प्रकाश विद्युत प्रभाव(Photoelectric effect)


photoelectriceffectजब किसी धातु की सतह पर विद्युत चुम्बकीय विकरण(Electro Magnetic Radiation जैसे X-किरण,पराबैगनी किरण,दृश्य प्रकाश) पड़ती है तो उसकी सतह से इलेक्ट्रॉन निकलने लगते है सरल शब्दों में यही प्रकाश विद्युत प्रभाव(Photoelectric effect) है। इस क्रिया से जो इलेक्ट्रॉन निकलते है उसे प्रकाश इलेक्ट्रॉन(Photoelectron) कहते है। दृश्य प्रकाश का उपयोग केवल क्षारीय धातु पर ही यह प्रभाव दिखाता है जबकि X-किरण का जब उपयोग किया जाता है तो लगभग सभी धातुएँ प्रकाश विद्युत प्रभाव दिखाती है।

प्रकाश विद्युत प्रभाव की खोज महान जर्मन भौतिक विज्ञानी हेनरीच हर्ट्ज(Heinrich Hertz) ने 1887 मे की थी। हेनरीच ने ऋण प्लेट पर पराबैगनी किरणें डालने पर देखा की परिपथ मे तुरन्त ही विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। पराबैगनी किरणे डालना बंद करते है तो धारा प्रवाह भी एकदम रुक जाता है। यदि इसको ऋण प्लेट के बजाय धन प्लेट पर डाला जाय तो परिपथ में या तो कोई धारा नही बहती अथवा बहुत ही क्षीण धारा बहती है। मगर हेनरीच अपने तमाम प्रयासों के बाद भी इस प्रकाश विद्युत प्रभाव की कोई संतोषजनक व्याख्या नही कर पाए। उनकी विफलता का बड़ा कारण था प्रकाश विद्युत प्रभाव को प्रकाश तरंग सिद्धान्त से समझाना। शास्त्रीय प्रकाश तरंग सिद्धान्त के अनुसार, प्रकाश की तीव्रता(तरंगदैर्घ्य: Wavelength) ही निर्धारित करती है तरंग की विपुलता(Amplitude: आयाम)*। हर्ट्ज के अनुसार अति तीव्र प्रकाश की प्रवलता के कारण इलेक्ट्रॉन धातु के अंदर दोलन करते हुए और अधिक गतिज ऊर्जा(Kinetic energy) के साथ उत्सर्जित होने लगते है। परंतु जब उनके प्रयोग से उनकी कथन की तुलना की गयी तो उनका कथन संतोषजनक नही था। प्रयोग यह दर्शाता है कि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा प्रकाश के आवृति पर निर्भर करती है प्रकाश की तीव्रता का प्रभाव केवल निकलनेवाले इलेक्ट्रॉन की संख्या पर ही था न की इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा पर। उनके इस सैद्धान्तिक टिप्पणी से उस समय प्रकाश विद्युत प्रभाव को समझना और समझाना काफी जटिल हो गया था। कारण कुछ भी हो हर्ट्ज इस प्रभाव के आविष्कारक थे इसलिए उनके सम्मान मे इस प्रकाश विद्युत प्रभाव को हर्ट्ज प्रभाव(Hertz effect) भी कहा जाता है।

प्रकाशविद्युत प्रभाव का अध्ययन करने के लिये प्रयोग। इसमें प्रकाश स्रोत एक पतली आवृत्ति बैण्ड वाला (लगभग एकवर्णी) लेते हैं। इस प्रकाश को कैथोड पर डालते हैं जो निर्वात में स्थित है। एनोड और कैथोड के बीच विभवान्तर से यह निर्धारित हो जाता है कि कैथोड से उत्सर्जित वे ही इलेक्ट्रान एनोड तक आ पायेंगे जिनके पास निकलते समय eV से अधिक गतिज ऊर्जा होगी। धारा की मात्रा (μA), प्राप्त इलेक्ट्रानों की संख्या के समानुपाती होगी।

