श्याम ऊर्जा: बहुधा पूछे जाने वाले प्रश्न(FAQ)


लगभग 13 वर्ष पहले यह खोज हुयी थी कि ब्रह्माण्ड की अधिकांश ऊर्जा तारों या आकाशगंगा मे ना होकर अंतराल(space) से ही बंधी हुयी है। किसी खगोलवैज्ञानिक की भाषा मे एक विशाल खगोलीय स्थिरांक (Cosmological Constant) की उपस्थिति का प्रमाण एक नये सुपरनोवा के निरीक्षण से मीला था।

पिछले तेरह वर्षो मे स्वतंत्र वैज्ञानिको के समूहों ने इस खगोलीय स्थिरांक की उपस्थिति के समर्थन मे पर्याप्त आंकड़े जुटा लीये है। ये आंकड़े प्रमाणित करते है कि एक विशाल खगोलीय स्थिरांक अर्थात श्याम ऊर्जा(Dark Energy) का अस्तित्व है। इस श्याम ऊर्जा के परिणाम स्वरूप ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे तेजी आ रही है। इस खोज के लिए वर्ष 2011 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार तीन खगोल वैज्ञानिको साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter), ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt) तथा एडम रीस(Adam G. Riess) को दीया जा रहा है।

2012 के भौतिकी नोबेल पुरुष्कार विजेता : एडम रीस(Adam G. Riess), साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter) तथा ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt)

2012 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार विजेता : एडम रीस(Adam G. Riess), साउल पर्लमटर(Saul Perlmutter) तथा ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt)

2011 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं की खोज पर समर्पित यह लेख श्याम ऊर्जा पर बहुधा पूछे जाने वाले प्रश्नो का उत्तर देने का प्रयास करता है। इस विषय पर दो लेख लेख 1 तथा लेख 2 भी पढें।

श्याम ऊर्जा (Dark Energy) क्या है ?

श्याम ऊर्जा वह बल है जिससे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति तेज हो रही है। ज्यादा तकनीकी शब्दो मे श्याम ऊर्जा से ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण आ रहा है।

ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण का क्या अर्थ है ?
सर्वप्रथम यह जाने कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। एडवीन हब्बल ने प्रमाणित किया था कि सभी आकाशगंगायें एक दूसरे से दूर जा रही है, उनके एक दूसरे से दूर जाने की गति उनके मध्य के अंतर के अनुपात मे है। ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण का अर्थ है कि यदि आप किसी आकाशगंगा की गति का मापन आज करे और उसके अरबो वर्ष पश्चात उस आकाशगंगा की गति का पुनः मापन करें तब मापी गयी नयी गति पहले की गति से ज्यादा होगी। आकाशगंगायें एक दूसरे से तेज होती हुयी गति से दूर जा रही हैं।

यह तो काफी आसान लगता है। क्या इसे संक्षेप मे वैज्ञानिक आधार से समझाया नही जा सकता ?
दूरस्थ आकाशगंगाओं के मध्य सापेक्ष दूरी को एक राशि मे समेटा जा सकता है जिसे परिमाण-कारक(Scale Factor) कहते है। इस परिमाण-कारक को a(t) या R(t) के रूप मे लिखा जाता है। परिमाण-कारक मूलतः ब्रह्माण्ड का आकार है। ब्रह्माण्ड का विस्तार अर्थात परिमाण कारक मे वृद्धि है। ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण अर्थात इसका विस्तार विस्तारित गति से हो रहा है। ध्यान दे कि अवकलन (Calculus)मे द्वितिय व्युत्पत्ती(second derivative) धनात्मक होती है।

बहरहाल परिमाण-कारक आकार नही हो सकता क्योंकि ब्रह्माण्ड असीमित रूप से विशाल हो सकता है लेकिन परिमाण कारक ज्ञात अंतरिक्ष का आकार है। 

क्या इसका अर्थ है कि हब्बल स्थिरांक(जो विस्तार की गति का मापन करता है) मे वृद्धी हो रही है ?
नही। हब्बल स्थिरांक(Hubble Constant) (या हब्बल कारक(Hubble Parameter) क्योंकि यह समय के साथ परिवर्तित होता है।) ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति का एक गुण है, लेकिन वह परिमाण-कारक पर निर्भर नही करता है।
यदि ब्रह्माण्ड के विस्तार गति मे कमी आ रही है अर्थात हब्बल स्थिरांक मे कमी आ रही है। यदि हब्बल स्थिरांक मे वृद्धि हो रही है अर्थात ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे वृद्धि हो रही है। लेकिन इन दोनो के मध्य मे एक ऐसा क्षेत्र है जिसमे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे तेजी आ रही है लेकिन हब्बल स्थिरांक मे कमी हो रही है। शायद वर्तमान मे ब्रह्माण्ड इसी क्षेत्र मे है। हर आकाशगंगा की गति मे वृद्धि हो रही है लेकिन ब्रह्माण्ड के आकार को दोगुना होने मे और ज्यादा समय लग रहा है।
गणितीय शब्दो मे : हब्बल के नियम के अनुसार किसी आकाशगंगा की गति v उसकी दूरी d से निचे दिये सूत्र के अनुसार होती है, इस सूत्र मे H हब्बल स्थिरांक है।

