2018 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : जेम्स पी एलिसन(James P. Allison) और तासुकू होंजो (Tasuku Honjo)


2018 चिकित्सा नोबेल कैंसर थेरपी विकसित करनेवाले जेम्स पी एलिसन(James P. Allison) और तासुकू होंजो (Tasuku Honjo) कोप्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कारों की लिस्ट में इस साल पहली घोषणा चिकित्सा के क्षेत्र के लिए हुई। इस बार चिकित्सा के क्षेत्र में यह पुरस्कार दो लोगों को सामूहिक तौर पर दिया जा रहा है। जेम्स पी एलिसन(James P. Allison) और तासुकू होंजो((Tasuku Honjo) को कैंसर थेरपी की खोज के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है। कैंसर की दुर्लभ बीमारी की इलाज के लिए दोनों वैज्ञानिकों ने ऐसी थेरपी विकसित की है जिससे शरीर की कोशिकाओं में इम्यून सिस्टम को कैंसर ट्यूमर से लड़ने के लिए मजबूत बनाया जा सकेगा।

नोबेल कमेटी के बयान के अनुसार एलीसन और होंजो ने अपनी खोज मे यह दिखाया कि कुछ विशिष्ट रणनितियों के द्वारा प्रतिरक्षा प्रणाली की कार्य गति को धीमा कर कैंसर का इलाज किया जा सकता है। इस पुरस्कार मे उन्हे 90 लाख स्विडिश क्राउन(10 लाख अमरीकी डालर दिये जायेंगे)।

हर वर्ष दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कारो मे चिकित्सा नोबेल पहला होता है। यह पुरस्कार विज्ञान , साहित्य और शांति के लिये दिये जाते है। इन पुरस्कारो को डायनामाईट के आविष्कारक अल्फ़्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार 1901 से दिया जा रहा है।

नेगेटिव इम्यून रेग्यूलेशन के इनहिबिशन के ज़रिये कैंसर थेरेपी की खोज के लिए संयुक्त रूप से जेम्स एलिसन तथा तासुकू हॉन्जो को मेडिसिन का नोबल पुरस्कार दिया गया।

नेगेटिव इम्यून रेग्यूलेशन के इनहिबिशन के ज़रिये कैंसर थेरेपी की खोज के लिए संयुक्त रूप से जेम्स एलिसन तथा तासुकू हॉन्जो को मेडिसिन का नोबल पुरस्कार दिया गया।

एलीसन और होंजो ने ऐसे प्रोटीनो का अध्ययन किया जोकि ट्युमर कोशीकाओ के आक्रमण से शरीर और उसके प्रतिरक्षा प्रणाली कोशीकाओ की रक्षा प्रभावी रूप से करते है। इन प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं को T कोशिका भी कहते है।

एलीसन टेक्सास विश्वविद्यालय(University of Texas) के एम डी एंडरसन कैसर केंद्र(MD Anderson Cancer Center) मे प्रोफ़ेसर है। उन्होने एक ऐसे प्रोटीन का अध्ययन किया जोकि प्रतिरक्षा प्रणाली(immune system) की कोशिकाओं के लिये ब्रेक का कार्य करता है। उन्होने पाया कि यदि इस ब्रेक को ह्टा दिया जाये तो प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाये कैंसर ट्युमर कोशीकाओं से बचाव बेहतर रूप से कर पायेंगी।

क्योटो विश्वविद्यालय मे 1984 से कार्यरत होंजो ने स्वतंत्र रूप से से एक ऐसे अन्य प्रोटीन की खोज की जो प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं के लिये ब्रेक का कार्य करता है लेकिन इसकी कार्यविधि एलीसन द्वारा खोजे प्रोटीन से भिन्न है।

इनका शोध जानलेवा बीमारी कैंसर के इलाज में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इनके अनुसार हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ही कैंसर से लड़ सकती है। इससे कैंसर के इलाज के लिए नए दरवाजे खुल गए हैं। अब तक कैंसर का इलाज शली चिकित्सा, विकिरण और कीमोथेरपी तक सीमित था। अब इसे इलाज का चौथा चरण माना जा रहा है।

