अगस्त 25, 2014

गाडेल का अपूर्णता प्रमेय(Gödel’s incompleteness theorem)

by Ashish Shrivastava

कुर्ट फ्रेडरिक गाडेल (Kurt Friedrich Gödel; जन्म 28 अप्रैल 1906 - 14 जनवरी 1978) मूल रूप से ऑस्ट्रियाई और बाद में अमेरिकी तर्कशास्त्री, गणितज्ञ और दार्शनिक थे।

कुर्ट फ्रेडरिक गाडेल (Kurt Friedrich Gödel; जन्म 28 अप्रैल 1906 – 14 जनवरी 1978) मूल रूप से ऑस्ट्रियाई और बाद में अमेरिकी तर्कशास्त्री, गणितज्ञ और दार्शनिक थे।

उन्नीसवीं शताब्दी तथा बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे गणितज्ञो का लक्ष्य था कि अंकगणित को कुछ स्वयंसिद्ध नियमों मे बांध दिया जाये। यह युक्लिड के ज्यामितिक नियमो के जैसा ही प्रयास था जिसमे कुछ निर्विवाद स्वयं सिद्ध नियमों के आधार पर हर प्रमेय को सिद्ध किया जा सकता था।

 
यह एक उत्कृष्ट लक्ष्य था। एक ऐसे सिद्धांत की कल्पना जिसमे पूर्णांको संबधित हर संभव स्वयं सिद्ध कथन(Axiom) का समावेश हो। गाडेल द्वारा प्रस्तावित अपूर्णता प्रमेय ने इस लक्ष्य को असंभव बना दिया।  
 
गाडेल के प्रमेय का गणितीय विवरण देना गणितीय तर्क शास्त्र नही जानने वालों से इस महत्वपूर्ण सहज ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान को छुपाने के तुल्य होगा। इसलिए इसे मै सरल कम्प्युटर की भाषा मे दोहराउंगा। 
 
कल्पना कीजिये  हमारे पास एक शक्तिशाली कम्प्यूटर ’आरेकल’ है। जैसे की कम्प्युटर की कार्य विधि है, आरेकल को उपयोगकर्ता कुछ “Input”निर्देश देता है जो कुछ नियमों पर आधारित होते है,आरेकल इसके उत्तर मे उन नियमो के पालन से उत्पन्न’Output’ देता है। समान Input हमेशा समान Output देंगें। आरेकल के Input तथा Output को पूर्णांकों मे लिखा जाता है तथा आरेकल केवल साधारण गणितीय प्रक्रियाएं जैसे जोड़, घटाना, गुणा तथा भाग ही करता है। साधारण कम्प्यूटर के विपरीत हम इस कंप्यूटर से दक्षता या कम समय मे कार्य की आशा नही रखते हैं। आरेकल हमेशा दिये गये निर्देशो का पालन करता है, वह इसमे लगने वाले समय की परवाह नही करता है, आरेकल अपना कार्य निर्देशो के पालन के पश्चात ही बंद करेगा चाहे इसमे लाखों करोड़ो वर्ष लग जायें।[आरेकल (शाब्दिक अर्थ): कोई व्यक्ति या संस्था जो किसी दैवीय  शक्ति द्वारा हर प्रश्न का उत्तर देने मे समर्थ है।]
 
अब एक साधारण सरल उदाहरण लेते है। हम जानते है कि 1 से बड़ी  धनात्मक पूर्णांक संख्या( N)  जो 1 और स्वयं (N) के सिवाए किसी से भाज्य न हो रूढ़(अभाज्य-Prime) संख्या कहलाती है। अब आप ’आरेकल’ को कैसे निर्देश देंगे कि वह तय करे कि ‘N’ एक रूढ़ संख्या है? हम उसे कहेंगे कि N को 1 से लेकर N-1 तक की हर पूर्णांक संख्या से भाग दे तथा भागफल(Quotient) पूर्णांक संख्या मिलने  पर या भाजक(divisor) के N-1 तक पहुंचने पर रूक जाये।(वास्तविक रूप मे आप आरेकल को भाजक के  N के वर्गमूल तक पहुंचने पर रूकने कह सकते हैं । यदि भाजक के N के वर्गमूल तक  पहुंचने पर भी कोई पूर्णांक भागफल नही मिला हो तो N एक रूढ़ संख्या हैं ।)
 
