पृथ्वी के उपग्रह और उनकी कक्षायें(Earth Satellite Orbits)


पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

पृथ्वी की निम्न कक्षा मे अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र

जब भी अंतरिक्ष और उपग्रहो की चर्चा होती है तब बहुत सी कक्षाओं की भी चर्चा होती है जैसे भूस्थानिक कक्षा, ध्रुविय कक्षा। क्या होती है ये कक्षायें ? इनकी आवश्यकता क्या है ?

जब आप किसी थियेटर मे को ड्रामा देखने जाते है तो अलग अलग सीट से आपको एक ही मंचन के अलग अलग पहलू दिखायी देते है, उसी तरह से पृथ्वी की विभिन्न कक्षायें उपग्रह को पृथ्वी को अलग अलग परिप्रेक्ष्य से निरीक्षण का अवसर देते है। हर कक्षा का अलग अलग कारण से अपना महत्व होता है। कुछ कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के किसी एक बिंदु पर टिका हुआ दिखाई देता है, कुछ अन्य कक्षाओं मे उपग्रह पृथ्वी के कई स्थानो के उपर से सतत यात्रा करता रहता है।

मूल रूप से पृथ्वी पर उपग्रहों की तीन कक्षायें है, उच्च पृथ्वी कक्षा, मध्यम पृथ्वी कक्षा तथा निम्न पृथ्वी कक्षा। अधिकतर मौसम उपग्रह और कुछ संचार उपग्रह उच्च पृथ्वी कक्षा मे रहते है, अर्थात पृथ्वी की सतह से अधिक दूरी पर। मध्य पृथ्वी कक्षा मे रहने वाले उपग्रह नेविगेशन तथा जासूसी उपग्रह होते है जो किसी एक विशेष क्षेत्र पर नजर रखने के लिये बनाये गये होते है। वैज्ञानिक उपग्रह पृथ्वी की निम्न कक्षा मे होते है जिसमे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन, नासा के पृथ्वी के निरीक्षण उपग्रहों के बेड़े का समावेश है।

 

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

कक्षाओं के वर्गीकरण का एक उपाय उंचाई है। निम्न पृथ्वी कक्षा वातावरण के ठीक उपर से आरंभ होती है, जबकि उच्च पृथ्वी कक्षा पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी के दंसवे भाग के समीप होती है।

किसी भी कक्षा की उंचाई या पृथ्वी की सतह से उपग्रह की दूरी से उपग्रह की गति निर्धारित होती है। पृथ्वी की परिक्रमा करते उपग्रह की गति का नियंत्रण मुख्य रूप से पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल करता है। जब उपग्रह पृथ्वी के समीप होता है, गुरुत्वाकर्षण बल का खिंचाव अधिक होता है और जिससे उपग्रह की गति अधिक होती है। नासा का एक्वा उपग्रह पृथ्वी की सतह से 705 किमी उंचाई पर है और वह पृथ्वी की एक परिक्रमा 99मिनट मे कर लेता है, जबकी एक मौसमी उपग्रह 36,000 किमी की उंचाई से पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकंड लेता है। पृथ्वी के केंद्र से 384,403 किमी की दूरी पर से चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये 28 दिन लगते है।

किसी भी उपग्रह की उंचाई मे परिवर्तन करने पर उसकी कक्षीय गति मे भी परिवर्तन होता है। इससे एक विचित्र विरोधाभाष का भी निर्माण होता हओ। मान लिजिये कि किसी उपग्रह के संचालक को उपग्रह की कक्षीय गति बढ़ानी है, वह उपग्रह के प्रणोदक को जलाकर उपग्रह की गति नही बढ़ा सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो उपग्रह की उंचाई बढ़ जायेगी और उससे उपग्रह की कक्षीय गति कम हो जायेगी। उपग्रह की गति बढ़ाने के लिये उपग्रह के प्रणोदक राकेट को उपग्रह की गति की उल्टी दिशा मे चलाना होगा, इसे हम पृथ्वी के सतह पर ब्रेक लगाना कह सकते है। इससे उपग्रह अपनी कक्षा मे पृथ्वी के निकट आयेगा और उसकी गति बढ़ जायेगी।

 किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।


किसी कक्षा की विकेंद्रता(eccentricity (e))उस कक्षा की परिपूर्ण वृत्त से विचलन दर्शाती है। वृत्ताकार कक्षा की विकेंद्रता शून्य होती है। जबकि अत्याधिक विक्रेंद्रता 1 के समीप लेकिन हमेशा 1 से कम होती है। विकेंद्रित कक्षा मे उपग्रह दिर्घवृत्त के फ़ोकल बिंदुओं के संदर्भ मे गति करता है।

उंचाई के अतिरिक्त विकेन्द्रता(eccentricity) और कक्षीय झुकाव(inclination) भी उपग्रह की कक्षा को आकार देते है। विकेन्द्रता से कक्षा का आकार निर्धारित होता है। कम विकेन्द्रता वाला उपग्रह वृत्त के जैसी कक्षा रखता है। अधिक विकेन्द्रता वाला उपग्रह दिर्घवृत्त के जैसी कक्षा मे पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इस कक्षा मे पृथ्वी से उपग्रह की दूरी निरंतर परिवर्तित होते रहती है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा और पृथ्वी के विषुवत के मध्य के कोण को कहते है। विषुवत के ठीक उपर गति करने वाले उपग्रह का कक्षीय झुकाव शून्य होता है। यदि कोई उपग्रह पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की कक्षा मे गति करता है तो उसका कक्षीय झुकाव 90 डीग्री होगा।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

कक्षीय झुकाव उपग्रह की कक्षा के प्रतल और विषुवत के मध्य का कोण होता है। 0° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर जबकि 90° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ ध्रुव के ठीक उपर तथा 180° कक्षीय झुकाव का उपग्रह का पथ विषुवत के ठीक उपर लेकिन पृथ्वी की घूर्णन दिशा के विपरीत मे होता है।

उपग्रह की उंचाई, विक्रेंद्रता और झुकाव किसी उपग्रह के पथ और पृथ्वी के दृश्य भाग को परिभाषित करते है।

उपग्रह कक्षा के तीन वर्ग

उच्च पृथ्वी कक्षा (High Earth Orbit)

जब उपग्रह पृथ्वी के केंद्र से 42,164 किमी (सतह से 36,000 किमी) की उंचाई पर पहुंचता है तो वह एक ऐसे बिंदु पर होता है जिसमे उसकी कक्षीय गति और पृथ्वी की घूर्णन(rotation) गति एक समान होती है। अब उपग्रह की गति और पृथ्वी की घूर्णन गति समान होने से, उपग्रह पृथ्वी के उपर एक ही देशांतर रेखा(longitude) पर स्थिर प्रतित होता है। यह संभव है कि उपग्रह की स्तिथि मे उत्तर दक्षिण दिशा मे विचलन हो। इस विशेष कक्षा को भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा कहते है।

वृत्ताकार भूसमकालिक(geosynchronous) कक्षा यदि विषुवत के उपर हो अर्थात उसकी विकेंद्रता शून्य तथा कक्षीय झुकाव शून्य हो तो उसे भूस्थानिक(geostationary) कक्षा कहते है क्योंकि इस कक्षा मे वह पृथ्वी के किसी बिंदु के सापेक्ष स्थिर रहेगा। वह हमेशा पृथ्वी के सतह के एक बिंदु के उपर ही रहेगा।

भूस्थानिक(geostationary) कक्षा मौसम उपग्रहों के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इस कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के एक भाग पर लगातार निरीक्षण कर सकता है। जब भी आप मौसम की जानकारी देनेवाली किसी वेबसाइट पर अपने शहर के मौसम की जानकारी देनेवाली पृथ्वी का चित्र देखते है तब वह चित्र भूस्थानिक कक्षा के किसी उपग्रह द्वारा लिया गया चित्र होता है। हर कुछ मिनट मे भारत के INSAT शृंखला के उपग्रह के जैसे मौसम उपग्रह बादलो, जल बाष्प, वायु दिशा जैसी जानकारी पृथ्वी के मौसम केंद्र तक भेजती है, इस जानकारी के विश्लेषण के द्वारा मौसम का अनुमान लगाया जाता है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्तैथिक कक्षा मे उपग्रह पृथ्वी के साथ विषुवत के उपर परिक्रमा करते है, वे एक स्थल पर स्थिर प्रतीत होते है। यह स्तिथि उन्हे मौसम और अन्य वायुमंडलीय कारको के निरीक्षण मे उपयोगी होती है।

