खगोल भौतिकी 21 : सुपरनोवा और उनका वर्गीकरण


लेखिका:  सिमरनप्रीत (Simranpreet Buttar)

जब भी हम रात्रि आकाश मे देखते है, सारे तारे एक जैसे दिखाई देते है, उन तारों से सब कुछ शांत दिखाई देता है। लेकिन यह सच नही है। यह तारों मे होने वाली गतिविधियों और हलचलो की सही तस्वीर नही है। तारों की वास्तविक तस्वीर भिन्न होती है। हर तारा दूसरे तारे से उल्लेखनीय ढंग से भिन्न होता है। इन तारों के दिखाई देने वाले शांत मुखौटे के पीछे प्रचंड प्रक्रियायें और विस्फोट होते है जोकि हमारी कल्पना से भी बाहर होते है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’शृंखला के इक्कीसवें लेख मे हम इन प्रलयंकारी घटनाओं की चर्चा करेंगे जिसे नोवा और सुपरनोवा कहते है।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

परिभाषा

अधिकतर समय नोवा और सुपरनोवा को एक ही तरह की घटना मान लिया जाता है। लेकिन वास्तविकता मे दोनो शब्दो का अर्थ भिन्न है और दोनो दो भिन्न गतिविधि/घटना को दर्शाते है। ’नोवा’ शब्द का संदर्भ एक ऐसी खगोलीय घटना से है जिसमे एक आकाश चमकदार, नवीन तारे के जैसे प्रतीत होने वाले तारे का उद्भव है जोकि कुछ सप्ताह या माह मे धूंधलाते हुये अपनी पुरानी स्थिति मे लौट जाता है। जबकि सुपरनोवा की घटना कुछ विशिष्ट तारो की मृत्यु पर होने वाली प्रलयंकारी विस्फोटक घटना है। नोवा वास्तविकता मे कई प्रकार के सुपरनोवा घटनाओं मे से एक है। अब हम इन शब्दो विस्तार से देखते है और इन भिन्न वर्गीकरणो को एक के बाद एक देखते है।

सुपरनोवा का वर्गीकरण

खगोलवैज्ञानिक सुपरनोवा का वर्गीकरण उनके द्वारा उत्सर्जित वर्णक्रम के आधार पर करते है। यह वर्णक्रम दर्शाता है कि वास्तविक तारे की रासायनिक संरचना मे कौनसे तत्व थे जोकि विस्फोट के बाद अब अंतरिक्ष मे वितरीत हो गये है। यदि सुपरनोवा के वर्णक्रम मे हायड्रोजन रेखायें हो तो उन्हे टाईप II सुपरनोवा कहते है, अन्य सुपरनोवा को टाईप I सुपरनोवा कहते है। समझने मे आसानी की दृष्टी से पहले हम टाईप II सुपरनोवा को देखते है, जोकि हमे टाईप I सुपरनोवा को समझने मे सहायता करेगा।

टाईप II सुपरनोवा (Type II Supernovae)

हमने अभी देखा है कि टाईप II सुपरनोवा के वर्णक्रम मे अन्य सुपरनोवाओं से विपरीत हायड्रोजन की उपस्थिति होती है। ये सामान्यत; आकाशगंगाओं की स्पाईरल बाहों मे मे और HII क्षेत्र मे पाये जाते है, लेकिन ये एल्लिप्टीकल आकाशगंगाओं मे नही पाये जाते है। किसी तारे द्वारा टाईप II सुपरनोवा स्तिथि मे आने के लिये उसका द्रव्यमान सूर्य से 8 से 15 गुणा होना चाहिये। ये महाकाय तारे अपने केंद्रक मे भारी तत्वो का संलयन कर सकते है, वे हायड्रोजन से हिलियन, उसके पश्चात कार्बन , नियान इत्यादि का संलयन कर आवर्त सारणी मे आगे बढ़ते जाते है। लेकिन जैसे ही वे अधिक भारी तत्वो तक पहुंचते है तब इन तत्वों के संलयन मे लगने वाली ऊर्जा, उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से अधिक हो जाती है और संलयन अभिक्रिया रूक जाती है, इस अवस्था मे तारा अपने ही गुरुत्वाकर्षण से सिकुड़ना आरंभ करता है।