गाडेल के प्रमेय के अनुसार पूर्णांको से संबधित कुछ प्रश्न ऐसे भी है जो केवल पूर्णांको का अंकगणित पर आधारित हो लेकिन उनका उत्तर देने मे आरेकल असमर्थ होगा। दूसरे शब्दो मे कुछ कथन ऐसे है कि जिनमे सही Input देने के पश्चात भी आरेकल उनके सत्य या असत्य निर्धारण मे असमर्थ रहेगा। ऐसे कथन अनिर्णनीय होते है और जटिल होते है। यदि ऐसे कथनो को आप डा. गाडेल ले पास लायें तो वे कहेंगे कि ऐसे कथन हमेशा से ही अस्तित्व मे रहे है और रहेंगे।
 
यदि आपको आरेकल का उन्नत माडेल आरेकल-स दिया जाये जिसमे एक विशेष अनिर्णनीय कथन UD को सत्य निर्धारित कर दिया गया है। किसी प्रश्न को हल करने दौरान UD के आने के बाद भी परिणाम मे एक दूसरा अनिर्णनीय कथन उसकी जगह ले लेगा। यदि आपको एक अन्य उन्नत आरेकल-अ दिया गया हो जिसमे  एक विशेष अनिर्णनीय कथन UD को असत्य निर्धारित कर दिया गया है। यह माडेल भी हल के दौरान UD के आने के बावजूद परिणाम मे अनिर्णनीय कथन ही देगा। आरेकल-स और आरेकल-अ के परिणाम भिन्न हो सकते है लेकिन दोनो वैध होंगे।
 
क्या आपको यह चौंकाने वाला तथा विरोधाभाषी लग रहा है ? 1931 जब गाडेल ने इस प्रमेय को विश्व के सामने रखा था समस्त विश्व स्तब्ध रह गया था, इसे अब अपूर्णता प्रमेय कहते है। गाडेल ने अपने परिणामो को कम्युटर भाषा मे नही लिखा था। वे एक निश्चित तर्क शास्त्र और गणित विषय मे कार्य करते थे और उनके परिणाम गणित तथा गणितीय तर्क शास्त्र की विशिष्टता पर निर्भर थे। अगले दशको मे कई अन्य गणितज्ञो जैसे स्टीफन सी क्लीने, एमील पोष्ट, जे बी रासर तथा महान गणितज्ञ, तर्क शास्त्री एलन ट्युरींग ने अपूर्णता प्रमेय को मान्यता दी।
 
क्या आपको गाडेल का अपूर्णता प्रमेय समझ मे आया ? नही ? थोड़ा और सरलीकरण का प्रयास करते है।
 
सरल शब्दों मे इसे कुछ ऐसा भी कह सकते है कि गणित को कुछ निश्चित नियमों मे नही बांधा जा सकता है, गणित के नियमों की सूची असीमित  है। सभी सत्य कथनो को सिद्ध करना असंभव है। आप कुछ कथनो को सिद्ध कर दें तब भी कुछ नये कथन आ जायेंगे, जिन्हे सिद्ध करना शेष रहेगा।
 
कुछ उदाहरण और लेते है :
 
  1. यह कथन असत्य है।
  2. मैं असत्यवादी हूँ।
  3. इस कथन को सिद्ध नही किया जा सकता है।

 

पहले कथन के संदर्भ मे, यदि यह वाक्य सत्य है, इसका अर्थ है कि वह कथन असत्य है। यदि वाक्य असत्य है अर्थात कथन सत्य है। दूसरे कथन मे, यदि मै सत्य कह रहा हूँ तब मै असत्य कथन कह रहा हूँ; यदि मै असत्य कह रहा हूँ तब मैं सत्य कथन कह रहा हूँ। अंतिम कथन मे यदि वाक्य सत्य है तब इसे सत्य सिद्ध नही किया जा सकता।
 
अब आपके के लिए एक चुनौती, क्या आप सिद्ध कर सकते है कि 

दो से बड़ी हर सम संख्या दो रूढ़ संख्या के योग के रूप मे लिखी जा सकती है।

          उदाहरण : 4=3+1 ,10=7+3
 
यह कथन सत्य है, लेकिन क्या आप इसे सिद्ध कर सकते है?
अगस्त 11, 2014

रंगो का अद्भुत विश्व : दर्पण, मृगमरिचिका

by Ashish Shrivastava

रंग अद्भुत होते है और उससे अद्भुत है हमारी उन्हे देखने की क्षमता। मानव नेत्र लगभग एक करोड़ से ज्यादा रंग पहचान सकते है।

