खगोल भौतिकी 19 :न्यूट्रान तारे और उनका जन्म


लेखक : ऋषभ

’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के पिछले लेख मे हमने सूर्य के जैसे मध्यम आकार के तारों के विकास और जीवन की चर्चा की। हमने देखा कि वे कैसे श्वेत वामन(white dwarfs) तारे बनते है। इस शृंखला के उन्नीसवें लेख मे हम महाकाय तारो के जीवन और विकास की चर्चा करेंगे और देखेंगे कि उनकी मृत्यु किस तरह से न्यूट्रान तारों के रूप मे होती है।

मध्यम आकार के तारों और महाकाय तारों के जीवनचक्र मे कार्बन संलयन तक समानता होती है। आपको पिछले लेख को पढ़ने भेजने की बजाय इस लेख मे हम उन सभी चरणो की चर्चा दोबारा कर लेते है। अब हम आरंभ करते है कि महाकाय तारे कैसे बनते है और उनका अंत न्यूट्रान तारे के रूप मे कैसे होता है।

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तारों का जन्म(Birth of Stars)

हम चर्चा की शुरुवात एकदम आरंभ से करेंगे। ब्रह्मांड मुख्य रूप से दो मुख्य तत्वों से बना है, हायड्रोजन और हिलियम। ब्रह्मांड मे धूल और गैस के विशालकाय बादल है जो इन तत्वों से बने है। इन बादलो का आकार कई प्रकाशवर्ष मे होता है। समय के साथ ये बादल निकट आते है। जब धुल और गैस के इन बादलो मे पर्याप्त द्रव्यमान जमा होजाता है तब मे अपने गुरुत्वाकर्षण से संपिडित(collapse) होना शुरु हो जाते है। इस क्रांतिक द्रव्यमान सीमा(critical mass limit) को जिंस सीमा(Jeans limit) कहते है। यह संपिड़न लंबे समय तक चलते रहता है और यह बादल गैस के घूर्णन करते गोले मे बदल जाता है, इस गोले के चारो ओर बादल की शेष गैस और धुल होती है। गैस और धूल के संपिड़न से बने इस गोले की उष्मा परमाणुओं के आपस मे टकराव से उत्पन्न उष्मा से बढ़ते जाती है। जब यह तापमान 150 लाख केल्विन तक पहुंच जाता है तब हायड्रोजन संलयन(hydrogen fusion) आरंभ होता है और तारे का जन्म होता है। अब यह तारा हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख मे मुख्य अनुक्रम(main sequence) के तारो मे प्रवेश कर लेता है।

मुख्य अनुक्रम अवस्था (The Main Sequence Phase)

हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख मे मुख्य अनुक्रम वह पट्टा है जिसके तारे अपने केंद्रक मे हायड्रोजन संलयन से हिलियम बनाते रहते है। हमारा सूर्य मुख्य अनुक्रम का तारा है। मुख्य अनुक्रम चरण की विलक्षण बात यह है कि इस चरण मे तारा प्रसन्न अवस्था मे रहता है, इसका अर्थ यह है कि उसमे आदर्श द्रवस्थैतिक संतुलन(perfect hydrostatic equilibrium) होता है। उसके महाकाय आकार के कारण गुरुत्वाकर्षण उसे संपिडित करने का प्रयास करता है। तारे के केंद्र की दिशा मे इस गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करने के लिये नाभिकिय संलयन से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा गैस का दबाव बाह्य दिशा मे कार्य करता है। गुरुत्वाकर्षण और नाभिकिय संलयन ऊर्जा से उत्पन्न दबाव एक दूसरे को संतुलन मे रखते है। यह नीचे चित्र मे दर्शाता गया है।

तारे के केंद्रक मे प्रोटान-प्रोटान शृंखला या CNO चक्र के द्वारा हायड्रोजन संलयन से हिलियम का निर्माण करती है जिसे हमने पिछले लेखों मे देखा है। सूर्य के जैसे तारो मे प्रोटान-प्रोटान अभिक्रिया प्रमुख होती है, जोकि धीमी प्रक्रिया है। इसलिये सूर्य को अपनी संपूर्ण हायड्रोजन को जलाकर हिलियम मे परिवर्तित करने के लिये दस अरब वर्ष लगेंगे। ध्यान दिजिये कि यह नाभिकिय अभिक्रिया केवल सूर्य के केंद्रक मे हो रही है जहाँ पर तापमान 150 लाख केल्विन है। सूर्य की सतह का तापमान केवल 6,000 केल्विन है।

