फिल्टर और प्रकाश : हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है? : भाग 2


किसी ब्रह्मांडीय पिंड से आने वाला प्रकाश रंगो की विस्तृत श्रेणी मे आता है, जिसमे से हर रंग विद्युत चुंबकिय विकिरण की एक विशिष्ट तरंग से संबधित होता है। हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला दृश्य प्रकाश की तरंगो के अतिरिक्त अन्य हजारों तरह की तरंगो जैसे अवरक्त, पराबैंगनी तरंगो को भी ग्रहण कर सकता है।
[इस लेख को पढ़ने से पहले इसका पहला भाग पढ़े।]

खगोलिय पिंड प्रकाश की भिन्न भिन्न तरंगो पर भिन्न रूप से दिखते हैं। हब्बल दूरबीन कुछ विशिष्ट फिल्टरो का प्रयोग कर अवांछित तरंगो को हटा देती है तथा वांछित तरंगो से ही चित्र लेती है।

फिल्टर कार्य कैसे करते है?

फिल्टर कैसे कार्य करते है!

फिल्टर कैसे कार्य करते है?

फिल्टर कार्य कैसे करते है, इसे समझने के लिये बाजू का चित्र देंखे। इस चित्र मे एक पीले रंग के कांच वाली खीड़की है। इस खीड़की के एक ओर पर पर यदि साधारण प्रकाश डाला जाये, तब दूसरी ओर केवल पीले रंग का प्रकाश दिखायी देता है। यह कैसे होता है?

कांच साधारण प्रकाश को पीले रंग मे नही बदल रहा है! कांच पीले रंग के अलावा बाकि सभी रंगो को अवशोषित कर ले रहा है और केवल पीले रंग हो पार होने दे रहा है, जिससे हम दूसरी ओर पीला रंग ही देख पा रहे है। यह सभी वस्तुओं के साथ होता है, लाल रंग का सेब , लाल रंग के अतिरिक्त सभी रंग के प्रकाश को अवशोषित कर लेता है, जिससे सेब हमे लाल दिखायी देता है। सफेद चूना कोई रंग अवशोषित नही करता इसलिए सफेद दिखायी देता है, वही श्यामपट सभी रंग को अवशोषित कर लेता है और काला दिखायी देता है। ध्यान दें सफेद अर्थात सभी रंगो की मौजूदगी तथा काला अर्थात सभी रंगों की अनुपस्थिति।

विभिन्न फिल्टरों के प्रयोग से लिए गये चित्र

एन जी सी 1512 का चित्र, विभिन्न फिल्टरो के प्रयोगों से

एन जी सी 1512 का चित्र, विभिन्न फिल्टरो के प्रयोगों से

फिल्टरो की इसी कार्यपद्धति का प्रयोग हब्बल दूरबीन करती है। वह हर अंतरिक्ष के पिंड का चित्र अलग अलग फिल्टर के साथ लेती है। यह इसलिए किया जाता है कि हर फ़िल्टर से ली गयी तस्वीर उस पिंड के विशिष्ट गुण को उभारती है। [बाजू की तस्वीर देंखे, इस तस्वीर मे आकाशगंगा एन जी सी 1512 की तस्वीर भिन्न फिल्टरो के प्रयोग से ली गयी है। ] जैसे अवरक्त(infrared) फिल्टर से ली गयी तस्वीर उस पिंड के विभिन्न भागों के तापमान के अंतर को दिखाती है। स्वाइन फ्लू के प्रकोप के दौरान पर इसी तकनीक के प्रयोग से किसी ज्वर से पिड़ीत व्यक्तियों का पता लगाया जा रहा था।  एक्स रे फिल्टरों का प्रयोग कर श्याम विवरो की खोज की जाती है क्योंकि श्याम विवर एक्स रे का उत्सर्जन करते है। श्याम विवरो के अस्तित्व का प्रमाण भी सीग्नस एक्स 1(Cygnus X 1) की एक्स रे तस्वीर से मिला था।

निचे दी गये चित्र मे विभिन्न फिल्टरो से लिये गये आकाशगंगा एन जी सी 1512के चित्रो के विस्तार से दर्शाया गया है। ध्यान दिजीए कि एक ही पिंड के विभिन्न फिल्टरों से लिए गये चित्र कितने भिन्न हो सकते है।

एन जी सी 1512 : विभिन्न फिल्टरो के द्वारा

एन जी सी 1512 : विभिन्न फिल्टरो के द्वारा

अगले भाग मे
भाग 3 : प्राकृतिक, प्रतिनिधि तथा उन्नत रंग

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101 विचार “फिल्टर और प्रकाश : हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है? : भाग 2&rdquo पर;

  1. Sir i think there is a mistakeसफेद चूना कोई रंग अवशोषित नही करता इसलिए सफेद दिखायी देता है, वही श्यामपट सभी रंग को अवशोषित कर लेता है और काला दिखायी देता है। ध्यान दें सफेद अर्थात सभी रंगो की मौजूदगी तथा काला अर्थात सभी रंगों की अनुपस्थिति। white color is absence of every color and black is presence.

