दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक


जैव घड़ी और भारतीय वैज्ञानिक:  अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों को जैव घड़ी के रहस्यों का पता लगाने के लिए इस साल का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है। उन महान वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई।  इस अवसर पर हमें अपने देश के उस महान वैज्ञानिक को भी याद करना चाहिए जिसने आज से 57 वर्ष पूर्व सन् 1960-61 में दक्षिणी ध्रुव पर जाकर 100 दिनों तक जैव घड़ी पर अपने प्रयोग किए थे। उस वैज्ञानिक का नाम है  डा. गिरिराज सिंह सिरोही। वे दक्षिणी ध्रुव में कदम रखने वाले प्रथम भारतीय नागरिक भी हैं। अमेरिका ने जैव घड़ी पर किए गए उनके महत्वपूर्ण शोधकार्य के सम्मान में दक्षिणी ध्रुव के मानचित्र पर एक स्थान का नाम सिरोही प्वाइंट रख दिया था। मैंने 1967 में प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग के लिए उनका इंटरव्यू लिया था जो धर्मयुग के दो अंकों में सचित्र प्रकाशित हुआ था। डा. गिरिराज सिंह सिरोही पर मीडिया में वह पहली एक्सक्लूसिव स्टोरी थी।

वैज्ञानिक डा. गिरिराज सिंह सिरोही एंटार्कटिका में कदम रखने वाले प्रथम भारतीय थे। वे 1961-62 में लगभग चार माह दक्षिणी ध्रुव में रहे और उन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने वहां जैविक घड़ियों पर अपने प्रयोग पूरे किए। पादप शरीर क्रिया विज्ञान के क्षेत्र में उनकी इस महत्वपूर्ण खोज के लिए एंटार्कटिका में एक स्थान का नाम ‘सिरोही पाइंट’ रख कर उन्हें सम्मानित किया गया। उनसे की गई मेरी(देवेंद्र मेवाड़ी) यह भेंटवार्ता ‘धर्मयुग’ के 18 जून 1967 में प्रकाशित हुई और उस समय की ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनी। मीडिया में उनकी खोज का यह पहला खुलासा था…

डा. गिरिराज सिंह सिरोही

डा. गिरिराज सिंह सिरोही

28 फरवरी 1967….। डा. गिरिराज सिंह सिरोही के पास नेशनल साइंस फाउंडेशन, वाशिंगटन से वह पत्र पहुंचा, जिसमें उन्हें दक्षिणी ध्रुव में बीयर्ड मूर ग्लेशियर के पश्चिम में 83.57 अक्षांश दक्षिण तथा 170.06 देशांतर पूर्व क्षेत्र को उनके सम्मान में ‘सिरोही पाइंट’ नाम दिए जाने की सूचना दी गई थी।

आगरा विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. तथा वनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम. एस-सीं की डिग्रियां कृषि विज्ञान में प्राप्त करने के बाद डा. सिरोही ने अपने गांव के छोटे से फार्म में एक साल तक खेती की। वे दिल्ली विश्वविद्यालय से फसलों में पीएच.डी. तथा कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, अमेरिका से साइंसेज में एम. ए. व वनस्पति शास्त्र में पीएच. डी. हैं। सन् 1958 से उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अध्यापन तथा शोध कार्य प्रारंभ किया और पौधों की विशिष्ट गतियों पर अपने शोध प्रयोगों की पुष्टि हेतु वे नवंबर, 1961 से फरवरी 1962 तक दक्षिणी ध्रुव में रहे। दक्षिणी ध्रुव जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे। आजकल वे भारतीय कृषि अनुसंधानशाला दिल्ली में हैं।

