितना? मैंने कहा कम से कम सौ साल। उन्होंने कहा इससे क्या मतलब। हम नहीं रहेंगे। तुम नहीं रहोगे लेकिन वृक्ष तो रहेंगे और आने वाले लोग इन्हें देखेंगे जैसे हम इस सर्किट हाउस में इन पेड़ों को देख रहे हैं। मुझे ये देख कर बहुत अच्छा लगा कि वो आगे के बारे में सोच रहे थे न कि अपने लिए।”

पंडित नेहरू के साथ भाभा

पंडित नेहरू के साथ भाभा

भाभा को जुनून की हद तक बागबानी का शौक था। टीआईएफ़आर और बार्क की सुंदर हरियाली का श्रेय उन्हों को दिया जाता है। इंदिरा चौधरी कहती हैं,

“टीआईएफ़आर में एक गार्डेन है जिसका नाम है अमीबा गार्डेन। वो अमीबा की शक्ल में है। उस पूरे गार्डेन को उन्होंने अपने ऑफ़िस में देख कर तीन फ़ीट शिफ़्ट किया था क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें परफ़ेक्शन चाहिए था। भाभा ने सभी बड़े बड़े पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया। एक भी पेड़ को काटा नहीं। पहले पेड़ लगाए गए और फिर बिल्डिंग बनाई गई। मुझे ये चीज़ इसलिए याद आ रही है क्योंकि बंगलौर में मेट्रो बनाने के लिए हज़ारों पेड़ काट डाले गए। अब से साठ साल पहले भाभा ने सोचा था कि पेड़ों को काटने के बजाए ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।”

खाने के शौक़ीन भाभा

भाभा लीक से हट कर चलने में यक़ीन रखते थे। वाकपटुता में उनका कोई सानी नहीं था और न ही आडंबर में उनका यक़ीन था। इंदिरा गांधी के वैज्ञानिक सलाहकार रहे प्रोफ़ेसर अशोक पार्थसार्थी कहते हैं,

“जब वो 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे। ख़ुद उसे ले कर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे। वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूँ और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष। एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा। भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा।”

बहुत कम लोगों को पता है कि होमी भाभा खाने के बहुत शौक़ीन थे। इंदिरा चौधरी याद करती हैं कि परमाणु वैज्ञानिक एमएस श्रीनिवासन ने उनसे बताया कि एक बार वॉशिंगटन यात्रा के दौरान भाभा का पेट ख़राब हो गया। डॉक्टर ने उन्हे सिर्फ़ दही खाने की सलाह दी। भाभा ने पहले पूरा ग्रेप फ़्रूट खाया, पोच्ड अंडों, कॉफ़ी और टोस्ट पर हाथ साफ़ किया और फिर जाकर दही मंगवाई और वो भी दो बार और ये तब जब उनका पेट ख़राब था।

भाभा को पाँच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

भाभा को पाँच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

भाभा का एक कुत्ता हुआ करता था। उसके बहुत लंबे कान होते थे जिसे वो क्यूपिड कह कर पुकारते थे और रोज़ उसे सड़क पर घुमाने ले जाते थेजैसे ही भाभा घर लौटते थे वो कुत्ता दौड़कर उनके पास आ कर उनके पैर चाटता था। जब भाभा का एक विमान दुर्घटना में निधन हुआ तो उस कुत्ते ने पूरे एक महीने तक कुछ नहीं खाया। रोज़ डॉक्टर आ कर उसे दवाई देते थे लेकिन वो कुत्ता सिर्फ़ पानी पिया करता था और खाने को हाथ नहीं लगाता था। वो ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाया। भाभा भी इंसान थे। हर इंसान पूरी तरह परफ़ेक्ट नहीं होता। भाभा भी इसके अपवाद नहीं थे। उनकी सिर्फ़ एक कमी थी कि वो वक़्त के पाबंद नहीं थे। इंदिरा चौधरी कहतीं हैं,

“हर इंसान में कुछ अच्छे गुण होते हैं तो कुछ बुरे। बहुत लोग बताते हैं कि उन्हें समय का कोई ध्यान नहीं रहता था। जो लोग उनसे मिलने का अप्वॉयमेंट लेते थे वो इंतज़ार करते रहते थे। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी, वियना में वह कभी-कभी बैठकों में बहुत देर से आते थे। उन लोगों ने इसका इलाज ये निकाला था कि वह मीटिंग से आधा घंटा पहले ही उसके होने की घोषणा करते थे ताकि भाभा के देर से आने का बहाना न मिल पाए।”

जे आर डी टाटा के साथ भाभा

जे आर डी टाटा के साथ भाभा

भाभा को पाँच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। भाभा के जीवन की कहानी आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी भी है। उनको श्रद्धांजलि देते हुए जेआर डी टाटा ने कहा था,

“होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है। इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गाँधी और तीसरे थे होमी भाभा। होमी न सिर्फ़ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता और उद्यानकर्मी भी थे। इसके अलावा वो एक कलाकार भी थे। वास्तव में जितने भी लोगों को मैंने जाना है और उनमें ये दो लोग भी शामिल हैं जिनका मैंने ज़िक्र किया है, उनमें से होमी अकेले शख़्स हैं… जिन्हें “संपूर्ण इंसान’ कहा जा सकता है।”

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स्रोत:

  1. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुम्बई की गृह-पत्रिका “ऊर्जायन”
  2. बी बी सी हिंदी (http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/07/140704_homi_jehangir_bhabha_rf_rd.shtml)
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