भविष्य की ऊर्जा : नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) से पूरी होगी ऊर्जा की आवश्यकतायें


मानव को विकास चाहिए। विकास के लिए आवश्यक है ऊर्जा। ऊर्जा हमें ईंधन से मिलती है। आज दुनिया में कई तरह के ईंधन काम में लाए जा रहे हैं। सबसे ज़्यादा जिनका इस्तेमाल हो रहा है वो है कोयला और तेल। दोनों ईंधन ज़मीन के अंदर से निकालकर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। मगर समस्या ये है कि दोनों का भंडार सीमित है। एक समय ऐसा आएगा जब दोनों ख़त्म हो जाएंगे। साथ ही दोनों से प्रदूषण बहुत होता है। इसीलिए तमाम देश परमाण्विक ईंधन पर भी ज़ोर दे रहे हैं। मगर परमाण्विक विद्युत संयत्र लगाना बेहद महंगा है। दूसरे इसके सह-उत्पाद के तौर पर निकलने वाले रेडियो सक्रिय कचरे को ठिकाने लगाना भी बड़ी चुनौती है।

इसीलिए काफ़ी दिनों से वैज्ञानिक एक ऐसे ईंधन की तलाश कर रहे हैं। जिससे पर्यावरण को भी नुक़सान न हो और उसका कोई खतरनाक सह-उत्पाद भी न हो। कुछ लोगों को ये तलाश परमाणु संलयन में समाप्त होती दिखायी देती है।

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नाभिकिय संलयन

संलयन वो नाभिकिय प्रतिक्रिया है जिसमें दो परमाणुओं का संलयन होने से ऊर्जा निकलती है। जैसे परमाण्विक विखंडन में एक परमाणु के टूटकर अनेक परमाणु के रूप मे बिखरने से बेहिसाब ऊर्जा निकलती है। वैसे ही जब दो परमाणु, एक दूसरे से जुड़ते हैं तो दोनों के मिलन से भी बहुत ऊर्जा निकलती है। परमाण्विक विस्फ़ोट से भी ज़्यादा। इसी तकनीक से हाइड्रोजन बम बनाए जाते हैं।

सूरज, जो धरती पर ऊर्जा का इकलौता स्रोत है, वहां भी इतनी आग संलयन के चलते ही है। वैज्ञानिकों को लगता है कि अगर मानव दो परमाणुओं का मेल कराकर उसमें से ईंधन बना सके तो ऊर्जा का इससे अच्छा स्रोत कोई और हो नहीं सकता। इससे प्रदूषण भी नहीं फैलेगा और इसके ख़त्म होने का भी कोई ख़तरा नहीं होगा। मानव की ऊर्जा की सारी ज़रूरतें इससे पूरी हो सकती हैं।

जब दो हल्के परमाणु नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के परमाणु नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है। जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन के समीकरण E = mc2 से ज्ञात करते हैं। तारों के अन्दर यह क्रिया निरन्तर जारी है। सबसे सरल संयोजन की प्रक्रिया है चार हाइड्रोजन परमाणुओं के संयोजन द्वारा एक हिलियम परमाणु का निर्माण।

nuclearfusionसूर्य से निरन्तर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का स्रोत वास्तव में सूर्य के अन्दर हो रही नाभिकीय संलयन प्रक्रिया का ही परिमाण है। सर्वप्रथम मार्क ओलिफेंट निरन्तर परिश्रम करके तारों में होने वाली इस प्रक्रिया को 1932 में पृथ्वी पर दोहराने में सफल हुए, परन्तु आज तक कोई भी वैज्ञानिक इसको नियंत्रित नहीं कर सका था। इसको यदि नियंत्रित किया जा सके तो यह ऊर्जा प्राप्ति का एक अति महत्त्वपूर्ण तरीका होगा। पूरे विश्व में नाभिकीय संलयन की क्रिया को नियंत्रित रूप से सम्पन्न करने की दिशा में शोध कार्य हो रहा है, और अब इसमे सफलता प्राप्त हुयी है।

इसी नाभिकीय संलयन के सिद्धान्त पर हाइड्रोजन बम का निर्माण किया जाता है। नाभिकीय संलयन उच्च ताप (10‍7 से 1080 सेंटीग्रेड) एवं उच्च दाब पर सम्पन्न होता है जिसकी प्राप्ति केवल नाभिकीय विखण्डन से ही संभव है।

नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया सभी तारों के केंद्र मे होती है। हल्के तत्वो के परमाणु एक दूसरे से टकराकर भारी तत्व का निर्माण करते है और ऊर्जा का निर्माण होता है। यदि यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर होती है तब यह एक प्रक्रिया “प्रज्वलन(ignition)” का प्रारंभ करती है, जिसमे अधिक परमाणु आपस मे जुड़कर अधिक ऊर्जा का निर्माण करते है। इस अधिक ऊर्जा से से परमाणु केंद्रक जुड़कर और अधिक ऊर्जा का निर्माण करते है, इस तरह से यह एक श्रृंखला प्रक्रिया(Chain reaction) होती है और उस समय तक जारी रहती है जब तक नाभिकिय संलयन के लिये पर्याप्त परमाणु उपलब्ध हों। यदि इस प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके तो यह अनंत रूप से ऊर्जा प्रदान कर सकती है। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे कोई प्रदुषण नही फैलता है और इससे उत्पन्न पदार्थ रेडीयो सक्रिय नही होते है। इसलिये यह प्रक्रिया नाभिकिय विखंडन(Nuclear Fission) से कई गुणा बेहतर तकनिक है। वर्तमान मे समस्त परमाणू ऊर्जा नाभिकिय विखंडन से प्राप्त होती है।

जब से संलयन की शक्ति के बारे में पता चला है तब से ही तमाम वैज्ञानिक इस तकनीक से चलने वाले ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। फ्रांस में तो संलयन तकनीक से चलने वाला एक रिएक्टर बरसों से बनाया जा रहा है। इसका नाम है आईटर(IETR)। इस प्रोजेक्ट में कई देशों ने रकम लगाई है।

ITER

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ITER नाभिकिय संलयन रिएक्टर

भारत सहित कई देश मिल कर फ्रांस में एक ऐसा महत्वाकांक्षी रिएक्टर बना रहे हैं, जो सूर्य को धरती पर उतारने के समान होगा। किंतु, इसमें अब अपेक्षा से अधिक धन लगने जा रहा है, जो उसके भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा सकता है।

इस समय के परमाणु बिजलीघरों में बिजली पैदा की जाती है नाभिकीय विखंडन से। इसके लिए मुख्यतः यूरेनियम-235 के नाभिक को आम तौर पर न्यूट्रॉन कणों की बौछार द्वारा तोड़ा जाता है। यूरेनियम-235 के नाभिक में कुल 92 प्रोटोन और 143 न्यूट्रॉन कण होते हैं। हर विखंडन से नाभिक में प्रोटोन और न्यूट्रॉन को बाँध कर एकजुट रखने वाली 200 मिली इलेक्ट्रॉन वोल्ट के बराबर ऊर्जा मुक्त होती है। इसी ऊर्जा से बिजली पैदा की जाती है।

वैसे तो यूरेनियम-235 के नाभिक को ताप-नाभिकिय विधि से भी विखंडित किया जा सकता है या यूरेनियम की जगह प्लूटोनियम-239 का भी उपयोग हो सकता है, लेकिन इसका प्रचलन बहुत कम है। नाभिक का चाहे जिस तरह विखंडन किया जाये, उससे स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक ऐसी अदृश्य किरणें भी पैदा होती हैं, जिन्हें रेडियोधर्मी विकिरण कहा जाता है। रिएक्टर में पैदा होने वाले कचरे के बिल्कुल निरापद निपटारे का भी किसी देश के पास कोई उपाय नहीं है। यही सब नाभिकीय विखंडन पर आधारित बिजलीघरों की आलोचना का सबसे बड़ा कारण हैं।

इसीलिए वैज्ञानिक दशकों से सपने देख रहे हैं कि ऐसा रिएक्टर बनाया जाये, जिसमें परमाणु नाभिकों का विखंडन होने के बदले अनका संयोजन या संलयन हो। सूर्य में ऐसा ही होता है। इसीलिए सूर्य ऊर्जा का अक्षय भंडार है। सूर्य के भीतर की प्रचंड गर्मी से हाइड्रोजन के नाभिक लगातार आपस में जुड़ते रहते हैं। इससे एक तरफ़ हीलियम गैस बनती है और दूसरी तरफ उससे कहीं अधिक ऊर्जा मुक्त होती है, जितनी नाभिकीय विखंडन से पैदा हो सकती है।