बचपन से ही साधारण घड़ियों की टिक्-टिक् की आवाजें सुनते हुए कब उनका मस्तिष्क जैविक घड़ियों का रहस्य जानने के लिए छटपटा उठा, कौन जाने! और, यही छटपटाहट उन्हें भारत के छोटे से गांव खेड़ी, उत्तर प्रदेश से लास ऐंजिल्स, अमेरिका और फिर वहां से दक्षिणी ध्रुव तक खींच ले गई। ऐंटार्कटिका के बर्फ ढके सुनसान और जीव-वनस्पतियों से विहीन विश्व के सबसे ठंडे स्थान में उन्होंने जैविक घड़ियों (बायोलाजिकल क्लाक) पर चार महीने तक कार्य किया।

प्रकृति की ये रहस्यमय घड़ियां

आप पूछ सकते हैं कि ये जैविक घड़ियां क्या है? जीवों तथा वनस्पतियों में तमाम जीवन-क्रियाएं एक निश्चित समयानुसार होती है। मनुष्य का दिन में जागना तथा रात को सोना, चूहों का दिन के प्रकाश में सोना एवं रात्रि के अंधेरे में क्रियाशील हो उठना, वनस्पतियों में फूलों का दिन में खिलना व रात में मुंदना तथा पत्तियों में रात और दिन के अंतर पर गिरने तथा उठने और मक्खियों में अंडों से लेकर शिशुओं के निकलने तक की संपूर्ण क्रियाएं एक निश्चित समयानुसार ही होती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार जीवों में यही विशिष्ट समय-बोध किसी अदृश्य घड़ी के माध्यम से होता है और समयबोध का यही माध्यम जैविक घड़ी है। डा. सिरोही के अनुसार यह स्वयं संचालित अर्थात् जीवन-क्रियाओं के निश्चित समय पर होने की आतंरिक प्रक्रिया है। परंतु कई वैज्ञानिक इसे पृथ्वी के घूमने तथा दिन और रात से प्रभावित होने वाली प्रक्रिया मानते थे। इसीलिए पृथ्वी के ध्रुव में जाकर पूर्ण अंधकार में, पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमने वाली मेजों पर जीवों तथा वनस्पतियों का अध्ययन करने पर उन्होंने यह सिद्ध किया कि जीवों में समय-बोध की एक स्वतंत्र प्रक्रिया होती है।

हजारों मील का देशांटन करने वाले पक्षियों में तथा नियत समय पर फूलने-खिलने वाली वनस्पतियों में इसका बहुत महत्व है। फसलों के संदर्भ में जैविक घड़ी पर आश्चर्यजनक प्रयोग किए गए हैं तथा प्रकाश के माध्यम से जैविक घड़ी की नियमितता में बाधा डाल कर, या उसे नियमित बनाकर उत्पादन में वृद्धि प्राप्त हुई है। फसल की किसी अच्छी किस्म को देश के हर भाग में उगाए जाने योग्य उसकी जैविक घड़ी की मदद से ही बनाया गया है। धान की ‘ताइचुंग-नेटिव’ किस्म इसका उदाहरण है।

जैविक घड़ियों पर अनुसंधान के लिए अपने दक्षिणी ध्रुव के प्रवास के अनुभव सुनाते हुए वे बता रहे हैं- ‘….वह अपनी झोपड़ी से थोड़ी दूरी पर था, तभी ‘ह्वाइट आउट’ हो गया। बर्फ और बर्फ। चारों और सिर्फ सफेदी ही सफेदी और सफेदी की चकाचैंध में कुछ भी नजर नहीं आता। अतः ह्वाइट आउट होते ही उसने सोचा कि सिर्फ कि कुछ ही कदमों का फासला मैं तय कर झोपड़ी ढूंढ लूंगा। परंतु उसे क्या पता था कि वह ठीक उसकी उल्टी दिशा में बढ़ रहा है। बहुत दूर तक वह निकलता ही चला गया और अंत में एकाएक ही समुद्र में गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। वह स्काट का एक साथी था और दक्षिणी ध्रुव में उसकी मृत्यु-स्थान पर उसका स्मारक बना हुआ है। मैंने एक फोटो भी लिया था उस जगह का…. ”

