सोशल मीडिया पर छद्म विज्ञान के ख़तरे


लेखक : अभिषेक मिश्र

साधारणतया आजकल लोग अपने शुभचिंतकों, करीबियों के सुझावों को भले नजरंदाज कर दें पर सोशल मीडिया पर उपलब्ध ज्ञान को बड़ी गंभीरता से लेते हैं। धर्म, समाज, ज्ञान, विज्ञान, स्वास्थ्य आदि कई बिंदुओं से संबंधित जानकारियाँ सोशल मीडिया पर आती रहती हैं, और ज्यादातर लोग बिना उनकी वास्तविकता को जाने धड़ल्ले से शेयर करते रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अनजाने में आप इससे कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं! सोशल मीडिया पर ज्यादातर उपलब्ध स्वास्थ्य या विज्ञान संबंधी जानकारी मिथ्या, भ्रामक और अवैज्ञानिक होती है; जिन पर निर्भरता आप या आपके किसी करीबी को ख़तरे में भी डाल सकती है।

हाल ही जून माह में एक संदेश काफी साझा(शेयर) हुआ जिसमें विषुव(ईक्विनौक्स) के मद्देनजर डिहाइड्रेशन होने और पानी ज्यादा पीने का सुझाव दिया गया। मई-जून के गरम मौसम में डिहाइड्रेशन होने की संभावना और इसे ध्यान में रखते पानी पीने में कोई बुराई नहीं, मगर इसके पीछे जो अवैज्ञानिक रूप से विषुव की चर्चा की गई, वो अनुचित था। सामान्य ज्ञान से अवगत कोई भी व्यक्ति जानता है कि विषुव वर्ष में दो बार 20/21 मार्च और 22/23 सितंबर को पड़ता है, जून में अयनांत(सोलस्टाइस) होता है पर संदेश को सबसे पहले अग्रेसित करने की होड़ में तथ्यों को देखता कौन है! ऐसे में कई बार घातक संदेश चर्चा में आ जाते हैं, और आम जन जिसे लगता है कि इंटरनेट पर है तो गलत थोड़े ही होगा, इसके छलावे में आ जाता है।

इसी मौसम में शीतपेय(कोल्ड ड्रिंक) पीने से एड्स, एन्थ्रोक्स… आदि जैसी बीमारियाँ फैलने के संदेश भी वायरल हो जाते हैं। ऐसे संदेश वायरल होने के पीछे कुछ व्यावसायिक प्रतिद्वंदीता रही हो या शीतपेय जो है तो अनावश्यक ही के प्रति लोगों को आगाह करना; मगर इन्हें प्रचलित करने के लिए छद्म विज्ञान का सहारा लेना गलत है। इसी प्रकार डायबिटीज़ के मरीजों के लिए उबले गेहूँ को अंकुरीत कर खाने का सुझाव दिया गया, बिना यह सोचे कि उबला अनाज अंकुरित कैसे होगा! इसी प्रकार कभी डेंगू, कभी हृदय रोग, कभी सर्पदंश या किसी और बीमारी के आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, एलोपैथिक किसी भी निराकरण की खबरें आती रहती हैं। इस देश में ‘नीम हक़ीम, ख़तरे जान’ की कहावत हमारी परंपरा में यूँ ही नहीं आ गई है। अब ये नीम- हक़ीम हमारी ही असावधानीवश तकनीक का सहारा लेकर हमारे जीवन में घुसपैठ करने को तैयार बैठे हैं। सतर्क रहें, सावधान रहें। आप भी तकनीक का सहारा लें। जब आपके स्मार्टफोन या लैपटॉप, कंप्यूटर आदि पर ये सूचनाएँ पहुँच जाती हैं तो इन्हीं माध्यमों का सहारा लेकर एक बार इनकी सत्यता भी जाँच लें। गूगल जैसे सर्च इंजन की सहायता लें। इंटरनेट का सहारा लेंगे तो check4spam.com जैसी वेबसाइट्स भी मिलेंगीं जिनपर स्वास्थ्य के अलावा कई अन्य विषयों पर फैले संदेशों की सच्चाई से अवगत हो सकेंगे।

भारत में क्यों है यह एक बड़ी समस्या?

