मेघनाद साहा : भारतीय खगोलविज्ञानी


मेघनाद साहा सुप्रसिद्ध भारतीय खगोलविज्ञानी (एस्ट्रोफिजिसिस्ट्) थे। वे साहा समीकरण के प्रतिपादन के लिये प्रसिद्ध हैं। यह समीकरण तारों में भौतिक एवं रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है। उनकी अध्यक्षता में गठित विद्वानों की एक समिति ने भारत के राष्ट्रीय शक पंचांग का भी संशोधन किया, जो 22 मार्च 1957 (1 चैत्र 1879 शक) से लागू किया गया। इन्होंने साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान तथा इण्डियन एसोसियेशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साईन्स नामक दो महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की।

जीवन परिचय

dr-meghnad-sahaमेघनाद साहा (अंग्रेज़ी: Meghnad Saha; जन्म- 6 अक्टूबर, 1893, पूर्वी बंगाल; मृत्यु- 16 फ़रवरी, 1956) गणित व भौतिकी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले भारतीय वैज्ञानिक थे। इनके अथक प्रयासों से ही ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फ़िजिक्स’ की स्थापना हुई थी। डॉ. मेघनाद साहा ने तारों के ताप और वर्णक्रम के निकट संबंध के भौतकीय कारणों को खोज निकाला था। अपनी इस खोज के कारण 26 वर्ष की उम्र में ही इन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो चुकी थी। इन्हें 34 वर्ष की उम्र में लंदन की ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ का फ़ैलो चुना गया था। मेघनाद साहा संसद के भी सदस्य थे। उनके प्रयत्न से भारत में भौतिक विज्ञान को बड़ा प्रोत्साहन मिला था।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा को जन्म 6 अक्टूबर, 1893 ई. को पूर्वी बंगाल के ढाका ज़िले के सिओराताली नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता जगन्नाथ साहा साधारण व्यापारी थे। मेघनाद साहा की शिक्षा पहले कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई थी। इन्हें विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में पूर्वी बंगाल भर के छात्रों में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। बी.एस.सी. और एम.एस.सी. में भी वे सर्वोच्च रहे थे।

शिक्षा पूरी होते ही मेघनाद साहा को ‘कोलकाता विश्वविद्यालय’ के विज्ञान विभाग में नियुक्ति मिल गई। वहीं पर उन्होंने उच्च अनुसंधान कार्य किया और डी.एस.सी. की उपाधि प्राप्त की। तारा भौतिकी पर एक निबन्ध लिखकर इन्होंने एक प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त किया।

सन् 1916 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति आशुतोष मुखर्जी से दो प्रतिभाशाली युवाओं ने नए शुरू हुए विज्ञान महाविद्यालय में भौतिकशास्त्र में एमएससी की पढ़ाई शुरू करने का आग्रह किया। मुखर्जी इसके लिए राजी हो गए और उन्होंने उन दोनों युवाओं को उस विषय का शिक्षक नियुक्त कर दिया। इन दोनों यानी मेघनाद साहा एवं सत्येंद्रनाथ बोस ने पढ़ाने की चुनौती को स्वीकार किया और उसी वक्त उन्होंने शोध कार्य भी शुरू किया।

सन् 1917 से उनके शोध लेख प्रतिष्ठित विदेशी पत्रिका ‘फिलासोफिकल’ में छपने लगे। सन् 1918 में उनकी ‘थीसिस ऑफ रेडियेशन, प्रेशर एंड इलेक्ट्रोमैगनेटिक थ्योरी’ के लिए साहा को कलकत्ता विश्वविद्यालय ने डी.एससी. की उपाधि दी। इसी वर्ष साहा और बोस ने सापेक्षतावाद पर अल्बर्ट आईंस्टीन और हरमन मिंकोवस्की के जर्मन भाषा में लिए गए कुछ दस्तावेजों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया, जिन्हें बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने प्रकाशित किया। इसी बीच देबेंद्र मोहन बोस ने उन्हें कुछ विदेशी शोध पत्र दिए। इनमें से स्टैलर स्पैक्ट्रा से जुड़े शोधपत्रों ने साहा का ध्यान अपनी ओर खींचा। वे सौर वर्णक्रम( सोलर स्पैक्ट्रम) के वितरण और पैटर्न की तीव्रता के विषय पर विचार करने लगे। इस पर चार शोधपत्रों की एक कड़ी ‘फिलासोफिकल’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।