वैज्ञानिक सोचते हैं कि नाभिकीय संलयन कहलाने वाली यह क्रिया यदि सूर्य सहित सभी तारामंडलों में संभव है, तो पृथ्वी पर मानवनिर्मित नये प्रकार के रिएक्टरों में भी संभव होनी चाहिये। इसे कर दिखाने के लिए दक्षिणी फ्रांस के कदाराश (Cadarache) नामक स्थान पर International Tokamak Experimental Reacter, संक्षेप में ITER नाम से एक संलयन रिएक्टर बानाया जाना है। जर्मनी के नोर्बेर्ट होल्टकाम्प इस परियोजना के तकनीकी निदेशक हैं:

“ITER इस समय संसार की सबसे बड़ी विज्ञान परियोजना है। उसे दिखाना है कि परमाणु नाभिकों के संलयन से ऊर्जा पैदा की जा सकती है, यानी सूर्य को ज़मीन पर उतारा जा सकता है।”

परियोजना में भारत भी सहभागी

संसार की इस सबसे मंहगी विज्ञान परियोजना में यूरोपीय संघ और अमेरिका के अतिरिक्त भारत, रूस, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं। दस साल के निर्माणकार्य के बाद इस परियोजना का संलयन रिएक्टर 2018 में बन कर तैयार होना है।

कोई 30 मीटर की ऊँचाई वाला रिएक्टर किसी पिंजड़े के आकार में लगे कई अत्यंत शक्तिशाली चुंबकों की सहायता से हाइड्रोजन गैस के एक मिश्रण को 15 करोड़ डिग्री सेल्ज़ियस तक गरम करेगा। यह मिश्रण हाइड्रोजन के ड्यूटेरियम (Deuterium) और ट्रीशियम (Tritium) कहलाने वाले दो आइसोटोपों से प्राप्त किया जायेगा, जिन्हें भारी पानी और बहुत भारी पानी भी कहा जाता है। इस अकल्पनीय तापमान पर ही हाइड्रोजन के नाभिक वह गति प्राप्त कर पाते हैं, जिस गति पर आपस में टकराने से वे जुड़ कर हीलियम का नाभिक बन सकते हैं।

“इस ऊँचे तापमान पर यदि उन्हें बार-बार टकराया जाये, तो वे एक-दूसरे के साथ गल-मिल(fuse) जाते हैं। इससे अच्छी-ख़ासी ऊर्जा मुक्त होती है।”

साफ़-सुथरी ऊर्जा

उनके जुड़ने से जो ऊर्जा मुक्त होगी, वह बिजली पैदा करने वाले टर्बाइन को चलायेगी। वैज्ञानिक कहते हैं कि संलयन रिएक्टर से प्राप्त ऊर्जा साफ़-सुथरी, अक्षय और निरापद होगी। उससे पर्यावरण या जलवायु को भी कोई हानि नहीं पहुँचेगी।

नाभिकीय संलयन के अब तक के प्रयोगों में कुछेक क्षणों के संलयन के लिए जितनी बिजली ख़र्च करनी पड़ती थी, वह संलयन से पैदा हुई बिजली की अपेक्षा कहीं कम होती थी। ITER संभवतः ऐसा पहला रिएक्टर होगा, जो सिद्धांततः खपत से कुछ अधिक ऊर्जा पैदा करेगा, हालाँकि उसकी सहायता से बनी बिजली की मात्रा फिर भी कहीं कम होगी। उसका वर्तमान डिज़ाइन ड्यूटेरियम और ट्रीशियम के आधा ग्राम मिश्रण से कोई 17 मिनट तक के लिए 500 मेगावाट बिजली पैदा कर सकने पर लक्षित है। इस दौरान वह जितनी ताप ऊर्जा पैदा करेगा, वह हाइड्रोजन को गरम करते हुए उसे प्लाज़्मा अवस्था में पहुँचाने में लगी ऊर्जा से 5 से 10 गुना अधिक होगी, लेकिन उससे बिजली नहीं पैदा की जायेगी।

प्रायोगिक रिएक्टर

ITER वास्तव में एक प्रायोगिक रिएक्टर है। उद्देश्य है यह देखना-जानना कि क्या हम भविष्य में एक ऐसा रिएक्टर बना सकते हैं, जो नाभिकीय संगलन द्वारा सतत बिजली पैदा कर सके। इसीलिए ITER का जीवनकाल केवल 20 वर्ष रखा गया है।

