खगोल भौतिकी 6 : स्टीफ़न का नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व


लेखक : ऋषभ

इस लेख मे हम भौतिकी के एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम की चर्चा कर रहे है जो कि बहुत ही सरल है इसके खगोलभौतिकी मे बहुत से प्रयोग है। यह बहुत लोकप्रिय नियम नही है और हम मे से बहुत इसके महत्व को समझ पाने मे असफ़ल रहते है। ’मूलभूत खगोलभौतिकी (Basics of Astrophysics)’ शृंखला के छठे लेख मे हम स्टीफ़न के नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व को जानेंगे।

इस शृंखला के सभी लेखों को आप इस लिंक पर पढ़ सकते है।

स्टीफ़न के नियम का गणितिय रूप

स्टीफ़न के नियम का अर्थ सरल है। स्टेफॉन वोल्‍ज़मान नियमानुसार इकाई समय में सभी तरंगदैर्घ्य परास में कृष्णिका(ब्लैकबाडी )द्वारा प्रति इकाई पृष्ठिय क्षेत्रफल द्वारा विकरित कुल ऊर्जा कृष्णिका के ऊष्मगतिकीय ताप के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती होता है। सरल शब्दो मे किसी ब्लैकबाडी (black body) की सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफ़ल द्वारा सभी तरंगदैर्ध्य पर उत्सर्जित विकिरण की कुल ऊर्जा उसके तापमान के चतुर्घात के अनुपात मे होती है।

 स्टेफॉन वोल्‍ज़मान सूत्र

स्टेफॉन वोल्‍ज़मान सूत्र

L = तारे की दीप्ति (luminosity)। वास्तविकता मे दीप्ति किसी तारे द्वारा कुल उत्पन्न का माप है। इस नियम को स्टेफॉन वोल्‍ज़मान नियम भी कहते है।

हमारा उद्देश्य इस नियम के पीछे के बुनियादी सिद्धांत को समझना है, इसलिये हम खाली स्लेट से शुरुवात करते है।

एक कृष्णिका या ब्लैकबाडी क्या है ?

एक ऐसी वस्तु जो अपने पृष्ठ पर आपतित सभी तरंगदैध्यो के विकिरणो का पूर्ण:  अवशोषण और पुन: पूर्ण  उत्सर्जन कर देती है उसे कृष्णिका कहते है। भौतिक विज्ञान में कृष्णिका पदार्थ की एक आदर्शीकृत अवस्था है, जो अपने ऊपर पड़ने वाले सभी विद्युत चुम्बकीय विकिरण अवशोषित कर लेता है। कृष्णिका एक विशेष और सतत वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में विकिरण को अवशोषित और गर्म होने पर फिर से उत्सर्जित करते हैं। सामान्यत: प्रकाश का एक अच्छा अवशोषक प्रकाश का एक अच्छा उत्सर्जक भी होता है इसलिये एक आदर्श अवशोषक को एक आदर्श विकिरण उत्सर्जक भी होना चाहीये। लेकिन साथ मे एक आदर्शअवशोषक द्वारा प्रकाश का परावर्तन भी नही होगा इसलिये वह काला दिखाई देगा, जिससे उन्हे कृष्णिका(ब्लैक बाडी) कहते है।

लेकिन सूर्य को कृष्णिका (ब्लैक बाडी) क्यों कहते है ? सूर्य की कोई ठोस सतह नही है। इसलिये सूर्य पर जो भी विकिरण आपतीत होता है पूरी तरह से समाप्त होने तक बिखरते(scattered) और अवशोषित होते रहता है। यह प्रक्रिया सूर्य को एक आदर्श अवशोषक बनाती है। लेकिन सूर्य एक आदर्श विकिरक(emitter) नही है। यह उसके वर्णक्रम से स्पष्ट है।

संतरे रंग की रेखा आदर्श कृष्णिका को दर्शाती है, जबकि लाल रेखा सूर्य के वर्णक्रम को दर्शाती है। सूर्य के वर्णक्रम मे आदर्श कृष्णिका के वर्णक्रम से कई विचलन है। सूर्य को एक आदर्श कृष्णिका के समीप माना जाता है।

