2022 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : स्वान्ते पाबो


वर्ष 2022 के चिकित्सा नोबेल पुरस्कारों का ऐलान सोमवार 3 अक्टूबर 2022 को किया गया है। इस बार यह पुरस्कार स्वीडन के वैज्ञानिक स्वान्ते पाबो को मिला है।

यह पुरस्कार उन्हे विलुप्त मानवनुमा(आदिमानव ) प्रजातियों के जीनोम तथा मानव प्रजाति के विकास पर खोज के लिए दिया गया है।

मानव जाती हमेशा अपने उद्गम के बारे में जानने के लिए उत्सुक रही है। हम कहाँ से आये है, हम अपने पहले आयी हुई आदिमानव प्रजातियों से किस तरह से संबधित है ? ऐसा क्या है जो हमने होमो सेपियंस बनाता है और अन्य आदिमानव प्रजातियों से अलग करता है ?

अपनी इस क्रांतिकारी शोध के दौरान स्वान्ते पाबो ने कुछ ऐसा कर दिखाया जिसे असंभव समझा जा रहा था। उन्होंने निएंडरथल के जीनोम की संरचना का मापन किया जोकि होमो सेपियंस के विलुप्त पूर्वज या सम्बन्धी है। उन्होंने एक ऐसी आदिमानव प्रजाति भी खोज निकाली जिसे देनिसोवा कहते है। सबसे महत्वपूर्ण है कि पाबो ने पाया कि आज से 70,000 वर्ष पहले होमो सेपियंस ने अफ्रिका से बाहर की यात्रा आरम्भ की। मानव जींस के वर्तमान मानव तक के प्रवाह का अध्ययन वर्तमान चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, इससे हम जान सकते है कि किस तरह से हम बाह्य संक्रमणों से लड़ने के लिए अपनी प्रतिरोध क्षमता को मजबूत कर सकते है।

पाबो की महत्वपूर्ण खोज ने विज्ञान की एक नई शाखा को जन्म दिया है जिसे पेलियोजिनोमिक्स (paleogenomics) कहते है। लुफ्त आदिमानवों के जीनोम और जीवित मानव प्रजाति के जीनोम के मध्य अंतर का अध्ययन कर हम जान सकते है कि ऐसा क्या है जो हमें “होमो सेपियंस” बनाता है?

हम कहाँ से आये है ?

हमारी उत्पत्ति, स्रोत या उद्गम तथा मानव प्रजाति की विशिष्टता ने मानव को अर्वाचीन काल से अचंभित कर रखा है। जीवाश्मविज्ञान (Paleontology) तथा पुरातत्व शास्त्र मानव प्रजाति के विकास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। शोध ने यह प्रमाणित कर दिया है आधुनिक मानव होमो सेपियंस का आगमन आज से 300,000 वर्ष पहले अफ्रिका में हुआ थ। जबकि हमांरे सबसे निकट के संबधी निएंडरथल का निवास यूरोप और पश्चिम एशिया में 400,000 वर्ष पहले रहा था, जोकि अब से 30,000 वर्ष पहले जो गए थे। अब से 70,000 वर्ष पहले तक होमो सेपियंस के समूह अफ्रिका से निकल कर मध्य पूर्व आये और उसके पश्चात समस्त विश्व में फ़ैल गए। होमो सेपियंस और निएंडरथल एक लम्बे समय तक यूरेशिया में एक साथ रहे , यह समय दसियों हजार वर्ष का है। लेकिन हम अपने लुफ्त निकट संबधी निएंडरथल से हमारे रिश्ते के बारे में क्या जानते है ? इसका उत्तर इन प्रजातियों की जिनेटिक सूचनाओं से मिलेगा। 1990 के दशक के अंत तक हमने मानव के जीनोम का मानचित्र बनाया जा चुका था, ये एक उपलब्धि थ। इस उपलब्धि ने विभिन्न मानव समूहों में मध्य जिनेटिक समानता या असमानता के अध्ययन के लिए रास्ता बनाया। लेकिन मानव और उसके सबसे निकट सम्बन्धी निएंडरथल के मध्य जिनेटिक सम्बन्ध को समझने के लिए निएंडरथल के जीनोम का मापन आवश्यक था।