भूस्थानिक उपग्रह हमेशा एक ही स्थान के उपर रहते है जिससे वे संचार माध्यम(फोन, टीवी और रेडीयो) के लिये प्रयोग किये जाते है। नासा द्वारा बनाये गये और अमरीकी नेशनल ओशेनिक एन्ड एटमासफ़ियिरीक एडमिनिस्ट्रेशन (National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA)) द्वारा संचालित जिओस्टेशनरी आपरेशनल एन्विरोन्मेंटल सेटेलाइट( Geostationary Operational Environmental Satellite (GOES)) जहाज और विमानो की आपदा स्तिथि मे खोज, राहत और बचाव मे मदद करते है।

बहुत से उच्च पृथ्वी कक्षा वाले उपग्रह सौर गतिविधियों की भी निगरानी भी करते है। GOES उपग्रहों के पास अंतरिक्ष मौसम की निगरानी के लिये उपकरण है जो सूर्य के चित्र लेते है और अपने आसपास चुंबकीय क्षेत्र और सौर वायु की जांच करते रहते है।

उच्च पृथ्वी कक्षा से आगे कुछ और महत्वपूर्ण बिंदु है जिन्हे लाग्रांज(Lagrange)बिंदु कहते है। इन बिंदुओं पर सूर्य तथा पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण समान होता है। इन बिंदुओ पर स्थित कोई भी वस्तु या पिंड पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है क्योंकि वह पृथ्वी और सूर्य दोनो द्वारा समान रूप से बंधा होता है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

लांग्राज बिंदु ऐसे विशेष स्थान होते है जिसमे उपग्रह पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हुये हमेशा पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर होता है । L1 तथा L2 दोनो क्रमश: पृथ्वी के दिन और रात भाग की ओर होते है। L3 सूर्य की दूसरी ओर पृथ्वी की विपरीत दिशा मे होता है। L4 तथा L5 दोनो क्रमश: पृथ्वी की कक्षा मे 60° आगे और पीछे होते है।

कुल पांच लाग्रांज बिंदु है जिनमे से दो L4 और L5 बिंदु ही संतुलित या स्थाई है। अन्य तीन बिंदुओं पर उपग्रह किसी पहाड़ की चोटी पर गेंद के जैसे है, इन बिंदुओं पर हल्के से क्षोभ से उपग्रह अपने स्थान से पहाड़ी से लुढकती गेंद के जैसे हट जाता है। इन तीनो बिंदुओ पर उपग्रह को स्थिर, संतुलित रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है। अंतिम दो बिंदुओ पर स्थित उपग्रह किसी कटोरे मे गेंद की तरह होते है, किसी वजह से इन बिंदुओ से हटजाने पर भी वापिस अपनी वास्तविक स्थिति पर आ जाते है।

प्रथम लाग्रांज बिंदु पृथ्वी और सूर्य के बीच मे स्तिथ है जिससे इस बिंदु से सूर्य पर लगातार नजर रखी जा सकती है। नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष संस्थान (ESA) की सोलर एन्ड हिलिओस्फेरिक ओब्जर्वेटरी(Solar and Heliospheric Observatory (SOHO)) पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर इसी बिंदु पर स्थित है।

द्वितिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी से इतनी ही दूरी पर है लेकिन पृथ्वी के पीछे है, पृथ्वी हमेशा सूर्य और द्वितिय लाग्रांज बिंदु के मध्य होती है। इस स्तिथि मे पृथ्वी, सूर्य और उपग्रह एक ही रेखा मे होते है, जिससे इस बिंदु पर स्तिथ उपग्रहो को सूर्य और पृथ्वी की उष्मा से बचने के लिये केवल एक ही ओर उष्मा शील्ड चाहीये होती है। यह अंतरिक्ष दूरबीनो के लिये सर्वोत्तम जगह है जिसमे भविष्य की जेम्स वेब दूरबीन तथा वर्तमान विल्किंसन माइक्रोवेव अनिसोट्रोपी प्रोब( Wilkinson Microwave Anisotropy Probe-WMAP) शामिल है जिसका प्रयोग ब्रह्मांड की प्रकृति को समझने के लिये माइक्रोवेव विकिरण के अध्ययन के लिये हो रहा है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

