ड्रैगन की धरती पर विज्ञान का उदय


दक्षिण अमरीकी सभ्यताओं की अद्भुत यात्रा समाप्त होने के बाद उस रात वातावरण में एक गहरी शांति थी। चंद्रमा की हल्की रोशनी आँगन में फैल रही थी। गार्गी और अनुषा अभी भी माया और इंका सभ्यताओं के रहस्यों में डूबी हुई थीं। मैं उनके चेहरों पर उस जिज्ञासा को देख रहा था जो किसी भी सभ्यता के असली ज्ञान का प्रारंभ होती है।

“ताऊजी,” अनुषा ने धीरे से पूछा, “क्या दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इतना ही अद्भुत विज्ञान विकसित हुआ था?”

मैं मुस्कुराया, “हाँ, और अब हम जिस सभ्यता की यात्रा करने जा रहे हैं, वह तो और भी गहरी और निरंतर विकसित होने वाली थी, प्राचीन चीन।”

गार्गी ने उत्सुकता से पूछा, “पापा, क्या भारत और चीन का संपर्क बहुत पुराना है?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “हाँ बेटा, इतना पुराना कि ज्ञान, धर्म और यात्राएँ दोनों सभ्यताओं के बीच पुल बन गई थीं। क्या तुमने चीनी यात्री Xuanzang का नाम सुना है? भारत में उन्हें युआन स्वांग या ह्वेनसांग भी कहा जाता है।”

अनुषा ने तुरंत पूछा, “क्या वे सच में इतने दूर चीन से भारत आए थे?”

मैंने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, सातवीं शताब्दी में उन्होंने हजारों किलोमीटर की कठिन यात्रा की, उनकी यह यात्रा पहाड़ों, रेगिस्तानों और खतरनाक रास्तों को पार करते हुए भारत आई थी। उनका उद्देश्य केवल यात्रा करना नहीं था, बल्कि भारत के ज्ञान, विश्वविद्यालयों और बौद्ध ग्रंथों को समझना था। उन्होंने यहाँ के विद्वानों से संवाद किया, गणित, दर्शन, खगोलशास्त्र और चिकित्सा से जुड़े ज्ञान को देखा, और विशेष रूप से प्राचीन विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया।”

गार्गी ने आश्चर्य से पूछा, “क्या वे यहाँ पढ़ने आए थे?”

मैंने कहा, “एक तरह से हाँ। उन्होंने भारत में लंबे समय तक रहकर ज्ञान अर्जित किया और फिर उसे चीन लेकर गए। उन्होंने भारत की वैज्ञानिक और बौद्धिक परंपराओं का विस्तृत विवरण लिखा, जिससे चीन को भारत की शिक्षा और विज्ञान के बारे में बहुत कुछ पता चला।

अनुषा ने धीरे से पूछा, “तो क्या चीन में विज्ञान का विकास भारत से जुड़ा था?”

मैंने आकाश की ओर देखते हुए उत्तर दिया, “ज्ञान कभी सीमाओं में बंद नहीं रहता। भारत और चीन दोनों ने एक-दूसरे से सीखा। युआन स्वांग की यात्रा हमें यह बताती है कि सभ्यताओं का विकास केवल अपने भीतर नहीं होता, बल्कि संवाद, यात्राओं और जिज्ञासा से होता है। और इसी से शुरू होती है हमारी अगली यात्रा, प्राचीन चीन में विज्ञान के उदय की कहानी, जहाँ तारों का अध्ययन, गणित की सूक्ष्मता और प्रकृति को समझने की अद्भुत जिज्ञासा धीरे-धीरे एक महान वैज्ञानिक परंपरा का रूप लेने लगी।”

गार्गी की आँखों में चमक आ गई, “क्या वहाँ भी खगोलशास्त्र और गणित उतना ही उन्नत था?”

मैंने उत्तर दिया, “केवल उन्नत ही नहीं, बल्कि व्यवस्थित, व्यावहारिक और दीर्घकालिक प्रभाव वाला भी। सबसे पहले हमें चीन की शुरुआत को समझना होगा। चीन की सभ्यता का उदय ह्वांग हो (पीली नदी) और यांग्त्ज़े नदी के किनारे हुआ। ये नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं थीं, बल्कि विज्ञान के जन्मदाता भी थीं। हर वर्ष आने वाली बाढ़ ने लोगों को मजबूर किया कि वे प्रकृति के नियमों को समझें। ”

अनुषा ने पूछा, “क्या यही विज्ञान की शुरुआत थी?”

“हाँ,” मैंने कहा, “विज्ञान अक्सर आवश्यकता से जन्म लेता है। प्राचीन चीनी लोगों ने देखा कि बाढ़ एक निश्चित चक्र में आती है। उन्होंने समय को मापना शुरू किया, ऋतुओं का अध्ययन किया, और धीरे-धीरे खगोलशास्त्र की ओर बढ़े।”

गार्गी ने उत्सुकता से पूछा, “ये तो हमने मिस्र, मेसोपोटामिया सभ्यता में भी देखा था, तो क्या चीनी लोगों ने भी कैलेंडर बनाया?”

“बिलकुल,” मैंने उत्तर दिया, “और वह केवल समय बताने का साधन नहीं था, बल्कि कृषि और शासन का आधार भी था।”

“चीन की सबसे प्रारंभिक राजवंशों में शिया और शांग का नाम आता है,” मैंने आगे कहा। “इन कालों में खगोलशास्त्र का प्रारंभिक विकास हुआ। शांग काल के लोग आकाश को देवताओं का क्षेत्र मानते थे, लेकिन वे उसे केवल पूजा नहीं करते थे, वे उसे समझने की कोशिश भी करते थे। उन्होंने सूर्य और चंद्रमा की गतियों का अवलोकन किया। ग्रहणों का अध्ययन किया गया। यह केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था।” पढ़ना जारी रखें ड्रैगन की धरती पर विज्ञान का उदय

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सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!

प्रयोगशाला मे सूर्य का निर्माण : नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) मे एक बड़ी सफलता


सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!
सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन के समय से ही नियंत्रित नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) द्वारा अनंत ऊर्जा का निर्माण वैज्ञानिको का एक सपना रहा है। यह ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया जो कि किसी भी तरह के प्रदुषण से मुक्त है। लेकिन बहुत से वैज्ञानिक इसे विज्ञान फतांशी की प्रक्रिया मानकर नकार चूके है। अभी भी लक्ष्य दूर है लेकिन पहली बार वैज्ञानिको को नाभिकिय संलयन की प्रक्रिया मे ऊर्जा के उत्पादन करने मे सफलता मीली है। यह घोषणा लारेंस लिवेरमोर नेशनल प्रयोगशाला(Lawrence Livermore National Laboratory) के नेशनल इग्नीशन विभाग(National Ignition Facility) के वैज्ञानीक ओमार हरीकेन(Omar Hurricane) द्वारा की गयी है और इसे नेचर पत्रिका मे प्रकाशित किया गया है।

जब दो हल्के परमाणु नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के परमाणु नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है। जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन के समीकरण E = mc2 से ज्ञात करते हैं। तारों के अन्दर यह क्रिया निरन्तर जारी है। सबसे सरल संयोजन की प्रक्रिया है चार हाइड्रोजन परमाणुओं के संयोजन द्वारा एक हिलियम परमाणु का निर्माण।

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