
एक सप्ताहांत सपरिवार हम लोग पिकनिक के लिए बैंगलोर से होगेनक्कल जलप्रपात की ओर चल दिए। हम लोगों की योजना जला प्रपात से कुछ पहले कावेरी नदी के किनारे कैम्पिंग करने की थी। हम लोगो ने कैम्प लगाया और खाना बनाया, खाना खा कर कुछ देर तक पानी में खेलते रहे तब तक शाम होने लगी थी।
संध्या का समय था। आकाश में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी और दूर क्षितिज पर सूर्य धीरे-धीरे ढल रहा था। एक शांत कावेरी नदी के किनारे, वृक्षों की छाया में गार्गी , अनुषा के साथ और हम लोग बैठे थे। नदी की लहरें जैसे समय की कहानी कह रही थीं, एक ऐसी कहानी जो लाखों वर्षों पहले शुरू हुई थी, जब न कोई लिखित भाषा थी, न कोई ग्रंथ, फिर भी ज्ञान था, अनुभव था, और सबसे बढ़कर जिज्ञासा थी।
गार्गी ने आकाश की ओर देखते हुए पूछा, “पापा, क्या हमेशा से लोग इतने ज्ञानवान थे? क्या हमेशा से विज्ञान और गणित था?”
मेरे चहरे पर मुस्कुराहट आ गई , मेरी आँखे नदी के पार देखने लगी, जैसे समय के पार देख रहा हूँ , मैंने कहा, “नहीं, विज्ञान और गणित हमेशा से किताबों में नहीं थे, लेकिन उनके बीज मानव के भीतर हमेशा से थे। चलो, मैं तुम्हें उस समय की कहानी सुनाता हूँ जब मानव ने पहली बार सोचना शुरू किया था।”
दोनों बच्चे उत्सुकता से मेरी ओर झुक गए। मैंने कहना शुरू किया, “बहुत-बहुत पहले, जब न शहर थे, न खेत, न घर , तब मानव जंगलों में रहता था। वह शिकार करता था, फल इकट्ठा करता था, और हर दिन उसके लिए एक नई चुनौती होती थी। यही पाषाण युग था, जब पत्थर उसके सबसे बड़े साथी थे। लेकिन बेटी, उस समय भी मानव केवल जीवित रहने के लिए नहीं जी रहा था, वह प्रकृति को, समय को, और स्वयं को समझने की कोशिश कर रहा था।”
“क्या वह भी हमारी तरह सोचता था?” गार्गी ने पूछा।
“हाँ,” मैंने उत्तर दिया, “शायद और भी अधिक ध्यान से। वह हर चीज़ को देखता था कि सूरज कब उगता है, कब ढलता है, चाँद कैसे बदलता है, और तारे कैसे हर रात एक ही रास्ते पर चलते हैं। उसने देखा कि जब ठंड बढ़ती है, तो कुछ जानवर गायब हो जाते हैं और कुछ नए आ जाते हैं। उसने समझना शुरू किया कि यह सब किसी नियम के अनुसार हो रहा है। यही विज्ञान की शुरुआत थी, प्रकृति के नियमों को समझने की कोशिश।”
अनुषा ने थोड़ी देर सोचकर कहा, “तो विज्ञान का मतलब सिर्फ किताबें नहीं हैं?”
मैंने शाम के लिए अलाव जलाने के लिए तैयारी शुरू कर दी थी, लकडीयो को जलाने के लिए एक ढेरी के रूप में जमा रहा था।
मैंने माचिस की तीली से आग जलाते हुए उत्तर दिया,, “बिल्कुल नहीं। विज्ञान का मतलब है प्रश्न पूछना। और उस समय मानव हर चीज़ पर प्रश्न करता था। जब उसने पहली बार देखा कि दो पत्थरों को टकराने से चिंगारी निकलती है, तो उसने सोचा, क्या इससे कुछ और हो सकता है? उसने कोशिश की, बार-बार की, और एक दिन आग जल उठी। इसी तरह जैसे मैंने तीली को माचिस की इस सतह से रगड़ कर उसे जलाया।”
गार्गी की आँखें चमक उठीं, “आग! वह तो बहुत बड़ी बात होगी!”