आपने कई रंग देखे होंगे लेकिन कभी सोचा है कि आखिर लाल रंग की वस्तु लाल क्यों दिखायी देती है? किसी भी वस्तु का कोई रंग क्यों होता है ? वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु का रंग एक भ्रम मात्र है, लाल वस्तु लाल इसलिये दिखायी देती है कि वह वस्तु लाल रंग का अवशोषण नही कर पाती है, लाल के अतिरिक्त अन्य सभी रंग उस वस्तु द्वारा अवशोषित हो जाते है। उसी तरह नीले रंग की वस्तु केवल नीले रंग का अवशोषण नही कर पाती है!

रंग

रंग

  1. प्रकाश स्रोत से ’सफ़ेद’ प्रकाश उस वस्तु पर पड़ता है।
  2. लाल के अतिरिक्त सभी रंग अवशोषित हो जाते है।
  3. इससे हमारी आंखो तक केवल लाल रंग का प्रकाश पहुंचता है और हम उस वस्तु को लाल रंग का देखते है।

जैसा कि हम जानते हैं कि सफ़ेद रंग सभी रंगो का मिश्रण है, सफ़ेद रंग की वस्तु किसी भी रंग का अवशोषण नही करती है जिससे वह सफ़ेद रंग कि दिखायी देती है। काला रंग इसका विपरीत है, काला अपने आप मे कोई रंग नही होता है, इसका अर्थ है रंगो की अनुपस्थिति। काले रंग की वस्तु अभी रंगो का अवशोषण कर लेती है, जिससे वह काले रंग कि दिखायी देती है।

यदि हम किसी लाल वस्तु पर एक ऐसा प्रकाश डाले जिसमे लाल रंग को छोड़कर अन्य सभी रंग हो तब वह वस्तु हमे लाल नही काली दिखायी देगी। वैसे ही यदि आपने ध्यान दिया हो कि कपड़ो के (या किसी अन्य वस्तु) के रंग दुकान के प्रकाश की तुलना मे सूर्य की प्रकाश मे भिन्न दिखायी देते है। यहाँ भी कारण वही है कि सूर्य के प्रकाश मे लगभग सब रंग होते है जबकि कृत्रिम रोशनी मे कुछ रंग अनुपस्थित होते है जिससे कपड़े द्वारा रंग का अवशोषण दोनो प्रकाशो मे भिन्न होता है।

रंग की तकनीकी परिभाषा कुछ ऐसी होगी

रंग प्रकाश के उत्सर्जन, वितरण या परावर्तन द्वारा उत्पन्न वर्णक्रम संरचना से निर्मित दृश्य प्रभाव है।

यहाँ तक तो ठीक है लेकिन दर्पण का रंग क्या होगा ? वह भी तो किसी भी रंग का अवशोषण नही करता है, तो उसका रंग भी तो सफ़ेद होना चाहीये ना ? Continue reading

अगस्त 4, 2014

क्वांटम आत्महत्या और श्रोडीन्गर की बिल्ली

by Ashish Shrivastava

 जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

एक व्यक्ति अपने सर पर तनी बंदूक के साथ बैठा है। यह साधारण बंदूक नही है, यह एक क्वांटम सिद्धांत आधारित बंदूक है जो किसी क्वांटम कण के स्पिन को मापने मे सक्षम है। जब भी बंदूक का ट्रिगर दबाया जाता है, एक क्वांटम कण या क्वार्क का स्पिन मापा जाता है। स्पिन के मापन के आधार पर गोली चलेगी या नही चलेगी। यदि क्वार्क का स्पिन घड़ी के सुईयों की दिशा मे है तो बंदूक से गोली चलेगी। यदि क्वार्क का स्पिन घड़ी की सुईयों के विपरीत है तो गोली नही चलेगी, केवल ट्रिगर की क्लिक होगी।