पृथ्वी के समीप के लांग्राज बिंदु की दूरी पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी से 5 गुणा है। L1 पृथ्वी और सूर्य के बीच तथा हमेशा पृथ्वी के दिन वाले भाग की ओर होता है, जबकि L2 सूर्य के विपरीत ओर हमेशा रात्रि वाले भाग मे होता है।

तृतिय लाग्रांज बिंदु पृथ्वी के विपरीत सूर्य की दूसरी ओर इस तरह से है कि सूर्य हमेशा इस बिंदु और पृथ्वी के मध्य होता है। इस स्तिथि मे उपग्रह पृथ्वी से कभी संपर्क नही कर पाता है। अत्याधिक रूप से स्थिर लाग्रांज बिंदु L4 तथा L5 है जो की पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा कक्षा मे पृथ्वी के सामने और पीछे 60 डीग्री दूरी पर है। इन बिंदुओ पर जुड़वा सोलर टेरेस्टेरीयल रीलेशनस ओब्सरवेटरी (Solar Terrestrial Relations Observatory (STEREO)) परिक्रमा कर रहे है और सूर्य का त्रिआयामी चित्र बना रहे है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा

पृथ्वी के समीप मध्यम पृथ्वी कक्षा मे उपग्रह तेजी से गति करते है। इनमे से दो कक्षाये विशिष्ट है, अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) तथा मोलनिया कक्षा(Molniya)।

अर्ध-समकालिक(semi-synchronous) कक्षा लगभग वृत्ताकार अर्थात कम विकेन्द्रता लिये हुये होती है और पृथ्वी केंद्र से 25,560 किमी(सतह से 20,200 किमी) उंचाई पर है। इस स्तिथि मे पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये उपग्रह को 12 घंटे लगते है। जैसे ही उपग्रह गति करता है, पृथ्वी भी नीचे घूर्णन करती है। 24 घंटो मे उपग्रह एक स्थान पर से दो बार गुजरता है। यह कक्षा सुसंगत और स्थिर होती है, जिससे यह कक्षा नेविगेशन उपग्रहो, ग्लोबल पोजिशनिगं सीस्टम के उपग्रहो के लिये उपयुक्त होती है।

मध्यम पृथ्वी कक्षा मे दूसरी महत्वपूर्ण कक्षा मोलनिया कक्षा है। यह कक्षा रूसी वैज्ञानिको ने खोजी थी। यह कक्षा उच्च अक्षांशो के लिये प्रयुक्त होती है। भूस्थानिक कक्षा के उपग्रहों से पृथ्वी का स्थिर परिदृश्य मिलता है लेकिन ये उपग्रह विषुवत रेखा पर होते है और इस स्तिथि मे वे उत्तरी ध्रुव या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो के निरीक्षण के लिये अनुपयुक्त होते है क्योंकि वे इन उपग्रहो की परिदृश्य की सीमा पर होते है। इस स्तिथि मे मोलनिया कक्षा एक अच्छा विकल्प होती है।

मोलनिया कक्षा अत्याधिक विकेन्द्रित होती है। उपग्रह अत्याधिक दिर्घवृत्ताकार कक्षा मे गति करता है जिसके एक भाग मे पृथ्वी निकट होती है। पृथ्वी की निकटतम स्तिथि मे उपग्रह की गति सर्वाधिक होती है क्योंकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उसे गति देता है। जैसे ही वह पृथ्वी से दूर जाता है उसकी गति कम होते जाती है और वह कक्षा मे अधिकतम समय उपर पृथ्वी से दूर व्यतित करता है। मोलनिया कक्षा मे उपग्रह 12 घंटे मे पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है लेकिन इसका दो तिहाई समय वह केवल एक ही गोलार्ध के उपर रहता है। अर्धसमकालिक कक्षा के जैसे यह भी 24 घंटे मे एक स्थान पर दो बार पहुंचता है। यह कक्षा उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के निकट के स्थलो पर संचार के लिये उपयुक्त होती है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

