सितम्बर 27, 2014

गुरुत्विय लेंस क्या होता है?

by आशीष श्रीवास्तव

गुरुत्विय लेंस अंतरिक्ष में किसी बड़ी वस्तु के उस प्रभाव को कहते हैं जिसमें वह वस्तु अपने पास से गुज़रती हुई रोशनी की किरणों को मोड़कर एक लेंस जैसा काम करती है। भौतिकी  के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की वजह से कोई भी वस्तु अपने इर्द-गिर्द के व्योम (“दिक्-काल” या स्पेस-टाइम) को मोड़ देती है और बड़ी वस्तुओं में यह मुड़ाव अधिक होता है। जिस तरह चश्मे,  दूरबीन के मुड़े हुए शीशे से गुज़रता हुआ प्रकाश भी मुड़ जाता है, उसी तरह गुरुत्वाकर्षण लेंस से गुज़रता हुआ प्रकाश भी मुड़ जाता है।

Gravitational-lensing-A1916 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने सापेक्षता सिद्धांत की घोषणा की और उसे प्रकाशित किया। 1924 में एक ओरॅस्त ख़्वोलसन नाम के रूसी भौतिकविज्ञानी ने आइनस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत को समझकर भविष्यवाणी की कि ऐसे गुरुत्विय लेंस ब्रह्माण्ड में ज़रूर होंगे। 1936 में आइनस्टाइन ने भी अपने एक लेख में ऐसे लेंसों के मिलने की भविष्यवाणी की। कई दशकों पश्चात , 1979 में,  एक क्वासर की एक के बजाए दो-दो छवियाँ देखी गयी और इस की पुष्टि हुयी। उसके बाद काफ़ी दूरस्थ वस्तुओं की ऐसी छवियाँ देखी जा चुकी हैं जिनमें उन वस्तुओं और पृथ्वी के बीच कोई बहुत बड़ी अन्य वस्तु रखी हो जो पहली वस्तु से आ रही प्रकाश की किरणों पर लेंसों का काम करे और उसकी छवि को या तो मरोड़ दे या आसमान में उसकी एक से ज़्यादा छवि दिखाए।

किसी अत्यंत दीप्तीमान पिंड जैसे एक तारे, आकाशगंगा या एक क्वासर की कल्पना किजीये जो कि पृथ्वी से 10 अरब प्रकाश वर्ष दूर हो। इस लेख मे हम मान लेते है कि वह क्वासर है। यदि हमारे और क्वासर के मध्य कुछ ना हो तो , हम उस क्वासर की एक छवि देख पायेंगे। लेकिन यदि कोई महाकाय आकाशगंगा या आकाशगंगा समूह हमारे और उस क्वासर के मध्य हो और हम उस क्वासर को देख ना पा रहे हों तो क्या होगा ?

Gravitational-lensing-Bऐसी स्थिति मे वह आकाशगंगा उस क्वासर से उत्सर्जित प्रकाश किरणो को अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकार्षण से मोड़ देगी, जैसा चित्र अ मे दिखाया गया है। इस प्रभाव को गुरुत्विय लेंस कहते है, क्योंकि आकाशगंगा का गुरुत्व किसी लेंस की तरह प्रकाश किरणो को मोड़ रहा हौ। लेकिन गुरुत्विय लेंस प्रभाव मे क्वासर की एक छवि बनने की बजाय एकाधिक छवि बनती है। हम पृथ्वी से क्वासर की प्रकाश किरणो को देखते है और क्वासर की छवि एक सरल रेखा मे बनते देखते है। यदि क्वासर और पृथ्वी के मध्य की आकाशगंगा पूर्ण सममितिय हो तो हमे क्वासर की छवि एक वलय के आकार मे दिखेगी।

सामान्यत: मे पृथ्वी और क्वासर के मध्य की आकाशगंगा क्वासर-पृथ्वी के मध्य की सरल रेखा के केंद्र मे नही होती है, इस अवस्था मे क्वासर उत्सर्जित प्रकाश के दो पथ आकाशगंगा से भिन्न दूरी तय कर आयेंगे। और क्वासर की छवियाँ हमे भिन्न भिन्न दूरी पर बनते दिखायी देंगी। चित्र ब देखें।