घबराहट के साथ वह व्यक्ति एक गहरी सांस लेता है और ट्रिगर दबा देता है। बंदूक से केवल क्लिक ही होता है। वह फ़िर से ट्रिगर दबाता है, क्लिक, फिर से ट्रिगर, परिणाम वही क्लिक। वह व्यक्ति बार बार ट्रिगर दबाते रहेगा लेकिन परिणाम वही रहेगा, गोली नही चलेगी। हालांकि बंदूक सही तरह से कार्य कर रही है और उसमे गोलीयाँ भी भरी हुयी है, वह व्यक्ति कितनी ही बार ट्रिगर दबायेगा, बंदूक से गोली कभी नही चलेगी। वह यह प्रक्रिया अनंत तक दोहराता रहेगा और क्वांटम अमर रहेगा।
अब हम समय यात्रा कर इस प्रयोग के आरंभ मे वापस जाते है। वह व्यक्ति प्रथम बार ट्रिगर दबाता है, बंदूक मे क्वार्क की दिशा का मापन घड़ी की सुईयों की दिशा मे होता है। बंदूक से गोली चलती है। वह व्यक्ति अब मृत है।

लेकिन रूकिये! उस व्यक्ति ने प्रथम बार ट्रिगर दबाया था और उसके पश्चात अनंत बार ट्रिगर दबाया था और हम पहले से ही जानते हैं कि बंदूक से गोली नही चली थी। अब वह व्यक्ति मृत कैसे हो सकता है ? वह व्यक्ति नही जानता कि वह जीवित और मृत दोनो अवस्था मे है। जब भी वह ट्रिगर दबाता है, ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो ब्रह्माण्ड बन जाते है। यह विभाजन होते रहता है, दोबारा , तीबारा, चौथी बार, जब भी वह व्यक्ति ट्रिगर दबाता है ब्रह्माण्ड का एक और विभाजन होता है।

इस वैचारिक प्रयोग (thought experiment) को क्वांटम आत्महत्या(quantum suicide) कहा जाता है। इसे प्रिंसटन विश्वविद्यालय(Princeton University) के सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक मैक्स टेगमार्क(Max Tegmark) ने 1997 मे प्रस्तावित किया था। वे अब एम आई टी(MIT) मे है। वैचारिक प्रयोग केवल मस्तिष्क मे किये जाते हैं। क्वांटम स्तर मानव द्वारा ब्रह्माण्ड मे खोजा गया पदार्थ का सूक्ष्मतर स्तर भाग है। यह इतना सूक्ष्म है कि इस स्तर पर पारंपरिक तौर पर वैज्ञानिक प्रयोग करना लगभग असंभव हो जाता है। Continue reading

जुलाई 29, 2014

ब्रह्माण्ड की 13 महत्वपूर्ण संख्यायें

by Ashish Shrivastava

कुछ संख्याये जैसे आपका फोन नंबर या आपका आधार नंबर अन्य संख्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इस लेख मे हम जिन संख्याओं पर चर्चा करेंगे वे ब्रह्मांड के पैमाने पर महत्वपूर्ण है, ये वह संख्याये है जो हमारे ब्रह्मांड को पारिभाषित करती है, हमारे आस्तित्व को संभव बनाती है और ब्रह्माण्ड के अंत को तय करेंगी।

1. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक( The Universal Gravitational Constant)

Universeयह वर्ष 2014 एक महत्वपूर्ण वर्ष ना हो लेकिन 1665 इस वर्ष से बहुत बुरा था, विशेषतः लंदन वासीयों के लिये। लंदन मे बुबोनिक प्लेग फैला हुआ था, उस समय शहर से बाहर जाने के अतिरिक्त इस महामारी से बचने का कोई अन्य उपाय या औषधी ज्ञात नही थी। बादशाह चार्लस द्वितिय(King Charles II ) ने अपनी राजधानी लंदन से आक्सफोर्ड स्थानांतरित कर दी थी और कैंब्रीज विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया था। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी ने अपने गृहनगर वूल्सथोर्पे(Woolsthorpe) जाने का निश्चय किया और अपने अगले 18 महिने आधुनिक विज्ञान के लिये नये दरवाजे खोलने मे बिताये, इस विद्यार्थी का नाम था आइजैक न्युटन