मोलनिया कक्षा मे कक्षीय झुकाव अधिक (63.4°) तथा विकेंद्रता (0.722) होती है जिससे उच्च अक्षांशो का अधिक समय तक निरीक्षण किया जा सकता है। इस कक्षा मे उपग्रह परिक्रमा करने मे 12 घंटे लेता है, जिसमे धीमी उंचाई वाली स्थिति हर दिन उसी स्थान पर हर दिन और रात रहती है। रूस के संचार उपग्रह और सिरियस रेडीयो उपग्रह इस तरह की कक्षा का प्रयोग करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit)

अधिकतर वैज्ञानिक उपग्रह और मौसमी उपग्रह लगभग वृत्ताकार निम्न पृथ्वी कक्षा मे होते है। उपग्रह का झुकाव उसके प्रयोग पर निर्भर करता है। ट्रापीकल रेनफ़ाल मेजरींग मिशन(Tropical Rainfall Measuring Mission (TRMM)) उपग्रह उष्णकटिबंध प्रदेश मे वर्षा के मापन के लिये है। इसलिये इस उपग्रह का झुकाव कम अर्थात 35 डीग्री है जिससे वह उष्णकटिबंध प्रदेश के उपर अधिकतर समय रहे।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

TRMM का कक्षीय झुकाव विषुवत से केवल 35°है जिससे उसके उपकरण उष्णकटीबंधीय क्षेत्र(Tropics) पर केंद्रित होते है। इस चित्र मे TRMM द्वारा आधे दिन मे किये गये निरीक्षणो को दर्शाया गया है।

नासा और इसरो के अधिकतर उपग्रह ध्रुविय कक्षा मे है। इस अत्याधिक झुकाव वाली कक्षा मे उपग्रह ध्रुव से ध्रुव गति करते है और एक परिक्रमा पूरी करने मे 99 मिनट लेते है। एक परिक्रमा मे उपग्रह आधे समय दिन वाले भाग मे और आधे समय रात वाले भाग मे होता है। उपग्रह दिनवाले भाग से रात वाले भाग मे प्रवेश ध्रुव के उपर से करता है।

जब उपग्रह अपनी कक्षा मे गति करता है नीचे पृथ्वी भी घूर्णन करती है। जैसे ही उपग्रह दिन वाले भाग मे दोबारा आता है वह पिछली कक्षा वाले स्थान से बाजु वाले स्थान से गुजरता है। 24 घंटे मे ध्रुविय उपग्रह हर स्थान से दोबारा गुजरता है, एक बार दिन वाले समय मे दूसरी बार रात वाले समय मे।

भूसमकालिक उपग्रहों द्वारा जिस तरह से विषुवत के उपर रह कर पृथ्वी के एक स्थान की निगरानी की जा सकती है उसी तरह से ध्रुविय उपग्रहो द्वारा एक स्थान पर स्थिर समय पर नजर रखी जा सकती है। इस कक्षा को सूर्यसमकालिक (Sun-synchronous)कहते है, इसका अर्थ यह है कि जब भी उपग्रह विषुवत रेखा को पार करेगा, पृथ्वी पर उस स्थल का स्थानिक समय हमेशा समान रहेगा। उदाहरण के लिये टेरा(Terra) उपग्रह सुबह 10:30 बजे ब्राजील के उपर से जब विषुवत रेखा को पार करता है, 99 मिनट बाद अपनी अगली परिक्रमा मे वह जब इक्वाडोर या कोलंबीया के उपर से विषुवत को पार करता है तब इक्वाडोर या कोलंबीया मे स्थानिय समय 10:30 सुबह होता है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

सूर्यसमकालिक कक्षा मे उपग्रह विषुवत पर से हर दिन (रात) समान स्थानिय समय पर गुजरता है। यह कक्षा वैज्ञानिक निरीक्षणो के लिये सूर्य और पृथ्वी के मध्य के कोण को लगभग स्थिर रखने मे सहायक होती है। इस चित्र मे इस उपग्रह की लगातार तीन परिक्रमाये दिखायी गई है, जिसमे सबसे नई परिक्रमा गहरे लाल रंग मे और पुरानी परिक्रमाये हल्के लाल रंग मे है।

