अगस्त 11, 2014

रंगो का अद्भुत विश्व : दर्पण, मृगमरिचिका

by Ashish Shrivastava

रंग अद्भुत होते है और उससे अद्भुत है हमारी उन्हे देखने की क्षमता। मानव नेत्र लगभग एक करोड़ से ज्यादा रंग पहचान सकते है।

आपने कई रंग देखे होंगे लेकिन कभी सोचा है कि आखिर लाल रंग की वस्तु लाल क्यों दिखायी देती है? किसी भी वस्तु का कोई रंग क्यों होता है ? वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु का रंग एक भ्रम मात्र है, लाल वस्तु लाल इसलिये दिखायी देती है कि वह वस्तु लाल रंग का अवशोषण नही कर पाती है, लाल के अतिरिक्त अन्य सभी रंग उस वस्तु द्वारा अवशोषित हो जाते है। उसी तरह नीले रंग की वस्तु केवल नीले रंग का अवशोषण नही कर पाती है!

रंग

रंग

  1. प्रकाश स्रोत से ’सफ़ेद’ प्रकाश उस वस्तु पर पड़ता है।
  2. लाल के अतिरिक्त सभी रंग अवशोषित हो जाते है।
  3. इससे हमारी आंखो तक केवल लाल रंग का प्रकाश पहुंचता है और हम उस वस्तु को लाल रंग का देखते है।

जैसा कि हम जानते हैं कि सफ़ेद रंग सभी रंगो का मिश्रण है, सफ़ेद रंग की वस्तु किसी भी रंग का अवशोषण नही करती है जिससे वह सफ़ेद रंग कि दिखायी देती है। काला रंग इसका विपरीत है, काला अपने आप मे कोई रंग नही होता है, इसका अर्थ है रंगो की अनुपस्थिति। काले रंग की वस्तु अभी रंगो का अवशोषण कर लेती है, जिससे वह काले रंग कि दिखायी देती है।

यदि हम किसी लाल वस्तु पर एक ऐसा प्रकाश डाले जिसमे लाल रंग को छोड़कर अन्य सभी रंग हो तब वह वस्तु हमे लाल नही काली दिखायी देगी। वैसे ही यदि आपने ध्यान दिया हो कि कपड़ो के (या किसी अन्य वस्तु) के रंग दुकान के प्रकाश की तुलना मे सूर्य की प्रकाश मे भिन्न दिखायी देते है। यहाँ भी कारण वही है कि सूर्य के प्रकाश मे लगभग सब रंग होते है जबकि कृत्रिम रोशनी मे कुछ रंग अनुपस्थित होते है जिससे कपड़े द्वारा रंग का अवशोषण दोनो प्रकाशो मे भिन्न होता है।

रंग की तकनीकी परिभाषा कुछ ऐसी होगी

रंग प्रकाश के उत्सर्जन, वितरण या परावर्तन द्वारा उत्पन्न वर्णक्रम संरचना से निर्मित दृश्य प्रभाव है।

यहाँ तक तो ठीक है लेकिन दर्पण का रंग क्या होगा ? वह भी तो किसी भी रंग का अवशोषण नही करता है, तो उसका रंग भी तो सफ़ेद होना चाहीये ना ?

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले प्रकाश की कुछ विशेषताओं पर विचार करते है:

दृश्य प्रकाश अर्थात वह प्रकाश जिसे हमारी आंखे देख सकती है , वास्तविकता मे विद्युत चुंबकिय विकिरण के वर्णक्रम(Electromagnetic Radiation Spectrum) का एक छोटा सा भाग है। इस दृश्य प्रकाश मे भिन्न भिन्न आवृत्ती वाली तरंगे होती है, हमारी आंखे हर आवृत्ती की तरंगो को एक अलग रंग मे देखती है। मोटे तौर पर हम उन्हे सात रंग मे बांटते है जो कि लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, बैंगनी हैं। इनमे से लाल रंग की आवृत्ती सबसे कम और बैंगनी रंग की आवृती सबसे ज्यादा होती है। वास्तविकता मे रंगो की संख्या अनगिनत है, मानव आंखे भी लाखो रंगो को देखने मे समर्थ है।

रंग

रंग

मोटे तौर पर कह सकते है कि रंग दो प्रकार के हो सकते है :