SN 1987A सुपरनोवा के अवशेष

SN 1987A सुपरनोवा के अवशेष

यह भी पढ़े: तारों मे चलने वाली संलयन अभिक्रियाये

हमने इन सब अभिक्रियाओं पर इस शृंखला के पिछले लेखो मे विस्तार से चर्चा की है। इस अवस्था मे इन तारों की बाह्य परते या खोल एक सेकंड के नन्हे भाग मे प्रकाशगति के 23% की गति से संकुचीत होकर केंद्रक की ओर गिरने लगती हौ। लेकिन न्यूट्रान अपकर्ष दबाव (neutron degeneracy pressure) से केंद्रक का सिकुड़ना रुक चुका होता है, जिससे सिकुड़कर केंद्र के पास आने वाली बाह्य परते केंद्रक से टकराकर वापस उछलती है और एक भयानक विस्फोट के साथटाईप II सुपरनोवा बनाती है। इस विस्फोट के बाद सिकुड़ा हुआ केंद्रक ही बचा रहता है। यदि केंद्रक का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के दो-तीन गुणे से कम होता है तो वह न्यूट्रान तारा बन जाता है। लेकिन यदि उसका द्रव्यमान 2या 3 सौर द्रव्यमान से अधिक हो तो न्यूट्रान अपकर्ष दबाव (neutron degeneracy pressure) भी उस तारे को संकुचन से बचा नही पाता है और वह अंतत: ब्लैक होल बन जाता है।

टाईप I सुपरनोवा(Type I Supernovae)

इन सुपरनोवाओं के वर्णक्रम मे मे प्रसिद्ध बाल्मर शृंखला(balmer series) रेखाये या हाईड्रोजन रेखाये नही होती है। इन सुपरनोवाओं के तीन उपवर्ग होते है, टाईप Ia, टाईप Ib तथा टाईप Ic।

टाईप Ia(Type Ia supernovae)

यह घटना युग्म तारों मे होती है जिसमे एक साथी श्वेत वामन तारा(white dwarf) होना चाहीये, दूसरा तारा अन्य किसी भी प्रकार का जीवित तारा हो सकता है, एक लाल दानव तारा , मुख्य अनुक्रम का तारा या दूसरा श्वेत वामन! कोई तारा एक लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के पश्चात कुछ समय के लिये दोबारा सक्रिय होने की घटना भी ’नोवा’ कहलाती है। हम जानते है कि किसी तारे को अपने आपको गुरुत्वाकर्षण की चपेट मे आकर संकुचन से बचाये रखने के लिये अपने केंद्रक मे तत्वों का संलयन करते रहना होता है। इन संलयन प्रक्रिया की सीमा उनके द्रव्यमान पर निर्भर होती है, अलग अलग द्रव्यमान वाले तारो मे अलग अलग स्तर पर यह प्रक्रिया थम जाती है।

जब हमारे सूर्य के जैसे तारे अपनी सारी हायड्रोजन और हिलियम समाप्त कर देते है तो वे अपनी समस्त बाह्य तहों को झाड़ देते है और एक बहुत छोटे , अत्याधिक उष्ण श्वेत वामन तारे मे परिवर्तित हो जाते है। ये श्वेत वामन वास्तविकता मे मृत तारो के निष्क्रिय केंद्रक है जिसने अपना सारा ईंधन समाप्त कर दिया है। अब युग्म तारों मे कोई एक तारा श्वेत वामन हो और दूसरा तारा लाल दानव अवस्था मे जा रहा हो तो अधिक द्रव्यमान और मजबूत गुरुत्वाकर्षण से श्वेत वामन तारा फ़ूलते हुये लाल दानव तारे के वातावरण से गैस खिंचना शुरु कर देता है। इस खिंची हुई गैस मे अधिकतम हायड्रोजन होती है। जब यह हायड्रोजन श्वेत वामन तारे के अत्याधिक उष्ण सतह पर पहुंचती है तो वह अचानक से संलयन प्रक्रिया से हिलियम बनने लगती है और उस श्वेत वामन तारे की सतह मे एक नाभिकिय विस्फोट होता है। इस घटना को नोवा या टाईप Ia सुपरनोवा कहते है।