अंत मे इन सभी पिंडो के मध्य दूरी इतनी अधिक है कि आकाशगंगा की त्रिज्या तथा आकाशगंगा का द्र्व्यमान वितरण को एक बिंदु के रूप मे माना जा सकता है, इससे गणना मे आने वाली त्रुटि नगण्य होगी। अब हम सरल ज्यामिति के प्रयोग से उस आकाशगंगा के द्रव्यमान, आकाशगंगा की दूरी तथा दोनो छवियों की दूरी के आधार पर उस क्वासर की वास्तविक दूरी की गणना कर सकते है।

चित्र स मे हब्बल दूरबीन द्वारा लिया गया Abell 2218 द्वारा उत्पन्न गुरुत्विय लेंस प्रभाव दिखाया गया है।
Gravitational-lensing-C

सितम्बर 24, 2014

मंगलयान : मंगल की कक्षा मे स्थापित

by आशीष श्रीवास्तव

Mars_Orbiter_Mission_-_India_-_ArtistsConceptअंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की अंतरिक्ष संस्था भारतीय अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने नायाब उपलब्धि हासिल की है। पहली ही कोशिश में भारतीय अनुसंधान संस्थान (इसरो) का मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन) 24 सितंबर सुबह लगभग 8 बजे मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया। पहले प्रयास में मंगल पर पहुंचने वाला भारत विश्व का पहला देश बन गया है। एशिया से कोई भी देश यह सफलता हासिल नहीं कर सका है। चीन और जापान अब तक मंगल पर नहीं पहुंच पाए हैं। अमेरिका की मंगल तक पहुंचने की पहली 6 कोशिशें विफल रही थीं।

सुबह साढ़े सात बजे करीब इंजन को प्रज्वलित किया गया। इसके बाद यान की गति को कम करने के लिये उसे 24 मिनट तक प्रज्वलित रखा गया। इसकी गति 4.3 किमी प्रति सेकंड होने पर इसे मंगल की कक्षा में स्थापित करने के लिए निर्देश दिया गया। इसरो यान पर लगे कैमरे से बुधवार दोपहर से मंगल ग्रह की तस्वीरें मिलने लगेंगी। पृथ्वी से मंगल की औसत दूरी करीब 22 करोड़ 50 लाख किलोमीटर है। इस दूरी को मंगलयान ने करीब 80 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की गति से तय किया। बाद में मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने के लिए इसकी गति को लगातार कम किया गया।

मंगलयान का योजनामूलक चित्र : A सौर पैनेल, B नोदक टंकी (प्रोपेलेण्ट टैंक), C माध्य एण्टेना लब्धि (गेन), D अधिकतम एण्टेना लब्धि, E कैमरा MCC, F फोटोमीटर लीमान अल्फा LAP, G मेंका (Menca) द्रव्यमान स्पेक्ट्रममापी, H अल्प लब्धि एण्टेना । चित्र में अदृष्य उपकरण : MSN और TIS आदि

मंगलयान का योजनामूलक चित्र : A सौर पैनेल, B नोदक टंकी (प्रोपेलेण्ट टैंक), C माध्य एण्टेना लब्धि (गेन), D अधिकतम एण्टेना लब्धि, E कैमरा MCC, F फोटोमीटर लीमान अल्फा LAP, G मेंका (Menca) द्रव्यमान स्पेक्ट्रममापी, H अल्प लब्धि एण्टेना । चित्र में अदृष्य उपकरण : MSN और TIS आदि

मंगलयान के मुख्य तरल इंजन का सोमवार 22 सितंबर को सफल परीक्षण किया गया था। मंगल की कक्षा में पहुंचने से पहले इस इंजन की जांच बहुत जरूरी और चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि यान का मुख्य इंजन पिछले 300 दिन (लगभग 10 महीने) से निष्क्रिय अवस्था में था। इसरो के मुताबिक, इंजन ने तय योजना के तहत 4 सेकंड तक ठीक काम किया था। सोमवार की सफलता के साथ ही भारत मंगल ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में अपना उपग्रह पहुंचाने वाला एशिया का पहला देश बन गया था।