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    • 1952: अमरीका ने पहली बार एच-बम का परीक्षण प्रशांत महासागर में स्थित मार्शल आइलैंड के एनेवीटेक एटोल पर किया।
      1953: सोवियत संघ ने मध्य साइबेरिया में एच-बम का परीक्षण किया।
      1957: ब्रिटेन ने एच-बम का अपना पहला परीक्षण प्रशांत महासागर के क्रिसमस आसलैंड पर किया।
      1967: चीन ने एच-बम का अपना पहला परीक्षण शिनजियांग क्षेत्र के मलान में किया।
      1968: फ्रांस ने थर्मोन्यूक्लियर बम का अपना पहला परीक्षण दक्षिणी प्रशांत महासागर में फैनगेटाफा एटोल के ऊपर किया।
      1998: भारत ने राजस्थान के पोखरण में परीक्षण किया और थर्मोन्यूक्लियर बम फोड़ने करने का दावा किया।

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    • आज से हजारों वर्ष पूर्व करीब 600 ई. पू. में यूनान के वैज्ञानिक थेल्स ने पाया कि जब अम्बर नामक पदार्थ को ऊन के किसी कपड़े से रगड़ा जाता है तो उसमें छोटी-छोटी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण आ जाता है। वह गुण जिसके कारण पदार्थ विद्युतमय होते हैं, ‘विद्युत’ (electricty) कहलाता है। जब आवेश किसी तार या चालक पदार्थ में बहता है तो उसे धारा विद्युत (current electricity) कहते हैं। आवेश दो प्रकार के – धनात्मक आवेश (+ve charge) व ऋणात्मक आवेश (-ve charge) होते हैं।

      जिन पदार्थों से होकर विद्युत आवेश सरलता से प्रवाहित होता है, उन्हें चालक कहते हैं तथा वे पदार्थ जिनसे होकर आवेश का प्रवाह नहीं होता है, अचालक कहलाते हैं। लगभग सभी धातुएं, अम्ल क्षार, लवणों के जलीय विलयन, मानव शरीर आदि विद्युत चालक पदार्थों के उदाहरण हैं तथा लकड़ी, रबड़, कागज, अभ्रक, आदि अचालक पदार्थों के उदाहरण हैं।

      आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। ठोस चालकों में आवेश का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण के कारण होता है। जबकि द्रवों जैसे- अम्लों, क्षारों व लवणों के जलीय विलयनों तथा गैसों में यह प्रवाह आयनों की गति के कारण होता है। यदि किसी परिपथ में धारा एक ही दिशा में बहती है तो उसे दिष्ट धारा (Direct current) कहते हैं तथा यदि धारा की दिशा लगातार बदलती रहती है तो उसे ‘प्रत्यावर्ती धारा’ (alternating current) कहते हैं।

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  2. aapne ek post me ye likha hai यदि हम अपने सबसे तेज रफ़्तार वाले यान न्यु
    हारीजोंस की गति को देखे तो वह लगभग
    50,000 किमी/घंटा से चल रहा है, इस गति से हमे
    केप्लर-452b तक पहुचने मे 2.6 करोड़ वर्ष लग जायेंगे।

    aur aapne abhi ye bataya tha ki humare pass keval 40 km/s ka yaan hai

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    • भूपेंद्र, आपके इस प्रश्न का उत्तर पहले भी दे चुका हुं। हमारा मस्तिष्क दोनो आंखो से प्राप्त संकेतो से एक त्रीआयामी छवि बनाता है। जब आप एक आंख पर दबाव बनाते है तब आंखो से प्राप्त संकेतो को मस्तिष्क ठीक से मिला नही पाता और आपखो दो छवि दिखायी देती है।

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    • फोटान(अन्य सभी परमाण्विक कण भी) दोहरा व्यवहार रखता है, एक कण के जैसे भी और ऊर्जा तरंग के जैसे भी। यह माना जाता है कि फोटान का द्रव्यमान नही होता है लेकिन वह गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित भी होता है। एक शून्य द्रव्यमान के कण को गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित नही होना चाहिये।

      हम जानते हैं कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक ही है। अर्थात ऊर्जा को दो तरह से देखा जा सकता है, स्थिर ऊर्जा(Energy at Rest) और कार्यरत ऊर्जा (Energy at Work)। इसमे से स्थिर ऊर्जा(Energy at Rest) का अर्थ ही द्रव्यमान होता है।
      आपका यह कथन सही है “These sub physical vibrations convert in to physical mass at the time of formation of matter (opposite to the nuclear reaction).”