सूर्य का तापमान

इस नियम का प्रतिपादन जोसेफ़ स्टीफ़न(Josef Stefan) ने 1879 मे किया था। उनसे पहले एक अन्य वैज्ञानिक जे सोरेट (J. Soret) ने एक खूबसूरत प्रयोग किया था जिसमे उन्होने एक पतली प्लेट को 2000K तापमान तक गर्म किया था। उसके बाद उन्होने इस प्लेट को इतनी दूरी पर रखा कि उसका सम्मुख कोण और सूर्य का सम्मूख कोण (subtended angle)समान था। इस प्रयोग से उन्होने पाया कि सूर्य से उत्सर्जित ऊर्जा इस पतली प्लेट से विकिरित ऊर्जा के घनत्व(energy flux density) से 29 गुणा अधिक है। स्टीफ़न ने इन आंकड़ो का प्रयोग किया और उसके आगे गये। उन्होने एक और कारक को जोड़ा। उन्होने अनुमान लगाया कि सूर्य से उत्सर्जित ऊर्जा का एक तिहाई भाग वातावरण द्वारा अवशोषण कर लिया जाता है। इसलिये सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा का घनत्व पतली प्लेट से 29 गुणा अधिक नही, बल्कि 29×3/2 गुणा अधिक है अर्थात 43.5 गुणा अधिक है।

अब उन्होने इस मूल्य को अपने सूत्र(उपरोक्त) मे डाला। अर्थात सूर्य द्वारा विकिरित ऊर्जा पतली प्लेट द्वारा विकिरित ऊर्जा से 43.5 गुणा अधिक है। इसका अर्थ यह है कि सूर्य का तापमान पतली प्लेट के तापमान के 43.5 गुणा का चतुर्थमूल होगा। यह सरल गणित है, उपरोक्त सूत्र मे मूल्य रखीये। अब (43.5)1/4 =2.57 अर्थात सूर्य का तापमान पतली प्लेट के तापमान का 2.57 गुणा होगा। 2000K x 2.57 =5700K। यह एक अप्रत्याशित परिणाम था। यह सूर्य के तापमान से केवल 1.3% ही दूर था, जोकि 5778K है। स्टीफ़न ने माना था कि पृथ्वी का वातावरण सूर्य की ऊर्जा का एक तिहाई अवशोषित कर लेता है, यह अनुमान भी सही पाया गया। सूर्य की सतह के तापमान की गणना का यह पहला प्रयास था और मानवता के इतिहास मे यह एक मील का पत्थर था।

स्टीफ़न के नियम का खगोलभौतिकी मे महत्व

अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि स्टीफ़न का नियम खगोलभौतिकी मे महत्वपूर्ण क्यो है। आखीर हमने इसके प्रयोग से सूर्य का तापमान ज्ञात किया था। लेकिन इसकी सीमा सूर्य के तापमान तक ही नही है, इसके द्वारा अन्य तारों के तापमान और आकार की गणना की जा सकती है।

लेखक का संदेश

अब हम धीमे धीमे खगोलभौतिकी मे गहरा गोता लगाने जा रहे है। इस लेख का उद्देश्य किसी तारे की दीप्ती और उसके प्रभावी तापमान के मध्य के संबध की जानकारी देना था। अगले कुछ लेखों मे हम तारों का अध्ययन करेंगे। तारकीय खगोलभौतिकी(Stellar Astrophysics) एक महत्वपूर्ण तथा बड़े पैमाने पर अध्ययन किया जानेवाला विषय है। इस विषय मे करीयर बनाने के लिये भौतिकी मे मजबूत पकड़ चाहीये। इस लेख मे हमने केवल सतह को छुआ है। हमे आशा है कि आप इस लेख शृंखला का आनंद ले रहे है।

मूल लेख : THE STEFAN’S LAW AND ITS IMPORTANCE IN ASTROPHYSICS.

लेखक परिचय

लेखक : ऋषभ

Rishabh Nakra

Rishabh Nakra

लेखक The Secrets of the Universe के संस्थापक तथा व्यवस्थापक है। वे भौतिकी मे परास्नातक के छात्र है। उनकी रूची खगोलभौतिकी, सापेक्षतावाद, क्वांटम यांत्रिकी तथा विद्युतगतिकी मे है।

Admin and Founder of The Secrets of the Universe, He is a science student pursuing Master’s in Physics from India. He loves to study and write about Stellar Astrophysics, Relativity, Quantum Mechanics and Electrodynamics.

खगोल भौतिकी 6 : स्टीफ़न का नियम और उसका खगोलभौतिकी मे महत्व&rdquo पर एक विचार;

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