v=H*d

यदि हब्बल स्थिरांक(H) मे हो रही कमी की दर आकाशगंगा की दूरी(d) मे वृद्धि दर से कम हो तो आकाशगंगा की गति(v) मे वृद्धि हब्बल स्थिरांक(H) मे कमी के बावजूद हो सकती है ।

क्या खगोल वैज्ञानिको ने अरबो वर्ष तक निरीक्षण किया है और आकाशगंगाओं की गति मापी है?
नही! खगोल वैज्ञानिको ने अरबो प्रकाशवर्ष दूर आकाशगंगाओं का निरीक्षण किया है। प्रकाश एक निश्चित गति से चलता है, जिससे हम भूतकाल मे देख सकते है। किसी एक प्रकाशवर्ष दूर स्थित तारे से आ रहे प्रकाश को हम एक वर्ष पश्चात देखते है अर्थात हम उसकी एक वर्ष पुरानी छवि देखते है। विभिन्न दूरीयों पर स्थित पिंडो की अवस्था के निरीक्षण से हम भूतकाल का चित्रण कर सकते है। इस विधि से हमने पाया है कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण आ रहा है।

किसी आकाशगंगा की दूरी का मापन कैसे होता है ?

यह आसान नही है। सबसे ज्यादा प्रयुक्त विधी मे मानक दीपस्तंभ(Standard Candle) का प्रयोग किया जाता है। मानक दीपस्तंभ ऐसे अंतरिक्ष पिंड को कहते है जिसे खगोलीय दूरी से देखा जा सकता है और उसकी वास्तविक दीप्ती(चमक) पहले से ज्ञात होती है। इसके पश्चात हम उस दीपस्तंभ की दूरी उसकी दीप्ती मे आयी कमी से ज्ञात कर सकते है। पिंड जीतनी दूरी पर होगा उसकी दीप्ती मे उतनी कमी आयेगी।

दुर्भाग्य से हमारे पास कोई मानक दीपस्तंभ नही है!

मानक दीपस्तंभ  नही है ? फिर दूरीयों की गणना कैसे होती है ?

हमारे पास मानक दीपस्तंभ नही है लेकिन वर्ग Ia के सुपरनोवा इसकी कमी पूरी करने के लिए पर्याप्त है। उनकी चमक खगोलीय दूरीयों तक दिखायी देती है लेकिन यह चमक स्थायी नही होती है। लेकिन 1990 मे मार्क फीलीप ने सुपरनोवा की वास्तविक दीप्ती तथा “चरम दीप्ती से घटकर वास्तविक दीप्ती तक पहुंचने मे लगने वाले समय” के मध्य एक संबध खोज निकाला था। इस तरह से यदि हम किसी सुपरनोवा की दीप्ती का निरीक्षण एक अंतराल तक करें तो हम सुपरनोवा की चमक का एक मानक बना सकते है। इस मानक के प्रयोग से दूरीयों की गणना की जा सकती है।

वर्ग Ia के सुपरनोवा को मानक दीपस्तंभ  क्यों माना जाता है।
हम इस बारे मे पूरी तरह से निश्चिंत नही है, लेकिन यह मान्यता अनुभवजन्य  है। हम जानते है कि वर्ग Ia के सुपरनोवा के मूल मे श्वेत वामन तारे होते है जो बाहर से पदार्थ जमा करते रहते है और इस प्रक्रिया मे चंद्रशेखर सीमा तक पहुंच जाते है। इस सीमा पर पहुचते ही उनमे विस्फोट होता है।

चंद्रशेखर सीमा सम्पूर्ण ब्रह्मांड मे समान है इसलिए इस तरह के सुपरनोवाओं की चमक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे समान होगी। इस चमक मे कोई विचलन(deviation) उस श्वेत वामन तारे के घटको से ही होगा जोकि दुर्लभ है।

लेकिन कोई सुपरनोवा विस्फोट कब होगा कैसे पता चलता है ?