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    • टी वी का रीमोट infrared (अवरक्त) किरणे उत्सर्जित करता है, टीवी मे अवरक्त किरणो का एक सेंसर लगा रहता है वो इन अवरक्त किरणो को पकड़ लेता है।
      डिश एंटीना पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे भूस्थानिक कक्षा के उपग्रहो से रेडीयो संकेत पकड़ते है। भूस्थानिक कक्षा के उपग्रह पृथ्वी पर एक ही स्थान पर रहते है , उनकी परिक्रमा गति और पृथ्वी की घूर्णन गति समान होती है। डिश एंटीना की दिशा इन उपग्रहो की ओर होती है।

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    • फोटान का अर्थ दृश्य प्रकाश ही नही होता है। फोटान की आवृत्ति (Frequency) एक बड़े वर्णक्रम मे होती है, जिसका एक बहुत छोटा भाग हम देख पाते है, इसी भाग को दृश्य प्रकाश कहा जाता है। बाकि सारे स्पेक्ट्रम को हमारी आंखे नही देख पाती है।
      यह आवश्यक नही है कि किसी पदार्थ द्वारा उत्सर्जित फोटान को आप प्रकाश रूप मे देखे, उसे आप उष्मा के रूप मे महसूस कर सकते है, या एक्स रे जैसे उपकरण से जांच सकते है।
      आप के टीवी के रीमोट से अवरक्त(infrared) आवृत्ति मे फोटान निकलते है जिन्हे आप नही देख सकते लेकिन टीवी उन्हे पकड़ लेता है!

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  3. sir jab kisi vastu par surya ka parkaash girta hai to vastu dwara photon avshosit kar liye jaate hai aur vastu ki energy badh jaati hai jisse vastu se electrono ka utsarjan hota hai yahi kirya prathvi par bahut adhik matra me hoti hai MATLAB prathvi par jitni bhi vastuo par parkash padta hai unse electrono nikalte hai ye itne saare electron jaate kaha hai.

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  4. sir dravamaan or urja ko n to utpan kiya Ja sakta or n nast kiya Ja sakta hai to
    fir ek orat ki kokh me bachcha kaise utpan hota hai kya us orat ka dravamaan ghat ta hai aur
    agar usse urja prapt karke bachcha banta hai to jitni urja ko badalkar 1bachcha banta hai utni urja to manusya se itni jaldi utpan karna namumkin hai.

    aur manusya ka bachcha ek manusya hi kyo hota hai ek anye animals kyo nahi isme science ka kya kehna hai

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    • 1. हम जो भी कुछ भोजन करते है वह हमारे शरीर की मांस पेशीयो मे परिवर्तित होता है। यही प्रक्रिया किसी शिशु के माँ की कोख मे होती है। माता द्वारा किया गया भोजन शिशु के विकास मे सहायक होता है।
      2. किसी शिशु का जन्म माता द्वारा उत्पन्न डिंब तथा पिता के शुक्राणु के मिलन से होता है। इस प्रक्रिया मे माता और पिता के गुणसुत्र मिलते है। ये गुणसुत्र ही शिशु की रूपरेखा तय करते है। यह प्रक्रिया सभी प्राणियो/वनस्पति मे होती है। हर प्राणी का गुणसुत्र भिन्न होता है। एक तरह से गुणसुत्र को आप किसी भी प्राणी का नक्शा कह सकते है।

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    • भौतिक विज्ञान मे वैज्ञानिक बनने के लिये आपको पहले 12 वी गणित तथा भौतिकी लेकर करनी होगी। उसके बाद IISc, TIFR जैसे संस्थानो से BSc/BS , MSc/MS करना होगा। अंत मे PhD.
      वैज्ञानिक बनने का शार्टकट नही है।
      मै वैज्ञानिक नही हुं, एक इंजीनियर हुं। मेरे वैज्ञानिक नही बनने के पीछे नीजी कारण है और अब मेरे लिये समय निकल चुका है।