  1. दृश्य प्रकाश के रंग : लाल और बैगनी रंग के मध्य के सभी रंग। इन्हे हम देख सकते है। इन रंगो के लांखो शेड है लेकिन मूल रूप से तीन ही रंग माने गये है,लाल, हरा और नीला।
  2. दृश्य प्रकाश बाह्य रंग : इन्हे हम देख नही सकते। इसका उदाहरण है पराबैंगनी किरण, अवरक्त किरण, एक्स किरण, गामा किरण। जब हम इन्हे देख नही सकते तो हमे पता कैसे चलेगा कि इनका आस्तित्व है ? एक तरीका फोटोग्राफीक प्लेट का है, जिसमे किसी भी विकिरण के पड़ने पर वह भाग काला हो जाता है। एक्स रे तस्वीर तो आपने देखी ही होगी। एक्स रे मानव आंखो की क्षमता के बाहर है साथ ही अधिक मात्रा मे यह हानिकारक भी है।) दूसरा तरीका है कि अदृश्य प्रकाश की एक विशेष आवृत्ती को लिए दृश्य प्रकाश के एक रंग से बदल दिया जाये। इससे जो चित्र बनेगा वह वास्तविक तो नही होगा लेकिन हमारे अध्यन के लिए पर्याप्त होगा जैसे एक्स रे चित्र। किसी काले-सफेद कैमरे से लिए गये चित्र मे भी विभिन्न रंगो को काले और सफेद के मध्य के विभिन्न शेडो से बदल दिया जाता है।

 

परावर्तन

परावर्तन

परावर्तन

प्रकाश की उसी माध्यम मे वापसी जिसमे से प्रकाश का अपतन होता है परावर्तन कहलाता है। जब किसी सतह पर प्रकाश पड़ता है तो उसका कुछ भाग सतह द्वारा परावर्तित कर दिया जाता है। विभिन सतहे भिन्न भिन्न मात्रा मे प्रकाश का परावर्तन करती है।

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन (Total internal reflection)

यहएक प्रकाशीय परिघटना है जिसमें प्रकाश की किरण किसी माध्यम के तल पर ऐसे कोण पर आपतित होती है कि उसका परावर्तन उसी माध्यम में हो जाता है। सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती प्रकाश किरण का आपतन कोण सदि क्रांतिक कोण से अधिक होता है, तो वह उस माध्यम में वापस आकर परावर्तन के नियमों का पालन करती हैं। यह घटना पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहलाती है।हीरे में चमक पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण होता है।

इसके लिये आवश्यक शर्त यह है कि प्रकाश की किरण अधिक अपवर्तनांक के माध्यम से कम अपवर्तनांक के माध्यम में प्रवेश करे (अर्थात सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करे) तथा आपतन कोण का मान ‘क्रान्तिक कोण’ से अधिक हो।

पूर्ण आंतरिक परार्वतन के कारण ही रेगिस्तान में कुछ दूरी पर जल होने का भ्रम होता है। शीत प्रदेशों में जलयान वायु में लटके प्रतीत होता हैं, काँच की वस्तुओं में हवा के बुलबुले चमकीले दिखई देते हैं।

अपवर्तन

प्रकाश किरण का एक माध्यम से दूसर माध्यम में जाना, अपवर्तन कहलाता है। परावर्तन के लिए एक माध्यम एवं अपवर्तन के लिए दो माध्यम आवश्यक होत है। जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है, जो अभिलम्ब से दूर हट जाती है। जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम से सघन माध्यम में जाती है, जो अभिलम्ब की ओर मुड़ जाती है।

अपवर्तन

अपवर्तन

जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है, तब वह आपतन कोण जिसके लिए अपवर्तन (वर्तन) कोण का मपन 90° हो क्रांतिक कोण कहलाता है। अपवर्तन के कारण जलाशय कम गहरे प्रतीत होते हैं तथा जल में डुबाई गयी छड़ मुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।

प्रकीर्णन

प्रकीर्णन

प्रकीर्णन

जब प्रकाश अणुओं, परमाणुओं व छोटे-छोटे कणों पर आपतित होता है तो उसका विभिन्न दिशाओं में प्रकीर्णन हो जाता है। जब सूर्य का प्रकाश जोकि सात रंगों का बना होता है वायुमंडल से गुजरता है तो वह वायुमंडल में उपस्थित कणों द्वारा विभिन्न दशाओं में प्रसारित हो जाता है। इस प्रक्रिया को ही प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। आकाश का रंग सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण ही नीला दिखाई देता है।

दर्पण का रंग

अब हम वापस आते है अपने प्रश्न पर कि दर्पण का रंग क्या होगा ?