सुपरनोवा विस्फोट का पूर्वानुमान नही लगाया जा सकता। वे दुर्लभ होते है, हर आकाशगंगा मे एक शताब्दी मे एक की दर से। सुपरनोवा विस्फोट के लिये अनेको आकाशगंगाओं का चित्र लिया जाता है, इन चित्रो को अगले कुछ सप्ताहों मे लिए चित्रो से मिलाया जाता है। ये “कुछ सप्ताह” सामान्यतः दो अमावस्या के मध्य के होते है, जब आकाश ज्यादा अंधियारा होता है। संयोग से किसी सुपरनोवा के अपनी चरम दीप्ती मे पहुंचने भी इतना ही समय लगता है। चित्रो का मिलान सामान्यतः कम्प्युटर से होता है, कंप्युटर इन चित्रो मे नया चमकदार बिंदू खोजने का प्रकाश करता है। किसी नये चमकदार बिंदू के पता चलते ही सारी दूरबीने उस दिशा मे मोड़ दी जाती है। यह एक कठीन प्रक्रिया है लेकिन अब तकनिक उन्नत हो गयी है और हम किसी सुपरनोवा के विस्फोट के तुरंत पश्चात उसका पता लगाने मे सक्षम हैं।

सुपरनोवाओं के इस निरीक्षण से वैज्ञानिको ने क्या पाया ?
अधिकतर (लगभग सभी) खगोल वैज्ञानिक यह मानकर चल रहे थे कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति कम हो रही होगी क्योंकि आकाशगंगाये एक दूसरे को अपने गुरुत्व से खीचती है, जिससे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे कमी आना चाहीये। लेकिन वास्तविक परिणाम विपरीत थे, दूरस्थ सुपरनोवा अपेक्षा से ज्यादा धूंधले थे अर्थात वे अनुमान से ज्यादा दूर थे। इसका अर्थ था कि ब्रह्माण्ड की विस्तार की गति मे वृद्धि हो रही है।

लेकिन खगोल वैज्ञानिको ने परिणामो को इतनी जल्दी कैसे मान लिया ?
1998 की घोषणा से पहले भी यह स्पष्ट था कि ब्रह्माण्ड मे सब कुछ ठीकठाक नही है। क्योंकि गणनाओ के अनुसार ब्रह्माण्ड की उम्र इसमे मौजूद पुरानो तारों की उम्र से कम थी। गणना के अनुसार ज्ञात द्रव्यमान निरीक्षित द्रव्यमान से कहीं ज्यादा था। बड़े पैमाने पर अनुमान से कही कम खगोलीय संरचनाये थी। श्याम ऊर्जा की खोज ने एक साथ इन सभी समस्याओं को हल कर दीया। सब कुछ अपनी जगह पर अपने आप फ़िट हो गया था। वैज्ञानिक थोड़े शंकित थे लेकिन जब यह घोषणा हुयी तब ब्रह्माण्ड की संरचना समझ मे आने लगी थी।

हम कैसे माने की ये सुपरनोवा अपनी दूरी के कारण धूंधले दिख रहे है ? हो सकता है कि किसी निहारिका या गैसीय बादल की आड़ मे वे धूंधले दिख रहे हो ?

यह एक सही प्रश्न है। इस वजह से इस खोज के लिए खगोल वैज्ञानिको की दो टीमो ने इस पर कार्य किया था। आप कभी भी 100% निश्चिंत नही रह सकते लेकिन आप ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय परिणाम ला सकते है। जैसे की हम जानते है कि कोई भी धूंधलाने वाला पदार्थ(निहारिका या गैसीय बादल) नीले रंग की प्रकाश किरणो को ज्यादा बिखेरता है जिससे गैस और धूल के बादलो के पिछे के तारे लाल दिखायी देते है। निरिक्षण किये गये सुपरनोवा लाल नही दीख रहे थे। इसके अतिरिक्त हमारे पास ऐसे कई स्वतंत्र परिणाम थे जो कि समान निष्कर्षो पर पहुंच रहे थे। इस लिये हम ज्यादा विश्वास से कह सकते है कि सुपरनोवा के निरीक्षण से प्राप्त यह परिणाम ठोस है।

क्या श्याम ऊर्जा की उपस्थिति के स्वतंत्र प्रमाण भी है ?