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    • 1. सूर्य के द्रव्यमान का कुछ भाग ऊर्जा मे परिवर्तित हो कर सौर मंडल मे फैल रहा है।
      2. कुछ भाग सौर मंडल मे सौर वायु के रूप मे वितरित हो रहा है, इसका भी कुछ भाग सौर मंडल से बाहर आकाशगंगा मे फैल रहा है।
      3. पृथ्वी का द्रव्यमान बढ़ रहा है। पृथ्वी पर हर क्षण अंतरिक्ष से धूल, उल्काये गिरती रहती है। यह मात्रा कम है लेकिन इससे किंचित मात्रा मे ही सही द्रव्यमान बढ़ रहा है।

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    • तरंग (Wave) का अर्थ होता है – ‘लहर’। भौतिकी में तरंग का अभिप्राय अधिक व्यापक होता है जहां यह कई प्रकार के कंपन या दोलन को व्यक्त करता है। इसके अन्तर्गत यांत्रिक, विद्युतचुम्बकीय, ऊष्मीय इत्यादि कई प्रकार की तरंग-गति का अध्ययन किया जाता है।

      किसी तरंग का गुण उसके इन मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है

      1.तरंगदैर्घ्य (Wavelength) – कोई साइन-आकार की तरंग, जितनी दूरी के बाद अपने आप को पुनरावृत (repeat) करती है, उस दूरी को उस तरंग का तरंगदैर्घ्य (wavelength) कहते हैं। तरंगदैर्घ्य, तरंग के समान कला वाले दो क्रमागत बिन्दुओं की दूरी है। ये बिन्दु तरंगशीर्श (crests) हो सकते हैं, तरंगगर्त (troughs) या शून्य-पारण (zero crossing) बिन्दु हो सकते हैं। तरंग दैर्घ्य किसी तरंग की विशिष्टता है। इसे ग्रीक अक्षर ‘लैम्ब्डा’ (λ) द्वारा निरुपित किया जाता है। इसका SI मात्रक मीटर है।
      2.वेग (speed)
      3.आवृति (frequency) – कोई आवृत घटना (बार-बार दोहराई जाने वाली घटना), इकाई समय में जितनी बार घटित होती है उसे उस घटना की आवृत्ति (frequency) कहते हैं। आवृति को किसी साइनाकार (sinusoidal) तरंग के कला (phase) परिवर्तन की दर के रूप में भी समझ सकते हैं। आवृति की इकाई हर्त्ज (साकल्स प्रति सेकण्ड) होती है।
      एक कम्पन पूरा करने में जितना समय लगता है उसे आवर्त काल (Time Period) कहते हैं।
      4.आयाम (Amplitude)

      तरंग के प्रकार
      गति की दिशा तथा कम्पन की दिशा के सम्बन्ध के आधार पर
      1.अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave) – इसमें तरंग की गति की दिशा माध्यम के कम्पन की दिशा के लम्बवत होती है।
      2.अनुदैर्घ्य तरंग (longitudenal wave) – इसमें तरंग की गति की दिशा माध्यम के कम्पन की दिशा के में ही होती है।

      तरंग की प्रकृति के आधार पर
      1.यांत्रिक तरंगे – जैसे ध्वनि, पराश्रव्य तरंग (ultrasonic waves), पराध्वनिक (supersonic), जल के सतह पर उठने वाली तरंग, आदि
      2.विद्युतचुम्बकीय तरंग – जैसे प्रकाश, उष्मा एवं एक्स-रे आदि