स्वान्ते पाबो

स्वान्ते पाबो का जन्म 20 अप्रैल 1955 को हुआ। पाबो का जन्म स्टॉकहोम में हुआ था और वह अपनी मां, एस्टोनियाई रसायनज्ञ कैरिन पाबो के साथ पले बड़े। वह एक स्वीडिश आनुवंशिक विज्ञानी (Geneticist specialist) हैं जो विकासवादी आनुवंशिकी के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं। पेलियोजेनेटिक्स के संस्थापकों में से एक के रूप में, उन्होंने निएंडरथल जीनोम पर बड़े पैमाने पर काम किया है।

उन्हें 1997 में जर्मनी के लीपज़िग में “मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी” में जेनेटिक्स विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया था। वह “ओकिनावा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, जापान” में भी प्रोफेसर हैं।

उनके पिता बायोकेमिस्ट सुने बर्गस्ट्रॉम थे जिन्होंने 1982 में बेंग्ट आई सैमुएलसन और जॉन आर वेन के साथ चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार साझा किया था। उन्होंने 1986 में उप्साला विश्वविद्यालय से शोध के लिए पीएचडी की उपाधि प्राप्त की, जिसमें यह जांच की गई कि एडेनोवायरस का E19 प्रोटीन प्रतिरक्षा प्रणाली को कैसे नियंत्रित करता है।

स्वान्ते पाबो को पैलियोजेनेटिक्स के संस्थापकों में से एक के रूप में जाना जाता है, विज्ञान की एक नई शाखा जिसमें आदिमानवों और अन्य प्राचीन प्रजातियों के अध्ययन करने के लिए जेनेटिक्स के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है।

1992 में, उन्हें “गॉटफ्रेड विल्हेम लाइबनिज पुरस्कार” मिला, जो जर्मन शोध में दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। पाबो को 2000 में “रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज” का सदस्य चुना गया था। 2005 में, उन्हें चिकित्सा के लिए प्रतिष्ठित “लुइस-जीनटेट” पुरस्कार मिला। 2008 में पाबो को “ऑर्डर पोर ले मेरिट फॉर साइंसेज एंड आर्ट्स” के सदस्यों में जोड़ा गया था।

एक असंभव कार्य को संभव बनाया ।

अपने करीयर की शुरुवात में स्वान्ते पाबो आधुनिक तकनीक की सहायता से निएंडरथल के DNA के अध्ययन की संभावना से रोमांचित थे। लेकिन शीघ्र ही उन्हें इस यात्रा में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा क्योंकि समय के साथ डीएनए रासायनिक रूप से परवर्तित होता है और छोटे टुकड़ो में विभाजित होता है। हजारो वर्ष के बाद डीएनए के बहुत ही सूक्ष्म अंश बचते है, और जो बचता भी है उसमे बैक्टीरिआ और मानव का डीएनए भी मिश्रित होता है।

जैव विकाश शास्त्र के पुरोधा एलन विल्सन (Allan Wilson) के शोध छात्र के रूप में पाबो ने निएंडरथल के डीएनए के अध्ययन की विधियों पर कार्य आरम्भ किया, जोकि कई दशकों तक चलता रहा।

1990 में पाबो ने म्यूनिख विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य आरम्भ किया। यहाँ भी उन्होंने अपना कार्य जारी रखा। अब उन्होंने निएंडरथल माइटोकॉन्ड्रिया से डीएनए निकाल कर विश्लेषण करना आरम्भ किया, माइटोकॉन्ड्रिया सभी जैव कोशिकाओं में पाया जाता है, जोकि अपना स्वयं का डीएनए रखता है। माइटोकॉन्ड्रिया डीएनए छोटा होता है और किसी कोशिका के डीएनए का एक नन्हा भाग ही रखता है, लेकिन इसकी हजारो प्रतिकृति होती है। यह एक जटिल स्तिथि है लेकिन इसमें सफलता की संभावना अधिक है।