रिएक्टर की रूपरेखा 2001 में जब बनी थी, तब उस पर पाँच अरब यूरो ख़र्च आने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन, यूरोपीय संघ के अलावा अमेरिका, रूस, चीन, जापान, भारत और दक्षिण कोरिया के इस परियोजना में शामिल होते-होते और निर्माणकार्य की हरी झंडी दिखाते-दिखाते नवंबर 2006 हो गया।

अनपेक्षित समस्याएँ

इस बीच वैज्ञानिकों का माथा ठनकने लगा है कि रिएक्टर अब तक की रूपरेखा के अनुसार नहीं बन सकता, क्योंकि 15 करोड़ डिग्री गरम हाइड्रोजन गैस वाला प्लाज़्मा रिएक्टर की दीवारों के लिए उससे कहीं ज़्यादा आक्रामक साबित हो सकता है, जितना पहले सोचा गया था। परियोजना के तकनीकी निदेशक नोर्बेर्ट होल्टकाम्प इससे काफ़ी चिंतित हैं:

“बात इतनी आसान नहीं है। इस विशाल निर्वात चैंबर में चुंबकीय कुंडलियाँ लगानी होंगी। इसके साथ और भी कई काम जुड़े हैं। चैंबर का डिजाइन बदलना पड़ेगा, ताकि कुंडलियाँ उसमें लग सकें। इस सब में अच्छा-ख़ासा पैसा लगेगा।”

कई दूसरी जगहों पर भी मूल डिजाइन में संशोधन करने पड़ेंगे। इस बीच इस्पात, तांबे व अन्य धातुओं की क़ीमतें बहुत बढ़ गयी हैं। रिएक्टर संबंधी क़ानूनी अनुमतियाँ प्राप्त करना मँहगा और मुश्किल हो गया है। कहने का मतलब यह कि ITER की लागत पाँच से बढ़ कर दस अरब यूरो तक भी पहुँच सकती है, कहना है यूरोपीय परमाणु ऊर्जा अधिकरण यूराटोम के शोधनिरीक्षक ओक्टावी क्विन्ताना काः

“परियोजना में शामिल सभी देशो को अपना योगदान बढ़ाना होगा। यूरोप क्योंकि लागत का क़रीब आधा ख़र्च उठा रहा है, इसलिए हमें यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों को समझाना होगा कि ITER बनाया जाना कितना ज़रूरी है। हम उसे विफल होने ही नहीं दे सकते।”

क्वियान्ताना का मानना है कि यूरोप इतनी महात्वाकाँक्षी परियोजना को कतई छोड़ नहीं सकता। इस रिएक्टर की संभावनाएँ इतनी बड़ी हैं कि यूरोप उसका लाभ उठाने से वंचित नहीं रहना चाहेगा। ऐसे में। स्वाभाविक है, कि भारत को भी अपना योगदान बढ़ाने के लिए कहा जायेगा।

निजी क्षेत्र के प्रयास

नाभिकिय संलयन रिएक्टर : निजी क्षेत्र के निवेशक

नाभिकिय संलयन रिएक्टर : निजी क्षेत्र के निवेशक

IETR की सफ़लता का पूरे विश्व को बेसब्री से इंतज़ार है। मगर ये प्रोजेक्ट इतनी धीमी रफ़्तार से चल रहा है कि इसका बजट कई गुना बढ़ चुका है। साथ ही इसके हाल-फिलहाल पूरा होने की उम्मीद भी नहीं। दुनिया भर में सरकारी प्रोजेक्ट का यही हाल है। यहां तक कि अमरीका जैसे देश भी सरकारी सिस्टम के चलते अब तक कोई संलयन रिएक्टर नहीं बना सके हैं।

इसीलिए दुनिया भर के कुछ बेहद कामयाब कारोबारी, भविष्य के इस ईंधन में दिलचस्पी ले रहे हैं। ये अरबपति उन मुट्ठी भर लोगों की मदद के लिए अपनी झोली खोल रहे हैं, जो संलयन तकनीक को कामयाब करके मानवियत की मदद करना चाहते हैं।

“जनरल फ्युजन”