300px-NewtonsLawOfUniversalGravitationहम ऐसे तकनीकी युग मे रह रहे है जिसमे संख्यात्मक(परिमाणात्मक) अनुमान नही लगाये जा सके तो जीना दूभर हो जाये। और परिमाणात्मक अनुमान लगाने मे शायद सबसे पहली सफलता न्युटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत(Universal Gravitation) से मीली थी। उनकी अवधारणा के अनुसार दो पिंडो मे मध्य का गुरुत्विय आकर्षण उनके द्रव्यमान के गुणनफल के आनुपातिक तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग के विलोमानुपातिक होता है। अपनी इस अवधारणा से न्युटन ने पता लगाया कि किसी ग्रह की कक्षा एक दिर्घवृत्त(ellipse) के आकार की होती है जिसके एक केंद्रबिंदु(focus) पर सूर्य होता है। जोहानस केप्लर ने ग्रहो की कक्षा के बारे मे यह अनुमान न्युटन से पहले लगाया था लेकिन वह निरीक्षण पर आधारित था। न्युटन ने यह अनुमान गणितिय गणनाओं और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के आधार पर लगाया था। उन्होने इस गणना के लिये गणित की एक नयी शाखा कलन गणित(calculus) भी खोज निकाली थी। Continue reading

जुलाई 25, 2014

दो नदीयों के संगम के बावजूद जल अलग अलग बहता है: विचित्र किंतु सत्य।

by Ashish Shrivastava

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil)मे दो नदीयाँ रिवो निग्रो(Rio Negro) तथा रिवो सोलिमोएस(Rio Solimões) का संगम होता है और वे मिलकर नीचली अमेजान(Lower Amazon) नदी का निर्माण करती है। लेकिन इन दोनो नदीयों का जल एक दूसरे मे विलिन होने से इंकार कर देता है और लगभग 6 किमी तक एक धारा मे ही अलग अलग बहता है। यह विचित्र घटना दोनो नदीयो के जल के परस्पर-विरोधी गुणो के कारण होती है।

रिओ निग्रो का जल अपने नाम के अनुरूप काला है। इसके जल मे तलछट/मिट्टी नही है लेकिन इसका काली चाय के जैसा रंग कोलंबीया के जंगलो के मध्य बहते समय वनस्पतिक अवशेषो के इसके जल मे मिलने से बन जाता है। इसके जल का तापमान लगभग 28° C है और धीमी गति अर्थात 2 किमी/घंटा की रफ़्तार से बहता है।

दूसरी ओर रिओ सोलिमोएस का रंग क्रीमी काफ़ी के जैसा है जोकि एंडीस पर्वत श्रृंखला से बहने के दौरान उसमे मिली तलछट/मिट्टी के रंग के कारण है। इसका जल थोड़ा शीतल 22°C तापमान का है, लेकिन इसके जल की रफ्तार तेज अर्थात 6 किमी/घंटा है।

दोनो नदीयों के जल के संघटको, गति, तापमान और घनत्व मे अंतर के कारण दोनो नदीयो का जल संगम होने पर एक दूसरे मे विलिन नही होता है, दोनो का जल 6 किमी तक साथ मे अलग अलग बहने के पश्चात धाराओ मे भंवर द्वारा उत्पन्न बाधाओं के फलस्वरूप एक दूसरे मे मजबूरन मीलता है। दोनो नदियों के रंगो मे अंतर इतना स्पष्ट है कि वह अंतरिक्ष से ली गयी तस्विरों मे भी स्पष्ट दिखायी देता है।

इसी विचित्रता के कारण इन दोनो नदियों का संगम स्थल मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil) एक प्रसिध्द पर्यटन स्थल बन गया है।

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

जुलाई 18, 2014

सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?

by Ashish Shrivastava

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य काफी विशाल है, बहुत ही विशाल। वह चौड़ाई मे पृथ्वी से सौ से भी ज्यादा गुणा है, उसके अंदर 10 लाख से ज्यादा पृथ्वीयाँ समा सकती है। यदि आप पृथ्वी और सूर्य को किसी ब्रह्माण्डीय तराजु पर तौले तो पायेंगे कि सूर्य पृथ्वी से 300,000 गुणा ज्यादा द्रव्यमान रखता है।

लेकिन सूर्य का द्रव्यमान कम हो रहा है। समय के साथ धीमे धीमे उसके द्रव्यमान मे ह्रास हो रहा है, यह दो तरह से हो रहा है, प्रथम है सौर वायु और द्वितीय है द्रव्यमान का ऊर्जा के रूप मे परिवर्तन जिससे सूर्य से प्रकाश और उष्मा का उत्सर्जन होता है।

सूर्य के द्रव्यमान मे उपरोक्त मे से किस विधि से द्रव्यमान ह्रास तेज गति से हो रहा है ? दोनो विधि को विस्तार से देखते है। Continue reading

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,187 other followers