समाप्ति बिंदु(Turnoff Point)

एक दिन केंद्र मे समस्त हायड्रोजन हिलियम बन जायेगी। अगली नाभिकिय प्रक्रिया ट्रिपल अल्फ़ा प्रक्रिया द्वारा हिलियम से कार्बन का निर्माण है लेकिन इसके लिये तापमान समस्या है। केंद्रक का तापमान 150 लाख केल्विन है, जबकी ट्रिपल अल्फ़ा प्रक्रिया को आरंभ करने के लिये 10 करोड़ केल्विन तापमान चाहिये। इस उच्च तापमान की अनुपस्थिति मे केंद्रक मे नाभिकिय अभिक्रिया रूक जाती है और केंद्रक निष्क्रिय हो जाता है, इसे ही समाप्ति बिंदु कहते है। अब तारा मुख्य अनुक्रम से बाहर हो जाता और दानव(Subgiant) शाखा मे प्रवेश करता है।

दानव अवस्था(Subgiant Phase)

हम इसे सरलतम रूप मे समझने का प्रयास करेंगे। जब कोई तारा समाप्ति बिंदु पर पहुंचता है तब केंद्रक मे कोई नाभिकिय प्रक्रिया नही हो रही होती है। अब वह हिलियम केंद्र के चारो ओर मोटे खोल मे हायड्रोजन के संलयन से हिलियम बनाना आरंभ करता है। यह प्रक्रिया नीचे चित्र मे दिखाई गई है।

तारे के केंद्र के द्रव्यमान से संबधित एक सीमा है जिसे स्कानबर्ग-चंद्रशेखर सीमा के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धांत सरल है। यदि केंद्रक का द्रव्यमान इस सीमा से अधिक होगा तो अब केंद्रक उष्मीय संतुलन मे नही रह पायेगा। केंद्रक अब समतापीय अवस्था मे नही रह पाता है। केंद्रक के खोल पर हायड्रोजन के संलयन से निष्क्रिय हिलियम केंद्रक का द्रव्यमान बढ़ता है क्योंकि उपरी खोल से “राख” केंद्रक मे गीर रही होती है। जैसे ही केंद्रक का द्रव्यमान स्कानबर्ग-चंद्रशेखर सीमा पार करता है, वह संपिड़ित होता है और उष्ण होना आरंभ होता है। अपने आरंभिक द्रव्यमान के आधार पर तारों द्वारा इस सीमा तक पहुंचने के लिये लगनेवाला समय भिन्न भिन्न होता है। यह अंदर की कहानी है, लेकिन बाहर खोल पर संलयन के कारण तारे की बाह्य तहे विस्तार करती हुई शीतल होते जाती है।

लाल दानव शाखा(Red Giant Branch)

तारे का केंद्रक अब उष्ण हो रहा है, जबकि बाहर उसका आकार बढ़ रहा है। इस आकार मे वृद्धि से उसकी सतह शीतल होते जाती है। दूसरे शब्दो मे तारा अव लाल दानव बन रहा है। वह हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख दायें बढ़ता है और लाल दानव शाखा मे पहुंच जाता है। इस अवस्था मे बहुत सी आंतरिक घटनाये होती है जिसमे सबसे महत्वपूर्ण है ड्रेज अप(dredge up)।

ड्रेज अप(Dredge Up)

तारे के अंदर तीन प्रमुख क्षेत्र होते है : केंद्रक(core), विकिरण जोन(radiation zone) और संवहन जोन(convection zone)। केंद्रक से उष्मा विकिरण जोन तक सीधे सीधे विकिरण द्वारा पहुंचती है। संवहन जोन मे प्लाज्मा संवहन धाराओं मे होता है। किसी पात्र मे जल को गर्म करने से तुलना किजिये। इसी तरह से विकिरण जोन के पास से उष्ण प्लाज्मा उपर उठता है, सतह पर आता है, शीतल होता है और वापस नीचे जाता है। लाल दानव अवस्था मे यह संवहन जोन केंद्रक के समीप होते जाता है। इसके कारण भारी संलयन तत्व जैसे हिलियम और कार्बन मिश्रीत हो जाते है और अंत मे सतह तक आ जाते है, और उन्हे वर्णक्रम मे देखा जा सकता है। इस गतिविधि को ड्रेज अप कहते है। ड्रेज अप किसी तारे की आंतरिक प्रक्रियाओं के बारे मे महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।

हिलियम कौंध(Helium Flash)