ऐसे अरबपति कारोबारियों में पहला नाम है अमेज़न कंपनी के मालिक जेफ बेजोस। उन्होंने कनाडा के एक संलयन ऊर्जा प्रोजेक्ट में करोड़ों का दांव खेला है।
कनाडा के वैंकूवर शहर में चल रहे इस प्रोजेक्ट का नाम है “जनरल फ्युजन”। इसके अगुवा हैं मिशेल लाबर्ज। मिशेल ने साल 2001 में लेज़र प्रिंटिंग कंपनी क्रियो की नौकरी छोड़कर संलयन तकनीक को कामयाब बनाने का अभियान शुरू किया था।

मिशेल कहते हैं कि उन्हें समझ आ गया था कि हमारी धरती को बहुत सारी ऊर्जा की ज़रूरत है, जो कोयले और तेल से नहीं पूरी होने वाली। इस चुनौती का मुक़ाबला, परमाण्विक ऊर्जा संयंत्र से भी नहीं किया जा सकता। मिशेल की नज़र में संलयन ही वो तकनीक है जिससे धरती की ऊर्जा की ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं। इसके लिए तमाम सरकारी प्रोजेक्ट चल भी रहे हैं। दिक़्क़त ये है कि उनकी रफ़्तार बेहद सुस्त है। इसीलिए मिशेल ने “जनरल फ्युजन” की शुरुआत की।

आज कनाडा के वैंकूवर में उनका प्लांट रोज़ाना, क़रीब पचास से एक सौ तक टेस्ट करता है। शहर से दूर, सुनसान इलाक़े में तोप जैसी गरज वाली मशीनें, मानव के इशारे पर शोर मचाती हैं, या फिर शांत रहती हैं।

जनरल फ्युजन नाभिकिय संलयन रिएक्टर

जनरल फ्युजन नाभिकिय संलयन रिएक्टर

संलयन तकनीक से ऊर्जा पैदा करने में दिक़्क़त जो आ रही है वो ये है कि दो परमाणुओं की टक्कर लगातार कराई कैसे जाए? और फिर इससे निकलने वाली ऊर्जा को इकट्ठा कैसे किया जाए? दो परमाणुओं को टकराने में काफ़ी ताक़त लगती है। अब तक वैज्ञानिक वो तरीक़ा नहीं निकाल पाए हैं जिससे परमाणुओं की टक्कर के बाद उनका मिलान करके जो उर्जा निकले, वो इस नाभिकिय प्रक्रिया को पूरी करने से ज़्यादा हो। ऐसा संभव है। ये बात हाइड्रोजन बम के तमाम कामयाब टेस्ट से साबित हो चुकी है। मगर, परमाणुओं के संलयन से निकलने वाली ऊर्जा को कैसे नियंत्रित करके दूसरे काम में लाया जा सके, वो तरीक़ा अब तक नहीं ढूंढा जा सका है।

वैंकूवर में “जनरल फ्युजन” की प्रयोगशाला में मिशेल और उनके साथी यही काम कर रहे हैं, वो भी दसियों साल से। अमेज़न के जेफ बेजोस ने इसी प्रोजेक्ट में पैसा लगाया है, ताकि संलयन तकनीक को कामयाब बनाने की सरकारी कोशिशों की धीमी रफ़्तार से आगे निकला जा सके। इस प्रोजेक्ट में क़रीब दो करोड़ डॉलर रुपए लगे हैं।

सिर्फ़ जेफ़ बेजोस ही नहीं, अमरीका की बड़ी निवेश कंपनी क्राइसैलिक्स, कनाडा की तेल कंपनी सेनोवस और मलयेशियाई सरकार की निवेश कंपनी ख़ज़ाना नेशनल बेरहद ने भी “जनरल फ्युजन” में पैसा लगाया है।

वैंकूवर में “जनरल फ्युजन” के ठिकाने पर कई बरस से संलयन तकनीक को कामयाब बनाने की कोशिशें जारी हैं। कंपनी के प्रमुख मिशेल लाबर्ज ने प्लाज़्मा फिजिक्स में पीएचडी की हुई है। वो कहते हैं कि उनके कई प्रयोग कामयाब रहे हैं। मिशेल लाबर्ज, संलयन तकनीक को बड़े छोटे पैमाने पर आज़मा रहे हैं। कामयाब होने की सूरत में उन्हें पैसे की कमी नहीं रहेगी।

