खगोल भौतिकी 4 : खगोलीय दूरी मापन : खगोलीय इकाई(AU), प्रकाशवर्ष(Ly) और पारसेक(Parsec)


लेखक : ऋषभ

मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ लेख शृंखला मे यह चतुर्थ लेख है, और अब हम ब्रह्मांड को विस्तार से जानने के लिये तैयार है। विज्ञान की हर शाखा मे मापन की अपनी इकाईयाँ होती है। दूरी मापन की इकाईयाँ, विज्ञान की हर शाखा मे आवश्यकतानुसार प्रयोग की जाती है। उदाहरण के लिये एक पदार्थ वैज्ञानिक(material scientist ) अधिकतर माइक्रान (10-6m)मे मापन करेगा, वहीं आण्विक भौतिक वैज्ञानिक (atomic physicist) अन्गस्ट्राम (10-10 m) मे, वहीं एक नाभिकिय वैज्ञानिक(nuclear physicist ) फ़र्मी(10-15 m) मे मापन करेगा। हम जानते है कि दूरी मे मापन के लिये मानक SI इकाई मीटर(m) है लेकिन यह इकाई विज्ञान की हर शाखा मे प्रयोग होने के लिये सुविधाजनक नही है। किसी परमाणु के व्यास को मीटर या किलोमीटर मे मापना भद्दा होगा। इस लिये अध्ययन और उपयोग के अनुसार इकाईयों का चयन आवश्यक होता है। तो खगोलशास्त्र मे दूरी मापन के लिये किस इकाई का प्रयोग हो ? इस लेख मे हम खगोलीय इकाई(astronomical unit – AU), प्रकाशवर्ष(light year- ly) और पारसेक(parsec) के बारे मे जानेंगे।

आप इस शृंखला के सारे लेख यहाँ पढ़ सकते है

दूरी मापन और इकाईयाँ

क्वांटम प्रणालीयों कि विपरीत ब्रह्माण्ड अत्यधिक विशाल है। इतना विशाल कि किलोमीटर बहुत छॊटी इकाई है। इसलिये खगोलशास्त्रीयों ने दूरी के मापन के लिये एक नई इकाई प्रणाली बनाई। इस लेख मे हम इस प्रणाली की तीन मुख्य इकाईयों की चर्चा करेंगे जोकि आपको अधिकतर खगोलशास्त्र के लेखों और किताबों मे मिलेंगी। ये तीन इकाईयाँ है, प्रकाश वर्ष , पारसेक और खगोलीय इकाई(Astronomical Unit (AU))। इनका प्रयोग दूरी के मूल्य के अनुसार होता है। सौर मंडल के अंदर ग्रहों के मध्य की दूरी के लिये खगोलीय इकाई का प्रयोग होता है। समीप के तारों की दूरी की चर्चा के लिये प्रकाशवर्ष तथा पारसेक का प्रयोग होता है, जबकि आकाशगंगाओं के मध्य की दूरी के लिये किलोपारसेक और मेगापारसेक का प्रयोग किया जाता है।

खगोलीय इकाई : Astronomical Unit (AU)

खगोलीय इकाई सूर्य और पृथ्वी के मध्य की औसत दूरी को कहते है। इसका मूल्य 149,597,870,700 metres या 15 करोड़ किमी (9.3 करोड़ मील) है।

हम जानते है कि पृथ्वी( या किसी अन्य ग्रह) की सूर्य परिक्रमा की कक्षा पूर्ण वृत्ताकार नही है। यह दिर्घवृत्ताकार(elliptical) है। इसलिये पृथ्वी की सूर्य से दूरी वर्ष भर बदलते रहती है। आरंभ मे खगोलीय इकाई की परिभाषा पृथ्वी की कक्षा की उपप्रधान अक्ष(semi-major axis) के तुल्य मानी गई थी। लेकिन 1976 मे अंतराष्ट्रीय खगोल संस्थान(International Astronomical Union (IAU)) अधिक शुद्धता तथा सुनिश्चतता के लुए इसे परिवर्तित किया। अब खगोलीय इकाई की परिभाषा एक द्रव्यमान रहित(शून्य द्रव्यमान) कण की ऐसी वृताकार कक्षा की त्रिज्या है जिसमे परिक्रमा के लिये लगने वाला समय 365.2568983 दिन या एक गासीयन वर्ष (Gaussian year) हो।