जी हां। सबसे आसान प्रमाण है “व्यवकलन“: ब्रह्माण्डीय माइक्रोवेव विकिरण की मात्रा ब्रह्मांड के कुल ऊर्जा(पदार्थ सहित) के समान है। आकाशगंगा और आकाशगंगा के समूह से पदार्थ के कुल द्रव्यमान की गणना की गयी है लेकिन यह कुल ऊर्जा का 27% है, अर्थात 73% ऊर्जा अदृश्य है जो कि पदार्थ के रूप मे नही है। यह मात्रा ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति की व्याख्या के लिए पर्याप्त है।

ठीक है लेकिन श्याम ऊर्जा क्या है ?
श्याम ऊर्जा के तीन गुण है।

प्रथम, वह श्याम है: हम उसे देख नही सकते और जहां तक हमने निरिक्षण किया है वह पदार्थ से प्रतिक्रिया नही करती है। यदि करती हो तो हमारे उपकरण उसे मापने मे असमर्थ है।

द्वितीय, वह समान रूप से वितरीत है: वह आकाशगंगा या आकाशगंगा समूहो मे नही है अन्यथा हम उसे इन पिंडो के गतिकी के अध्यन से पता कर लेते।

तृतीय, वह स्थायी है: श्याम ऊर्जा का घन्त्व ब्रह्माण्ड के विस्तार के साथ कम नही हो रहा है। पदार्थ का घनत्व विस्तार के साथ कम होता है लेकिन श्याम ऊर्जा का घनत्व स्थायी है।
द्वितिय और तृतिय गुणधर्म के कारण हम उसे ऊर्जा कहते है पदार्थ नही। श्याम ऊर्जा कणो के जैसे व्यवहार नही करती है जिसकी स्थानिय गतिकी होती है और विस्तार के साथ कमजोर होती है। श्याम ऊर्जा कुछ और है।

ठीक है, एक अच्छी कहानी है ! लेकिन श्याम ऊर्जा क्या हो सकती है?
सही उत्तर है, हम नही जानते। लेकिन श्याम ऊर्जा के सबसे संभावित उम्मीदवारों मे है निर्वात ऊर्जा(Vaccum Energy) या खगोलीय स्थिरांक। हम जानते कि श्याम ऊर्जा सपाट और स्थायी है, यह गुण निर्वात ऊर्जा के साथ ही हो सकता है। निर्वात ऊर्जा अर्थात अंतराल के हर छोटे से भाग के साथ जूड़ी हुयी ऊर्जा, जोकि समय या स्थान के साथ बदलती नही है। यदि आप संख्या मे जानना चाहेंगे तो यह 1/100,000,000 erg/cm3 है।

क्या निर्वात ऊर्जा और खगोलीय स्थिरांक समान है।
जी हां। इसके विपरीत के किसी दावे पर विश्वास ना करें। जब आइन्स्टाइन ने इस के बारे मे सोचा था तब उन्होने इसे ऊर्जा के रूप मे नही लीया था। वे इसे काल-अंतराल का ऊर्जा पर प्रभाव मानते थे लेकिन यह निर्वात ऊर्जा के रूप मे सामने आयी।

क्या निर्वात ऊर्जा क्वांटम अस्थिरता(Quantum Fluctuations) से निर्मित होती है?
पूरी तरह से नही। निर्वात ऊर्जा के पिछे एकाधिक कारक हो सकते है जिनमे से अधिकतर का क्वांटम अस्थिरता से कोई लेनादेना नही है। लेकिन क्वांटम अस्थिरता भी निर्वात ऊर्जा के पिछे एक महत्वपूर्ण कारक ह। क्वांटम अस्थिरता कारक का मूल्य काफी अधिक होता है, जिससे खगोलीय स्थिरांक समस्या(cosmological constant problem) सामने आती है।

खगोलीय स्थिरांक समस्या(cosmological constant problem) क्या है?
यदि हम पारम्परिक यांत्रिकी (classical mechanics)को लेकर चलें तब खगोलीय स्थिरांक को एक संख्या होना चाहीये। ऐसा कोई कारण नही है कि वह बड़ी हो या छोटी हो, धनात्मक हो या ऋणात्मक हो। हम केवल उसकी मापन करेंगे, बस।

लेकिन ब्रह्माण्ड पारम्परिक नही है, वह क्वांटम है। क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत(quantum field theory) मे पारंपरिक कारक मे क्वांटम सुधार(quantum corrections) होते है। अर्थात मापी गयी मात्रा और गणना की गयी मात्रा का अंतर क्वांटम सुधार कहलाता है। लेकिन निर्वात ऊर्जा के संदर्भ मे यह क्वांटम सुधार निर्वात के रिक्त स्थान के आभासी कणो की ऊर्जा के रूप मे आता है।
यदि हम इन आभासी कणो की ऊर्जा को जोड़े तब हमे उत्तर मिलता है, असिमित (infinite)। असिमित ऊर्जा ? यह नही हो सकता, कुछ गलत है, लेकिन कुछ वैज्ञानिक मानते है कि हमारी गणना गलत है। ये सभी गणनाए हर आकार के क्वांटम अस्थिरताओं का समावेश करती है, जिसमे प्लैंक स्थिरांक(Plank Constant) से कम तरंग दैधर्य भी शामील है। प्लैंक दूरी (Plank Distance)से कम तरंग दैधर्य पर काल-अंतराल अपना सैधांतिक अर्थ खो देता है। यदि हम उन्ही तरंग दैधर्यो का समावेश करे जो प्लैंक दूरी के तुल्य हो या ज्यादा हो तब हमे खगोलीय स्थिरांक का एक अनुमानीत मूल्य मिलता है।
लेकिन यह अनुमानित मूल्य निरीक्षित मूल्य से 10120 गुणा ज्यादा है। इसे ही खगोलीय स्थिरांक समस्या कहते हैं।