किसी दानव तारे से गैस का छीना जाना

किसी दानव तारे से गैस का छीना जाना

नोवा/नोवे(Novae)

नोवे(Novae) यह नोवा शब्द का अंग्रेजी मे बहुवचन है जोकि लैटीन भाषा का शब्द है और इसका अर्थ होता है, नया तारा। नोवा घटना के दौरान जोकि नंगी आंखो से नही देखा जा सकता था अब आकाश मे सबसे चमकीले पिंडो मे से एक हो जाता है। यह एक नये तारे के जैसे दिखाई देने लगता है और धीमे धीमे धुंधलाते हुये पूर्वावस्था मे आ जाता है। इन तारो के वर्ण क्रम मे सिलिकान अवशोषण(silicon absorption) रेखाए अपने अधिकतम पर होती है। इन तारों से पदार्थ का उत्सर्जन अत्याधिक गति से होता है जोकि 10,000 km/s तक होती है।

टाईप Ia प्रकार के सुपरनोवा के बनने की प्रक्रिया

टाईप Ia प्रकार के सुपरनोवा के बनने की प्रक्रिया

टाईप Ib तथा Ic भी टाईप II सुपरनोवा के जैसे केंद्रक के संकुचन से बनते है। लेकिन दोनो मे अंतर यह है कि उनमे पहले से ही बाह्य हायड्रोजन खोल उतसर्जित किया हुआ होता है। जिससे वे अपने वर्णक्रम मे हायड्रोजन रेखाये नही दिखा पाते है। साथ मे इन तारों मे टाईप Ia सुपरनोवा के जैसे मजबूत आयोनाइज्ड सिलिकान अवशोषण रेखायें भी नही होती है। इनके अलावा भी कुछ और अन्य प्रकार के सुपरनोवा होते है। लेकिन उनके वर्णक्रम ना तो टाईप I के जैसे होते है ना टाईप II के जैसे। लेकिन इस तरह के सुपरनोवा अत्यंत दुर्लभ होते है।

लेखिका का संदेश

सुपरनोवा किसी तारे के संपूर्ण जीवन चक्र को समझने मे बहुत उपयोगी होते है। ये प्रलयंकारी विस्फोट की घटनाये अत्याधिक मात्रा मे ऊर्जा उत्सर्जन करती है। इनमे से कुछ घटनाओं मे लोहे से भारी तत्वों का निर्माण होता है। सारे भारी तत्व जैसे स्वर्ण, चांदी, जस्ता, युरेनियम इन्ही प्रलयंकारी घटनाओं मे बनते है, इन तत्वो का निर्माण तारो के केंद्रक मे संभव नही है। इन सुपरनोवाओं से उत्सर्जित पदार्थ अंतरतारकीय माध्यम(interstellar medium) का भाग बन जाता है। इसी अंतरतारकीय माध्यम से नये तारे और ग्रह बनते है। और इसी पदार्थ से जीवन संभव हो पाता है। हमारे शरीर मे जो लोहा, जस्ता, स्वर्ण और चांदी की अत्यल्प लेकिन आवश्यक मात्रा है इन्ही सुपरनोवा से आई है। टाईप Ia तारे अपनी मातृ आकाशगंगा की दूरी मापने के लिये मानक मोमबत्ती(standard candles) का कार्य करते है।

संक्षेप मे नोवा और सुपरनोवा का अध्ययन ब्रह्मांड के इन महान रहस्यो को जानने के लिये सबसे सक्रिय और महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करता है। हम आशा करते है कि इस लेख ने आपको इस प्रलयंकारी लेकिन नव जीवन को जन्म देनी वाली घटना को समझने मे सहायता की होगी।

मूल लेख : SUPERNOVAE AND THEIR CLASSIFICATION

लेखक परिचय

सिमरनप्रीत (Simranpreet Buttar)
संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका भौतिकी मे परास्नातक कर रही है। उनकी रुचि ब्रह्मांड विज्ञान, कंडेस्ड मैटर भौतिकी तथा क्वांटम मेकेनिक्स मे है।

Editor at The Secrets of the Universe, She is a science student pursuing Master’s in Physics from India. Her interests include Cosmology, Condensed Matter Physics and Quantum Mechanics

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