अपनी नई खोजी गई विधियों से पाबो ने 40,000 वर्ष पुराने निएंथरडल मानव की हड्डी से माइटोकॉन्ड्रिया डीएनए के एक भाग को अलग करने में सफलता पाई। इस तरह से पहली बार हमारे लुफ्त निकट सम्बन्धी के डीएनए का मानचित्र मिल पाया। आधुनिक मानव या होमो सेपियंस के डीएनए और निएंथरडल मानव के डीएनए की तुलना से पता चला कि दोनों प्रजाति जिनेटिकली भिन्न है।

जैव कोशिका में डीएनए दो भाग में होता है। नाभिकीय डीएनए में अधिकतर जिनेटिक सूचना होती है, जबकि माइटोकॉन्ड्रियल में डीएनए छोटा होता है लेकिन हजारो प्रतिकृति होती ह। मृत्यु के पश्चात डीएनए में बदलाव होते है और समय के साथ एक नन्हा भाग बचता है, यह बचा भाग भी बैक्टेरिया और मानव डीएनए से दूषित होता है।

निएंडरथल जीनोम का मापन

माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के विश्लेषण से बहुत सिमित सूचना मिलती है। अब पाबो के सामने निएंथरडल नाभिकीय जीनोम के मापन की विशालकाय चुनौती थी। इस समय उन्हें लिपजिग जर्मनी में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट की स्थापना का अवसर मिला। इस नए संस्थान में पाबो और उसकी टीम पुरातन जीवाश्म हड्डियों से डीएनए को निकलने और विश्लेषित करने की नई विधियों पर काम करना शुरू किया। शोध टीम ने तकनीकी विकास में उन्नति का फायदा लेना आरम्भ कर दिया, जिसने डीएनए के मापन को बेहतर कर दिय। पाबो में इस क्षेत्र में अन्य विशेषज्ञों के साथ सहयोग आरम्भ कर दिया, जिन्होंने जनसंख्या के बड़े भाग के जिनेटिक अध्ययन और आधुनिक मापन तथा विश्लेषण में काम किया था। उनके ये प्रयास सफल रहा। पाबो को सफलता मिली और उन्होंने 2010 में निएंथरडल जीनोम के मापन में सफलता पाई। आधुनिक मानव होमो सेपियंस और निएंथरडल मानव के जीनोम की तुलना और विश्लेषण से पता चला कि इन दोनों का आदि पूर्वज अब से 800,000 पहले हुआ था।
पाबो और उनके सहयोगियों ने विश्व के भिन्न भागो में निएंथरडल और होने सेपियंस के मध्य रिश्तो का अध्ययन किया। दोनों की डीएनए की तुलना और विश्लेषण से पता चला कि यूरोप और एशिया के मानव निएंथरडल मानव से अफ्रिका के मानवों की तुलना अधिक निकट के सम्बन्धी है। इसका अर्थ यह है निएंथरडल और होमो सेपियंस अपने सह आस्तित्व के दौर में यौन सम्बन्धो से मिश्रित संतान उत्पन्न की। आधुनिक समय में यूरोप और एशियाई मूल के लोगो के 1-4% लोगो के जीनोम निएंथरडल से आई है।

पाबो ने लुफ्त मानव प्रजाति की हड्डियों से डीएनए प्राप्त किया। उन्होंने जर्मनी से निएंथरडल मानव की हड्डी प्राप्त की, जोकि निएंथरडल नामके स्थान से ही प्राप्त हुई थी और इस प्रजाति का नामकरण हुआ था। इसके बाद उन्होंने दक्षिण साइबेरिया की देनिसोवा गुफा से प्राप्त उंगली की हड्डी से डीएनए निकाला। इन डीएनए के विश्लेषण से होमो सेपियंस और लुफ्त मानव प्रजाति के मध्य सम्बन्ध का पता चला और एक विकास वृक्ष का चित्रण संभव हुआ।

सनसनीखेज खोज : देनीसोवा

2008 में साइबेरिया के दक्षिणी भाग की एक गुफा देनिशोवा से 40,000 पुरानी उंगली की हड्डी का टुकड़ा मिला। इस हड्डी में डीएनए अच्छी तरह से संरक्षित था। पाबो की टीम ने इस डीएनए का मापन किया। इसके नतीजों ने सनसनी फैला दी, यह डीएनए अपने आप में विशिष्ट था, यहाँ होमो सेपियंस और निएंथरडल दोनों की तुलना में भिन्न विशिष्टता लिए हुए था। पाबो ने एक नई मानव प्रजाति खोज निकाली थी जो अब तक अज्ञात थी। इस प्रजाति को देनिशोवा नाम दिया गया। इस विश्लेषण से यहाँ भी पता चला कि होमो सेपियंस में कुछ जींस देनिशोवा से भी आये है। मेलेंशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के डीएनए का 6% भाग देनिशोवा मानव से आया है।