मगर इस प्रोजेक्ट से जुड़े अमीर लोग, हॉलीवुड फिल्म ”डार्क नाइट राइज़ेज़” की याद दिलाते हैं। जिसमें कुछ अरबपति मिलकर एक वैज्ञानिक को संलयन रिएक्टर बनाने में मदद करते हैं। ताकि उससे हाइड्रोजन बम बना सकें।

ख़ैर, “जनरल फ्युजन” के अगुवा मिशेल या उनके निवेशकों का ऐसा कोई इरादा नहीं। आज मिशेल की कंपनी में 65 लोग काम कर रहे हैं। वैंकूवर में एक छोटा सा परमाण्विक रिएक्टर लगाया है। जहां पर मिशेल और उनकी टीम लगातार काम कर रही है।संलयन तकनीक के जानकार केनेथ फाउलर कहते हैं कि फिलहाल मिशेल और उनकी टीम कामयाबी के बेहद क़रीब पहुंचती लग रही है। वो आख़िरी चुनौती का सामना कर रहे हैं।वहीं अमरीकी सरकारी प्लाज़्मा फ़िज़िक्स प्रयोगशाला के डिप्टी डायरेक्टर माइकल ज़ार्नस्ट्राफ को लगता है कि मिशेल और उनके साथियों के लिए अभी दिल्ली दूर है।

वैसे आख़िर में तो “जनरल फ्युजन” की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि उनके निवेशकों का उन पर भरोसा बना रहता है या नहीं। वजह ये है कि ऐसे निवेशक दस साल के भीतर अपनी पूंजी पर फ़ायदेमंद रिटर्न चाहते हैं। मगर विज्ञान के प्रयोग इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकते।

“ट्राई अल्फ़ा”

“जनरल फ्युजन” के ठिकाने से क़रीब दो हज़ार किलोमीटर दक्षिण में एक और प्रयोगशाला है जो संलयन तकनीक से ऊर्जा पैदा करने की कोशिश कर रही है। इसका नाम है “ट्राई अल्फ़ा”। जो कैलिफोर्वनिया की ऑरेंज काउंटी में है। ये प्रयोगशाला पिछले 18 सालों से ये कोशिश बेहद ख़ुफ़िया तरीक़े से कर रही है। हाल-फिलहाल तक, बाक़ी दुनिया से संपर्क के लिए इसने कोई ज़रिया नहीं खोला था।

मगर अब ट्राई अल्फा, अपने अभियान के बारे में लोगों से जानकारी साझा कर रही है। इसके निवेशकों में माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलेन, वेंचर कैपिटल कंपनी वेनरॉक से लेकर रूसी सरकार की कंपनी रूसनैनो तक शामिल है।

TriAlpha,ट्राई अल्फा नाभिकिय संलयन रिएक्टर

ट्राई अल्फा नाभिकिय संलयन रिएक्टर

हाल के दिनों में ट्राई अल्फा ने अपने से जुड़ी कई जानकारियां उजागर की हैं। यहां तक कि पिछले साल अगस्त में मीडिया को भी बुलाया गया था ट्राई अल्फा के रिएक्टर और प्रयोगशाला को देखने के लिए। “ट्राई अल्फ़ा” कंपनी, “जनरल फ्युजन” से अलग तकनीक की मदद से संलयन ऊर्जा पैदा करने की कोशिश कर रही है।

माइकल ज़ार्नस्ट्राफ कहते हैं कि ट्राई अल्फा की तकनीक साधारण है मगर ज़्यादा विकसित नहीं है। माइकल ने पिछले साल ट्राई अल्फा के केंद्र का जायज़ा लिया था। वो कहते हैं कि संलयन के लिए आम तौर पर ड्यूटेरियम-ट्राइटियम का इस्तेमाल होता है। मगर ट्राई अल्फा बोरॉन-11 और प्रोटॉन के परमाणुओँ का मेल कराने की कोशिश कर रही है। केनेथ फाउलर कहते हैं कि ये बेहद मुश्किल है।

वैसे सभी जानकार ये मानते हैं कि संलयन तकनीक को कामयाबी से ऊर्जा पैदा करने में इस्तेमाल करने में अब तक कोई कामयाब नहीं हुआ। इसलिए ये कहना सही नहीं कि फलां तरीक़ा ग़लत है और फलां नहीं। “ट्राई अल्फ़ा” के तरीक़े में कमी भले लोग निकालें, मगर उनके पास निवेशकों की अच्छी ख़ासी फौज है। ऊर्जा कंपनियों में पैसा लगाने वाले अमरीकी निवेशक मॉरिस गुंडरसन भी इसके निवेशकों में से एक हैं। मॉरिस कहते हैं कि ट्राई अल्फा कामयाब हो न हो, उसका प्लान अच्छा है। जोखिम लेने लायक़ है।

