परग्रही जीवन भाग 5 : जीवन अमृत – जल एक महान विलायक


जल

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अब तक हमारी चर्चा का केंद्र जीवित प्राणीयों की जैवरासायनिक संरचनाओं पर रहा है। यह सब बहुत महत्वपूर्ण था लेकिन हम इस तथ्य को नजर अंदाज नही कर सकते कि ये जैव अणु निर्वात मे कार्य नही करते है। पृथ्वी पर सभी जैव जैव कोशीकाओं के अंदर सभी जैव रासायनिक प्रक्रियायें द्रव जल की उपस्थिति मे ही होती है। पृथ्वी पर जीवन संरचना मे मुख्य भूमिका कार्बन की है लेकिन इसकी पृष्ठभूमी और मंच द्रव जल ने तैयार की है।

जीवन के लिये किसी द्रव माध्यम की भूमिका सरसरी तौर पर महत्वपूर्ण नही लगती है लेकिन यह जैविक संरचना के लिये जिम्मेदार तत्वो की भूमिका से अधिक महत्वपूर्ण है। सर्वप्रथम किसी द्रव का चयन ही निर्धारण करेगा कि किस तरह कि जैव रसायन प्रक्रियायें संभव है। उदाहरण के लिये सिलेन रसायन जल और अमोनिया मे संभव नही है। द्वितीय , किसी तय दबाव पर यौगिक द्रव अवस्था ने एक विशिष्ट तापमान सीमाओं के मध्य ही रहते है, जिसका अर्थ है कि किसी ग्रह पर किसी भी पदार्थ की द्रव अवस्था उस ग्रह के तापमान और दबाव पर निर्भर करेगी। उदाहरण के लिये , जल आधारित जीवन के लिये जीवन योग्य ग्रह गोल्डीलाक क्षेत्र मे पाये जाते है, यह तारे के पास वह क्षेत्र होता है जहाँ जल ग्रह की सतह पर द्रव अवस्था मे पाये जाने की संभावना होती है। किसी भी तरह के जीवन के लिये ये सभी शर्ते अनिवार्य है, चाहे वह कार्बन आधारित जीवन हो या किसी अन्य तरह का विचित्र जीवन।

विलायक द्रव ही क्यों चाहिये?

आदर्श विलायक

आदर्श विलायक

किसी भी कोशिका मे होने वाली जैव रासायनिक प्रक्रिया के लिये जल ही उपयुक्त परिस्थितियाँ प्रदान करता है। इसके पहले कि हम ब्रह्मांड मे अन्य स्थानो पर जीवन के लिये आवश्यक जल की इस भूमिका के विकल्पों पर विचार करें , पहले यह देखतें है कि क्या द्रव की जगह कोई अन्य अवस्था जैव रासायनिक प्रक्रिया के लिये उपयुक्त परिस्थिति उपलब्ध करा सकती है। वैज्ञानिको ने जैव रासायनिक प्रक्रिया के वातावरण के लिये द्रव के स्थान पर गैस या ठोस की भूमिका की संभावनाओं पर गंभीर विचार किया है लेकिन उन्होने गैस या ठोस को इस के लिये प्रभावी नही पाया है।

द्रव एक साझा पर्यावरण प्रदान करता है। द्रव एक ऐसा विलायक होता है जो ठोस (प्रोटीन, DNA इत्यादि), द्रव तथा गैस(आक्सीजन, कार्बन डाई आक्साईड इत्यादि) का विलय कर(घोल कर) एक ऐसा पर्यावरण प्रदान कर देता है कि वे आपस मे प्रतिक्रिया कर सकें। जबकि ठोस और गैस अवस्था वाले पदार्थों के पास इस तरह की क्षमता सीमित होती है कि वे अन्य दो अवस्थाओं इस तरह का पर्यावरण निर्मित कर सकें। ना तो ठोस ना ही गैस अन्य दो अवस्थाओं के पदार्थ को द्रव के जैसे घोल सकते है।

द्रव संघटको को पूर्ण गति स्वतंत्रता प्रदान करता है। किसी भी प्रभावशाली जैवरासायनिक प्रक्रिया के लिये आवश्यक होता है कि प्रतिक्रिया करबे वाले घटक कोशीकाओं के अंदर पूरी स्वतंत्रता से विचरण कर सकें। कोशीकाओं के लिये आवश्यक होता है कि पोषक तत्व आसानी से लाये का सकें तथा अपशिष्ट का निस्पादन आसानी से हो सके। यह प्रक्रिया ठोस माध्यम मे होना कठीन है क्योंकि ठोस पदार्थ मे पदार्थ का विसरण अत्यंत धीमी गति से होता है। इस तरह की प्रक्रिया के लिये द्रव और गैस आदर्श अवस्थायें हैं।