इस समय मंगल के राज जानने के लिए सात अभियान काम कर रहे हैं। ये सभी अमेरिकी अभियान हैं। उसका सबसे ताजा प्रयास मावेन के रूप में सामने आया है। इसके अलावा मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और मार्स ऑर्बिटर मंगल की परिक्रमा कर रहे हैं। दो रोवर्स- स्पिरिट और अपॉर्च्युनिटी भी मंगल पर मौजूद हैं। इसके साथ ही लैंडर- फीनिक्स भी वहां तैनात हैं।

अभियान के उद्देश्य और उपकरण

मंगलयान के जरिए भारत मंगल ग्रह पर जीवन के सूत्र तलाशने के साथ ही वहां के पर्यावरण की जांच करना चाहता है। वह यह भी पता लगाना चाहता है कि इस लाल ग्रह पर मीथेन मौजूद है कि नहीं। मीथेन गैस की मौजूदगी जैविक गतिविधियों का संकेत देती है। इसके लिए मंगलयान को करीब 15 किलो वजन के कई अत्याधुनिक उपकरणों से लैस किया गया है। इसमें कई शक्तिशाली कैमरे भी शामिल हैं। इस अभियान मे मीथेन के अलावा और खनिजों के बारे में भी पता चल सकेगा।

मंगलयान के साथ पाँच प्रयोगात्मक उपकरण भेजे गये हैं जिनका कुल भार १५ किलोग्राम है।

  1. मीथेन सेंसर (मीथेन संवेदक) – यह मंगल के वातावरण में मिथेन गैस की मात्रा को मापेगा तथा इसके स्रोतों का मानचित्र बनाएगा।
  2. थर्मल इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर (TIS) (ऊष्मीय अवरक्त स्पेक्ट्रोमापक) – यह मंगल की सतह का तापमान तथा उत्सर्जकता (emissivity) की माप करेगा जिससे मंगल के सतह की संरचना तथा खनिजकी (mineralogy) का मानचित्रण करने में सफलता मिलेगी।
  3. मार्स कलर कैमरा (MCC) (मंगल वर्ण कैमरा)- यह दृष्य स्पेक्ट्रम में चित्र खींचेगा जिससे अन्य उपकरणों के काम करने के लिए सन्दर्भ प्राप्त होगा।
  4. लमेन अल्फा फोटोमीटर (Lyman Alpha Photometer (LAP)) (लिमैन अल्फा प्रकाशमापी) – यह ऊपरी वातावरण में ड्यूटीरियम तथा हाइड्रोजन की मात्रा मापेगा।
  5. मंगल इक्सोस्फेरिक न्यूट्रल संरचना विश्लेषक (MENCA) (मंगल बहिर्मंडल उदासीन संरचना विश्लेषक) – यह एक चतुःध्रुवी द्रव्यमान विश्लेषक है जो बहिर्मंडल (इक्सोस्फीयर) में अनावेशित कण संरचना का विश्लेषण करने में सक्षम है।

मंगलयान को पिछले साल 5 नवंबर को 2 बजकर 36 मिनट पर इसरो के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से रवाना किया गया था। इसे पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-25 की मदद से छोड़ा गया। अमेरिका और रूस ने अपने मंगलयान छोड़ने के लिए इससे बड़े और खासे महंगे रॉकेटों का प्रयोग किया। इसे पहले पिछले साल ही 19 अक्टूबर को छोड़े जाने की योजना थी, लेकिन दक्षिण प्रशांत महासागर क्षेत्र में मौसम खराब होने के कारण यह काम टाल दिया गया था। इस पर 450 करोड़ रुपये की लागत आई है। इस यान का वजन 1350 किलो है। मंगलयान को छोड़े जाने के बाद से इसके यात्रा मार्ग में सात बार परिवर्तन किए गए, ताकि यह मंगल की दिशा में अपनी यात्रा जारी रख सके।

