खगोल भौतिकी 13 :सूरज की संरचना – I


लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

मंदाकिनी आकाशगंगा(The Milky way) मे लगभग 1 खरब तारे है। हमारे लिये सबसे महत्वपूर्ण तारा सूर्य है। यह वह तेजस्वी तारा है जिसकी परिक्रमा पृथ्वी अन्य ग्रहों के साथ करती है। आज इस लेख मे हम सूर्य को करीब से जानेंगे। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के तेरहंवे लेख मे हम सूर्य की संरचना और रूपरेखा मे बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे।

इस शृंखला के सारे लेखों को पढने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें।

सूर्य हमारे सबसे समीप का तारा है, जिससे हम इस तारे के बारे विस्तार से जानने और अध्ययन करने के अधिक मौके मिले है। यह अकेला तारा है जिसे हम डिस्क के रूप मे देख पाते है, जबकि अन्य तारे हमे केवल बिंदु रूप मे ही दिखते है। आधुनिक परिष्कृत उपकरण और कार्यकुशल निरीक्षण तकनीक ने हमे सूर्य के वास्तविक भौतिक गुणधर्मो के अध्ययन के अवसर प्रदान किये है। लेकिन हम सूर्य के वातावरण और उसकी उग्र बाह्य परतो को ही देख पाते है। वैज्ञानिक भौतिकी के नियमों और सूर्य की बाह्य परतो के अध्ययन को जोड़ कर उसकी आंतरिक परतो के बारे मे अनुमान लगाते है। इस लेख मे हम सूर्य की संरचना, घटको और उसमे चलरही भिन्न गतिविधियों का संक्षिप्त परीचय देखेंगे।

सूर्य की संरचना

इसके पहले वाले लेख मे हमने हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख(THE HERTZSPRUNG RUSSELL DIAGRAM) की चर्चा की है। इसके अनुसार वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण के अनुसार सूर्य G वर्ग का मुख्य अनुक्रम का तारा है। इसे अनौपचारिक रूप से पीला वामन(yellow dwarf) तारा भी कहते है। इसमे 73% हायड्रोजन और 25% हिलियम है। सूर्य के अंदर अन्य भारी तत्व जैसे आक्सीजन, कार्बन , निआन और लोहा अत्यल्प मात्रा मे मौजूद है।

सूर्य की विभिन्न परतें

सूर्य के दोनो मुख्य क्षेत्र है, आंतरिक तथा बाह्य क्षेत्र। आंतरिक क्षेत्र सौर केंद्रक(solar core) तथा उसके पश्चात क्रमश: विकिरण क्षेत्र (radiation) तथा संवहण(convective) क्षेत्र से बना हुआ है। सौरकेंद्रक मे तापनाभिकिय प्रक्रियायें चलते रहती है। यही प्रक्रियायें ही सूर्य की प्रचुर ऊर्जा का स्रोत है। इस आंतरिक क्षेत्र के बाहर का क्षेत्र सौर वातावरण है, जिसके भाग है , फोटोस्फ़ियर( photosphere), क्रोमोस्फ़ियर( chromosphere), संक्रमण क्षेत्र(transition) और प्रभामंडल या कोरोना(corona)।

सूर्य की संरचना

सूर्य की संरचना

फोटोस्फियर(Photosphere)

इस क्षेत्र के नाम से ही स्पष्ट है कि फोटोस्फियर सूर्य का दृश्य क्षेत्र है। इसी क्षेत्र से निकलने वाला प्रकाश सौर वातावरण के भागो को प्रकाशित करता है। सौर वातावरण मे फोटोस्फियर के बाद का अगला क्षेत्र फोटोस्फ़ियर की तीव्र चमक के कारण अदृश्य है। सूर्य पर चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से उत्पन्न सौर कलंक(sunspots) इसी क्षेत्र मे उत्पन्न होते है। इस क्षेत्र का तापमान 5770 K-5780 K के मध्य होता है।

क्रोमोस्फीयर(The Chromosphere)

क्रोम का अर्थ है रंग, और क्रोमोस्फियर नाम के अनुसार यह क्षेत्र हल्की गुलाबी या हल्की लाल आभा लिये होता है। इस क्षेत्र का घनत्व अत्यंत कम अर्थात पृथ्वी के समुद्र सतह के वातावरण से 8-10 गुणा होता है और इसे केवल सूर्यग्रहण के समय ही देखा जा सकता है। इस क्षेत्र का तापमान लगभग 20,000 K होता है।