प्रकाश विद्युत प्रभाव का अध्ययन करने के लिये प्रयोग। इसमें प्रकाश स्रोत एक पतली आवृत्ति बैण्ड वाला (लगभग एकवर्णी) लेते हैं। इस प्रकाश को कैथोड पर डालते हैं जो निर्वात में स्थित है। एनोड और कैथोड के बीच विभवान्तर से यह निर्धारित हो जाता है कि कैथोड से उत्सर्जित वे ही इलेक्ट्रान एनोड तक आ पायेंगे जिनके पास निकलते समय eV से अधिक गतिज ऊर्जा होगी। धारा की मात्रा (μA), प्राप्त इलेक्ट्रानों की संख्या के समानुपाती होगी।

कहते है, वो महान है जो जटिल यंत्र बनाये,जटिल सिद्धान्त दे परन्तु उससे भी ज्यादा महान वो है जो जटिल को सरल बना दे। प्रकाश विद्युत प्रभाव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जर्मनी मे ही जन्मे इस सदी के महान भौतिकविज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन(Albert Einstein :1905) ने प्रकाश विद्युत प्रभाव की सफल व्याख्या की। आइंस्टीन ने मैक्स प्लांक(Max Planck) द्वारा प्रतिपादित क्वांटम थ्योरी(Quantum theory) को आधार मानकर प्रकाश विद्युत प्रभाव की सटीक व्याख्या की। मैक्स प्लांक के अनुसार प्रकाश ऊर्जा छोटे-छोटे पैकटों के रूप में चलता है जिसे फोटोन या क्वांटम(Photon or Quantum) कहते है।

एक फोटॉन की ऊर्जा = hc/λ
जहाँ h = प्लांक नियतांक = 6.62607×10-34 जूल
c = प्रकाश का वेग = 3×108 m/s
λ = प्रकाश का तरंगदैर्ध्य
यदि प्रकाश की आवृति n हो तो v = c/λ
इसलिए एक फोटॉन की ऊर्जा E = hυ
यहाँ [E = energy] [h = plank constant] [υ = frequency]

किसी धातु पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन को मात्र बाहर निकलने मे जितनी ऊर्जा व्यय होती है उसे धातु का कार्य फलन(Work function) कहा जाता है इसे Φo से व्यक्त किया जाता है। अलग अलग धातुओ के लिए Φo का मान भी भिन्न-भिन्न होता है। यदि hυ ऊर्जा के फोटॉन द्वारा उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉन का महत्तम वेग यदि Vmax हो, तो ऊर्जा संरक्षण नियमानुसार,

[hυ = Φo+½mv²max]
या,[½mv²max = hυ-Φo]

यहाँ m इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान है। इस समीकरण को आइन्सटीन का प्रकाश विद्युत समीकरण कहा जाता है। इससे स्पस्ट है सतह से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा महत्तम होती है। प्रकाश विद्युतधारा आपतित विकिरण की तीव्रता पर निर्भर करता है जबकि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा फोटॉन की आवृत्ति पर निर्भर करती है।
किसी भी धातु के लिए क्रांतिक आवृति(Threshold frequency) वह न्यूमतम आवृति है जिसके नीचे की आवृत्ति वाले प्रकाश द्वारा प्रकाश विद्युत प्रभाव उत्तपन्न नही किया जा सकता चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी बड़ी क्यों न हो।

यदि f० =Threshold frequency हो तो
Φo = hf०

अब प्रकाश विद्युत प्रभाव को इस प्रकार लिखा जाता है

[hf = hf० +½mv²max]

photoelectriceffect1हम प्रकाश के दोहरी प्रकृति के बारे में जानते है अगर प्रकाश के कण सिद्धान्त की बात की जाये तो प्रकाश ऊर्जा के पैकेट्स के रूप में चलता है और इन् पैकेट्स को फोटोन्स कहा जाता है।

प्रकाश के इन फॉटानों की ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है। जब उच्च आवृत्ति का प्रकाश किसी धात्विक सतह पर पड़ता है तो उस धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों का निकलना शुरू हो जाता है। इस घटना को प्रकाश वैद्युत प्रभाव कहा जाता है।

परंतु ऐसा होता क्यूँ है?