द्रव एक प्रावरण(encapsulation) प्रदान करते है। जैव रसायन के लिये आवश्यक होता है कि सभी आवश्यक मुख्य पदार्थ एक दूसरे के समीप रहें जिससे वह प्रक्रिया कर सके, उनका बिखरी अवस्था मे रहना प्रक्रिया धीमी कर देता है। जैविक प्रक्रियाओं के लिये आवश्यक होता है कि एक ऐसी सीमा हो जो बाह्य परिस्थितियों से अप्रभावित रहे और उसमे किसी मिलावट की संभावना नगण्य हो। एक ऐसी सीमा जो मुख्य जैविक घटको को बांधे रख सके जो जैविक प्रक्रियाओं के घटित होने मे सहायक हो। दूसरी ओर यह सीमा अर्ध-पारगम्य हो जो पोषक तत्वों को अंदर आने दे तथा अपशिष्ट पदार्थ को बाहर जाने दे। गैसीय पदार्थों से ऐसी सीमा नही बनाई जा सकती है लेकिन यह सीमा द्रव या ठोस पदार्थो मे बनाई जा सकती है।

द्रव पदार्थ मे रासायनिक प्रक्रियायें तेजी से घटित होती है।  द्रव जैविक विलायक के लिये ठोस या गैस अवस्था से बेहतर होने के लिये एक महत्वपूर्ण कारक यह है कि द्रव माध्यम मे गैस या ठोस अवस्था की तुलना मे रासायनिक प्रक्रियायें तेजी से घटित होती है। ठोस अवस्था मे प्रक्रिया करने वाले घटको की सीमीत गति से रासायनिक प्रक्रिया धीमी होती है, जबकि गैस अवस्था मे प्रक्रिया करने वाले घटको के घनत्व के कम होने से प्रक्रियायें धीमी हो जाती है। द्रव माध्यम मे इन दोनो अवस्थाओं मे एक संतुलन होने से प्रक्रिया तेज होती है। इसके अतिरिक्त द्रव विलायको मे अधिकतर लवण और यौगिको के घुलने के बाद वे आयन बनाते है जोकि तेज गति से रासायनिक प्रक्रिया करते है जोकि उनके साधारण आण्विक रूप से तेज होती है।

इन सभी तथ्यो को ध्यान मे रखते हुते वैज्ञानिक मानते है कि जैव रसायन के लिये द्रव माध्यम ही उचित है और यह विचित्र जीवन के लिये भी लागु होता है। ठोस और गैस जैवरासायनिक प्रक्रियाओं के लिये अक्षम उम्मीदवार है।

आदर्श जैव विलायक के गुणधर्म

ठोस और गैस विलायको को गंभीर उम्मीदवार के रूप मे खारिज करने के बाद भी हमारे पास ढेर सारे द्रव उम्मीदवार बचे हुये है। हमे द्रव विलायको पर चर्चा करते हुये यह भी ध्यान रखना है कि हम केवल ऐसे द्रवों की चर्चा ना करें जो कि पृथ्वी के तापमान और परिस्थितियों मे ही द्रव हो। अन्य ग्रह और उनके चंद्रमाओं का तापमान और वातावरन पृथ्वी से भिन्न है जिससे वैकल्पिक द्रव विलायक उपलब्ध हो सकते है। उदाहरण के लिये मिथेन(CH4) जो पृथ्वी मे गैस के रूप मे पायी जाती है अत्यधिक शीतल परिस्थिति मे द्रव होती है जैसे शनि के चंद्रमा टाईटन पर द्रव मिथेन की झीले है।

हमारे पास ढेर सारे संभावित जैव विलायकों के उम्मीदवार है, इनमे से अक्षम उम्मीदवार को अलग करने के लिये हम आदर्श जैव विलायक के गुणधर्मो की चर्चा करते है।

प्राकृतिक रूप से उपलब्धता : रसायनशास्त्री प्रयोगशाला मे बहुत से प्रकार के विलायक बना सकते है लेकिन प्राकृतिक रूप से जीवन के निर्माण के लिये इन विलायको का प्राकृतिक रूप से निर्मित होकर उपलब्ध होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त विलायक की मात्रा भी समुचित मात्रा मे होना चाहिये|

आदर्श विलायक: एक प्रभावी विलायक का सबसे बड़ा गुण है कि वह बहुत सारे विभिन्न पदार्थो का विलयन बना सके जिसमे कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थो का समावेश है। साथ मे इन विलायक मे विलेय पदार्थ की मात्रा भी समुचित हो। एक महत्वपूर्ण गुण बृहद अणुओं को घोल सकने की क्षमता भी है, यह महत्वपूर्ण इसलिये है कि पृथ्वी के वातावरण मे जीवन का आधार अणुओं मे से एक एक प्रोटीन के अणु मे हजारो परमाणु होते है।