दर्पण एक ऐसी आदर्श सतह है जो आदर्श परावर्तन करता है। अर्थात आपतित किरण और परावर्तित किरण का कोण समान होता है। लेकिन दर्पण किसी भी रंग को अवशोषित नही करता है, ना ही इसमे प्रकिर्णन होता है। दर्पण मे जिस रंग का प्रकाश आपतित होता है उसी रंग का प्रकाश परावर्तित कर देता है।

एक आदर्श सफेद कागज का रंग और आदर्श दर्पण का रंग एक जैसा ही होता है। लेकिन सफ़ेद कागज मे प्रकीर्णन होता है, दर्पण मे वह नही होता इस वजह से हमे दोनो के रंगो मे अंतर दिखायी देता है।

अगस्त 4, 2014

क्वांटम आत्महत्या और श्रोडीन्गर की बिल्ली

by Ashish Shrivastava

 जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

एक व्यक्ति अपने सर पर तनी बंदूक के साथ बैठा है। यह साधारण बंदूक नही है, यह एक क्वांटम सिद्धांत आधारित बंदूक है जो किसी क्वांटम कण के स्पिन को मापने मे सक्षम है। जब भी बंदूक का ट्रिगर दबाया जाता है, एक क्वांटम कण या क्वार्क का स्पिन मापा जाता है। स्पिन के मापन के आधार पर गोली चलेगी या नही चलेगी। यदि क्वार्क का स्पिन घड़ी के सुईयों की दिशा मे है तो बंदूक से गोली चलेगी। यदि क्वार्क का स्पिन घड़ी की सुईयों के विपरीत है तो गोली नही चलेगी, केवल ट्रिगर की क्लिक होगी।

घबराहट के साथ वह व्यक्ति एक गहरी सांस लेता है और ट्रिगर दबा देता है। बंदूक से केवल क्लिक ही होता है। वह फ़िर से ट्रिगर दबाता है, क्लिक, फिर से ट्रिगर, परिणाम वही क्लिक। वह व्यक्ति बार बार ट्रिगर दबाते रहेगा लेकिन परिणाम वही रहेगा, गोली नही चलेगी। हालांकि बंदूक सही तरह से कार्य कर रही है और उसमे गोलीयाँ भी भरी हुयी है, वह व्यक्ति कितनी ही बार ट्रिगर दबायेगा, बंदूक से गोली कभी नही चलेगी। वह यह प्रक्रिया अनंत तक दोहराता रहेगा और क्वांटम अमर रहेगा।
अब हम समय यात्रा कर इस प्रयोग के आरंभ मे वापस जाते है। वह व्यक्ति प्रथम बार ट्रिगर दबाता है, बंदूक मे क्वार्क की दिशा का मापन घड़ी की सुईयों की दिशा मे होता है। बंदूक से गोली चलती है। वह व्यक्ति अब मृत है।

लेकिन रूकिये! उस व्यक्ति ने प्रथम बार ट्रिगर दबाया था और उसके पश्चात अनंत बार ट्रिगर दबाया था और हम पहले से ही जानते हैं कि बंदूक से गोली नही चली थी। अब वह व्यक्ति मृत कैसे हो सकता है ? वह व्यक्ति नही जानता कि वह जीवित और मृत दोनो अवस्था मे है। जब भी वह ट्रिगर दबाता है, ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो ब्रह्माण्ड बन जाते है। यह विभाजन होते रहता है, दोबारा , तीबारा, चौथी बार, जब भी वह व्यक्ति ट्रिगर दबाता है ब्रह्माण्ड का एक और विभाजन होता है।

इस वैचारिक प्रयोग (thought experiment) को क्वांटम आत्महत्या(quantum suicide) कहा जाता है। इसे प्रिंसटन विश्वविद्यालय(Princeton University) के सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक मैक्स टेगमार्क(Max Tegmark) ने 1997 मे प्रस्तावित किया था। वे अब एम आई टी(MIT) मे है। वैचारिक प्रयोग केवल मस्तिष्क मे किये जाते हैं। क्वांटम स्तर मानव द्वारा ब्रह्माण्ड मे खोजा गया पदार्थ का सूक्ष्मतर स्तर भाग है। यह इतना सूक्ष्म है कि इस स्तर पर पारंपरिक तौर पर वैज्ञानिक प्रयोग करना लगभग असंभव हो जाता है। Continue reading