MOMIMPStepsअभियान कालक्रम

  • 3 अगस्त 2012 – इसरो की मंगलयान परियोजना को भारत सरकार ने स्वीकृति दी। इसके लिये 2011-12 के बजट में ही धन का आवण्टन कर दिया गया था।
  • 5 नवम्बर 2013 – मंगलयान मंगलवार के दिन दोपहर भारतीय समय 2:38 अपराह्न पर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) के सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-25 द्वारा प्रक्षेपित किया गया।3:20 अपराह्न के निर्धारित समय पर पीएसएलवी-सी 25 के चौथे चरण से अलग होने के उपरांत यान पृथ्वी की कक्षा में पहुँच गया और इसके सोलर पैनलों और डिश आकार के एंटीना ने कामयाबी से काम करना शुरू कर दिया था।
  • 5 नवम्बर से 01 दिसम्बर 2013 तक यह पृथ्वी की कक्षा में रहा तथा कक्षा (ऑर्बिट) सामंजस्य से जुड़े 6 महत्वपूर्ण ऑपरेशन किये गये। इसरो की योजना पृथ्वी की गुरुत्वीय क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करके मंगलयान को पलायन वेग देने की थी। यह काफी धैर्य का काम है और इसे छह किस्तों में 01 दिसम्बर 2013 तक पूरा कर लिया गया।
    • 7 नवम्बर 2013-भारतीय समयानुसार एक बजकर 17 मिनट पर मंगलयान की कक्षा को ऊँचा किया गया। इसके लिए बैंगलुरू के पी‍न्‍या स्थित इसरो के अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र से अंतरिक्ष यान के 440 न्‍यूटन लिक्विड इंजन को 416 सेकेंडों तक चलाया गया जिसके परिणामस्वरूप पृथ्‍वी से मंगलयान का शिरोबिन्‍दु (पृथ्‍वी से अधिकतम दूरी पर‍ स्थित बिन्‍दु) 28,825 किलोमीटर तक ऊँचा हो गया, जबकि पृथ्‍वी से उसका निकटतम बिन्‍दु 252 किलोमीटर हो गया।
    • 11 नवम्बर 2013 को नियोजित चौथे चरण में शिरोबिन्‍दु को 130 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर लगभग 1 लाख किलोमीटर तक ऊँचा करने की योजना थी, किंतु तरल इंजिन में खराबी आ गई। परिणामतः इसे मात्र 35 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर 71,623 से 78,276 किलोमीटर ही किया जा सका। इस चरण को पूरा करने के लिए एक पूरक प्रक्रिया 12 नवम्बर 0500 बजे IST के लिए निर्धारित की गई।
    • 12 नवम्बर 2013 – एक बार फिर मंगलवार मंगलयान के लिए मंगलमय सिद्ध हुआ। सुबह 05 बजकर 03 मिनट पर 303.8 सेकंड तक इंजन दागकर यान को 78,276 से 118,642 किलोमीटर शिरोबिन्‍दु की कक्षा पर सफलतापूर्वक पहुंचा दिया गया।
    • 16 नवम्बर 2013 : पांचवीं और अंतिम प्रक्रिया में सुबह 01:27 बजे 243.5 सेकंड तक इंजन दागकर यान को 1,92,874 किलोमीटर के शिरोबिंदु तक उठा दिया। इस प्रकार यह चरण भी पूरा हुआ।
  • 01 दिसम्बर 2013 – 31नवंबर-1दिसंबर की मध्यरात्रि को 00:49 बजे मंगलयान को मार्स ट्रांसफर ट्रेजेक्‍टरी में प्रविष्‍ट करा दिया गया, इस प्रक्रिया को ट्रांस मार्स इंजेक्शन (टीएमआई) ऑपरेशन का नाम दिया गया। यहाँ से इसकी 20 करोड़ किलोमीटर से ज्यादा लम्बी यात्रा शुरूआत हुयी जिसमे नौ महीने से भी ज्यादा का समय लगा और इसकी सबसे बड़ी चुनौती इसके अन्तिम चरण में यान को बिल्कुल सटीक तौर पर धीमा करने की थी, ताकि मंगल ग्रह अपने छोटे गुरुत्व बल के जरिये इसे अपने उपग्रह के रूप में स्वीकार करने को तैयार हो जाये।
  • 22 सितंबर 2014 : मुख्य इंजन को 4 सेकंड तक दागकर उसका परीक्षण किया गया।
  • 24 सितंबर 2014 :मुख्य इंजन को 24 मिनट  तक दागकर यान को मंगल कक्षा मे पहुंचा दिया गया।