उपरोक्त दृश्य उन्हें फिल्म के माध्यम से अमेरिका में तब दिखाया जा रहा था जब वे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अपने आचार्य प्राध्यापक कार्ल सी. हेमनर एवं एक जापानी वैज्ञानिक टी. होसीजाकी के साथ दक्षिणी ध्रुव में जाकर जैविक घड़ियों के सिलसिले में अपने प्रयोगों को सिद्ध करने का निश्चय कर रहे थे।

“अपने प्रयोगों के सही परिणाम हम सिर्फ ध्रुवों में ही प्राप्त कर सकते थे। यह देखिए…“ मैं पानी से भरी हुई एक पेट्री डिश को उनकी मेज में देखता रहा, जिसमें कागज का एक टुकड़ा पड़ा हुआ था। “…..बचपन में किसी चौड़े बर्तन में पानी भर कर मैं यह प्रयोग करता था। अंगुलियों से यदि बर्तन को गोलाई में धीरे-धीरे घुमाया जाए तो कागज अपनी जगह पर ही स्थिर रहता है। अतः टुकड़े के सामने यदि कोई निशान लगा दिया जाए तो पृथ्वी के घूमने से बारह घंटे में निशान उसकी दूसरी दिशा में मिलना चाहिए। इसके लिए मैं दूसरी सुबह का इंतजार करता था। परंतु ऐसा कभी नहीं हो सका। और, इसका उत्तर मुझे बहुत आगे जाकर मिला कि ऐसा तो सिर्फ ध्रुवों पर हो सकता है। और, अपने प्रयोगों में भी जैविक घड़ियों का स्वतंत्र या पृथ्वी की घूमने की गति से नियंत्रित साबित करने के लिए हमें ध्रुवों पर ही प्रयोग करना जरूरी था। उपरोक्त प्रयोग ही वहां घूमने वाली मेजों व सोयाबीन के पौधों वगैरह के रूप में था। उत्तरी ध्रुव में तो समुद्र है और तमाम आइसबर्ग हैं, जो प्रति पल सरकते रहते हैं। इससे प्रयोगों के गलत हो जाने की संभावना थी। परंतु दक्षिणी ध्रुव का क्षेत्र ठोस होने के साथ-साथ वहां एक रिसर्च स्टेशन भी था। इसीलिए हम लोगों ने दक्षिणी ध्रुव में जाने का निश्चय किया था।”

“…..फिल्मों की सहायता से ही हमें वहां के बारे में पूरी जानकारी दी गई। सभी परेशानियों और खतरनाक दृश्यों से हमें अवगत कराया गया। एकबारगी तो हम बुरी तरह घबरा भी गए परंतु प्रयोगों के परिणाम तो वहां जाकर ही प्राप्त किए जा सकते थे। इसलिए हमें जाना था ही। हमने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जाएंगे ही। अपने प्रयोगों की समस्या के संदर्भ में हम ‘नेशनल सांइस फाउंडेशन’ को लिख चुके थे। और, दो महीने के भीतर-भीतर ही हम तीनों को न केवल दक्षिणी ध्रुव जाने की ही आज्ञा मिली, वरन् वहां जाने और रहने के लिए सभी तरह की सुविधाएं भी प्राप्त हो गईं। वाशिंगटन बुला कर हमें पूर्णतः तैयार कर दिया गया और मैं, प्रोफेसर हेमनर और टी. होसीजाकी जाने के लिए तैयार हो गए। आज्ञा मिल जाने के बाद भी कई समस्याएं सम्मुख थीं। बड़ी सख्त डाक्टरी की गई। परंतु अंततः हमें वहां जाने की पूरी तरह से आज्ञा मिल गई। पहनने, ओढ़ने के लिए विशेष पोशाकें, पौष्टिक भोजन वगैरह का प्रबंध हुआ और हम तीनों नवंबर, 1961 में हवाई जहाज से दक्षिणी ध्रुव के लिए रवाना हुए।”