अधिक अचूकता के लिये एक खगोलीय इकाई(AU) वह दूरी है जिसपर हिलियोसेंट्रीक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (G*M☉) का मूल्य (0.017 202 093 95)² AU³/d² हो। M☉ = सूर्य का द्रव्यमान ।

खगोलीय इकाई (AU) का महत्व

यह ध्यान मे रखा जाना चाहिये कि गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (G) तथा सूर्य का द्रव्यमान (M☉) का मूल्य अत्याधिक सटीक रूप से ज्ञात नही है। लेकिन इन दोनो का गुणनफ़ल अधिक सटिकता से ज्ञात है। इसलिये ग्रहीय गति की सारी गणना मुख्य रूप से खगोलीय इकाई और सौर द्रव्यमान (M☉) के प्रयोग से की जाती है। इस तरह से सारे परिणाम गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक पर निर्भर हो जाते है। इन स्थिरांको को मानक SI इकाईयों मे नही बदला जाता है क्योंकि इस परिवर्तन से अशुध्दता आ सकती है।

प्रकाशवर्ष (ly)

जुलियन वर्ष (365.25 दिन) और प्रकाशगति (299,792,458 m/s) के गुणनफ़ल को प्रकाशवर्ष कहा जाता है। यह समय और गति का गुणनफ़ल है, इसलिये यह वह दूरी है जिसे प्रकाश एक जुलियन वर्ष मे तय करता है। प्रकाशवर्ष का मूल्य 9.46 ट्रिलियन किमी या 63,241.077है। प्रकाशवर्ष यह कुछ अन्य इकाई प्रकाश सेकंड, प्रकाश मिनट या प्रकाशघंटा जैसी इकाईयों की मातृ इकाई है। जब हम कहते है कि कोई पिंड “प्रकाश-x” दूरी पर है, उसका अर्थ है कि वह दूरी जिसे तय करने मे प्रकाश x इकाई समय लेगा।

प्रकाश इकाई मे मापन

प्रकाश इकाई मे मापन

प्रकाशवर्ष का महत्व

प्रकाशवर्ष का खगोलशास्त्र मे अत्याधिक प्रओग होता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह भी है कि जब हम कहते है कि यह पिंड इतने प्रकाशवर्ष दूर है तब हम यह भी जानते है कि हम उस पिंड की कितनी पुरानी छवि देख रहे है। यदि कोई पिंड 4 प्रकाशवर्ष की दूरी पर है, तो इसका अर्थ है कि उस पिंड से उत्सर्जित प्रकाश को हम तक पहुंचने मे 4 वर्ष लगे है। अर्थात हम उसकी 4 वर्ष पुरानी छवि देख रहे है। इसी तरह से सूर्य हमसे 500 प्रकाशसेकंड की दूरी पर है, यदि किसी कारण से सूर्य गायब हो जाये तो हमे 500 सेकंड बाद ही पता चलेगा।

पारसेक -Parsec (pc)

एक पारसेक का मूल्य 3.26 प्रकाशवर्ष है। अब आप सोच रहे होंगे कि प्रकाशवर्ष और पारसेक मे इतना कम अंतर है तो एक अतिरिक्त इकाई की क्या आवश्यकता ? चलिये देखते है।

खगोलशास्त्र मे किसी तारे की दूरी मापन की सबसे प्राचिन विधियों मे से एक पेरेलक्स (parallax) विधि है। इस विधि मे किसी तारे की आकाश मे स्तिथि के दो मापन के मध्य के कोण को मापा मापा जाता है। इसमे पहला मापन पृथ्वी के सूर्य के एक ओर होने पर है दूसरा छः माह बाद पृथ्वी के सूर्य के दूसरी ओर होने पर किया जाता है। इन दो मापनो के मध्य मे पृथ्वी की दोनो स्तिथियों के मध्य दूरी पृथ्वी और सूर्य के मध्य की दूरी का दोगुणा होती है। अब इन दोनो मापनो के मध्य के कोणो का अंतर पेरेलक्स कोण का दोगुणा होता है जोकि सूर्य तथा पृथ्वी से उस तारे तक बनने वाली रेखाओं के मध्य बनता है।