पूरे विश्व में व्हाट्सऐप के तकरीबन 150 करोड़ उपभोक्ता हैं। इनमें 20 करोड़ भारत में माने जाते हैं। इसी नव वर्ष भारत में शुभकामना भेजने की बड़ी संख्या और इसके फलस्वरूप व्हाट्सऐप का धीमा हो जाना काफी चर्चा का विषय बना था। व्हाट्सऐप फ़र्जी समाचारो( फेक न्यूज) का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है। इस पर संदेश भेजने वाले मूल व्यक्ति की पहचान भी कठिन है। भारत में ही लगभग 25 करोड़ फेसबुक उपभोक्ता हैं। यह आबादी और बढ़ ही रही है। ऐसे में वैज्ञानिकता और सूझबूझ के अभाव में एक भ्रामक संदेश इस विविधतापूर्ण देश में कितनी समस्याएँ खड़ी कर सकता है, आप स्वयं समझ सकते हैं।

एक आकलन के अनुसार भारत में 20 करोड़ स्मार्ट फोन हैं, तो इसपर निर्भर आबादी का अंदाजा भी लगा सकते हैं। इसमें भी एक बड़े भाग का अशिक्षित या अल्पसाक्षर होना उन्हें ऐसे संदेशों का आसान शिकार बना देता है। जागरूकता की कमी से कई बार कानून व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो जाती है। उदाहरण के लिए कराची के एक ऐड वीडियो के वायरल हो जाने के प्रभावस्वरूप भारत के कई भागों में लोगों के द्वारा बच्चा चोर समझ कई जगह हिंसक घटनाएँ हुईं। इसी प्रकार भारत विश्व के उन गिने-चुने देशों में है जहाँ चिकित्सा की एक प्रामाणिक पद्धति की जगह विविध विकल्प और एलोपैथिक ईलाज के महंगा होने के कारण आम जनता की उसकी ओर ललक भी है। यही प्रवृत्ति यहाँ नीम-हकीमों को प्रश्रय देती है जो बाद में आपकी जान की आफत बन जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि समय रहते किसी भी ईलाज को अपनाने से पहले एक बार विश्वस्त तरीकों से तथ्यों की जाँच कर लें।

फ़र्जी समाचार(फेक न्यूज) एक वैश्विक समस्या

राजनीतिक मसला हो या सामाजिक अथवा चिकित्सकीय- फ़र्जी समाचार एक वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है। भारत चाहे इसे लेकर जिस भी कारण से उतना गंभीर न हुआ हो, पर कई देशों में इसपर समय रहते नियंत्रण की कवायद आरंभ हो चुकी है। फ्रांस में फ़र्जी समाचार के विरुद्ध एक नया बिल लाया जा रहा है, जिसमें किसी खबर के झूठा प्रमाणित होने पर सरकार उस मीडिया प्रतिष्ठान पर प्रतिबंध लगा सकती है, साथ ही सोशल नेटवर्किंग साईट पर भी जिम्मेदारी डाली जाएगी कि इन भ्रामक ख़बरों के प्रसारित होने पर इसकी जानकारी सरकार को दे तथा अपनी कार्यवाई को सावर्जनिक करे। ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, मलेशिया आदि जैसे कई देश अब इस दिशा में ठोस पहल कर रहे हैं। देर-सबेर भारत में भी यह कार्यवाई होगी, किन्तु इसका प्रभावी होना जनता की जागरूकता और सहयोग पर ही निर्भर होगा। इसलिए उचित होगा कि जनता समय रहते इस दिशा में जागरूक हो, इंटरनेट पर उपलब्ध हर चीज को सत्य समझ अंधविश्वास न करे और सूझ-बूझ के साथ सही निर्णय ले। जानकारी और सावधानी में ही आपकी सुरक्षा निहित है।

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2 विचार “सोशल मीडिया पर छद्म विज्ञान के ख़तरे&rdquo पर;

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