कई लोगों के लिए कैंसर एक लाइलाज बीमारी है। इसका नाम सुनकर ही लोग सिहर उठते हैं। क्या आम और क्या खास, यह बीमारी हजारों लोगों की जिंदगी लील चुकी है। ऐसे में जो शरीर कैंसर के आगे लाचार हो जाता है, अगर वही इस बीमारी के सामने हथियार बन जाए तो? इस साल के नोबेल विजेताओं के रिसर्च के अनुसार शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली में कैंसर से लड़ने की क्षमता है। बस इसे बढ़ाने की जरूरत है। इस तरह कैंसर थेरपी में एक नया सिद्धांत स्थापित हुआ है। डॉ. एलिसन और होन्जो ने अलग-अलग काम करते हुए 1990 में यह सिद्ध किया था कि कैसे शरीर में मौजूद कुछ प्रोटीन इम्यून सिस्टम के टी-सेल पर ‘ब्रेक’ का काम करते हैं और उन्हें कैंसर सेल्स से लड़ने से रोकते हैं। ऐसे प्रोटीन को निष्क्रिय करके उन सेल्स की कैंसर से लड़ने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इस तरह हमारा शरीर खुद ही कैंसर की दवा बन सकता है।

इस नोबेल पुरस्कार पर  डा स्कंद शुक्ला की टिप्पणी:

2018 के नोबेल पुरस्कार की बात को  आगे बढ़ाते है। जिन दो लोगों को यह पुरस्कार मिला है , उन्होंने दो अणुओं पर काम किया है। जेम्स पी.एलिसन और तासुको होंजो का शोध जिन दो अणुओं पर है , वे कैंसर-कोशिकाओं के वे प्रमाण-पत्र हैं , जिनसे वे हमारे शरीर की रक्षक लिम्फोसाइटों के जूझा करते हैं और उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं।

आप इसे ऐसे समझिए। कैंसर-कोशिकाएँ मानव-शरीर की ही वे कोशिकाएँ हैं , जिनका अपनी वृद्धि पर कोई नियन्त्रण नहीं है। ये सामान्य कोशिकाओं से आहार और स्थान के लिए प्रतियोगिता करती और उन्हें पिछाड़ देती हैं। अन्ततः यही वह कारण होता है , जिसके कारण मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

ऐसा नहीं है कि हमारा प्रतिरक्षा-तन्त्र इन कोशिकाओं से लड़ता नहीं या उन्हें नष्ट करने की कोशिश नहीं करता। लेकिन अगर पुलिसवाले किसी अपराधी को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं , तो अपराधी भी शातिर है और वह अपनी पहचान छिपाने की फ़िराक में है। सो कई कैंसर कोशिकाएँ इसी तरह से शरीर के इन रक्षक लिम्फोसाइटों को चकमा दिया करती हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली कोशीका(T Cell) के ब्रेक को खोल देने से वे कैंसर कोशीकाओं को नष्ट करना आरंभ कर देती है।

प्रतिरक्षा प्रणाली कोशीका(T Cell) के ब्रेक को खोल देने से वे कैंसर कोशीकाओं को नष्ट करना आरंभ कर देती है।

कैंसर से लड़ने के दो और उपाय

कैंसर से लड़ने के दो और उपाय

कैंसर-कोशिकाओं की सतह पर अन्य सामान्य कोशिकाओं की ही तरह अपने कुछ एंटीजन नामक प्रोटीन उपस्थित होते हैं , जिन्हें वे टी लिम्फोसाइटों ( लिम्फोसाइटों का एक प्रकार ) को प्रस्तुत करती हैं। इन प्रोटीनों को कैंसर कोशिकाएँ एमएचसी 1 नामक अणु में बाँधती हैं और टी सेल रिसेप्टर से जोड़ देती हैं , जो टी लिम्फोसाइट की सतह पर मौजूद है। इस तरह से एक एमएचसी 1 + एंटीजन + टी सेल रिसेप्टर का जोड़ बन जाता है। शरीर की हर कोशिका को अपनी पहचान टी लिम्फोसाइटों को देनी ही है , यह एक क़िस्म का नियम मान लीजिए।

अब इस सम्पर्क के बाद कैंसर को कोशिकाओं पर कुछ अन्य अणु भी उग आते हैं। ये अणु सहप्रेरक ( को-स्टिम्युलेटरी ) हो सकते हैं और सहशमनक ( इन्हिबिटरी ) भी। सहप्रेरक अणु सीडी 80 और सीडी 86 हैं। कैंसर-कोशिका पर मौजूद इस अणु से जब लिम्फोसाइट जुड़ेगी , तो वह आक्रमण के लिए उत्तेजित होकर तैयार हो जाएगी। सहशमनक अणु सीटीएलए 4 और पीडी 1 हैं। इन अणुओं से लेकिन जब लिम्फोसाइट जुड़ती हैं , तो एक अलग घटना होती है। अब ये लिम्फोसाइट जो पहले कैंसर-कोशिकाओं को सम्भवतः मारने की तैयारी में थीं , निष्क्रिय हो जाती हैं। यानी एमएचसी 1 + एंटीजन _ टी सेल रिसेप्टर के बाद हुए इस दूसरे सम्पर्क ने रक्षक लिम्फोसाइट के इरादे ऐसे बदले कि उसने दुश्मन को मारने से मना कर दिया। अब शरीर क्या करे बेचारा ! कैंसर ने तो शरीर के सैनिकों को चक़मा दे दिया !