चौथा शोध पत्र प्रो अल्फ्रेड फावलर के सुझाव पर ‘ऑन ए फिजिकल थ्योरी ऑफ स्टैलर स्पैक्ट्रा ‘ शीर्षक से संशोधित रूप में प्रकाशित हुआ। अपने शोधपत्र ‘आयोनाइजेशन इन द सोलर क्रोमोसेफियर’ में उन्होंने आयनीकरण का सटीक सूत्र प्रस्तावित किया जिसे उनके नाम ‘साहा आयोनाइजेशन फार्मूला’ से जाना जाता है। चौथे शोधपत्र में साहा ने तापमान और दबाव को पर्याप्त महत्व देते हुए अपना आयोनाइजेशन या आयनीकरण का फार्मूला लागू किया। रॉयल सोसाइटी की बैठक में प्रोफेसर फावलर ने उनके इस कार्य की जमकर तारीफ की और इसे खगोल भौतिकी (एस्ट्रोफीजिक्स) के क्षेत्र में महानतम योगदान बताया।

सन् 1859 में किरचफ की खोज ‘डिस्कवरी ऑफ स्पैक्ट्रम एनालसिस’ के बाद इसे सबसे महत्वपूर्ण शोध माना गया था। भौतिकशास्त्र से जुड़े अन्य विषयों जैसे ब्रह्माण्ड विकिरण भौतिकी(Cosmic Ray Physics) एवं नाभिकिय भौतिकी(Nuclear Physics) पर भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया। सन् 1927 में उन्हें ‘फैलो ऑफ रॉयल सोसायटी’ चुना गया, हालांकि तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया इंटेलिजेंस विभाग के अड़ंगे की वजह से इसमें देरी हुई। कॉम्टन द्वारा नोबल पुरस्कार के लिए उनके नाम की अनुशंसा के बावजूद उन पर विचार नहीं किया गया।

कारनेगी ट्रस्ट की एक फैलोशिप पर उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका की यात्रा की। इसी दौरान उन्होंने विकास में नाभिकिय भौतिकी के महत्व को जाना। नाभिकिय भौतिकी पर आयोजित कोपेनहेगन कांफ्रेंस में उनकी मुलाकात कुछ वैज्ञानिकों से हुई और उनसे चर्चा के बाद उन्होंने परमाणु शक्ति के रूप भारत का सपना देखा। अपने इस स्वप्न को साकार करने के लिए उन्होंने ‘इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स में 38” साइक्लोट्रन की स्थापना की। 11 जनवरी, 1950 को मैडम क्यूरी जोलिअट ने इसका उद्घाटन किया।

उच्च पदों की प्राप्ति

मेघनाद साहा के सम्मान में जारी डाक टिकट

मेघनाद साहा के सम्मान में जारी डाक टिकट

ज्ञानवर्धन और खोज कार्य को अग्रसर करने के उद्देश्य से वर्ष 1921 ई. में डॉ. साहा इंग्लैण्ड चले गए और वहाँ से फिर बर्लिन में प्रमुख भौतिक वैज्ञानिकों के साथ अनेक शोध कार्य किए। भारत लौटने पर इनकी नियुक्ति ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय’ में भौतिकी विभाग के प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष पद पर हो गई। वर्ष 1923 से 1938 तक ये इस पद पर बने रहे। इसके उपरान्त पुन: ‘कोलकाता विश्वविद्यालय’ में विज्ञान के पालित प्रोफ़ेसर के पद पर चले गए। वर्ष 1955 में इनकी नियुक्ति कोलकाता के ‘इंडियन एसोसियेशन फ़ॉर दी कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस’ के निदेशक पद हो गई। 1956 में इन्होंने कोलकाता में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फ़िजिक्स’ की स्थापना की और उसके निदेशक बने।