खगोलीय स्थिरांक का मूल्य इतना कम क्यों है?
इसका उत्तर किसी के पास नही है। सुपरनोवा विस्फोट की जानकारी के पहले भौतिक विज्ञानी मानते थे कि कोई अदृश्य सममीती(Invisible Symmetry) या अतिरिक्त आयाम(Extra Dimension) खगोलीय स्थिरांक को शून्य कर देती है, लेकिन अब हम जानते है कि इसका मूल्य हमारी गणना से अत्याधिक कम है। इसे जानने की आवश्यकता है कि यह इतना छोटा क्यों है, यह शून्य क्यों नही हओ। एक संयोग समस्या(coincidence problem) भी है, ब्रह्माण्ड मे पदार्थ का घनत्व और श्याम ऊर्जा का घनत्व समान है।
खगोलीय स्थिरांक का मूल्य के कम होने की सबसे अच्छी व्याख्या एन्थ्रोपिक सिद्धांत(anthropic principle) करता है। यदि हम किसी मल्टीवर्स (Multiverse – एकाधिक ब्रह्माण्ड) मे हों तो भिन्न क्षेत्रो मे निर्वात ऊर्जा का मूल्य भिन्न होना चाहीये। यह भी कहा जा सकता है कि जीवन का प्रादुर्भाव उन्ही क्षेत्रो मे हो सकता है जहां पर निर्वात ऊर्जा का मूल्य गणना कीये गये मूल्य से काफी कम हो। यदि इसका मूल्य अधिक और धनात्मक हो तो आकाशगंगा (अणु,परमाणु भी) बीखर जायेंगी, यदि इसका मूल्य अधिक और ऋणात्मक होने पर ब्रह्माण्ड जल्दी ही संकुचीत हो जायेगा। यदि हम इस अवस्था मे यदि एक स्थायी ब्रह्माण्ड के लिए निर्वात ऊर्जा का अनुमान लगायें तो वह निरीक्षित मूल्य के समीप है। स्टीवन वेनबर्ग ने ब्रह्मांड के विस्तार की गति मे विस्तार की खोज से पहले ही 1988 मे यह सिद्धांत प्रस्तावित किया था। लेकिन इस गणना के साथ कई समस्याएं है, वह भी उस समय जब आप मल्टीवर्स(एकाधिक ब्रह्माण्ड) की कल्पना करें।
हम एक ऐसा साधारण और सरल सूत्र खोज रहे है जिससे हम खगोलीय स्थिरांक का मूल्य ज्ञात कर सकें और वह प्रकृति के अन्य स्थिरांको के जैसे हो। लेकिन हमारे पास ऐसा कोई सुत्र नही है। प्रस्तावित सिद्धांतो मे क्वांटम गुरुत्व(Quantum Gravity), अतिरिक्त आयाम(Extran Dimensions), श्वेत वीवर(Wormhole), महासममीती(Super Symmetry) के अतिरिक्त कई दिलचस्प लेकिन अव्यवहार्य सिद्धांतो का समावेश है। लेकिन अभी तक कोई भी सर्वमान्य सिद्धांत सामने नही आया है।

क्या इस खोज के परिणामो का स्ट्रिंग थ्योरी(String Theory) पर कोई असर पड़ा है ?
हां! अन्य भौतिक विज्ञानीयों की तरह स्ट्रिंग सिद्धांत के समर्थक वैज्ञानिक भी शुन्य निर्वात ऊर्जा मानकर चल रहे थे। लेकिन क्या स्ट्रिंग सिद्धांत मे अशून्य निर्वात ऊर्जा का समाहन किया जा सकता है? उत्तर होगा कि यह कठिन नही है। समस्या यह है आपके पास एक हल नही है, स्ट्रिंग सिद्धांत बेतुके रूप से अनेक हल देती है। स्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार किसी भी समस्या का एक हल पाना असंभव है जो कि विश्व को समझाया जा सके। लेकिन विज्ञान को वह सिद्धांत मानना होगा जो प्रकृति सुझाये!

अब ये संयोग समस्या क्या है ?