जैसे ही केंद्रक का तापमान 10 करोड़ केल्विन पहुंचता है, बेलगाम तरिके से हिलियम संलयन आरंभ होता है। इसे हिलियम कौंध(Helium Flash) कहते है। यह इतनी तीव्र विस्फोटक प्रक्रिया होती है कि हिलियम का 6‍% भाग क्षण भर मे कार्बन मे ट्रिपल अल्फ़ा प्रक्रिया से परिवर्तित हो जाता है। इसके पश्चात सामान्य रूप से ट्रिपल अल्फ़ा प्रक्रिया से हिलियम संलयन से कार्बन निर्माण होता है।

लाल दानव शाखा मे तारा द्रवस्थैतिक संतुलन(hydrostatic equilibrium) मे नही होता है। केंद्रक मे नाभिकिय अभिक्रिया की अनुपस्थिति के कारण गुरुत्चाकर्षण ने प्रभुत्व जमा लिया होता है और वह तारे को संपिड़ित करते जाता है। इस संपिड़न बल से केंद्रक उष्ण होते जाता है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल तारे को पूर्ण संपिड़ित क्यो नही कर पाता है ? आखिरकार तारा लाल दानव अवस्था मे दो अरब वर्ष रहता है। इसका उत्तर है इलेक्ट्रान विकर्षण दबाव(electron degeneracy pressure)। हम जानते है कि इलेक्ट्रान फ़र्मियान(Fermions) है, और वे पाउली के अपवर्जन सिद्धान्त(Pauli’s exclusion principle) का पालन करते है। इसका अर्थ है कि कोई भी दो इलेक्ट्रान समान क्वांटम अवस्था मे नही रह सकते है। जब हम पदार्थ को संपिड़ित करते है तो वे निम्न क्वांटम अवस्था प्राप्त करते है, और अधिक संपिडन करने पर इन इलेक्ट्रानो द्वारा बाहर की दिशा मे विकर्षण दबाव उत्पन्न होता है। यह विकर्षण दबाव पाउली के अपवर्जन सिद्धान्त के कारण होता है।

इसलिये अब केद्रक विकर्षण(degenerate)अवस्था मे पहुंच जाता है और हिलियम कौंध द्वारा उत्पन्न भीषण ऊर्जा द्वारा इस विकर्षण अवस्था का सामना किया जाता है। ध्यान रहे कि सभी तारे विकर्षण अवस्था मे नही पहुंचते हौ और भारी तारो मे हिलियम कौंध नही होती है।

क्षैतिज शाखा(Horizontal Branch)

हिलियम कौंध के पश्चात केंद्रक पुन: सक्रिय हो जाता है। अब केंद्रक मे ट्रिपल अल्फ़ा प्रक्रिया द्वारा हिलियम संलयन से कार्बन निर्माण होता है। तारा संकुचित होता है और सतह का तापमान बढ़ता है। अब तारा हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख मे बाये चला जाता है। इस शाखा का नाम क्षैतिज शाखा है क्योंकि समान दीप्ती वाले तारे (दीप्ती Y अक्ष) पर विभिन्न वर्णक्रम के वर्गो(सतह का तापमान X अक्ष) मे एक क्षैतिज रेखा पर होते है। एक क्षैतिज रेखा शाखा वाले तारे का गुणधर्म है : हिलियम संलयन वाला केंद्रक जिसके खोल पर हायड्रोजन संलयन हो रहा होता है।

अनन्तस्पर्शी दानव शाखा(Asymptotic Giant Branch)

एक समय पश्चात तारे के केंद्रक मे हिलियम समाप्त हो जाती है। सारी हिलियम कार्बन मे परिवर्तित हो जाती है और केंद्रक फ़िर से निष्क्रिय हो जाता है क्योंकि कार्बन संलयन के लिये अत्याधिक 50 करोड़ केल्विन तापमान चाहीये। इस अवस्था मे जो खोल हायड्रोजन से हिलियम बना रहा था, वह हिलियम से कार्बन बनाना आरंभ कर देता है। इस खोल के उपर एक नया खोल हायड्रोजन से हिलियम बनाना आरंभ करता है जो कि नीचे चित्र मे दर्शाया गया है।