संक्रमण क्षेत्र(Transition Region)

क्रोमोस्फियर के बाद संक्रमण क्षेत्र आता है। इस क्षेत्र मे तापमान अचानक ही 20,000 K से बढ़कर 1,000,000 K तक हो जाता है। इस क्षेत्र को पृथ्वी से देखा नही जा सकता है। लेकिन इसे अंतरिक्ष के उपग्रहों द्वारा पराबैंगनी(ultraviolet) वर्णक्रम के लिये संवेदी उपकरणो द्वारा आसानी से देखा जा सकता है।

प्रभामंडल(The Corona)

सूर्य का सबसे बाह्य क्षेत्र प्रभामंडल या कोरोना है। यह क्रोमोस्फ़ियर का सहज विस्तार है लेकिन गुणधर्मो के अत्याधिक भिन्न है। कोरोना को सूर्यग्रहण के समय स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह सूर्य के आंतरिक भाग के को घेरे हुये एक आभामंडल के जैसे दिखाई देता है। इस क्षेत्र का बाह्य भाग सूर्य की डिस्क से बहुत दूर तक ग्रहों के मध्य के अंतरिक्ष तक देखा जा सकता है। इसका तापमान दस लाख डीग्री केल्विन तक होता है। यह एक विसंगति है। इस संरचना मे स्रोत का तापमान अत्यंत कम है लेकिन वह इस क्षेत्र को इतना अधिक उष्ण कैसे कर देता है ? अपेक्षाकृत 5900 K तापमान के शीतल फोटोस्फियर से उष्मा प्रवाहित होकर प्रभामंडल को दस लाख डीग्री केल्विन तक कैसे उष्ण कर देती है ? प्रभामंडल को उष्णता प्रदान करने का स्रोत कुछ और होना चाहीये। खगोलभौतिकी की अनसुलझी पहेलीयो मे से एक है : सौर प्रभामंडल का उष्ण होने की पहेली।

सूर्यग्रहण के दौरान लिया गया प्रभामंडल का चित्र

सूर्यग्रहण के दौरान लिया गया प्रभामंडल का चित्र

मानव प्रभामंडल के बारे मे शताब्दियों से जानकारी रखता है लेकिन उसे इसकी वास्तविकता और प्रकृति के बारे मे जानकारी नही थी। वैज्ञानिको को पहले यह केवल एक दृष्टिभ्रम ही लगता था। यहाँ तक कि केप्लर जैसे खगोलवैज्ञानिक इसकी वास्तविक प्रकृति से अनजान थे। 1869 मे अमेरीकन खगोलशास्त्री डब्ल्यु हार्कनेस(W. Harkness) तथा सी ए यंग(C. A. Young) ने पहली बार सौर प्रभामंडल के वर्णक्रम का अध्ययन किया। इसके बाद 1930 मे फ़्रेंच भौतिक वैज्ञानिक बी लायट(B. Lyot) ने क्रोनोग्राफ़ उपकरण के द्वारा प्रभामंडल का प्रथम चित्र लिया। इसी क्षेत्र मे सौर ज्वाला(solar prominence) जैसी संरचनाये दिखाई देती है।

स्कायलैब (Skylab) द्वारा 1973 मे लिया गया सौर ज्वाला का चित्र

स्कायलैब (Skylab) द्वारा 1973 मे लिया गया सौर ज्वाला का चित्र

लेखिका का संदेश

इस लेख के द्वारा खगोलभौतिकी लेख शृंखला मे हमने एक नई शाखा सौर भौतिकी (Solar Physics) का परिचय कराया है। लेखिका प्लाज्मा भौतिक वैज्ञानिक है और उन्होने अल्फ़वेन तरंगो(Alfven waves) का अध्ययन किया है जोकि सौर प्रभामंडल के असामान्य रूप से उष्ण होने के लिये संभावित रूप से उत्तरदायी हो सकती है। यदि आप सूर्य की संरचना को गहराई से जानना चाहते है तो आपको विद्युतगतिकी(Electrodynamics) तथा प्लाज्मा भौतिकी का ज्ञान होना आवश्यक है। इस शृंखला के अगले लेख मे हम सूर्य की सतह के कुछ गुणधर्मो जैसे सौर कलंक(Sunspots), सौर ज्वाला(Solar Flares) के बारे मे जानकारी प्राप्त करेंगे।

मूल लेख : THE STRUCTURE OF SUN – I

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)

संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.

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