मंगलयान प्रोजेक्ट से भारत की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। इससे पहले अमेरिका, रूस और यूरोप के कुछ देश ही संयुक्त रूप से मंगल पर अपना मिशन भेज पाए हैं। चीन और जापान इस कोशिश में अब तक कामयाब नहीं हो सके हैं। रूस भी अपनी कई असफल कोशिशों के बाद इस मिशन में सफल हो पाया। अब तक मंगल को जानने के लिए शुरू किए गए दो तिहाई अभियान नाकाम साबित हुए हैं।

भारत का मंगल अभियान सफल होने के साथ ही अंतरिक्ष में उसका रुतबा काफी बढ़ गया है। जाहिर है अंतरिक्ष व्यवसाय के मामले में भी भारत नई छलांग लगा सकता है। इससे उसे विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित करने के नए आदेश मिलने के पूरे आसार हैं।

संबधित लेख :  

सितम्बर 12, 2014

तापमान : ब्रह्माण्ड मे उष्णतम से लेकर शीतलतम तक

by आशीष श्रीवास्तव

उष्ण होने पर परमाणु और परमाण्विक कण तरंगीत तथा गतिमान होते है। वे जितने ज्यादा उष्ण रहेंगे उतनी ज्यादा गति से गतिमान रहेंगे। वे जितने शीतल रहेंगे उनकी गति उतनी कम होगी। परम शून्य तापमान पर उनकी गति शून्य हो जाती है। इस तापमान से कम तापमान संभव नही है। यह कुछ ऐसा है कि आप दक्षिणी ध्रुव से ज्यादा दक्षिण मे नही जा सकते या उत्तरी ध्रुव से उत्तर मे नही जा सकते है। ऐसा कभी नही होगा क्योंकि वह संभव ही नही है।

नीचे दी गयी सारणी मे ज्ञात ब्रह्माण्ड की उष्णतम चीजो या घटनाओं का विवरण दिया है। ज्ञात शब्द पर ध्यान दे क्योंकि ब्रह्माण्ड संबंधित हमारा ज्ञान संपूर्ण नही है। नीचे दी गयी सारणी मे वही सूचना है जो हमे ज्ञात है, भविष्य मे इसमे परिवर्तन संभव है। Continue reading

सितम्बर 10, 2014

लानीआकिया मे आपका स्वागत है : आपका नया ब्रह्माण्डिय पता

by आशीष श्रीवास्तव

सूर्य की मदाकिनी आकाशगंगा की मंदाकिनी भूजा मे स्थिति

सूर्य की मदाकिनी आकाशगंगा की मंदाकिनी भूजा मे स्थिति

पिछले सप्ताह तक किसी अन्य आकाशगंगा का परग्रही मुझसे मेरा पता पूछता तो मेरा उत्तर होता

आशीष श्रीवास्तव, B-3,गुनीना हेलिक्स, इलेक्ट्रानीक सीटी, बैंगलोर,कर्नाटक, भारत,पृथ्वी, सौर मंडल,व्याध भूजा, मंदाकिनी आकाशगंगा, स्थानीय आकाशगंगा समूह, कन्या बृहद आकाशगंगा समूह, ब्रह्माण्ड(Ashish Shrivastava, B3, Gunina Helix, Electronic City, Bangalore,Karnataka,India,Earth, Solar System, Orion Arm, Milky Way Galaxy, Local Group, Virgo Supercluster, Universe).