अब तारा हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख मे दायें चला जाता है क्योंकि उसकी सतह का तापमान कम हो गया है। यह इसके पहले के लाल दानव शाखा के जैसा है, इसलिये इसे अनन्तस्पर्शी दानव शाखा(Asymptotic Giant Branch) कहते है। इस शाखा के तारे अत्याधिक द्रव्यमान वाले होते है। इनके गुणधर्म मे निष्क्रिय कार्बन केंद्रक, उसके उपर हिलियम संलयन करता खोल और उसके उपर हायड्रोजन संलयन करता खोल। इस अवस्था मे तारा फ़ूल जाता है और उसका आकार एक खगोलीय इकाई तक (1 AU) तक होता है। इन तारो मे द्वितिय ड्रेज अप होता है। इसलिये शीलत और महाकात अनन्तस्पर्शी दानव शाखा(Asymptotic Giant Branch) के वर्णक्रम मे गहरी कार्बन रेखा दिखाई देती है।

अनन्तस्पर्शी दानव शाखा(Asymptotic Giant Branch) के बाद

मध्यम आकार के तारों की कहानी यहीं समाप्त हो जाती है, उनके पास पूरे पैमाने पर कार्बन संलयन करने की क्षमता नही होती है। लेकिन महाकाय तारे कार्बन संलयन के लिये आवश्यक तापमान आसानी से प्राप्त कर लेते है। वे नाभिकिय संलयन से अधिक भारी तत्वों का निर्माण करते रहते है जिसकी चर्चा हम नीचे कर रहे है।

कार्बन संलयन(Carbon Fusion)

कार्बन पांच संभव तरिकों से संलयन कर सकता है। प्रथम, तो कार्बन के नाभिक जुड़ कर अस्थाई मैग्नेशियम बनायेंगे, जो कि चित्र मे दिखाये अनुसार पांच संभव तरिके से क्षय हो जाता है। पहली दो प्रक्रियाये अत्याधिक ऊष्माक्षेपी(exothermic) है जोकि अत्याधिक धनात्मक ऊर्जा उत्सर्जन से स्पष्ट है। यह प्रक्रिया सर्वाधिक मात्रा मे होती है। तीसरी प्रक्रिया अत्याधिक उष्माशोषी है जोकि अत्याधिक ऋणात्मक ऊर्जा विक्षेप से स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया मे ऊर्जा उत्पादन की बजाय अवशोषण हो रहा है। इससे इस प्रक्रिया की संभावना कम हो जाती है लेकिन यह अत्याधिक ऊर्जा वाले कार्बन संलयन के वातावरण मे संभव है। चौथी प्रक्रिया की संभावना न्यून होती है, इसके लिये पहले विद्युतचुंबकीय प्रक्रिया चाहिए, जो कि गामा किरण से स्पष्ट है। अंत मे पांचवी प्रक्रिया के लिये तीन प्रक्रिया कारक चाहीये और यह प्रक्रिया भी उष्माशोषी है और इसके होने की संभावना न्यूनतम होती है।

यह भी पढ़े : तारो मे नाभिकिय अभिक्रियाये।

50 करोड़ केल्विन तापमान पर कार्बन के संलयन से अतिम उत्पाद निआन-आक्सीजन-मैग्नेशियम-सोडीयम के मिश्रणा से बना केंद्रक होता है।

निआन संलयन(Neon Burning)

कार्बन संलयन के पश्चात केंद्रक फ़िर से निष्क्रिय हो जाता है। जब संपिड़न से तापमान 1.2 अरब केल्विन पहुंच जाता है तो निआन संलयन आरंभ होता है। यह अभिक्रिया नीचे दिखाये चित्र के अनुसार होती है।

निआन संलयन मे आक्सीजन और मेग्नेशियन केंद्रक मे जमा होते है और निआन का उपभोग होता है। कुछ वर्षो मे समस्त निआन समाप्त हो जाती है और केंद्रक संलयन ऊर्जा का निर्माण बंद कर देता है और सिकुड़ना आरंभ करता है। फ़िर से एक बार गुरुत्विय दबाव नियंत्रण ले लेता है और केंद्रक को संपिड़ित करता है, जिससे घनत्व बढ़ता और परिणामस्वरूप तापमान भी, एक समय बाद इतना तापमान हो जाता है कि आक्सीजन संलयन आरंभ हो जाता है।

आक्सीजन संलयन(Oxygen Burning)

आक्सीजन संलयन केंद्रक के 3 अरब डीग्री केल्विन तापमान तक पहुंचने के पश्चात आरंभ होता है। आक्सीजन संलयन के उत्पाद सिलिकान और गंधक(सल्फ़र) होते है।

