अंधविश्वास के अंधेरों तक कैसे पहुंचे रोशनी


पिछले दिनों झारखंड में लातेहार जिले के सेमरहाट गांव में दो बच्चों की नरबलि देने का मामला सामने आया। इससे पहले असम के उदालगुड़ी जिले के कलाईगांव में एक विज्ञान शिक्षक द्वारा पड़ोस के बच्चे की बलि देने की कोशिश की चौंकाने वाली खबर आई थी। चिंता की बात यह है कि नरबलि की बात ने भले थोड़ा चौंकाया हो, इसके पीछे का अंधविश्वास हमारे लिए कोई नई चीज नहीं है। आज के वैज्ञानिक युग में भी बिल्ली के रास्ता काटने को अपशगुन मानने और दरवाजे पर नींबू-मिर्ची लटकाने से लेकर किसी को डायन कहकर मार डालने तक अंधविश्वास के अनेकानेक रूप देखने-सुनने को मिलते रहते हैं।

आखिर क्या कारण है कि शिक्षा और उच्च शिक्षा भी हमारे मन से अंधविश्वास का प्रभाव दूर नहीं कर पाती? कहते हैं इसका एक कारण है बिना किसी प्रमाण या तर्क के किसी भी बात पर यकीन करने की हमारी प्रवृत्ति। दूसरे शब्दों में इसे कहा जाता है वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। सवाल उठता है यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या बला है? किताबों में इसका स्पष्ट जवाब मिल जाता है- वैज्ञानिक दृष्टिकोण मूलतः एक ऐसी मनोवृत्ति या सोच है जिसका मूल आधार है किसी भी घटना की पृष्ठभूमि में उपस्थित कार्य-कारण को जानने की प्रवृत्ति। मगर किताबों में इस बात का जवाब नहीं मिलता कि स्कूलों के पाठ्यक्रमों से गुजरने और कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में रहते हुए तमाम बड़े विद्वानों के विचारों को आत्मसात करने के बाद भी हमारा मन अंधविश्वास के अंधेरों से पीछा क्यों नहीं छुड़ा पाता।

साफ है कि जीवन पूरी तरह किताबों से संचालित और नियंत्रित नहीं होता। किताबों से बाहर के बहुत से कारक हैं जो हमारे जीवन और सोच को आकार देते हैं। इन बाहरी कारकों में ज्यादातर ऐसे हैं जो शासन और समाज द्वारा नियंत्रित किए जा सकते हैं। संविधान के मुताबिक शासन का यह दायित्व भी है कि वह नागरिकों में वैज्ञानिक चेतना विकसित होने लायक माहौल बनाए।

आज के हालात को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि आजादी के बाद की सरकारें अपना दायित्व अच्छे से नहीं निभा पाई हैं। शुरुआती दौर में ऐसे संस्थान जरूर बनाए गए जिनका काम देश में वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देना था, मगर ये संस्थान भी कागजी कार्रवाइयों से आगे नहीं बढ़ पाए। देशवासियों की सोच को सीधे प्रभावित करने वाली जीवनदशाएं बदलें इसका प्रयास नहीं किया गया। कुछ लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आए, समृद्धि भी आई कुछ तबकों में, लेकिन गरीबी और लाचारी की मौजूदगी बनी रही आसपास।

ऐसे में जो गरीबी में बने रहे वे किसी चमत्कार से अमीरी की चमकती दुनिया में पहुंच जाने की लालसा पाले रहे तो जो समृद्धि के करीब पहुंच चुके थे, वे भी वापस गरीबी-लाचारी के चंगुल में चले जाने की आशंकाओं से घिरे रहे। आशंका, असुरक्षा की यह निरंतरता अंधविश्वास के लिए खाद-पानी की निर्बाध सप्लाई का सबसे बड़ा स्रोत बनी रही।

इस स्थिति में एक बड़ा बदलाव पिछले कुछ समय से यह आया है कि जिन संस्थाओं को वैज्ञानिक चेतना का फैलाव करना था, वे भी उलटी दिशा में चलती दिखाई देने लगी हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है भारतीय विज्ञान कांग्रेस। बीते चार-पांच वर्षों में हुए भारतीय विज्ञान कांग्रेस में वैज्ञानिकों ने ऐसे-ऐसे दावे किए कि विज्ञान खुद शरमा जाए। हालांकि आम लोगों में विज्ञान के प्रति अरुचि के चलते मुख्यधारा का मीडिया अमूमन विज्ञान कांग्रेस की कवरेज से बचता रहा है, मगर विगत कुछ वर्षों से वेदों-पुराणों के प्रमाणहीन दावों को विज्ञान बताने से जुड़े विवादों के चलते यह आयोजन सुर्खियों में रहा।

बहरहाल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव निजी तौर पर भी हमारे जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। हमें अंधविश्वास के उन गड्ढों की ओर ले जाता है जो अक्सर पूरे परिवार की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। समय-समय पर आने वाली विभिन्न बाबाओं की हरकतों की खबरें इसका उदाहरण हैं और इन बाबाओं की विशाल शिष्य संख्या इसका सबूत। खास बात यह कि जरा सी वैज्ञानिक चेतना ऐसे गड्ढों से बचाने के लिए काफी हो सकती है।

साभार : नवभारत टाइम्स, 31 जुलाई 2019

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