प्रो. साहा हमेशा देश के विकास के लिए सोचा करते थे। दामोदर नदी घाटी परियोजना उनकी इसी दूरदर्शी सोच का नतीजा था जिससे बाढ़ राहत और सिंचाई के रूप में इन इलाकों की जनता को इसका लाभ मिला। देश में बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास, वैज्ञानिकों के लिए अनुकूल माहौल बनाने और भारत की अर्थव्यवस्था का चेहरा बदलने के लिए उन्होंने राज्यसभा में जाना स्वीकार किया।

1953 में वे ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ के निदेशक बने। यहां उन्होंने बहुत-सी शोध सुविधाओं की शुरुआत कर इसके निर्माता डॉ़ महेंद्रलाल सरकार के सपने को साकार किया।

 

खोज

डॉ. मेघनाद साहा ने तारों के ताप और वर्णक्रम के निकट संबंध के भौतकीय कारणों को खोज निकाला था। अपनी इस खोज के कारण 26 वर्ष की उम्र में ही इन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो चुकी थी। इसी सिद्धांत को तारों के वर्णक्रम पर लगाकर इन्होंने आण्विक वर्णक्रम संबंधी अनेक गुत्थियों को सुलझाया। इनके अनुसंधान से सूर्य तथा उसके चारों ओर अंतरिक्ष में दिखाई पड़ने वाली प्राकृतिक घटनाओं के मुख्य कारण ज्ञात हो सके।

अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

मेघनाद साहा संसद के भी सदस्य थे। उन्हें अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए थे। 34 वर्ष की उम्र में ही वे लंदन की ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ के फ़ैलो चुने गए। 1934 में उन्होंने ‘भारतीय विज्ञान कांग्रेस’ की अध्यक्षता की। भारत सरकार ने कलैण्डर सुधार के लिए जो समिति गठित की थी, उसके अध्यक्ष भी मेघनाद साहा ही थे। डॉ. साहा ने पाँच महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की भी रचना की थी।

उनकी (साहा की) खोजें हलचल मचा देने वाली थीं। वे शुरू से ही नवीन खोजों में रुचि रखने वाले व्यक्ति थे। उनके दिये सिद्धांत विज्ञान की दुनिया में उपयोग किए जाते रहेंगे।
—जे.जे. थॉमसन, प्रसिद्ध पाश्चात्य वैज्ञानिक

982 में नोबल पुरस्कार विजेता खगोलशास्त्री एस़ चंद्रशेखर ने लिखा था,

”खगोलशास्त्र और भारत के आधुनिक विज्ञान में मेघनाद साहा का योगदान अद्वितीय है।”

एस़ रोसलेंड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थ्योरेटिकल एस्ट्रोफिजिक्स’ में लिखा है,

”खगोल भौतिकी को जो प्रोत्साहन साहा के काम से मिला है उसका अंदाजा शायद ही लगाया जा सकता है, क्योंकि इस क्षेत्र में जो प्रगति हुई वह उन्हीं से प्रेरित है और उसके बाद किए गए कामों में साहा के ही विचारों के अंश मिलते हैं।’

उच्च अंतरिक्ष में आयनीकरण के अध्ययन के लिए उन्होंने अंतरिक्ष में एक प्रयोगशाला की परिकल्पना की। हॉर्वर्ड कॉलेज के वेधशाला बुलेटिन में उन्होंने सूर्य के पराबैंगनी स्पेक्ट्रम की फोटोग्राफी करने का सुझाव दिया था। जर्मनी के वी 2 रॉकेट की मदद से यह प्रयोग संभव हो पाया और उसने साहा की भविष्यवाणी को सही साबित भी किया। आजकल ऐसी प्रयोगशालाएं और वेधशालाएं अंतरिक्ष में संभव हैं।