केंद्रक मे जमा सिलिकान और गंधक अंत मे नाभिकिय अभिक्रियाओं के अंतिम सेट से गुजरते है जोकि अल्फ़ा सीढ़ी(Alpha Ladder) कहलाता है।

अल्फ़ा सीढ़ी(Alpha Ladder)

सिलिकान का द्रव्यमान क्रमांक 28 है। यह सिलिकान के नाभिक मे प्रोटान और न्यूट्रान की संख्या है। अल्फ़ा कण या हिलियम नाभिक का द्रव्यमान क्रमांक 4 है। जब अल्फ़ा कण Si-28 से टकराता है तो Su-32(सल्फ़र) बनता है। ध्यान दिजिये कि किस तरह द्रव्यमान संख्या संरक्षित (28+4=32)रहती है। इसके पश्चात अगला अल्फ़ा तत्व जिसकी द्रव्यमान संख्या चार के गुणक मे हो बनते जाती है, जोकि नीचे चित्र मे दिखाई गई है।

यह अभिक्रिया क्रम निकेल(Ni-56) पर रूक जाती है। ऐसा इसलिये कि Ni-56 की प्रति न्युक्लिआन बंधन ऊर्जा(binding energy) सर्वाधिक होती है। दूसरे सरल शब्दो मे अगली नाभिकिय अभिक्रिया Ni-56 से Zn-60 से ऊर्जा मूक्त नही होगी, उल्टे इस अभिक्रिया को ऊर्जा चाहीये होगी। यह उष्मागतिकि के अनुसार अनुकूल नही है। इसलिये Ni-56 पर केंद्रक निष्क्रिय हो जाता है। अल्फ़ा सीढी अपने उच्च तापमान के कारण अत्यंत तेज अभिक्रिया है। किसी तारे को हायड्रोजन से हिलियम बनाने मे अरबो वर्ष लगते है लेकिन सिलिकान से निकेल बनने की प्रक्रिया एक दिन मे हो जाती है।

अब नाभिकिय अभिक्रियायें बंद है तो गुरुत्वाकर्षण फ़िर से तारे को नियंत्रण मे ले लेता है और तारे को संपिड़ित करना आरंभ करना आरंभ कर देता है।

सुपरनोवा(Supernova)

हमने इससे पहले देखा है कि समाप्ति बिंदु(Turnoff Point) के पश्चात किस तरह से केंद्रक के खोल पर संलयन आरंभ होता है। यह अब भी जारी है। इसके बाद के खोल पर पर भी भारी तत्वों का संलयन होते रहा है। जैसे ही अल्फ़ा सीढ़ी प्रक्रिया की समाप्ति होती है, किसी तारें की आंतरिक संरचना कुछ ऐसी होती है।

हायड्रोजन संलयन करने वाला खोल जिसने सबसे पहले संलयन आरंभ किया था अब सतह के ठीक नीचे है। अब संपिड़न वाला गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक है कि इलेक्ट्रान अपकर्ष दबाव(electron degeneracy pressure) भी मरते तारे को बचा नही सकता है। इलेक्ट्रान और प्रोटान मिलकर न्यूट्रान बन जाते है और संपिड़न इसी के जैसे न्यूट्रान अपकर्ष दबाव द्वारा रोका जाता है। ऐसा इसलिये कि इलेक्ट्रान के जैसे न्यूट्रान भी फ़र्मियान है और पाली के अपवर्जन सिद्धान्त (Pauli’s exclusion principle) का पालन करते है।

तारे का अंदर की ओर सिकुड़ता हुआ बाह्य खोल अब रूक जाता है और न्यूट्रान के निर्माण के समय बनने वाले न्यूट्रिनो के तुफ़ान मे एक विस्फोट के द्वारा बाहर फ़ेंक दिया जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते है। बचा हुआ भाग अब न्यूट्रान तारा है।

लेकिन यदि बचे हुये न्यूट्रान तारे का द्रव्यमान अब भी 3 M☉ (सूर्य के द्रव्यमान का तीन गुणा) है, तो 3 times mass of Sun), तो उसके संकुचन को न्यूट्रान अपकर्ष दबाव भी नही रोक पाता है और वह ब्लैक होल(श्याम विवर) बन जाता है।

न्यूट्रान तारा(Neutron Star)