विज्ञान मे सूर्य समकालिक कक्षाये महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इन कक्षाओं मे पृथ्वी की सतह पर सूर्य किरणो का कोण हमेशा समान रखने का प्रयास होता है।(हालांकि सूर्य की किरणो का कोण पृथ्वी की सतह पर मौसम के अनुसार बदलते रहता है।) इससे यह होता है कि वैज्ञानिक एक ही मौसम की भिन्न वर्षो मे ली गई तस्वीरो की सूर्य के कोण, प्रकाश और छाया की चिंता किये बगैर तुलना कर सकते है। सूर्य समकालिक कक्षा के बिना इस तरह की तुलना कष्टसाध्य होगी। मौसमी बदलाव या क्लाईमेट चेंज का अध्ययन इस तरह की तुलना के बगैर असंभव होगा।

सूर्य समकालिक कक्षा मे उपग्रह का पथ काफ़ी संकरा होता है। यदि उपग्रह की उंचाई 100 किमी है तो सूर्य समकालिक कक्षा मे बने रहने उसका कक्षीय झुकाव 96 डीग्री होना चाहिये। इन दोनो मे कोई भी बदलाव उस उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा से बाहर कर देगा। वातावरण द्वारा घर्षण से उत्पन्न खिंचाव और सूर्य, चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण इन उपग्रहो की कक्षा मे बदलाव करते है, जिससे इन उपग्रहो को सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने के लिये लगातार समायोजन करते रहना होता है।

उपग्रह द्वारा कक्षा प्राप्त करना और उसमे बने रहना

प्रक्षेपण

किसी उपग्रह के प्रक्षेपण मे लगने वाली ऊर्जा प्रक्षेपण स्थल, कक्षा की उंचाई और कक्षीय झुकाव पर निर्भर करती है। उच्च पृथ्वी कक्षा मे पहुंचने उपग्रहों को सर्वाधिक ऊर्जा चाहिये होती है। अत्याधिक कक्षिय झुकाव जैसे ध्रुविय कक्षा के लिये लगने वाली ऊर्जा कम अक्षीय झुकाव वाले उपग्रह जैसे विषुवत के उपर गति करने वाले उपग्रह से अधिक होती है। कम अक्षिय झुकाव वाला उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन का प्रयोग कर अपनी कक्षा मे पहुंच सकता है। अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र 51.6397 डीग्री के झुकाव वाली कक्षा मे है जिससे नासा के स्पेस शटल और रूसी सोयुज द्वारा उस तक पहुंचना आसान है। जबकि ध्रुव की परिक्रमा करने वाले उपग्रह को पृथ्वी के संवेग से कोई मदद नही मिलने से उसी उंचाई तक पहुंचने मे अधिक ऊर्जा चाहिये होती है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कम कक्षीय झुकाव वाली कक्षाओं मे उपग्रह को स्थापित करने के लिये पृथ्वी की घूर्णन गति की सहायता ली जाती है, इसके लिये उन्हे विषुवत के समीप से प्रक्षेपित किया जाता है। युरोपियन अंतरिक्ष संस्थान अपने भूस्तैथिक उपग्रहो का प्रक्षेपण फ़्रेंच गुयाना से करता है(बायें)। जबकि उच्च कक्षीय झुकाव वाले उपग्रहों को विषुवत के पास के प्रक्षेपण स्थलो से मदद नही मिलती है। 49° उत्तर अक्षांश स्तिथ बैकानुर अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुविय तथा मोलनिया कक्षाओं मे उपग्रह स्थापित करने तथा अंतरराष्ट्रीय केंद्र मे यात्री और रसद भेजने के लिये प्रक्षेपण होते है।

कक्षा मे स्थिर रहना

एक बार उपग्रह अपनी कक्षा मे पहुंच गया तब भी उसे अपनी कक्षा मे बने रहने कुछ कार्य करते रहना होता है। पृथ्वी पूर्ण रूप से गोल नही है, उसका गुरुत्वाकर्षण कुछ जगह पर अन्य स्थानो की तुलना मे अधिक है। गुरुत्वाकर्षण मे यह अनियमितता और सूर्य, चंद्रमा , बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न खिंचाव से मिलकर उपग्रह के कक्षीय झुकाव मे परिवर्तन आ जाता है। अपने जीवनकाल मे GOES उपग्रहो को अपनी कक्षा मे बने रहने तीन से चार बार बदलाव करने होते है। नासा के निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह सूर्यसमकालिक कक्षा मे बने रहने अपने कक्षीय झुकाव मे वर्ष मे एक बार या दो वर्ष मे एक बार बदलाव करते है।

निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रह पृथ्वी के वातावरण के घर्षण से उत्पन्न खिंचाव से अपनी कक्षा से हट जाते है। ये उपग्रह पृथ्वी के वातावरण की उपरी पतली तह से गुजरते है लेकिन उस उंचाई पर वायु का प्रतिरोध फ़िर भी इतना होता है कि वह उन उपग्रहो को खींच कर पृथ्वी की ओर ले आता है। अब पृथ्वी का गुरुत्चाकर्षण उन्हे कम उंचाई पर आने से अधिक गति देता है। अधिक गति अधिक घर्षण। समय के साथ उपग्रह गति बढ़ने और उंचाई कम होने से पृथ्वी के वातावरण मे स्पाईरल पथ मे प्रवेश कर जल सकता है।

वातावरण का यह खिंचाव सौर सक्रियता मे अधिक मजबूत होता है क्योंकि सौर सक्रियता मे सूर्य के द्वारा अतिरिक्त ऊर्जा के देने से वायुमंडल किसी गुब्बारे के जैसे फ़ूलता है। वातावरण की बाह्य पतली परत उपर उठती है और उसकी जगह नीचे से घनी परत ले लेती है। अब उपग्रह वातावरण मे घनी परत से गुजर रहा है जबकि वह सूर्य के सक्रिय ना होने पर अपेक्षाकृत रूप से पतली परत से गुजर रहा था। सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह अधिक घनी परत से गुजरने से उसे अधिक प्रतिरोध का सामना करना होता है। सूर्य के असक्रिय काल मे निम्न पृथ्वी कक्षा के उपग्रहों को अपनी कक्षा मे परिवर्तन वर्ष मे चार बार करना होता है। लेकिन सौर गतिविधियों के चरम पर उपग्रह को अपनी कक्षा मे बदलाव हर दो तीन सप्ताह मे करना होता है।

उपग्रह की कक्षा मे बदलाव का तीसरा कारण अंतरिक्ष कबाड़ है जोकि उस उपग्रह के पथ मे हो सकता है। 11 फ़रवरी 2009 को अमरीकी उपग्रह कंपनी इरीडीयम का एक संचार उपग्रह रूस के निष्क्रिय उपग्रह से टकरा गया था। दोनो उपग्रह टूट गये और दोनो ने मिलकर 2,500 टूकड़ो का एक अंतरिक्ष मलबा बना दिया। इन 2500 टूकड़ो को पृथ्वी की कक्षा मे गति कर रहे 18,000 मानवनिर्मित पिंडो के डेटाबेस मे जोड़ दिया गया जिन पर अमरीकी अंतरिक्ष निगरानी नेटवर्क (U.S. Space Surveillance Network.)नजर रखता है।

 अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।


अंतरिक्ष मे मानव द्वारा निर्मित हजारो पिंड है, जिसमे से 95 % अंतरिक्षीय कबाड़ है और पृथ्वी की निम्न कक्षा मे है। इस चित्र मे हर काला बिंदु या तो कार्यरत उपग्रह है या निष्क्रिय उपग्रह या उपग्रह का मलबा है। चित्र मे पृथ्वी के पास के अंतरिक्ष भीड़ दिखाई दे रही है लेकिन हर बिंदु वास्तविक उपग्रह या कबाड़ से बहुत बड़ा है। वर्तमान मे अंतरिक्ष मे टकराव दुर्लभ है।

नासा उपग्रह अभियान संचालक अपने उपग्रह मे पथ मे आनेवाली हर वस्तु पर नजर रखते है। हर वर्ष कम से कम चार पांच बार उपग्रहो को रास्ते मे आ रहे इन मलबो से टकराने से बचने के लिये पथ बदलना होता है।

उपग्रह संचालन टीम अंतरिक्ष के इन मलबो तथा अन्य उपग्रहो पर नजर रखती है, और उसके अनुसार इन उपग्रहो के कक्षा मे मार्ग, उंचाई बदलने की योजना बनाती है।

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5 विचार “पृथ्वी के उपग्रह और उनकी कक्षायें(Earth Satellite Orbits)&rdquo पर;

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