जुलाई 29, 2014

ब्रह्माण्ड की 13 महत्वपूर्ण संख्यायें

by Ashish Shrivastava

कुछ संख्याये जैसे आपका फोन नंबर या आपका आधार नंबर अन्य संख्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इस लेख मे हम जिन संख्याओं पर चर्चा करेंगे वे ब्रह्मांड के पैमाने पर महत्वपूर्ण है, ये वह संख्याये है जो हमारे ब्रह्मांड को पारिभाषित करती है, हमारे आस्तित्व को संभव बनाती है और ब्रह्माण्ड के अंत को तय करेंगी।

1. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक( The Universal Gravitational Constant)

Universeयह वर्ष 2014 एक महत्वपूर्ण वर्ष ना हो लेकिन 1665 इस वर्ष से बहुत बुरा था, विशेषतः लंदन वासीयों के लिये। लंदन मे बुबोनिक प्लेग फैला हुआ था, उस समय शहर से बाहर जाने के अतिरिक्त इस महामारी से बचने का कोई अन्य उपाय या औषधी ज्ञात नही थी। बादशाह चार्लस द्वितिय(King Charles II ) ने अपनी राजधानी लंदन से आक्सफोर्ड स्थानांतरित कर दी थी और कैंब्रीज विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया था। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी ने अपने गृहनगर वूल्सथोर्पे(Woolsthorpe) जाने का निश्चय किया और अपने अगले 18 महिने आधुनिक विज्ञान के लिये नये दरवाजे खोलने मे बिताये, इस विद्यार्थी का नाम था आइजैक न्युटन

300px-NewtonsLawOfUniversalGravitationहम ऐसे तकनीकी युग मे रह रहे है जिसमे संख्यात्मक(परिमाणात्मक) अनुमान नही लगाये जा सके तो जीना दूभर हो जाये। और परिमाणात्मक अनुमान लगाने मे शायद सबसे पहली सफलता न्युटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत(Universal Gravitation) से मीली थी। उनकी अवधारणा के अनुसार दो पिंडो मे मध्य का गुरुत्विय आकर्षण उनके द्रव्यमान के गुणनफल के आनुपातिक तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग के विलोमानुपातिक होता है। अपनी इस अवधारणा से न्युटन ने पता लगाया कि किसी ग्रह की कक्षा एक दिर्घवृत्त(ellipse) के आकार की होती है जिसके एक केंद्रबिंदु(focus) पर सूर्य होता है। जोहानस केप्लर ने ग्रहो की कक्षा के बारे मे यह अनुमान न्युटन से पहले लगाया था लेकिन वह निरीक्षण पर आधारित था। न्युटन ने यह अनुमान गणितिय गणनाओं और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के आधार पर लगाया था। उन्होने इस गणना के लिये गणित की एक नयी शाखा कलन गणित(calculus) भी खोज निकाली थी। Continue reading

जुलाई 25, 2014

दो नदीयों के संगम के बावजूद जल अलग अलग बहता है: विचित्र किंतु सत्य।

by Ashish Shrivastava

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil)मे दो नदीयाँ रिवो निग्रो(Rio Negro) तथा रिवो सोलिमोएस(Rio Solimões) का संगम होता है और वे मिलकर नीचली अमेजान(Lower Amazon) नदी का निर्माण करती है। लेकिन इन दोनो नदीयों का जल एक दूसरे मे विलिन होने से इंकार कर देता है और लगभग 6 किमी तक एक धारा मे ही अलग अलग बहता है। यह विचित्र घटना दोनो नदीयो के जल के परस्पर-विरोधी गुणो के कारण होती है।

रिओ निग्रो का जल अपने नाम के अनुरूप काला है। इसके जल मे तलछट/मिट्टी नही है लेकिन इसका काली चाय के जैसा रंग कोलंबीया के जंगलो के मध्य बहते समय वनस्पतिक अवशेषो के इसके जल मे मिलने से बन जाता है। इसके जल का तापमान लगभग 28° C है और धीमी गति अर्थात 2 किमी/घंटा की रफ़्तार से बहता है।

दूसरी ओर रिओ सोलिमोएस का रंग क्रीमी काफ़ी के जैसा है जोकि एंडीस पर्वत श्रृंखला से बहने के दौरान उसमे मिली तलछट/मिट्टी के रंग के कारण है। इसका जल थोड़ा शीतल 22°C तापमान का है, लेकिन इसके जल की रफ्तार तेज अर्थात 6 किमी/घंटा है।