स्वतंत्रता संग्राम मे योगदान

उन्होंने देश की स्वतंत्रता संग्राम में भी योगदान दिया था। अंग्रेज सरकार ने वर्ष 1905 में बंगाल के आंदोलन को तोड़ने के लिए जब इस राज्य का विभाजन कर दिया तो समूचे मेघनाद भी इससे अछूते नहीं रहे। उस समय पूर्वी बंगाल के गर्वनर सर बामफिल्डे फुल्लर थे। अशांति के इस दौर में जब फुल्लर मेघनाद के ढाका कालिजियट स्कूल में मुआयने के लिए आए तो मेघनाद ने अपने साथियों के साथ फुल्लर का बहिष्कार किया। नतीजतन मेघनाद को स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ते हुए ही मेघनाद क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। उस समय आजादी के दीवाने नौजवानों के लिए अनुशीलन समिति से जुड़ना देश सेवा का पहला पाठ माना जाता था। मेघनाद भी इस समिति से जुड़ गए। बाद में मेघनाद का संपर्क नेताजी सुभाष चंद्र बोस और देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से भी रहा।

भारतीय सौर कैलेंडर

आजादी के बाद महान वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा (Meghnad Saha), जिनके ज्ञान की विविधता भी अद्भूत थी, के देखरेख में एक नए संशोधित राष्ट्रिय पंचांग का निर्माण किया गया।

भारतीय राष्ट्रीय पंचांग या ‘भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर’ भारत में उपयोग में आने वाला सरकारी सिविल कैलेंडर है। यह शक संवत पर आधारित है और ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ-साथ 22 मार्च 1957 से अपनाया गया। भारत मे यह भारत का राजपत्र, आकाशवाणी द्वारा प्रसारित समाचार और भारत सरकार द्वारा जारी संचार विज्ञप्तियों मे ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ प्रयोग किया जाता है।

चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह होता है। राष्‍ट्रीय कैलेंडर की तिथियाँ ग्रेगोरियम कैलेंडर की तिथियों से स्‍थायी रूप से मिलती-जुलती हैं। सामान्‍यत: 1 चैत्र 22 मार्च को होता है और लीप वर्ष में 21 मार्च को।

अधिवर्ष में, चैत्र मे 31 दिन होते हैं और इसकी शुरुआत 21 मार्च को होती है। वर्ष की पहली छमाही के सभी महीने 31 दिन के होते है, जिसका कारण इस समय कांतिवृत्त में सूरज की धीमी गति है। महीनों के नाम पुराने, हिंदू चन्द्र-सौर पंचांग से लिए गये हैं इसलिए वर्तनी भिन्न रूपों में मौजूद है और कौन सी तिथि किस कैलेंडर से संबंधित है इसके बारे मे भ्रम बना रहता है। शक् युग, का पहला वर्ष सामान्य युग के 78 वें वर्ष से शुरु होता है, अधिवर्ष निर्धारित करने के शक् वर्ष मे 78 जोड़ दें- यदि ग्रेगोरियन कैलेंडर मे परिणाम एक अधिवर्ष है, तो शक् वर्ष भी एक अधिवर्ष ही होगा।

इस कैलेंडर को कैलेंडर सुधार समिति द्वारा 1957 में, भारतीय पंचांग और समुद्री पंचांग के भाग के रूप मे प्रस्तुत किया गया। इसमें अन्य खगोलीय आँकड़ों के साथ काल और सूत्र भी थे जिनके आधार पर हिंदू धार्मिक पंचांग तैयार किया जा सकता था, यह सारी कवायद इसको एक समरसता प्रदान करने की थी। इस प्रयास के बावजूद, पुराने स्रोतों पर आधारित स्थानीय रूपान्तर जैसे सूर्य सिद्धांत अभी भी मौजूद हैं।