हम जानते हैं कि किसी भी धातु में अनेकों मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। परंतु ये इलेक्ट्रॉन परमाणु के आकर्षण बल से बँधे हुए होते हैं। आकर्षण की इस रस्सी को तोड़ने के लिए कुछ बल की आवश्यकता होती है और यह बल प्रकाश के फॉटान कणों में स्थित ऊर्जा से मिलता है। किसी भी धातु के लिए यह ऊर्जा भिन्न भिन्न होती है और इस निश्चित मान को उस धातु का कार्य फलन कहते है। जैसे ही कोई प्रकाश किरण किसी धातु की सतह पर पड़ती है तो फोटॉन कण धातु के मुक्त इलेक्ट्रॉनों से टकरा कर उन्हें अपनी ऊर्जा दे देते है और यदि यह ऊर्जा उस धातु के कार्य फलन से अधिक हो तो वह इलेक्ट्रान धातु की सतह को छोड़ कर बाहर आ जाता है। परंतु ऐसा हर बार हर इलेक्ट्रान के साथ हो ऐसा जरुरी नहीं है। किसी फोटोन की  सम्पूर्ण ऊर्जा किसी एक इलेक्ट्रान को स्थान्तरित होने के बाद भी वह इलेक्ट्रान धातु की सतह छोड़कर बाहर आ जाये यह इस बात पर निर्भर करता है की फोटोन से ऊर्जा लेने के बाद उस इलेक्ट्रान ने कितनी ऊर्जा का ह्रास किया है। किसी फोटोन से ऊर्जा ग्रहण करने के बाद कोई इलेक्ट्रान यह सारी ऊर्जा दूसरे परमाणुओं से टकरा कर खो भी सकता है। ऐसे में केवल वही इलेक्ट्रान सतह से बाहर आ पाते है जो सतह के बहुत निकट होते है।

प्रकाश के दोहरे बर्ताव के अनुसार इसकी व्याख्या समझने के लिए पहले प्रकाश के तरंग सिद्धान्त का प्रयोग करते है। अगर किसी काम तीव्रता वाले प्रकाश का प्रयोग किया जाये तो, जब कोई प्रकाश किरण किसी धातु सतह पर पड़ेगी तो उसकी ऊर्जा पूरी सतह पर बंट जाएगी, जिससे हर मुक्त इलेक्ट्रान के हिस्से में थोड़ी – थोड़ी सी ऊर्जा ही आएगी और किसी एक इलेक्ट्रान को सतह से बाहर निकलने के लिए कुछ समय इंतज़ार करना पड़ेगा और इस समयांतराल में इलेक्ट्रान बहुत सी टक्करों को पैदा करेंगे जिनमे लगातार ऊर्जा का ह्रास होगा और कोई इलेक्ट्रान शायद इतनी ऊर्जा ग्रहण ही नही कर पायेगा की धातु की सतह से बाहर आ सके। तरंग सिद्धान्त इस प्रभाव की व्याख्या करने में तभी समर्थ है जब प्रकाश की तीव्रता बहुत अधिक हो उस स्थिति में बाटने वाली ऊर्जा की मात्रा भी इतनी अधिक होती है की इलेक्ट्रान टक्करों के बावजूद भी बाहर आने लगते है। परंतु प्रयोगों में देखा गया है की चाहे कितनी भी कम तीव्रता का प्रकाश किसी धातु पर डाला जाये अगर उसकी ऊर्जा उस धातु के कार्य फलन से ज्यादा है तो इलेक्ट्रान का निष्कषण बिना किसी समयांतराल के शुरू हो जाता है। क्योंकि प्रकाश के कणों की गतिज ऊर्जा प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती है। यह निर्भर करता है प्रकाश की तरंग दैर्ध्य पर। प्रकाश की तीव्रता का अर्थ है की कितने फोटोन्स एक साथ धातु की सतह से टकरा रहे है। इसे ऐसे समझ लीजिये यही कोई 100 वाट का एक बल्ब किसी निश्चित वोल्टेज पर किसी निश्चित तीव्रता का प्रकाश उत्सर्जित कर रहा है तो वोल्टेज कम होने पर उसके प्रकाश में जो कमी आएगी वो उसकी तीव्रता में कमी होगी, अब वही बल्ब कुछ कम फोटोन उत्सर्जित करेगा पर हर एक फोटोन की गतिज ऊर्जा उतनी ही है जितनी पहले थी।