मैंने अलाव पर कुछ भुट्टे सिंकने के लिए रख दिए। “हाँ,वह मानव इतिहास की पहली बड़ी वैज्ञानिक क्रांति थी। आग ने सब कुछ बदल दिया। अब वह ठंड से बच सकता था, जंगली जानवरों को दूर रख सकता था, और सबसे महत्वपूर्ण कि अब वह भोजन पका सकता था। लेकिन सोचो, यह सब कैसे हुआ? किसी ने प्रयोग किया, असफल हुआ, फिर प्रयास किया, बस यही तो विज्ञान है।”

आग में कुछ लकड़ियां और चाहिए थी, मैंने कुल्हाड़ी उठाई और पास पड़े बड़े लकड़ी के लठ्ठों को छोटे टुकड़ो में चीरने लगा।
नदी के जल में चाँद की हल्की छाया बनने लगी थी। मैंने आगे कहा, “फिर धीरे-धीरे मानव ने औजार बनाना सीखा। उसने देखा कि कुछ पत्थर दूसरों से बेहतर हैं जबकि कुछ अधिक धारदार होते हैं, कुछ जल्दी टूट जाते हैं। उसने समझा कि यदि वह पत्थर को एक विशेष कोण पर तोड़े, तो वह और भी उपयोगी हो सकता है। यह केवल शिल्प नहीं था, यह गणित था, कोणों की समझ, संतुलन की समझ। यह आदिम ज्यामिति, आदिम गणित या आदिम इंजीनियरिंग थी ।”
अनुषा ने आश्चर्य से पूछा, “क्या उन्हें गणित आता था?”
मैंने उत्तर दिया, “उन्हें किताबों वाला गणित नहीं आता था, लेकिन वे गणित का उपयोग करते थे। जब वे शिकार के लिए निकलते थे, तो उन्हें दूरी का अनुमान लगाना पड़ता था। जब वे भाला फेंकते थे, तो उन्हें दिशा और गति का आकलन करना पड़ता था। यह सब गणित ही था, भले ही वे उसे नाम न देते हों।”
थोड़ी देर बाद हवा में ठंडक बढ़ने लगी। प्यास लगा रही थी, मैंने निवेदिता को आवाज दे कर तीन चार शीतल पेय की बोतलें लाने कहा।
मैंने बच्चो को अलाव के पास आने के लिए कहा , “और फिर आया वह समय जब मानव ने गिनती करना शुरू किया। शुरू में वह केवल इतना समझता था कि एक, दो, और बहुत सारे। लेकिन धीरे-धीरे उसने चीज़ों को गिनना शुरू किया,शिकार के जानवर, समूह के लोग, दिन और रात।”
गार्गी ने पूछा, “वह गिनता कैसे था?”
मैंने कहा, “वह अपनी उँगलियों का उपयोग करता था, पत्थरों को इकट्ठा करता था, और कभी-कभी हड्डियों पर निशान बनाता था। यह उसकी पहली गणना थी। सोचो, जब उसने पहली बार यह समझा होगा कि हर दिन एक नया निशान बनाना है, तब उसने समय को मापना शुरू किया।”

अन्धेरा हो चुका था, मैंने कहा कि “सात बज गए है, चलो बल्ब जलाते है।”
“क्या वह समय को समझता था?” अनुषा ने पूछा।
“हाँ,” मैंने उत्तर दिया, “उसने देखा कि चाँद हर कुछ दिनों में अपना रूप बदलता है। उसने समझा कि यह एक चक्र है। उसने देखा कि साल के कुछ समय में ठंड होती है, कुछ में गर्मी। उसने इन पैटर्न को पहचाना और यही खगोल विज्ञान की शुरुआत थी।”
मैंने आकाश की ओर इशारा किया, जहाँ तारे चमकने लगे थे। “देखो, वही तारे जो आज हम देखते हैं, वे उस समय भी थे। उस तारे को देखो, वह ध्रुव तारा है, वह स्थिर रहता है लेकिन सारे तारे एक निश्चित पथ में चलते है। मानव ने देखा कि ये तारे हर रात एक निश्चित क्रम में चलते हैं। उसने उन्हें याद किया, उनके आधार पर दिशा तय की। यह उसका पहला नेविगेशन सिस्टम था।”
हम लोग कैम्प के अंदर अपने बिस्तरों पर लेट गये थे, दोनों बच्चे अब पूरी तरह उस कहानी में डूब चुके थे, पूछा, “और घर? क्या वे घर बनाते थे?”