तारे की स्थिति का पृथ्वी की कक्षा मे सूर्य के दो ओर से मापन(पेरेलक्स विधि)

तारे की स्थिति का पृथ्वी की कक्षा मे सूर्य के दो ओर से मापन(पेरेलक्स विधि)

पेरेलक्स का मूल्य उस तारे द्वारा आकाश मे आभासीय गति की कोणीय दूरी का आधा होता है। इस चित्र मे तारे की स्तिथि D से, सूर्य की S से तथा पृथ्वी की स्तिथि E से दिखाई गई है और ये तीनो पिंड समकोण त्रिभूज बना रहे है। इसमे तारे की स्तिथि पृथ्वी की कक्षा के उपप्रधान अक्ष के सम्मुख कोण मे है।

अब हम कोण SDE तथा रेखा SE की दूरी का मूल्य(1 AU) जानते है। इस जानकारी के प्रयोग से त्रिकोणमिती का प्रयोग करते हुये, SD या ED का मूल्य जान सकते है। यदि सम्मुख कोण का मुल्य 1 आर्क सेकंड(arc second) होतो तारे की दूरी 1 पारसेक होगी। अब हम 1 पारसेक को परिभाषित करने की स्तिथि मे है। एक पारसेक अर्थात वह दूरी जिसपर 1 AU का सम्मुख कोण(subtends) 1 आर्कसेकंड हो।

पारसेक(parsec) का महत्व

खगोलभौतिकी मे पारसेक विधि दूरी के निर्धारण मे सबसे बुनियादी कैलीब्रेशन का महत्वपूर्ण चरण रही है। पृथ्वी पर आधारित दूरबीनो द्वारा पेरेलक्स मापन की सीमा 0.01 आर्कसेकंड है, जिससे 100 पारसेक से अधिक दूरी के तारों की दूरी का सटिक मापन इस विधि से संभव नही है। यह सीमा पृथ्वी के वातावरण के तारे की बनने वाली छवि मे आने वाले धुंधलेपन के कारण होती है। लेकिन अंतरिक्ष स्तिथ दूरबीनो के सामने यह सीमा नही होती है। अंतरिक्ष मे अत्याधिक दूरी के पिंडॊ की दूरी के मापन के लिये पारसेक, किलोपारसेक तथा मेगापारसेक का प्रयोग होता है।

इस शृंखला मे इससे पहले : दूरबीनो की कार्यप्रणाली का परिचय

लेखक का संदेश

मुझे आशा है कि मूलभूत खगोलभौतिकी लेख शृंखका के चौथे लेख ने आपको खगोलशास्त्र मे दूरी मापन की इकाईयों खगोलीय इकाई, प्रकाशवर्ष तथा पारसेक की के बारे मे आवश्यक जानकारी दे दी होगी। यह खगोलशास्त्र के अध्ययन मे एक बुनियादी लेख है। आने वाले लेखों मे हम इन इकाईयों का धड़ल्ले से प्रयोग करेंगे। इसलिये इस लेख का महत्व स्पष्ट हो जाता है। आशा है कि आप इन लेखों का आनंद ले रहे होंगे। इस विषय पर यदि आप कोई पुस्तक पढ़ना चाहते है तो हम बैद्यनाथ बसु(Baiydanaath Basu) की पुस्तक “Basics of Astrophysics” की सलाह देंगे जोकि अमेजन पर उपलब्ध है। यह सरल भाषा मे इस विषय की बुनियादी जानकारी को समेटे हुये लिखी पुस्तक है। आप इस पुस्तक का भरपूर आनंद उठायेंगे।

मूल लेख : THE CONCEPT OF ASTRONOMICAL UNIT, LIGHT YEAR AND PARSEC

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe (https://secretsofuniverse.in/) के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.

 

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