प्रकाश के कण सिद्धान्त के अनुसार – प्रकाश किसी धातु की सतह से टकरा कर उस पर कणों के रूप में बिखर जाता है।  हर कण एक फोटोन होता है। जब ये फोटोन किसी एक इलेक्ट्रान से टकराता है तो बहुत कम समय में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा उस इलेक्ट्रान को दे देता है। इस ऊर्जा को लेके इलेक्ट्रान सतह से उत्सर्जित भी हो सकता है और नहीं भी। अगर इलेक्ट्रान  की ग्रहण की गयी ऊर्जा अन्य परमाणुओं से टकरा कर व्यर्थ नही होती है तो वह इलेक्ट्रान तुरंत ही उत्सर्जित हो जाता है। इस क्रिया में कोई समयांतराल नहीं होता है। यहाँ पर एक फैक्टर और है जो प्रकाश विद्युत प्रभाव को प्रभावित करता है- यह फैक्टर है “थ्रेसहोल्ड वेवलेंथ”. इसका अर्थ है की प्रकाश की तरंगदैर्ध्य एक निश्चित मान से कम होनी चाहिए अन्यथा फोटोन्स की गतिज ऊर्जा इतनी नहीं होगी की धातु से इलेक्ट्रान उत्सर्जित हो सके। चाहे फिर कितनी ही अधिक तीव्रता का प्रकाश धातु की सतह पर पड़ रहा हो। X-किरण, गामा किरण जैसी किरणों का जब उपयोग किया जाता है तो लगभग सभी धातुएँ प्रकाश विद्युत प्रभाव दिखाती है। इन किरणों में उच्च ऊर्जा विधमान होती है इसलिए इन किरणों का धातुओं पर बड़ा विनाशकारी प्रभाव भी पड़ता है, धातुओं में घनाविष्ट आयनों का निर्माण हो जाता है और उनके रासायनिक बंधन टूट जाते है।

अल्बर्ट आइंस्टीन(Albert Einstein) ने इस प्रयोग के कुछ परिणाम भी सबके समक्ष रखा था।

  1. धातु की सतह से प्रकाशपुंज टकराते ही इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते है अर्थात प्रकाश पड़ने और इलेक्ट्रॉन निकलने के बीच कोई समय अंतराल नही होता।
  2. उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की संख्या प्रकाश की तीव्रता के समानुपाती होता है।
  3. क्रांतिक आवृति से नीचे की आवृत्ति का प्रकाश यह प्रभाव उत्तपन्न नही कर सकता।
  4. जैसे जैसे प्रकाश की आवृत्ति को बढ़ाते है वैसे वैसे उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है।
  5. उत्तपन्न प्रकाश विद्युतधारा प्रकाश विकरण की तीव्रता पर निर्भर करता है।

इस सिद्धान्त का महत्व इससे बड़ा हो जाता है क्योंकि यह सिद्धान्त प्रकाश के तरंग प्रकृति के विरुद्ध उसके कणीय प्रकृति का समर्थन करता है। इस सफल व्याख्या के लिए उन्हें 1921 मे नोबेल पुरस्कार(Nobel Prize) से सम्मानित किया गया। आज इस सिद्धान्त का उपयोग फोटो सेल, टेलीविज़न, कैमरा ट्यूब और सोलर सेल मे किया जाता है।

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7 विचार “प्रकाश विद्युत प्रभाव(Photoelectric effect)&rdquo पर;

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