मैंने कहा, “शुरुआत में वे गुफाओं में रहते थे। लेकिन फिर उन्होंने अपने घर बनाना शुरू किया , लकड़ी, मिट्टी और पत्थरों से। उन्होंने सीखा कि कैसे एक संरचना को संतुलित रखना है, कैसे दीवारें खड़ी करनी हैं। यह इंजीनियरिंग थी, भले ही वे इसे ऐसा नहीं कहते थे।”
“और खेती?” गार्गी ने उत्सुकता से पूछा।
मैंने गहरी साँस ली, “यह मानव इतिहास का एक और बड़ा मोड़ था। नवपाषाण काल में मानव ने खेती शुरू की। उसने बीज बोना सीखा, फसल उगाना सीखा। लेकिन इसके लिए उसे समय का ज्ञान होना जरूरी था कि कब बारिश होगी, कब बीज बोना है, कब फसल काटनी है। यह विज्ञान और गणित का संगम था।”
धीरे-धीरे रात गहराने लगी थी। मेरी आवाज़ अब और भी गहरी हो गई थी, “और फिर, मानव ने आकाश को और ध्यान से देखना शुरू किया। उसने बड़े-बड़े पत्थरों से संरचनाएँ बनाईं, जो सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के अनुसार खड़ी की गई थीं। यह केवल निर्माण नहीं था, यह खगोलीय गणना थी।”

गार्गी ने आश्चर्य से पूछा, “क्या वे इतने बुद्धिमान थे?”
मैं मुस्कराया, “बुद्धिमत्ता केवल किताबों से नहीं आती, अनुभव से आती है। उन्होंने प्रकृति को अपना गुरु बनाया था।”
कुछ क्षणों के लिए दोनों चुप रहे। केवल नदी की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
फिर मैंने धीरे से कहा, “ विज्ञान और गणित अचानक नहीं आए। वे धीरे-धीरे विकसित हुए, हर छोटे अनुभव, हर छोटे प्रयोग, हर छोटी गलती से। जब किसी ने पहली बार पत्थर को सही तरीके से काटा, जब किसी ने पहली बार गिना, जब किसी ने पहली बार तारे देखे, वही क्षण थे जब विज्ञान और गणित जन्म ले रहे थे।”
गार्गी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा, “तो हम भी वैसे ही सीख सकते हैं?”
मैंने उसकी ओर देखकर कहा, “हाँ, बिल्कुल। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं में नहीं होता, वह हर जगह है, प्रकृति में, हमारे आसपास, और हमारे भीतर। बस हमें देखना और प्रश्न करना सीखना है।”

आकाश में अब असंख्य तारे चमक रहे थे। हम लोग दोनों उन्हें देख रहे थे जैसे वे केवल तारे नहीं, बल्कि मानवता की हजारों वर्षों की यात्रा देख रहे हों।
और उस रात, नदी के किनारे, एक नई पीढ़ी ने पुराने समय की उस महान यात्रा को समझा जहाँ से विज्ञान और गणित की शुरुआत हुई थी, और जहाँ से मानव ने ब्रह्मांड को समझने का अपना अनंत प्रयास शुरू किया था।