लेकिन इस ब्रह्माण्ड मे मेरे पते मे एक और मोहल्ला बढ़ गया है जोकि मेरे पते के अंतिम दो क्षेत्रो के मध्य है, जिसे लानीआकिया (Laniakea)कहा जा रहा है, जोकि आकाशगंगाओं का एक विशालकाय समूह है।

मैने जो अपना पता बताया है उसमे आप सौर मंडल तक तो परिचित ही होंगे। हमारा सूर्य मंदाकिनी आकाशगंगा मे उसकी व्याध भूजा(Orion arm) मे स्थित है। मंदाकिनी आकाशगंगा के कुछ भाग को आप रात्रि मे उत्तर से दक्षिण मे एक बड़े पट्टे के रूप मे देख सकते है। यह आकाशगंगा वस्तुतः एक स्पायरल के आकार की है और उसकी पांच से अधिक भूजाये है। सूर्य इसमे से एक भूजा व्याध भूजा के बाह्य भाग मे स्थित है।

मंदाकिनी आकाशगंगा कुछ एक दर्जन अन्य आकाशगंगाओं के साथ एक स्थानीय आकाशगंगा समूह(Local Group) बनाती है जिसमे मंदाकिनी (Milkyway)आकाशगंगा और देव्यानी (Andromeda)आकाशगंगा सबसे बड़ी है। यह आकाशगंगा समूह भी एक बड़े आकाशगंगा समूह जिसे कन्या आकाशगंगा समूह (Virgo Cluster)के नाम से जाना जाता है, का एक भाग है। कन्या आकाशगंगा समूह मे 1000 से ज्यादा आकाशगंगाये है और यह समूह दसीयो लाख प्रकाशवर्ष चौड़ा है। Continue reading

सितम्बर 2, 2014

जीवन के लिये आवश्यक तत्वो का निर्माण

by आशीष श्रीवास्तव

प्राचीन समय मे मानव शरीर को पंच तत्व -भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल से निर्मित माना जाता था। लेकिन आज हम जानते है कि ये पंचतत्व भी शुध्द तत्व नही है, और अन्य तत्वों से मीलकर बने है। इस लेख मे हम देखेंगे कि मानव शरीर के लिये आवश्यक तत्व कौनसे है? और उन तत्वो का निर्माण कैसे हुआ है?

तत्व क्या होते है?

तत्व (या रासायनिक तत्व) ऐसे उन शुद्ध पदार्थों को कहते हैं जो केवल एक ही तरह के परमाणुओं से बने होते हैं। या जो ऐसे परमाणुओं से बने होते हैं जिनके नाभिक में समान संख्या में प्रोटॉन होते हैं। सभी रासायनिक पदार्थ तत्वों से ही मिलकर बने होते हैं। हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, तथा सिलिकॉन आदि कुछ तत्व हैं। सन 2007 तक कुल 117 तत्व खोजे या पाये जा चुके हैं जिसमें से 94 तत्व धरती पर प्राकृतिक रूप से विद्यमान हैं। कृत्रिम नाभिकीय अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप उच्च परमाणु क्रमांक वाले तत्व समय-समय पर खोजे जाते रहे हैं।

मानव शरीर मे कौन से तत्व होते है?

जीवन के लिये आवश्यक तत्व

जीवन के लिये आवश्यक तत्व

मानव शरीर का लगभग 99% भाग मुख्यतः छह तत्वो से बना है: आक्सीजन, कार्बन, हायड्रोजन, नाइट्रोजन, कैल्सीयम तथा फास्फोरस। लगभग 0.85% भाग अन्य पांच तत्वो से बना है : पोटैशीयम, सल्फर, सोडीयम, क्लोरीन तथा मैग्नेशीयम है। इसके अतिरिक्त एक दर्जन तत्व है जो जीवन के लिये आवश्यक माने जाते है या अच्छे स्वास्थ्य के लिये उत्तरदायी होते है, जिसमे बोरान(Boran B), क्रोमीयम(Chromium Cr), कोबाल्ट(Cobalt Co), कापर(Copper Cu), फ़्लोरीन(Fluorine F), आयोडीन(Iodine I), लोहा(Iron Fe),मैग्नीज(Manganese Mn), मोलीब्डेनम(Molybdenum Mo), सेलेनियम(Selenium Se), सीलीकान(Silicon Si), टीन(Tin Sn), वेनाडीयम(Vanadium V) और जस्ता(Z) का समावेश है।