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    • सूर्य अथवा सूरज सौरमंडल के केन्द्र में स्थित एक तारा है जिसके चारों तरफ पृथ्वी और सौरमंडल के अन्य अवयव घूमते हैं। सूर्य हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा पिंड है और उसका व्यास लगभग १३ लाख ९० हज़ार किलोमीटर है जो पृथ्वी से लगभग १०९ गुना अधिक है। ऊर्जा का यह शक्तिशाली भंडार मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का एक विशाल गोला है। परमाणु विलय की प्रक्रिया द्वारा सूर्य अपने केंद्र में ऊर्जा पैदा करता है। सूर्य से निकली ऊर्जा का छोटा सा भाग ही पृथ्वी पर पहुँचता है जिसमें से १५ प्रतिशत अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है, ३० प्रतिशत पानी को भाप बनाने में काम आता है और बहुत सी ऊर्जा पेड़-पौधे समुद्र सोख लेते हैं। इसकी मजबूत गुरुत्वाकर्षण शक्ति विभिन्न कक्षाओं में घूमते हुए पृथ्वी और अन्य ग्रहों को इसकी तरफ खींच कर रखती है।
      सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग १४,९६,००,००० किलोमीटर या ९,२९,६०,००० मील है तथा सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को आने में ८.३ मिनट का समय लगता है। इसी प्रकाशीय ऊर्जा से प्रकाश-संश्लेषण नामक एक महत्वपूर्ण जैव-रासायनिक अभिक्रिया होती है जो पृथ्वी पर जीवन का आधार है। यह पृथ्वी के जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है। सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हिलियम, लोहा, निकेल, ऑक्सीजन, सिलिकन, सल्फर, मैग्निसियम, कार्बन, नियोन, कैल्सियम, क्रोमियम तत्वों से हुआ है। इनमें से हाइड्रोजन सूर्य के सतह की मात्रा का ७४ % तथा हिलियम २४ % है।
      इस जलते हुए गैसीय पिंड को दूरदर्शी यंत्र से देखने पर इसकी सतह पर छोटे-बड़े धब्बे दिखलाई पड़ते हैं। इन्हें सौर कलंक कहा जाता है। ये कलंक अपने स्थान से सरकते हुए दिखाई पड़ते हैं। इससे वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य पूरब से पश्चिम की ओर २७ दिनों में अपने अक्ष पर एक परिक्रमा करता है। जिस प्रकार पृथ्वी और अन्य ग्रह सूरज की परिक्रमा करते हैं उसी प्रकार सूरज भी आकाश गंगा के केन्द्र की परिक्रमा करता है। [[इसको परिक्रमा करनें में २२ से २५ करोड़ वर्ष लगते हैं, इसे एक निहारिका वर्ष भी कहते हैं। इसके परिक्रमा करने की गति २५१ किलोमीटर प्रति सेकेंड है।

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  5. पिगबैक: हबल दूरबीन के शानदार 25 वर्ष पूरे | विज्ञान विश्व

  6. पिगबैक: हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है? | विज्ञान विश्व

  7. पिगबैक: प्राकृतिक, प्रतिनिधि तथा उन्नत रंग: हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है?: भाग 3 | विज्ञान विश

  8. aur ha.. Hame book ka title sonchne me dikkat ho rahi hai. Kya aap madad kar sakte hain?
    Ye kuchh topics hain jinke bare me puri charcha us book me hogi…
    Brahmand ki utpatti
    bhavishya me jana sambhav hai
    black hole theory
    big bang theory
    theory of relativity
    quantum yug
    moolbhoot bal
    tare kaise bante hai, kaha bante hain.
    Vedo me brahmand sambandhi wo bate jo aaj siddh ho chuki hain
    einstein ki short biography
    einstein ke jeevan se jude bahut se tathya…
    Einstein related stories
    Bhautik vigyan me abhi kaun kaun si theorical problem hai jo solve nahi hui hain.

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  9. dekhiye, hame aapki site ke lekh bahut pasand aa gaye hain aur hum chahte hain ki ye lekh aam jan tak bhi pahuche.
    .
    Isliye hum inhe pustak ke roop me chhpwana chahte hain.
    Per us pustak me keval aapke hi lekh nahi honge. Brahmaand aur bhautiki sambandhi aur bhi jankariya hongi. Iske alawa us book me einstein ki short biography aur einstein se sambandhit sabhi jankariya bhi hongi.
    .
    Matlab hum use eak puri tarah gyanvardhak roop dena chahte hain.
    Aur haan, hum aapke lekho ko edit bhi kar sakte hain. Wo isliye kyunki maan liya aapne kisi topic pe jo jankari di hai, usi topic pe hame dusri jagah se aur jankari mil gayi. To ab dono ko jodna bhi to padega na… Ha per mool bhav nahi badalne denge…
    .
    Aur jaha tak naam ki baat hai, prastavna me hum sabhi sahi bat likh denge ki ye matter kaha kaha se liya gaya hai. Aur aapka naam vishesh rahega kyunki aapka matter useme 50% se jyada rahega.
    Ab aap bataiye, aapko koi aapatti to nahi hogi? Ye bhi bata deejiye ki usme kiska naam likhna hai ? Matlab aap akele likhte hain ya aur koi bhi shamil hai blog likhne me?
    .
    Aur eak baat bata deejiye ki aap apni site me ye matter kaha se likhte hain? Wo isliye kyonki book me kuchh galat jankari na chhap jaye.
    Aur kahi koi rachna kalpanik na ho…
    Aur eak baat bata deejiye, ki bhautik vigyan sambandhi hindi me aur jankari aapki blog ke alawa hame aur kaha se mil sakti hai?
    Dhanyawaad

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  10. बहुत श्रम से तैयार किया है आपने यह आलेख।

    आपकी इस लगन को सलाम करने को जी चाहता है।

    ——
    ब्‍लॉगसमीक्षा की 27वीं कड़ी!
    क्‍या भारतीयों तक पहुँचेगी यह नई चेतना ?

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