ट्राई अल्फा और “जनरल फ्युजन” ने बड़े निवेशक भले जुटा लिए हों, मगर उनके लिए चुनौती सफ़लता नहीं, समय है। क्योंकि वेंचर कैपिटल निवेशक, दस साल से ज़्यादा वक़्त लेने वाले प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं लेते। तो अगर, ट्राई अल्फ़ा और “जनरल फ्युजन” ने वक़्त पर कामयाबी के क़दम नहीं चूमे, तो उनको पैसे का टोटा हो सकता है।

वहीं, संलयन तकनीक की कामयाबी में कितना वक़्त लगेगा, ये कहना बहुत मुश्किल है। फिर भी मॉरिस गुंडरसन उन बड़े कारोबारियों की तारीफ़ करते हैं जिन्होंने इन कंपनियों में निवेश किया है। वो कहते हैं कि जेफ बेजोस और पॉल एलेन ने बहादुरी भरा क़दम उठाया है। वो सम्मान के क़ाबिल हैं। हालाकिं वो अपने कारोबार जैसी कामयाबी संलयन ऊर्जा की दुनिया में दोहरा पाएंगे, इसमें संदेह है। ये हज़ार गुना ज़्यादा मुश्किल काम है।

हालांकि केनेथ फाउलर और माइकल ज़ार्नस्ट्राफ जैसे जानकार कहते हैं कि बड़े निवेशकों का दिलचस्पी लेना ही इस बात का सबूत है कि हम संलयन से ऊर्जा पैदा करने के बेहद क़रीब हैं। विश्व को बेकरारी से इस सफ़लता का इंतज़ार है। हमें आज इसकी सख़्त ज़रूरत भी है। ख़राब होते पर्यावरण और ख़त्म होते परंपरागत ईंधनों जैसे कोयले और तेल के भंडार, इस ज़रूरत को और बढ़ा रहे हैं।

वरना पहाड़ों पर बर्फ़ की चादर जैसी क़ुदरती ख़ूबसूरती से लेकर शानदार समुद्री बीच तक को पर्यावरण मे बदलाव से ख़तरा है। इन सब का जवाब संलयन ऊर्जा ही है।

स्रोत :

 

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19 विचार “भविष्य की ऊर्जा : नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) से पूरी होगी ऊर्जा की आवश्यकतायें&rdquo पर;

  1. THANKS

    Harcharnsingh272@gmail.com

    15 मई 2016 को 11:31 pm को, “विज्ञान विश्व” ने
    लिखा:

    > आशीष श्रीवास्तव posted: “मानव को विकास चाहिए। विकास के लिए आवश्यक है
    > ऊर्जा। ऊर्जा हमें ईंधन से मिलती है। आज दुनिया में कई तरह के ईंधन काम में
    > लाए जा रहे हैं। सबसे ज़्यादा जिनका इस्तेमाल हो रहा है वो है कोयला और तेल।
    > दोनों ईंधन ज़मीन के अंदर से निकालकर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। मगर”
    >

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  2. ये प्रयत्न सफल हों यह कामना करते हुये एक भय बारंबार मन में कौंधता है – आज की स्थितियों को देखते हुये और भी अधिक ,कि कहीं इसका प्रयोग ग़लत हाथों तक पहुँच गया तो परिणाम बहुत विनाशका.री भी हो सकता है .आज का इन्सान प्रकृति के साथ ताल-मेल कर चले और भौतिकता की दौड़ पर थोड़ा अ्ंकुश लगाये तो जीवन अधिक तुष्टिपूर्ण होने की आशा है .

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बुद्ध मुस्कुराये शांति-अहिंसा के लिए – ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

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  4. हम, संलयन परियोजनाओ की सफलता कि मंगल कामना करते है| इस संलयन ऊर्जा स्रोत को निरापद नहीं कहा जा सकता | क्योकि यदि इस साधन से हिरोसिमा की घटना दोहराइ गयी तो सूर्य ज़मीन पर हि नहीं उतारेगा, बल्कि पुरी पृथ्वी ही सूर्य मे बदल जाएगी |

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