दोनो नदीयों के जल के संघटको, गति, तापमान और घनत्व मे अंतर के कारण दोनो नदीयो का जल संगम होने पर एक दूसरे मे विलिन नही होता है, दोनो का जल 6 किमी तक साथ मे अलग अलग बहने के पश्चात धाराओ मे भंवर द्वारा उत्पन्न बाधाओं के फलस्वरूप एक दूसरे मे मजबूरन मीलता है। दोनो नदियों के रंगो मे अंतर इतना स्पष्ट है कि वह अंतरिक्ष से ली गयी तस्विरों मे भी स्पष्ट दिखायी देता है।

इसी विचित्रता के कारण इन दोनो नदियों का संगम स्थल मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil) एक प्रसिध्द पर्यटन स्थल बन गया है।

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

जुलाई 18, 2014

सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?

by Ashish Shrivastava

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य काफी विशाल है, बहुत ही विशाल। वह चौड़ाई मे पृथ्वी से सौ से भी ज्यादा गुणा है, उसके अंदर 10 लाख से ज्यादा पृथ्वीयाँ समा सकती है। यदि आप पृथ्वी और सूर्य को किसी ब्रह्माण्डीय तराजु पर तौले तो पायेंगे कि सूर्य पृथ्वी से 300,000 गुणा ज्यादा द्रव्यमान रखता है।

लेकिन सूर्य का द्रव्यमान कम हो रहा है। समय के साथ धीमे धीमे उसके द्रव्यमान मे ह्रास हो रहा है, यह दो तरह से हो रहा है, प्रथम है सौर वायु और द्वितीय है द्रव्यमान का ऊर्जा के रूप मे परिवर्तन जिससे सूर्य से प्रकाश और उष्मा का उत्सर्जन होता है।

सूर्य के द्रव्यमान मे उपरोक्त मे से किस विधि से द्रव्यमान ह्रास तेज गति से हो रहा है ? दोनो विधि को विस्तार से देखते है। Continue reading

जुलाई 10, 2014

महान विज्ञानी : निकोला टेस्ला

by Ashish Shrivastava

Tesla_circa_1890.jpegनिकोला टेस्ला (अंग्रेजी: Nikola Tesla; सर्बियाई सिरिलिक: Никола Тесла, 10 जुलाई 1856 – 7 जनवरी 1943) एक सर्बियाई अमेरिकी आविष्कारक, भौतिक विज्ञानी, यांत्रिक अभियन्ता, विद्युत अभियन्ता और भविष्यवादी थे। उनका थॉमस एडीसन के आविष्कारों में बहुत बड़ा योगदान रहा है। टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को ऑस्ट्रियन स्टेट (अब क्रोशिया) में हुआ था। बाद में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली। उनके बारे में कहा जाता है कि वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को प्रकाश से सजाया। टेस्ला की प्रसिद्धि उनके आधुनिक प्रत्यावर्ती धारा (एसी) विद्युत आपूर्ति प्रणाली के क्षेत्र में दिये गये अभूतपूर्व योगदान के कारण है। टेस्ला के विभिन्न पेटेंट और सैद्धांतिक कार्य, बेतार संचार और रेडियो के विकास का आधार साबित हुये हैं। वैद्युत चुंबकत्व के क्षेत्र में किये गये उनके कई क्रांतिकारी विकास कार्य, माइकल फैराडे के विद्युत प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों पर आधारित थे।

जीवनयात्रा

टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को सर्बियन मातापिता मिलुटिन टेस्ला और ड्युका टेस्ला के परिवार मे आस्ट्रीयन साम्राज्य(वर्तमान क्रोएशिया) मे हुआ था। 1870 मे निकोला टेस्ला ने कार्लोवैक के स्कूल मे प्रवेश लिया और उस स्कूल मे अपने गणित शिक्षक मार्टिन सेकुलिक से प्रभावित हुये थे। टेस्ला उस समय समाकलन(Integral Calculus) के प्रश्नो को अपने मन मे ही हल करने मे सक्षम थे। उनके शिक्षको को उन पर विश्वास नही होता था लेकिन उन्होने अपना चार वर्ष का अभ्यासक्रम तीन वर्षो मे ही पूरा कर लिया। 1875 मे उन्होने आस्ट्रीयन पालीटेक्निक मे प्रवेश लिया, और अपने प्रथम वर्ष मे उन्होने सभी कक्षाओं मे उपस्थित रहे, नौ परिक्षायें उतीर्ण की और सभी मे सर्वोत्तम संभव गुण प्राप्त किये। Continue reading