ब्रह्मांड के विस्तार के साथ ब्रह्माण्ड मे पदार्थ का औसत घनत्व कम होता है लेकिन श्याम ऊर्जा का घनत्व स्थायी रहता है। अर्थात श्याम ऊर्जा और पदार्थ के सापेक्ष घनत्व मे समय के साथ काफी परिवर्तन हुआ है। भूतकाल मे पदार्थ और विकिरण का घनत्व ज्यादा था, भविष्य मे श्याम ऊर्जा का घनत्व ज्यादा होगा। लेकिन वर्तमान मे दोनो समान है। क्या हम इतने सौभाग्यशाली है कि हमने उस समय जन्म लिया है जब श्याम ऊर्जा की खोज संभव है और इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जा सके। या यह केवल एक संयोग है, या यह वर्तमान युग की विशिष्टता है ? यह एक कारण है कि कुछ व्यक्ति एन्थ्रोपिक सिद्धांत(anthropic principle) को गंभीरता से लेते है। यहां हम एक अतर्कसंगत ब्रह्माण्ड की चर्चा कर रहे हैं।

श्याम ऊर्जा और निर्वात ऊर्जा मे क्या अंतर है ?
श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण के लिए उत्तरदायी है। निर्वात ऊर्जा , श्याम ऊर्जा के संभावित उम्मीदवारो मे से सबसे प्रभावी उम्मीदवार है।

इसका अर्थ यह है कि श्याम ऊर्जा के और भी उम्मीदवार है ?
हां! ऐसी कोई भी ऊर्जा जो सपाट और स्थायी हो। लेकिन अधिकतर का घनत्व विस्तार के साथ कम हो जाता है, इसलिए स्थायी ऊर्जा श्रोत की खोज आसान नही है। सबसे सरल और सर्वोत्कृष्ट उदाहरण “क्वीटेसेंस(quintessence)” का है जो कि एक अदिश(scalar) ऊर्जा क्षेत्र है और सारे ब्रह्माण्ड मे फैला हुआ है और समय के साथ अत्यंत धीमी गति से परिवर्तित होता है।

क्या क्वीटेसेंस विचार प्राकृतिक है?
नही! इस विचार के बारे मे मूल आशा था कि यह प्राकृतिक होगा। यह आशा इसलिये थी कि गतिज और विचलन होने ऊर्जा की बजाये सपाट स्थिर स्थायी ऊर्जा पर ध्यान देने से श्याम ऊर्जा के घनत्व के कम होने की व्याख्या की संभावना थी और इससे संयोग समस्या के हल होने की आशा थी। लेकिन ये दोनो आशायें पूरी नही हुयी।
उसकी बजाये इस विचार मे नयी समस्यायें जुड़ती गयी। क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत(quantum field theory) के अनुसार अदिश ऊर्जा क्षेत्र भारी होते है लेकिन क्वीटेसेंस के अनुसार अदिश ऊर्जा क्षेत्र अत्याधिक रूप से हल्के होना चाहीये( सबसे हल्के न्युट्रीनो से 20से 30 गुणा भारी लेकिन शून्य नही)। यह केवल एक समस्या थी ; दूसरी यह कि हल्के अदिश ऊर्जा क्षेत्र द्वारा सामान्य पदार्थ से प्रतिक्रिया करना चाहीये। यह प्रतिक्रिया लघु हो सकती है लेकिन जांची जाने योग्य होना चाहीये लेकिन इसे अभी तक नही जांचा जा सका है। लेकिन यह एक समस्या के साथ ही एक अवसर भी है। शायद बेहतर प्रयोगो से क्वीटेसेंस ऊर्जा को जांचा जा सके तब हम श्याम ऊर्जा को समझ सकेंगें और गुत्थी हमेशा के लिए सुलझ जायेगी।

क्या क्वीटेसेंस विचार की जांच का कोई और तरिका है ?

सबसे आसान उपाय सुपरनोवा निरीक्षण प्रयोग को दोहराने का है लेकिन बेहतर तरिके से। इसमे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति को ज्यादा सटिकता से मापा जाये कि हम जाने सकें की श्याम ऊर्जा का घनत्व समय के साथ परिवर्तित हो रहा है। साधारण रूप से यह श्याम ऊर्जा की अवस्था-समीकरण-कारक(equation-of-state parameter ) w का मापन है। यदि w=-1 तब श्याम ऊर्जा स्थायी है अर्थात वह निर्वात ऊर्जा है। यदि w का मूल्य -1 से थोड़ा भी ज्यादा है तब श्याम ऊर्जा का घन्त्व धीमे धीमे कम हो रहा है। यदि w का मूल्य -1 से थोड़ा कम है(उदा. -1.1), श्याम ऊर्जा का घनत्व बढ रहा है और यह स्थिति सारी भौतिकी को पलट के रख देगी।
अब ये w कहां से आ गया ? क्या है w?
w को अवस्था-समीकरण-कारक(equation-of-state parameter ) कहते है क्योंकि वह श्याम ऊर्जा के दबाव(p) को ऊर्जा घनत्व(ρ) से जोड़ता है।
w = p/ρ
श्याम ऊर्जा के घनत्व का मापन असंभव है इसलिये यह एक थोड़ी बेतुकी परिभाषा है। लेकिन यह इतिहास की एक घटना या दूर्घटना है। हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि क्या श्याम ऊर्जा समय के साथ परिवर्तित होती है। सामान्यतः साधारण सापेक्षता अवस्था-समीकरण-कारक(equation-of-state parameter ) से प्रभावित होती है।