प्रो. साहा को विज्ञान में उनके योगदान के लिए सदैव याद रखा जाएगा, लेकिन उससे ज्यादा उन्हें आधुनिक भारत के लिए अनेक विज्ञान संस्थानों की स्थापना हेतु याद रखा जाएगा। सन् 1938 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष थे, उन्होंने प्रो़ साहा को अपने राष्ट्रीय योजना आयोग में शामिल किया। सन् 1931 में उन्होंने इलाहाबाद में ‘यूपी अकादमी ऑफ साइसेंस’ की स्थापना की जिसे अब राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के नाम से जाना जाता है। सन् 1933 में कलकत्ता में उन्होंने ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस’ की स्थापना की, जिसे बाद में राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का दर्जा दिया गया। इसी वर्ष उन्होंने ‘इंडियन साइंस न्यूज एसोसिएशन’ की शुरुआत की और उसके जर्नल ‘साइंस एंड कल्चर’ के संपादक बने। सन् 1940 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के एमएससी के पाठ्यक्रम में उन्होंने नाभिकिय भौतिकी को शामिल किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने प्रो. साहा के कहने पर डॉ़ होमी जहांगीर भाभा को नाभिकिय भौतिकी का प्रश्नपत्र बनाने का जिम्मा दिया गया, साथ ही उन्हें ही परीक्षक की भूमिका भी सौंपी गई। बाद में यही डॉ़ भाभा ‘परमाणु भारत’ के निर्माता बने।

एक नजर में मेघनाद साहा का इतिहास

  • मेघनाद साहा का जन्म जगन्नाथ साहा और उनकी पत्नी भुबनेश्वरी देवी की पाचवी संतान के रूप में हुआ। उनके पिता एक छोटी दुकान चलाते थे और उनका परीवार गरीब था। परीवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनके माता-पिता अपने बच्चों को पढाना नही चाहते थे।
  • मेघनाद ने कम उम्र में ही शिक्षा में अपनी रूचि दिखाई थी। इसी वजह से आरंभिक शिक्षा पूरी होने के बाद उनके माता-पिता चाहते थे की मेघनाद वही अपनी पढाई छोड़कर अपने पिता की दुकान चलाने में सहायता करे।
  • तभी मेघनाद की भेट एक नेक आदमी अनंता कुमार से हुई जो एक स्थानिक डॉक्टर थे। उन्होंने आसान काम के बदले मेघनाद को पढाने की ठानी। और माध्यमिक शिक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद वे 1905 में ढाका गये, जहा कॉलेजिएट स्कूल में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की।
  • 1911 में उन्होंने इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की और कोलकाता के प्रेसीडेंसी महाविद्यालय में शामिल हो गये। वहा एक सहपाठी की तरह उनकी मुलाकात सत्येन्द्रनाथ बोस से हुई। बोस एक विशिष्ट भौतिकशास्त्री बनना चाहते थे।
  • महाविद्यालय में उन्हें प्रफुल्ल चंद्र रॉय और जगदीश चंद्र बोस ने पढाया था। 1913 में उन्होंने गणित में BSc और 1915 में गणित में MSc की परीक्षा उत्तीर्ण की।

मेघनाद साहा के प्रमुख कार्य

  • मेघनाद साहा का सबसे बडा योगदान खगोलविज्ञान के क्षेत्र में रहा है। उनका साहा समीकरण विश्व प्रसिद्ध है। यह समीकरण तारो में भौतिक और रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है।
  • मेघनाद साहा का योगदान केवल खगोलशास्त्र तक ही सीमित न होकर उन्होंने  स्वतंत्रता अभियान में भी भाग लिया था। वे भारत को दुनिया की नजरो में सम्माननिय पहचान दिलवाना चाहते थे। उनके अतुल्य योगदान को लोग हमेशा याद रखेंगे।

निधन

प्रगतिशील विचारों के धनी मेघनाद साहा के प्रयत्नों से ही भारत में भौतिक विज्ञान को बड़ा प्रोत्साहन मिला था। प्रतिभा के धनी मेघनाद साहा का 16 फ़रवरी, 1956 ई. को देहान्त हो गया।

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