ब्रह्माण्ड के जन्म के पश्चात जीवन के लिये आवश्यक तत्वो का निर्माण कैसे हुआ ? Continue reading

अगस्त 25, 2014

गाडेल का अपूर्णता प्रमेय(Gödel’s incompleteness theorem)

by आशीष श्रीवास्तव

कुर्ट फ्रेडरिक गाडेल (Kurt Friedrich Gödel; जन्म 28 अप्रैल 1906 - 14 जनवरी 1978) मूल रूप से ऑस्ट्रियाई और बाद में अमेरिकी तर्कशास्त्री, गणितज्ञ और दार्शनिक थे।

कुर्ट फ्रेडरिक गाडेल (Kurt Friedrich Gödel; जन्म 28 अप्रैल 1906 – 14 जनवरी 1978) मूल रूप से ऑस्ट्रियाई और बाद में अमेरिकी तर्कशास्त्री, गणितज्ञ और दार्शनिक थे।

उन्नीसवीं शताब्दी तथा बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे गणितज्ञो का लक्ष्य था कि अंकगणित को कुछ स्वयंसिद्ध नियमों मे बांध दिया जाये। यह युक्लिड के ज्यामितिक नियमो के जैसा ही प्रयास था जिसमे कुछ निर्विवाद स्वयं सिद्ध नियमों के आधार पर हर प्रमेय को सिद्ध किया जा सकता था।

 
यह एक उत्कृष्ट लक्ष्य था। एक ऐसे सिद्धांत की कल्पना जिसमे पूर्णांको संबधित हर संभव स्वयं सिद्ध कथन(Axiom) का समावेश हो। गाडेल द्वारा प्रस्तावित अपूर्णता प्रमेय ने इस लक्ष्य को असंभव बना दिया।  
 
गाडेल के प्रमेय का गणितीय विवरण देना गणितीय तर्क शास्त्र नही जानने वालों से इस महत्वपूर्ण सहज ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान को छुपाने के तुल्य होगा। इसलिए इसे मै सरल कम्प्युटर की भाषा मे दोहराउंगा। 
 
कल्पना कीजिये  हमारे पास एक शक्तिशाली कम्प्यूटर ’आरेकल’ है। जैसे की कम्प्युटर की कार्य विधि है, आरेकल को उपयोगकर्ता कुछ “Input”निर्देश देता है जो कुछ नियमों पर आधारित होते है,आरेकल इसके उत्तर मे उन नियमो के पालन से उत्पन्न’Output’ देता है। समान Input हमेशा समान Output देंगें। आरेकल के Input तथा Output को पूर्णांकों मे लिखा जाता है तथा आरेकल केवल साधारण गणितीय प्रक्रियाएं जैसे जोड़, घटाना, गुणा तथा भाग ही करता है। साधारण कम्प्यूटर के विपरीत हम इस कंप्यूटर से दक्षता या कम समय मे कार्य की आशा नही रखते हैं। आरेकल हमेशा दिये गये निर्देशो का पालन करता है, वह इसमे लगने वाले समय की परवाह नही करता है, आरेकल अपना कार्य निर्देशो के पालन के पश्चात ही बंद करेगा चाहे इसमे लाखों करोड़ो वर्ष लग जायें।[आरेकल (शाब्दिक अर्थ): कोई व्यक्ति या संस्था जो किसी दैवीय  शक्ति द्वारा हर प्रश्न का उत्तर देने मे समर्थ है।]

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