क्या इसका अर्थ है कि श्याम ऊर्जा का दबाव ऋणात्मक है ?
एकदम सही! ऋणात्मक दबाव का अर्थ होता है कि यह दबाव धकेलने की बजाये खींचता है, किसी खिंचे गये स्प्रिंग की तरह हो दोनो सीरो पर खिंचता है। इसे ’तनाव’ भी कहते है। श्याम ऊर्जा के लीए ’सरल तनाव’ ज्यादा सही शब्द है।

श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार को गति क्यों दे रही है?
क्योंकि श्याम ऊर्जा स्थायी है। आइन्सटाइन के अनुसार ऊर्जा द्वारा काल-अंतराल मे वक्रता आती है। ब्रह्मांड मे यह वक्रता दो तरह से आती है: अंतराल मे वक्रता तथा ब्रह्मांड का विस्तार। हमने अंतराल की वक्रता का मापन कीया है और यह लगभग शुन्य है। इस कारण से यह स्थायी ऊर्जा से विस्तार को स्थायी गति मील रही है। यदि हब्बल कारक स्थिरांक है और उपर दिये गये हब्बल के नियम अर्थात (v = H d) को देंखे तो पता चलता है कि v का मूल्य बढता जायेगा। क्योंकि d का मूल्य बढ रहा है और इस कारण ब्रह्माण्ड के विस्तार को त्वरण मील रहा है।

यदि ऋणात्मक-दबाव तनाव के जैसे है, तो वह आकाशगंगाओं को खिंचने की बजाये धकेल क्यों रहा है?
शायद आप सुनते होंगे कि ” श्याम ऊर्जा से ब्रह्माण्ड के विस्तार गति मील रही है क्योंकि उसका दबाव ऋणात्मक है।
” यह पारिभाषिक रूप से ही सही है। लेकिन यह विषय को समझाने की बजाये उसे उलझा देता है।
यह प्रश्न कि “तनाव पिंडो को खींच क्यो नही रहा है ?”, एकदम सही है। श्याम ऊर्जा किसी को धकेलती या खिंचती नही है। तथ्य तो यह है कि श्याम ऊर्जा पदार्थ (आकाशगंगाओं) के कोई प्रतिक्रिया ही नही करती है। श्याम ऊर्जा अंतराल मे समान रूप से वितरीत है, इसलिये एक ओर से खिंचाव दूसरी ओर के खिंचाव से संतुलित हो जायेगा। यह श्याम ऊर्जा का गुरुत्वाकर्षण द्वारा अप्रत्यक्ष प्रभाव है कि ब्रह्माण्ड के विस्तार को गति मील रही है।
ब्रह्माण्ड के विस्तार गति मे त्वरण इसलिये आ रहा है कि यह एक स्थायी ऊर्जा है। समय या अंतराल के साथ इसमे परिवर्तन नही होता है। सही अर्थो मे श्याम ऊर्जा से आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर नही जा रही है बल्कि उनके मध्य मे अंतराल का विस्तार हो रहा है।

क्या श्याम ऊर्जा प्रतिगुरुत्वाकर्षण है ?
नही, श्याम ऊर्जा प्रतिगुरुत्वाकर्षण नही है। वस्तुतः वह गुरुत्वाकर्षण ही है। एक ऐसे विश्व की कल्पना किजीये जिसमे शून्य श्याम ऊर्जा हो लेकिन दो श्याम ऊर्जा के दो बड़े धब्बे हो। ये दोनो धब्बे एक दूसरे को धकेलेंगे नही, दोनो एक दूसरे को आकर्षीत करेंगे। लेकिन इन धब्बो के अंदर श्याम ऊर्जा अंतराल के विस्तार के लिये धकेलेंगे। इसे समझने के लिए हमे युक्लीड की भूमीती से बाहर निकल कर सोचना होगा।

क्या यह नया प्रतिकर्षण बल है ?
नही। यह गुरुत्वाकर्षण बल का ही एक रूप है। यह कोई नया बल नही है।