तो इस तरह से फिर समझिए :

  1.  एमएचसी 1 + एंटीजन ( कैंसर-कोशिका पर ) जुड़ा लिम्फोसाइट के टी सेल रिसेप्टर से ( पहला चरण )।
  2. फिर अगर सीडी 80 या सीडी 86 ( कैंसर-कोशिका पर ) जुड़ा लिम्फोसाइट से तो हुआ लिम्फोसाइट का उत्तेजन और वह हुआ आक्रमण के लिए तैयार और उनसे किया कैंसर-कोशिका को नष्ट। ( दूसरी सम्भावना , जो कैंसर-कोशिका को मारने की सफलता देती है। )
  3. लेकिन अगर सीडी 80 और 86 की जगह लिम्फोसाइट जुड़ गया कैंसर-कोशिका की सीटीएलए 4 या पीडी 1 से तो वह निष्क्रिय हो गया। ( दूसरी सम्भावना जो कैंसर-कोशिका को मारने की असफलता देती है। यानी कैंसर बच निकलता है।)
    ( ज़ाहिर है कैंसर की कोशिकाएँ स्मार्ट हैं। वे अपनी देह पर ज़्यादा-से-ज़्यादा सीटीएलए 4 और पीडी 1 उगाएँगी , न कि सीडी 80/86 ! उन्हें पहचान कराकर अपनी , मरना थोड़े ही है लिम्फोसाइटों के हाथों ! )

अब यहाँ एलिसन और होंजो की जोड़ी आती है मैदान में। वे ऐसी कुछ दवाएँ बनाते हैं , जो कैंसर-कोशिकाओं पर उग आये सीटीएलए 4 और पीडी 1 का लिम्फोसाइटों से सम्पर्क ही न होने दें। उनसे पहले ही जुड़ जाएँ। नतीजन लिम्फोसाइट गुमराह नहीं होंगी और कैंसर-कोशिकाओं को सामान्य रूप से मार सकेंगी। इसी काम के द्वारा विज्ञान कई कैंसरों से लड़ने में कामयाब होता रहा है और इसी तकनीकी को इम्यूनोथेरेपी कहा गया है।

ऐसा नहीं है कि इम्यूनोथेरेपी नयी है। यह कई सालों से प्रचलन में है। इसके अन्तर्गत ढेर सारी दवाएँ उपलब्ध हैं। नोबेल पुरस्कार वैसे भी जिस काम पर मिलता है , उसे मनुष्य काफी समय से इस्तेमाल कर रहे होते हैं। केवल सैद्धान्तिक कामों पर नोबेल नहीं दिये जाते ; उनका व्यापक रूप में मानव-हितकारी होना बहुत ज़रूरी है।

5 प्रकार के कैंसर इम्युनोथेरेपी इलाज

5 प्रकार के कैंसर इम्युनोथेरेपी इलाज

पुनश्च : अगर आप इस लेख को पढ़कर नहीं समझ पाये , तो कोई आश्चर्य नहीं। अच्छे-अच्छे डॉक्टरों के ये बातें नहीं पता होती हैं। यहाँ तक कि हम-(डा स्कंद शुक्ला)जैसे छात्र इन बातों को पहली बार जब पढ़ते थे , तो दिमाग टन्नाने लगता था। सो अगर धैर्य हो , तो फिर से पढ़िए। नहीं हो , तो न सही। )

नोबेल कमेटी के अनुसार इन दोनो वैज्ञानिको की खोज कैंसर से लड़ाई मे एक मील का पत्थर है।

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3 विचार “2018 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : जेम्स पी एलिसन(James P. Allison) और तासुकू होंजो (Tasuku Honjo)&rdquo पर;

  1. पिगबैक: कैंसर के इलाज में कारगर ‘इम्यून चेकप्वाइंट थेरेपी’। – Hello Paper

  2. पिगबैक: कैंसर के इलाज में कारगर ‘इम्यून चेकप्वाइंट थेरेपी’। – Hello Paper

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