खगोल भौतिकी 14 :सूर्य की संरचना 2 – सौरकलंक, सौरज्वाला और सौरवायु


लेखिका याशिका घई(Yashika Ghai)

पिछले लेख मे हमने अपने सौर परिवार के सबसे बड़े सदस्य सूर्य की संरचना का परिचय प्राप्त किया था। । ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के चौदहवें लेख मे हम सूर्य की संरचना की अधिक जानकारी प्राप्त करेंगे। इस लेख मे हम सूर्य की संरचना और उसकी सतह पर सतत चल रही कुछ अद्भूत गतिविधियों को जानेंगे।

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सौर कलंक/सूर्यधब्बे(Sunspots)

सूर्य के फोटोस्फियर मे चलने वाली गतिविधियों मे सबसे हटकर दिखाई देने वाली गतिविधि सौरकलंक है। सौरकलंक सूर्य के वह क्षेत्र है जहाँ चुंबकीय क्षेत्र अत्याधिक शक्तिशाली होता है और तापमान कम। किसी सौरकलंक का तापमान 3800 K हो सकता है जो कि आसपास के फोटोस्फियर तापमान से 2000 K कम है। यही कारण है कि सौर कलंक दीप्तीमान फोटोस्फियर पृष्ठभूमी मे गहरे धब्बो की तरह दिखाई देते है।

सौरकलक, सूर्य धब्बे(Sunspots)

सौरकलक, सूर्य धब्बे(Sunspots)

सौरकलंक का प्रथम निरीक्षण

1610 मे गैलेली गलीलीयो ने अपनी नई खोज दूरबीन से सौरकलंको को प्रथम बार देखा था। अठारवी सदी के अंत तथा उन्नीसवीं सदी के आरंभ खगोलवौज्ञानिक इन्हे सूराख(hole) समझते थे। वे मानते थे कि सौरकलंक ऐसी खिड़कीया है जिनके द्वारा सूर्य की आंतरिक संरचना को देखा जा सकता है। अब हम जानते है कि यह सब विचित्र कल्पना मात्र थी। लेकिन उस समय ऐसी कल्पनाओं पर विश्वास करना आसान था।

सौरकलंक आरंभ के लगभग 1,000 km व्यास के क्षेत्र से आरंभ होता है। उसका आकार और आकृति धीमे धीमे उसके विस्तार के साथ बदलती है। एक पूर्णत: व्यस्क सौर कलंक के दो स्पष्ट भाग होते है। ये भाग है आंतरिक गहरा भाग प्रच्छाया(umbra ) और बाह्य हल्के रंग का उपच्छाया(penumbra )।

आंतरिक गहरा भाग प्रच्छाया(umbra ) और बाह्य हल्के रंग का उपच्छाया(penumbra )

आंतरिक गहरा भाग प्रच्छाया(umbra ) और बाह्य हल्के रंग का उपच्छाया(penumbra )

सौर कलंक वास्तविकता मे संकेन्द्रित चुम्बकीय अभिवाह(concentrated magnetic flux) के क्षेत्र है। यह सामान्यत: युग्म मे विपरीत चुंबकीय ध्रुवो के साथ उत्पन्न होते है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि सौरकलंको की संख्या 11.2 वर्ष के सौर चक्र के अनुसार बदलते रहती है।

सौर चक्र सौर गतिविधियों का काल होता है। इस काल मे सूर्य का चुंबकिय ध्रुव परिवर्तित होता है। इस चक्र के चरम पर सूर्य पर चुंबकीय तुफ़ान आते है। इस समय वह सौरकलंक और सौर ज्वाला(solar flares) उत्पन्न करता है जोकि पृथ्वी की ओर प्लाज्मा की धारा प्रवाहीत करते रहता है। सौर तुफ़ानो से मौसम की भविष्यवाणी करने वाले तथा जीपीएस प्रणाली के उपग्रह को क्षति पहुंचती है। इसी के साथ रेडीयो, संचार प्रणाली तथा ध्रुवो के उपर से उड़ान भरने वाले विमानो के कंप्युटर भी प्रभावित होते है।

सौर ज्वाला (Solar Prominence)

सूर्यग्रहण के दौरान सूर्य की ली गई तस्वीरों मे क्रोमोस्फियर से प्रभामंडल(corona) तक उठती हुई लाल लपटे देखी जा सकती है। ये लाल चमक वाली लपटे वलय रूप मे प्लाज्मा ही होती है जिसे सौर ज्वाला कहते है। ये सूर्य पर चल रही गतिविधियों मे महत्वपूर्ण गतिविधियो मे से एक है। सौर ज्वाला विशाल वलयाकार सूर्य की सतह से निकलकर प्रभामंडल तक पहुंचने वाली चमकदार संरचना है। सौर ज्वाला सामान्यत: कुछ दिनो तक रहती है। स्थिर सौर ज्वालायें महिनो तक प्रभामंडल मे बनी रह सकती है। सौर ज्वालाये अंतरिक्ष मे हजारो किमी दूर तक जाकर वापिस सूर्य की सतह तक वलय बनाती है, इनकी उंचाई पृथ्वी के व्यास का भी कई गुणा होती है।