दक्षिणी ध्रुव का बर्फीला विस्तार और वह अनुसंधान यात्रा  

डा. सिरोही की आंखों के सम्मुख जैसे दक्षिणी ध्रुव का वह बर्फीला विस्तार और वहां बिताए हुए चार महीने एक बार फिर सजीव हो उठेः “वहां तो बर्फ ही बर्फ है और एक चरम खामोशी। यह देखिए….” कह कर वे स्वयं द्वारा खींचा गया एक फोटोग्राफ दिखाने लगे।

“प्रयोगों हेतु आपको क्या-क्या साथ ले जाना पड़ा?” पूछा, तो वे हंस पड़े “वहां के लिए तो हमें मिट्टी भी साथ ले जानी पड़ी, सोयाबीन के पौधे उगाने के लिए, क्योंकि वहां तो मिट्टी भी नहीं है। अपने प्रयोगों हेतु हमने चार चीजें साथ ली थीं- हेम्स्टर्स (विशेष चूहे), ड्रोसोफिला मक्खियां, न्यूरोस्पोरा फफूंद तथा सोयाबीन। पौधों में कुछ खास तरह की गतियां (मूवमेंट्स) होती हैं, जैसे दिन में पत्तियों का उठना और रात को गिरना। ऐसी जैविक गतियों के बारे में दो मत हैं। एक यह कि ऐसा पृथ्वी के घूमने से होता है और दूसरा स्वनियंत्रित रूप से। जैविक घड़ियों की गति पृथ्वी के घूमने से होती है अथवा नहीं- यही हमें वहां सिद्ध करना था। हेम्स्टर चूहे दिन में आराम करते हैं और रात को दौड़ते भागते हैं, न्यूरोस्पोरा फफूंद में हर रात के हिसाब से वृत्तों का निर्माण (जोनेशन) होता है, ड्रोसोफिला में अंडों से बच्चे बनने की अवस्था में होने वाली गति और सोयाबीन की पत्तियों में रात और दिन को पत्तियों के गिरने-उठने की गतियां क्या पृथ्वी के घूमने से होती हैं?….घूमने वाली तमाम मेजें भी हम लोग साथ ले गए थे।”

”हां तो ये सारा साज-सामान लेकर हम रवाना हुए। टी. होशीजाकी को हमने मकमर्डो पाइंट पर छोड़ दिया। मैंने तथा प्रोफेसर हेमनर ने वहां से 1300 मील आगे एमंडसन-स्काट बेस की ओर फिर हवाई यात्रा प्रारंभ की। जहाज वहां कुछ मिनटों के लिए ही रूक पाता है और वह भी इंजन को चलता हुआ रखकर ही, अन्यथा फिर तो स्टार्ट भी नहीं हो सकता। जहाज पर भी पहिए नहीं लगे होते। उनके स्थान पर ‘स्की’ होते हैं, जो बर्फ की किसी लंबी पट्टी पर स्कीइंग करते हुए से फिसल कर रुकते हैं। मकमर्डो बेस पर तो बर्फ जमे रौस सागर का ही हवाई अड्डे के रूप में उपयोग करते हैं।“

“….वहां पहुंचने पर देखा बस बर्फ ही बर्फ का विस्तार। प्रयोगशाला की आवश्यकता थी। इसकी भी मजेदार बात है। अमेरिकी नौसेना के लोगों ने प्रयोगशाला के लिए हमें अपना मोटर गैराज दे दिया। सारा काम तो वहां खुद ही करना पड़ता था। वह मोटर गैराज हमने साफ किया। तख्ते-परदे लगा कर प्रयोगशाला का निर्माण किया। बड़ी इल्लतबाजी और फिर उतनी ठंड।…और हां, काम वहां ज्यादा नहीं किया जा सकता। यह पहले भी बता दिया गया था। बड़ी ऊब हुई क्योंकि एक मिनट काम फिर चाय। यह अतिशयोक्ति नहीं है। मैं तो तंग आ गया था और अक्सर झल्ला पड़ता था कि ‘सिर्फ एक मिनट काम और फिर चाय!’ परंतु यह कितना जरूरी था जल्दी समझ में आ गया।”