श्याम ऊर्जा और श्याम पदार्थ मे क्या अंतर है ?
आप सेब और संतरे की तुलना कर रहे है। श्याम पदार्थ कणो से बना है लेकिन हम इन कणो को अभी तक खोज नही पाये है। हम जानते है कि इन कणो का आस्तित्व है क्योंकि हमने उनके गुरुत्वाकर्षण को भिन्न भिन्न जगहो(आकाशगंगा, आकाशगंगा समूह, माइक्रोवेव विकिरण) पर महसूस किया है। यह लगभग ब्रह्माण्ड का 23% है लेकिन यह पदार्थ है। ऐसा पदार्थ जिसे हम सीधे सीधे जांच नही सकते। श्याम पदार्थ गुरुत्वाकर्षण से संगठीत होता है तथा ब्रह्माण्ड के विस्तार से इसका घनत्व कम होता है। श्याम ऊर्जा संगठीत नही होती है, नाही उसका घनत्व कम होता है। श्याम ऊर्जा कणो से निर्मित नही है। वह सबसे अलग है।

क्या यह संभव है कि श्याम ऊर्जा का आस्तित्व ही नही हो और गुरुत्वाकर्षण खगोलीय पैमाने पर भिन्न रूप से व्यवहार करता हो।
यह संभव है और कुछ वैज्ञानिक इस संभावना पर कार्य कर रहे है। लेकिन इस सिद्धांत के सामने भी कई प्रश्न है।

श्याम ऊर्जा का ब्रह्माण्ड के भविष्य पर क्या असर होगा ?
यह श्याम ऊर्जा के गुणो पर निर्भर है। यदि यह खगोलीय स्थिरांक है जो कि स्थायी रहेगा, तब ब्रह्माण्ड का अंनंत तक विस्तार होते रहेगा, वह ठंडा हो जायेगा और अंत मे रिक्त स्थान के अतिरिक्त कुछ नही बचेगा।
यह भी संभव है कि वर्तमान मे खगोलीय स्थिरांक स्थिर है लेकिन भविष्य मे इसमे परिवर्तन आये और निर्वात ऊर्जा के घनत्व मे कमी हो। इस अवस्था मे ब्रह्माण्ड संकुचन प्रारंभ होगा और अंत मे ब्रह्माण्ड एक बिंदू के रूप मे संकुचित हो जायेगा।
लेकिन यदि भविष्य मे खगोलीय स्थिरांक का मूल्य बढता है तब ब्रह्माण्ड का विस्तार त्वरित होते जायेगा। एक समय पश्चात वह आकाशगंगाओ, तारो, ग्रहो, परमाणुओं तक को चीर देगा। एक एक कण अलग अलग हो जायेगा।

आगे क्या ?
हमे श्याम ऊर्जा को बेहतर रूप से समझना है और इसके लिए बेहतर खगोलीय निरीक्षण करने होंगे। युरोपीयन अंतरिक्ष एजेंसी श्याम ऊर्जा के मापन के लिए एक उपग्रह की योजना बना रही है। कुछ धरती आधारित परियोजनाए भी है जैसे बृहद सीनोप्टीक सर्वे दूरबीन( Large Synoptic Survey Telescope ) इस खोज मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी।
लेकिन इस सब का उत्तर निरस हो सकता है। शायद श्याम ऊर्जा एक खगोलीय स्थिरांक ही हो। केवल एक संख्या! तब हम क्या करेंगे ? इस अवस्था मे हमे और प्रयोगो के द्वारा अपने सिद्धांतो को मजबूत करना होगा।
विज्ञान के प्रश्नो का उत्तर पुस्तको के पीछे नही होता है, उन्हे हमे खोजना होता है। यह तो एक बहुत बड़ा प्रश्न है।

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कुछ प्रश्नों का उत्तर बोझील हो गया है, भविष्य मे उन्हे और सरल भाषा मे लिखने का प्रयास करुंगा!

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7 विचार “श्याम ऊर्जा: बहुधा पूछे जाने वाले प्रश्न(FAQ)&rdquo पर;

  1. sir
    1.kya har energy ka ghanatva vistaar ke sath sthir rehta hai yadi nahi to dark energy ka kyu rehta hai
    2.padarth ke vistaar ya sankuchan ke liye bal zimedar hote hai phir ye kaam energy kaise kar rahi hai
    3.galaxies ek dusre se door ja rahi hai par,
    kya clusters me sabhi galaxies aapas me karib aa rahi hai, means kya clusters ka sankuchan ho raha hai ?

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  2. ब्रह्मांड के एक और रहस्य – श्याम ऊर्जा को समझने समझाने हेतु एक परिपूर्ण आलेख.
    कभी कभी तो लगता है कि हम जितना ब्रह्मांड को समझने की कोशिश करते हैं तो वह और ज्यादा उलझता जाता है 🙂

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