सूर्य का आंतरिक डायनेमो चुंबकीय क्षेत्र बनाता है। सौर ज्वालाओं का प्लाज्मा इन चुंबकीय रेखाओ मे मोड़ के कारण वलय बनाती है। यह प्लाज्मा मुख्यत: विद्युत रूप से आवेशित हायड्रोजन और हिलियम की होती है। इन सौर ज्वालाओं मे विस्फोट चुंबकीय क्षेत्र मे अस्थिरता आने से होता है। तब यह विस्फोट बाहर की ओर प्लाज्मा को अंतरिक्ष मे धकेल देता है।

सौर ज्वाला (Solar Prominence)

सौर ज्वाला (Solar Prominence)

सौर वायु(Solar Wind)

हम सब जानते है कि सूर्य सभी तरंगदैधर्य मे विद्युत चुंबकीय विकिरण उत्सर्जित करता है। हमने इससे पहले चर्चा की है कि सौरचक्र के चरम मे सूर्य अत्यंत तीव्र गति की प्लाज्मा कणो की धारा भी पृथ्वी की ओर प्रवाहित करता है जिसे सौर वायु कहते है। सौर वायु के प्रमुख घटक इलेक्ट्रान और प्रोटान होते है। इस वायुधारा के गुण लगातार परिवर्तित होते रहते है। सूर्य पर वायु के उद्गम स्थल के अनुसार भी इसमे परिवर्तन आते रहते है। प्रभामंडल के छीद्रो(coronal holes) पर इसकी गति अधिक होती है, इन स्थलो पर इसकी गति 800 किमी/सेकंड होती है।

हमारी पृथ्वी पर इन ऊर्जावान कणो की सतत बरसात होते रहती है। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र सौर वायु को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से बचाता था। यह चुंबकीय क्षेत्र इन कणो को ध्रुविय क्षेत्रो की ओर मोड़ देता है। इन्ही आवेशित कणो के कारण ध्रुवो पर खूबसूरत ध्रुवीय ज्योति, या मेरुज्योति (Auroras)बनती है। जिस स्थान पर पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इन आवेशित कणो से टकराता है उस स्थल पर एक धनुष के आकार का झुकाव(bow shock) बनता है।

लेखिका का संदेश

हम भौतिकी के मूलभूत नियमों को प्रकृति के निरीक्षण से समझ सकते है। यह एक रोचक तथ्य है कि प्रकृति के निरीक्षण से ही मानव के लाभ के लिये नई तकनिके विकसीत की जा सकती है। सौर ज्वालाओं का अध्ययन भी एक ऐसा उदाहरण है। सौर ज्वालाओं की वलयाकार आकृति ने सूर्य की मजबूत चुंबकीय रेखाओं की उपस्तिथि दिखाई थी। नाभिकिय भौतिकी वैज्ञानिक इसी आधार पर संलयन रियेक्टरो मे वलय बनाने वाली चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं से प्लाज्मा को परिरोधित रखने का प्रयास कर रहे है। यदि यह प्रयोग सफ़ल हो जाता है तो मानव के पास प्रदुषण रहित अनंत ऊर्जा का स्रोत होगा और नाभिकिय ऊर्जा के एक नये युग का आरंभ!

मूल लेख : STRUCTURE OF SUN – SUNSPOTS, PROMINENCES AND SOLAR WIND

लेखक परिचय

याशिका घई(Yashika Ghai)

संपादक और लेखक : द सिक्रेट्स आफ़ युनिवर्स(‘The secrets of the universe’)

लेखिका ने गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर से सैद्धांतिक प्लाज्मा भौतिकी(theoretical plasma physics) मे पी एच डी किया है, जिसके अंतर्गत उहोने अंतरिक्ष तथा खगोलभौतिकीय प्लाज्मा मे तरंग तथा अरैखिक संरचनाओं का अध्ययन किया है। लेखिका विज्ञान तथा शोध मे अपना करीयर बनाना चाहती है।

Yashika is an editor and author at ‘The secrets of the universe’. She did her Ph.D. from Guru Nanak Dev University, Amritsar in the field of theoretical plasma physics where she studied waves and nonlinear structures in space and astrophysical plasmas. She wish to pursue a career in science and research.

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