“हिदायत के प्रतिकूल और आदतन प्रो. हेमनर जल्दी-जल्दी काम करने लगे और थोड़ी ही देर में हांफते हुए गिर पड़े। हालत यह थी कि हम उन्हें खड़ा करते और वह फिर गिर पड़ते। आराम के बाद ही खड़े रह सके। इसलिए वहां काम धीरे करना बहुत ही जरूरी था। उस स्थान की ऊंचाई थी लगभग 10,000 फीट। हवा की परत पतली होने से आक्सीजन की भी कमी थी। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है और शरीर में ऊर्जा जल्दी समाप्त हो जाती है। शरीर में ‘एनर्जी’ जमा रखने के लिए धीरे-धीरे काम करना पड़ता है। बर्फ के भीतर अपनी कोठरियों में बैठे रहने के अतिरिक्त और कोई काम नहीं। इसलिए प्रयोगों के काम से छूटने पर बड़ी मुश्किल होती थी। दुनिया भी वहां उतनी ही बड़ी थी- विभिन्न गतियों में घूमती मेजों पर सोयाबीन के पौधे, ड्रोसोफिला मक्खियां, चूहे और फफूंद, बाहर बर्फ, और हम।”

“आदमी वहां बंदी की तरह महसूस करता है। महीनों लंबे दिन और वैसी ही रातें। तब तो वहां दिन चल रहा था। परदे खोल लेने पर हम दिन मान लेते थे और बंद करने पर रात। न्यूजीलैंड की घड़ियों के समयानुसार हमने अपने दिन और रातें निश्चित कर रखीं थीं। ..घर की याद भी खूब आती थी। पढ़ना-लिखना ही मुख्य काम। कई बार आदमी वहां पागल हो जाता है। एकदम खामोशी, बंद कोठरियां, बाहर निर्जन बर्फ का विस्तार और कहीं कोई नई बात नहीं। इसी एक रसता से बुरी तरह घबरा कर आदमी मानसिक संतुलन खो बैठता है।…दिनों तक चिट्ठी-पत्री भी नहीं। मौसम खराब रहने पर तो हवाई सेवा भी कई दिनों तक बंद रह जाती है।”

“…परंतु हम तो अपने प्रयोगों के लिए गए थे। हर किस्म की सुविधाएं हमें दी गई थीं। ऊबने पर फिल्में देखते थे। एक कोठरी ही हमने फिल्में देखने के लिए बना रखी थी। मैंने अमेरिका में सात-आठ साल रहकर भी उतनी फिल्में नहीं देखी होंगी जितनी  सिर्फ दक्षिणी ध्रुव में देखीं। एक दिन तो दिन भर में (बारह घंटे) छह फिल्में देख डालीं।…बर्फ पिघला-पिघला कर खाने-नहाने के लिए पानी बनाते थे। हफ्ते में एक बार नहाना। तीन-तीन, चार-चार बार दिन में खाना पड़ता था। बहुत भूख लगती थी। प्यास बुझाने के लिए बहुत बीयर पीनी पड़ती थी। खाना पकाने वगैरह में रसोइए की मदद करते। बर्तनों को धोने वगैरह की तो बारी लगती थी।“…डा. सिरोही के चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान आ गई जैसे उतनी परेशानियों में भी काम करने में एक अलग किस्म का आनंद पाया हो।

“…वहां के बारे में तो कितनी ही बातें हैं। अपनी विशेष पोशाक पहन कर हम घूमने बाहर निकलते थे। ठंड से नाक का अगला भाग बिल्कुल जम जाता था। और, वहां दाढ़ी के सिवा तो कुछ उगता नहीं! कोई भी चीज आप बर्फ में फेंकना चाहें, वह वैसे ही सुरक्षित रह जाएगी। मुझे एक फोटोग्राफिक पेपर का पांच वर्ष पुराना टुकड़ा मिला था और उपयोग में आ गया। स्काट के सुरक्षित कैंप में तो करीब पचास साल पुराने अधखाए बिस्किटों के टुकड़े तक वैसे ही पड़े थे।”