पाबो की खोजो ने मानव विकास के इतिहास को पुनर्स्थापित किया है। जब होमो सेपियंस अफ्रिका से निकल रहे थे, तब यूरेशिया में काम से काम दो मानव प्रजाति थी जो अब लुफ्त हो चुकी है। इनमे से निएंथरडल पश्चमी यूरेशिया में रहते थे, जबकि पूर्वी भाग में देनीशोवा रहते थे। जब होमो सेपियंस अफ्रिका से बाहर आये तब उन्होंने ना केवल निएंथरडल से संताने उत्पन्न की बल्कि देनिशोवा से भी उनका मिश्रण हुआ है।

पेलिओजीनोमिक्स और उसका महत्त्व

इस समस्त शोध कार्य में पाबो ने विज्ञान की एक नई शाखा का विकास किया जिसे पेलिओजीनोमिक्स कहते है। इसकी शुरुवाती खोजो के पश्चात उन्होंने कुछ अन्य लुफ्त आदिमानव प्रजाति के जीनोम का अध्ययन किया। इस अध्ययन ने मानव विकास और उसके प्रवास को समझने में मदद की है। जीनोम के मापन की नई शक्तिशाली विधियों ने यहाँ बताया है कि होमो सेपियंस के अफ्रिका में रहने के दौरान भी उनमे अन्य प्रजातियों का मिश्रण हुआ होगा। लेकिन अफ्रिका के गर्म वातावरण के कारण अब तक किसी लुफ्त मानव जाती का संरक्षित डीएनए प्राप्त नहीं हो पाया है।

पाबो के कार्य से अब हम जानते है कि आधुनिक मानव के जीनोम पर अन्य लुफ्त मानव प्रजातियों का प्रभाव पड़ा है। इसका एक उदाहरण EPAS1 जीन है, जोकि देनिशोवा से प्राप्त जीनोम है और आधुनिक मानव होमो सेपियंस को ऊंचाई पर रहने की क्षमता देता है, यह जींस तिब्बितीयो में पाया जाता है। निएंथरडल मानव से प्राप्त जीनोम से हमें भिन्न प्रकार के संक्रमणों से बचाव की प्रतिरोध क्षमता मिली है।

पाबो की खोजो के अनुसार होमो सेपियंस के अफ्रिका से बाहर प्रवास के दौरान विश्व में मानव जातियों का वितरण हुआ है। निएंथरडल पश्चमी यूरेशिया में रहते थे, जबकि पूर्वी भाग में देनीशोवा रहते थे।

पाबो की खोजो के अनुसार होमो सेपियंस के अफ्रिका से बाहर प्रवास के दौरान विश्व में मानव जातियों का वितरण । निएंथरडल पश्चमी यूरेशिया में रहते थे, जबकि पूर्वी भाग में देनीशोवा रहते थे।

होमो सेपियंस के विशिष्ट होने का राज क्या है ?

होमो सेपियंस जटिल संस्कृति का निर्माण करने में सक्षम है, वे आविष्कार कर सकते हैं, कलाकृति बना सकते है। वो थल में रहने के बावजूद जल पार कर सकते है और समस्त विश्व में फ़ैल गए है। निएंथरडल भी बड़े समूहों में रहते थे और उनका मस्तिष्क भी विशाल था। वो भी उपकरणों का प्रयोग जानते थे लेकिन शताब्दियों तक जीवित रहने के बावजूद वे अधिक विकसित नहीं हो पाये। पाबो के कार्य से अब हम उनके और होमो सेपियंस के जीनोम में अंतर समझ पा रहे है। इन अन्तरो के अध्ययन से पता चलेगा कि ऐसा क्या है जो हमें सबसे अलग बनाता है ?

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