एक बृहद तापमान सीमा मे द्रव अवस्था: यह  गुणधर्म विलायक के द्रव अवस्था मे रहने के लिये न्यूनतम और अधिकतम तापमान को दर्शाता है। यह तापांतर उस विलायक के द्रवीकरण बिंदु तथा बाष्पीकरण बिंदु के मध्य होता है। यह तापांतर जितना अधिक होगा वह उसपर आधारित जीवन के लिये मौसमी तापमान परिवर्तन से जैव विलायक को जमने या उबलने से होने वाले खतरों को कम करेगा। विलायक का जमना या उबलना उसपर आधारित जीवन के लिये घातक हो सकता है। द्रव अवस्था के लिये तापांतर को ध्यान मे रखते हुये यह भी देखना है कि अशुद्धियों की  उपस्तिथि भी द्रवीकरण बिंदु को कम कर सकती है और इस तापांतर को बढ़ा सकती है। इसका एक उदाहरण कार के रेडियेटर मे जल को शीतकाल मे जमने से बचाने के लिये कुछ रासायनो की सहायता से उसके द्रवीकरण बिंदु को कम करना है। दूसरा कारक बाह्य दबाव है, दबाव के बढ़ने पर बाष्पीकरण बिंदु बढ़ता है। गहरे समुद्र मे उष्मीय जलधारा के पास अत्याधिक तापमान पर जल का उत्सर्जन होता है लेकिन दबाव के कारण वह द्रव रूप मे ही रहता है क्योंकि सागर तलहटी मे वायुमंडलीय दबाव अत्याधिक होता है।

 प्रावरण(encapsulation)निर्मित करने की क्षमता: द्रव मे सीमा निर्माण करने एक साधारण प्रक्रिया जलावरोधी प्रभाव(hydrophobic effect) कहलाती है। इसका अर्थ है कि तैलीय द्रव(हायड्रोकार्बन तथा अध्रुविय(non-polar)अणु ) किसी ध्रुविय(polar) विलायक जैसे जल या अमोनिया मे एक दूसरे से पृथक ही रहेंगे। कुछ विशेष तरह मे वसा अणु(Fat Molecule) जिन्हे लिपिड(lipid) कहा जाता है जल मे अपने आप ही एक कोशीका मेम्ब्रेन बना लेते है जोकि किसी भी कोशिका की बाह्य सीमा के रूप मे कार्य करती है। इस तरह की संरचना किसी कोशीका के अंदर भी कक्षो निर्माण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विशाल पारद्युतिक स्थिरांक(Large dielectric constant): किसी द्रव का पारद्युतिक स्थिरांक उसमे आयन निर्माण की क्षमता का निर्धारण करता है। एक विशाल पारद्युतिक स्थिरांक कई कारणो से महत्वपूर्ण है। प्रथम, यह लवणो के विलेय होने मे मदद करता है(वे अपने घटक आयन मे अलग हो जाते है। द्वितिय, यह बड़ी मात्रा मे आयनो की उपस्तिथि सुनिश्चित करता है, उदाहरण के लिये सोडियम(Na+) तथा पोटेशियम (K+) आयन तंत्रिका संदेश वहन(nerve message conduction) मे महत्वपूर्ण होते है। तृतिय, इससे प्रभावी अम्ल-क्षार(acid-base) आधारित रासायनिक प्रक्रिया होती है जिनमे H+ तथा OH- के जैसे आयनो की भूमिका होती है। चतुर्थ, विशाल पारद्युतिक स्थिरांक वाले विद्युत रूप से आवेशित केंद्रक वाले बृहद अणु को भी विलेय कर लेते है। सामान्य रूप से अणु के आकार के बढ़ने के साथ उनकी विलायकता कम होती जाती है लेकिन विशाल पारद्युतिक स्थिरांक इस समस्या को हल करता है।