“….एमंडसन-स्काट बेस पर मैं दो महीने रहा। वहीं सारे प्रयोग किए और अंत में सिद्ध किया कि जैविक घड़ियों पर पृथ्वी के घूमने का कोई असर नहीं पड़ता है। बाद में डा. हेमनर भी चले गए और वहां अपने ग्रुप में मैं अकेला रह गया।”

“…..लौटती बार हवाई जहाज से जाने से मना कर दिया। मैंने कहा कि इस बार समुद्री यात्रा करूंगा। जल यात्रा भी शरीर थरथरा देने वाली रही। ठंड से नहीं, डर से। आइस ब्रेकर जहाज से लौटना पड़ता है। इसके भीतर पानी का टैंक होता है। पानी पंप करने से जहाज एक बार एक ओर और फिर दूसरी ओर लुढ़कता है और बर्फ काटता है। इससे बड़े झटके लगते हैं…सिडनी पहुंचने तक करीब 15 दिन की यात्रा भी बड़ी मजेदार रही, पर सिहरा देने वाली। सिडनी पहुंच कर तो खूब आस्ट्रेलिया घूमा। और, फिर भारत आ गया। मार्च 1963 से इस कृषि अनुसंधान संस्थान में हूं।….” डा. सिरोही ने मुलाकात को अंतिम स्पर्श देते हुए कहा।

 

(धर्मयुग 18 जून, 1967 से )

लेखक

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

(देवेंद्र मेवाड़ी)

देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है।

वरिष्ठ लेखक और विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी विगत 50 वर्षों से विज्ञान कथाओं, मार्मिक संस्मरणों से साहित्यिक रचनाधर्मिता से आम जनता के लिए विज्ञान लिख रहे हैं। विज्ञान पर 20 से अधिक पुस्तकें लिख चुके मेवाड़ी सभी पाठकों को किस्सागोई अंदाज में विज्ञान समझा रहे हैं।

नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में जन्मे 73 वर्षीय मेवाड़ी वनस्पति विज्ञान में एमएससी, हिंदी में एमए, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं। ‘मेरी यादों का पहाड़’ उनका आत्मकथात्मक संस्मरण है। उनके दीर्घकालीन सक्रिय विज्ञान लेखन ने समाज में विज्ञान की जागरूकता फैलाई है।

मेवाड़ी के ही शब्दों में ‘वे साहित्य की कलम से विज्ञान लिखते हैं,’ इससे उनका लिखा विज्ञान सरस होता है। आमजन को किस्से-कहानी की तरह रोचक लगता है। लेखन के इन प्रयोगों को इनकी प्रमुख कृतियों में बखूबी देखा जा सकता है। इनमें ‘विज्ञान और हम’, ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी विज्ञान डायरी’ ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि शामिल हैं। मेवाड़ी ने कई विज्ञान पत्रिकाओं, वैज्ञानिक पुस्तकों का संपादन, अनुवाद भी किया है।

इनके स्तरीय विज्ञान लेखन के लिए इन्हें अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का प्रतिष्ठित आत्माराम पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का ‘ज्ञान-प्रौद्योगिकी सम्मान’, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार का राष्ट्रीय विज्ञान लोकप्रियकरण पुरस्कार, भारतेंदु राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार आदि शामिल हैं। वह 15,000 से अधिक बच्चों को अपनी किस्सागोई शैली से विज्ञान की दुनिया समझा चुके हैं।

वे दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इसी तर्ज पर रचनात्मक शिक्षक मंडल उत्तराखंड में स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक चेतना जगाने, नए सांस्कृतिक मूूल्यों से रूबरू कराने में लगा है।

पताः सी-22, शिव भोले अपार्टमेंट्स, प्लाट नं. 20, सैक्टर-7 द्वारका फेज-1 नई दिल्ली- 110075

E-mail: dmewari@yahoo.com

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6 विचार “दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक&rdquo पर;

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

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