इस तरह से बने न्यूट्रान तारे वास्तव मे अत्याधिक घनत्व वाले पिंड होते है। हमने श्वेत वामन तारों के लिये उपरी द्रव्यमान सीमा चंद्रशेखर सीमा (1.44 M☉) देखी है, इसी तरह से स्थिर न्यूट्रान तारों के लिये भी द्रव्यमान की सीमा है जिसे टोलमन-ओपेन्हाइमर-वोल्कोफ़ सीमा( Tolman-Oppenheimer-Volkoff (TOV)) कहते है और यह सीमा 1.4 से 3 M☉ है। 3 M☉ से 5 M☉ के मध्य द्रव्यमान वाले तारे अत्याधिक घनत्व के परिकल्पित क्वार्क तारे(quark star) बनते है और इससे अधिक घनत्व के तारे ब्लैक होल बनते है।

न्यूट्रान तारों के गुणधर्म

इस लेख के अंत से पहले न्यूट्रान तारों के कुछ अद्भूत गुणो पर चर्चा करते है।

  1. नये बने न्यूट्रान तारे का तापमान 1000 अरब केल्विन(1 ट्रिलियन केल्विन) होता है। जैसे ही न्यूट्रान तारो से न्यूट्रिनो का उत्सर्जन होता है कुछ वर्षो मे ही यह तापमान गीरकर 10 लाख केल्विन तक आ जाता है। इस तापमान पर न्यूट्रान तारों से केवल एक्स किरणे उत्सर्जित होती है।
  2. न्यूट्रान तारे का घनत्व नाभिकिय घनत्च के पैमाने पर होता है जोकि 10^17 Kg/m3 है। न्यूट्रान तारे का एक चम्मच पदार्थ का द्रव्यमान गीजा के पिरामीड से 900 गुणा अधिक होगा।
  3. न्यूट्रान तारों का चुंबकीय क्षेत्र अत्याधिक शक्तिशाली होता है। न्यूट्रान तारों का एक विशिष्ट वर्ग होता है जिसे मेग्नेटार कहते है जिसका चुंबकीय क्षेत्र 1000 अरब टेस्ला के पैमाने पर होता है। यदि चंद्रमा की दूरी पर किसी मेग्नेटार को रख दे तो वह आपके क्रेडीट कार्ड की चुंबकीय पट्टी की सूचना को प्रभावित कर सकता है।

लेखक का संदेश

यह मूलभूत भौतिकी(Basics of Astrophysics) शृंखला के जटिल लेखो मे अंतिम था। इस लेख का उद्देश्य खगोलभौतिकी मे भौतिकी के अन्य विभागो के महत्व को दिखाना था, इसे हमने तारों के विकास और जीवन क्रम के दिखाया है। हमने तारकीय विकास को सरलतम रूप से प्रस्तुत करने का सर्वोत्तम प्रयास किया है। हमे आशा है कि आपने तारकीय खगोलभौतिकी के इस भाग को रूची से पढ़ा होगा। इसके पश्चात हम खगोलभौतिकी के अन्य रोचक विषयो पर चर्चा करेंगे जिसमे ब्लैक होल, निहारिका, आकाशगंआओं का समावेश होगा। इन लेखो मे हम भौतिकी की गहराईयों मे नही जायेंगे।

लेख की समाप्ति से पहले, हम एक बात साझा करना चाहेंगे : बहुत से विद्यार्थी पुछते है कि उच्च माध्यमिक स्कूल(कक्षा 12) के बाद मे खगोलभौतिकी मे करीयर कैसे बनाये। इन विद्यार्थीयों के लिये सलाह है कि “आप जल्दबाजी मे है, खगोलभौतिकी मे प्रवेश करने के लिये कक्षा 12 सही नींव नही है। सबसे पहले आप भौतिकी के सिद्धांतो पर अपनी पकड़ बनाये। सबसे पहले आपको सांख्यकिय यांत्रिकी(Statistical Mechanics), स्पेक्ट्रोस्कोपी( Spectroscopy),विद्युत गतिकी( Electrodynamics), नाभिकिय भौतिकी( Nuclear Physics), आप्टिक्स( Optics), क्वांटम यांत्रिकी(Quantum Mechanics) तथा गणितिय भौतिकी के साथ कई अन्य विषयो पर महारत हासिल करनी होगी। यदि आप की इन सब पर मजबूत पकड़ है तो खगोलभौतिकी आपके लिये बहुत आसान होगी।

मूल लेख :NEUTRON STARS AND THEIR BIRTH

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.

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खगोल भौतिकी 19 :न्यूट्रान तारे और उनका जन्म&rdquo पर एक विचार;

  1. पिगबैक: खगोल भौतिकी 20 : तीन तरह के ब्लैक होल | विज्ञान विश्व

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