उत्तम उष्मीय नियंत्रक(Good thermal moderator): सभी जीवो को अपने वातावरण मे तापमान मे परिवर्तन तथा उनकी अपनी आंतरिक जैवरसायन प्रक्रिया से उत्पन्न उष्मा के साथ तालमेल करना होता है।  किसी भी विलायक का उष्मीय गुणधर्म ऐसा होना चाहिये कि वे इन उष्मीय परिवर्तनो से जीवन को संरक्षित रखे और जीवन को हिमित(Freez) होने से या अधिक उष्ण होने से बचाकर रखे। इस लेख मे हम ऐसे तीन गुणधर्मो पर चर्चा करेंगे। सबसे पहले उष्मा धारिता(Heat Capacity), किसी पदार्थ के द्रव्यमान का ताप एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की ऊष्मा धारिता (Heat capacity) कहते हैं। इस भौतिक राशि का एस आई मात्रक जूल प्रति केल्विन (J/K) है। किसी विलायक की अधिक उष्मा धारिता से उष्णता मे कमी या बढोतरी से विलायक के तापमान मे अधिक परिवर्तन नही होंगे। दूसरा महत्वपूर्ण कारक है द्रवण की गुप्त उष्मा(heat of fusion), यह ऊर्जा की वह मात्रा है जो द्रव के इकाई मात्रा को ठोस में बदलने के लिये द्रव से निकालनी होती है। अधिक द्रवण की गुप्त उष्मा होने से द्रव से कुछ मात्रा मे ही उष्मा मुक्त होने पर वह ठोस नही होगा। तीसरा कारक है वाष्पन की गुप्त ऊष्मा(heat of vaporization), यह ऊर्जा की वह मात्रा है जो द्रव के इकाई मात्रा को गैस में बदलने के लिये आवश्यक होती है। अधिक बाष्पन की गुप्त उष्मा होने पर द्रव का बाष्पन कम उष्मा देने पर नही होगा और यह गुणधर्म जीवन को अपने आप को शीतल होने मे मदद करता है। ये तीनो गुण मिलकर किसी अच्छे विलायक द्वारा तापमान मे परिवर्तन से समायोजन को परिभाषित करते है।

श्यानता

श्यानता

न्यून श्यानता : श्यानता (Viscosity): किसी तरल का वह गुण है जिसके कारण वह किसी बाहरी प्रतिबल (स्ट्रेस) या अपरूपक प्रतिबल (शीयर स्ट्रेस) के कारण अपने को विकृत (deform) करने का विरोध करता है। सामान्य शब्दों में, यह उस तरल के गाढे़पन या उसके बहने का प्रतिरोध करने की क्षमता का परिचायक है। उदाहरण के लिये, पानी पतला होता है एवं उसकी श्यानता वनस्पति तेल की अपेक्षा कम होती है जो कि गाढा़ होता है।

जैव विलायक के लिये न्यून श्यानता आवश्यक है जो उसे प्रवाहित होने मे अधिक स्वतंत्रता देगा और जैव अणु आपस मे प्रभावशाली तरिके से प्रतिक्रिया कर पायेंगे। उदाहरण के लिये कोशीका के एन्जाइम आवश्यक होने पर आसानी से अपने लक्ष्य तक पहुंच पायेंगे।

पृष्ठ तनाव

पृष्ठ तनाव

पृष्ठ तनाव : अधिक पृष्ठ तनाव अधिशोषण प्रक्रिया के लिये अत्यावश्यक है, यह वह प्रक्रिया है जिसमे कुछ विशिष्ट घुले हुये पदार्थ विलायक मे स्वतंत्र रूप से विचरण करने की बजाय सतह पर चिपके रहते है। यह उन पदार्थो के साथ होता है जो अपने विलायक के पृष्ठ तनाव को कम कर देते है जिससे वह वे अपने विलायक के मध्य पर रहने की बजाय सतह पर अधिक ऊर्जा के साथ उपस्थित रहते है। अधिकतर प्रोटीन तथा उससे मिलते जुलते अणु इस तरह की पृष्ठ तनाव कम करने का गुणधर्म रखते है, जिससे वे कोशीका की दिवारो(membrane) पर जमा होते है। यह प्रक्रिया कोशीका की दिवारो को को विशिष्ट आकार देने के लिये आवश्यक है। अधिक पृष्ठ तनाव एक विशिष्ट जैव प्रक्रिया केशिका क्रिया (Capillary action) के लिये आवश्यक है। इस प्रक्रिया का अर्थ है कि द्रव बहुत ही संकरे स्थान से बिना किसी बाह्यबल के पार हो जायेगा। पृथ्वी पर केशिका क्रिया से जमीन अपने आप मे नमी बरकरार रखती है और पेड पौधो मे केशिका क्रिया जड़ो से पत्तो तक जैव द्रव्य के संचार मे मदद करता है।

इन आठ गुणधर्मो मे पहले तीन गुण जीवन के लिये अत्यावश्यक है, शेष पांच कम महत्वपूर्ण है।

अगले लेख मे जल की विशेषता और कमीयों पर चर्चा करेंगे

लेख शृंखला

परग्रही जीवन भाग 1 : क्या जीवन के लिये कार्बन और जल आवश्यक है ?

परग्रही जीवन भाग 4 :बोरान आधारित जीवन

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2 विचार “परग्रही जीवन भाग 5 : जीवन अमृत – जल एक महान विलायक&rdquo पर;

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