मई 1, 2015

हबल अंतरिक्ष दूरबीन : जब 1.6 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट को बर्बाद होने से बचाया गया!

by आशीष श्रीवास्तव

हबल दूरबीन

हबल दूरबीन

अंतरिक्ष को देखने का हमारा नज़रिया पूरी तरह से बदल देने वाले हबल वेधशाला इस महीने 25 साल की हो गयी।

25 साल पहले अप्रैल 1990 में दूरबीन हबल अपनी अंतरिक्ष यात्रा पर शटल ‘डिस्कवरी’ में सवार हो कर निकली थी| अपने कार्यकाल के दौरान यह उपकरण पृथ्वी पर लगभग 7 लाख तस्वीरें भेज चुका है, जिनमें से अधिकाँश को क्लासिक तस्वीर की संज्ञा प्राप्त हो चुकी है और उन्हें पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया है तथा लगभग सभी लोग उन्हें जानते हैं|

लेकिन 1990 में इसे प्रक्षेपण के साथ ही 1.6 अरब डॉलर के खर्च से बनी इस अंतरिक्ष वेधशाला में एक गंभीर समस्या पैदा हुई जिसने इसे शुरुआती दौर में मज़ाक का विषय बना दिया। उस पर कामेडी, स्टैंड अप कॉमेडी होने लगी। 1991 की हिट फिल्म “नेकिड गन 2½ में इस वेधशाला का एक फोटो “हिंडनबर्ग” और “टाइटैनिक” जैसे हादसों के साथ दिखाया गया। अगर हबल कोई कार होती तो उसे डीलर के पास ले जाकर पैसे वापस मांगा जाता। लेकिन ये अमरीकी जनता के पैसों से बना था और अब अंतरिक्ष में था। नासा के सामने दो ही विकल्प थे – इसका उपयोग बंद करे और इसे त्याग दे, या फिर इसे सही करने के सभी जोखिम भरे कदम उठाए।

हबल वेधशाला मरम्मत का काम पृथ्वी की कक्षा में, पृथ्वी से 600 किलोमीटर (या 370 मील) ऊपर 35 घंटे और 28 मिनट की अंतरिक्ष चहलकदमी के दौरान हुआ। लेकिन कोई सामान्य मिशन नहीं था।

क्या थी समस्या ?

हबल का मुख्य दर्पण पालीश होते हुये, इसी दर्पण मे समस्या थी।

हबल का मुख्य दर्पण पालीश होते हुये, इसी दर्पण मे समस्या थी।

जून, 1990 में नासा को गलती की गंभीरता का अंदाजा हुआ। संचार और इलेक्ट्रानिक्स पुर्जो के साथ-साथ सबसे बड़ी समस्या थी मुख्य दर्पण। जांच से ये मालूम हुआ कि मुख्य दर्पण के किनारों को काफी ज्यादा पॉलिश कर दिया गया था, जिसके चलते वो समतल हो गया था। इससे ज़ाहिर था कि करीब 1.61 अरब डॉलर की लागत वाले दूरबीन का फोकस ही ठीक नहीं था यानी वह सही चित्र नहीं भेज सकता था।

चैलेंजर हादसे के समय नासा की ख़ासी आलोचना हुई थी और उसके चार साल बाद, वह फिर राजनीतिक तूफ़ान में घिर रहा था। कुछ लोग जिसे लापरवाही कह रहे थे, पत्रकार, पर्यवेक्षक और राजनेता उसके बारे में कहीं कड़े शब्दों में आलोचना कर रहे थे। ऐसे में नासा ने इस वेधशाला को ठीक करने का ज़िम्मा स्टोरी मसग्रेव पर छोड़ा। मसग्रेव कहते हैं,

“मुझे हर संभव गलती का पता लगाने को कहा गया, अंतरिक्ष चहलकदमी के साथ उन्हें ठीक भी किया जा सकता था।”

किसकी अंतरिक्ष चहलकदमी से बचा हबल?

हबल द्वारा लिये गये चित्र (मरम्मत से पहले और पश्चात)

हबल द्वारा लिये गये चित्र (मरम्मत से पहले और पश्चात)

अंतरीक्षयात्री-डॉक्टर-वैज्ञानिक स्टोरी मसग्रेव ने हबल अंतरिक्ष वेधशाला को विकसित करने का काम 1970 के मध्य में शुरू किया था। मसग्रेव ने गणित और चिकित्सा समेत कई विषयों में पढ़ाई कर रखी थी और उनके पास कुल सात स्नातक डिग्रियां हैं। वो एक-एक प्रणाली और उपकरण को समझते थे। लेकिन अनुमान नहीं था कि उन्हें हबल वेधशाला उन समस्याओं के साथ जूझना पड़ेगा जो सामान, औजार या उपकरणों की गुणवत्ता के कारण पैदा होंगी।
इस वेधशाला को लेकर तमाम बड़े दावे किए गए थे। लेकिन अब 1.61 अरब डॉलर डूब रहे थे।

मसग्रेव कहते हैं,

“हबल के काम करने में कोई मुश्किल नहीं आनी चाहिए थी, लेकिन अंतरिक्ष में जाते ही उसकी समस्याएं शुरू हो गईं।”

मसग्रेव को एक्स्ट्रा वेहिकुलर एक्टिविटी (ईवीए) टीम का नेतृत्व करने को कहा गया।

टीम में शामिल लोगों को ह्यूस्टन के विशालकाय पानी के टैंक में अंतरिक्ष चहलकदमी का प्रशिक्षण दिया गया। उधर वेधशाला में गड़बड़ियों की सूची बढ़ती जा रही थी। इसकी वजह से हबल की मरम्मत का पहला अभियान एसटीएस-61 काफी चुनौती पूर्ण हो गया।

दो दिसंबर, 1993 को मसग्रेव की टीम अंतरिक्ष में रवाना हुई। तीन दिन बाद उन्होंने हबल वेधशाला को सही करने का काम शुरू किया। मसग्रेव और उनके साथ जेफ़ हॉफ़मैन अंतरिक्ष शूट के साथ अंतरिक्ष इतिहास में यान के बाहर सबसे लंबे समय तक चलने वाले अभियान के लिए निकल पड़े।

35 घंटे, 28 मिनट का अंतरिक्ष चहलकदमी

अंतरिक्ष चहलकदमी से हबल की मरम्मत

अंतरिक्ष चहलकदमी से हबल की मरम्मत

पृथ्वी तल से करीब 600 किलोमीटर की ऊंचाई पर दोनों ने पहले दिन कुल आठ घंटे तक वेधशाला में समान को बदला किया। इसमें गायरोस्कोप, कंट्रोल यूनिटस और इलेक्ट्रिकल सर्किट शामिल थे। जो समस्या हल नहीं हो रही थी वो थी उपकरण कक्ष के दरवाजे को बंद न कर पाना।

इस अभियान के बारे में मसग्रेव बताते हैं,

“उतना मुश्किल नहीं था। आसान था। हालांकि पृथ्वी से देखने पर यह काफी चुनौतीपूर्ण लगता था, लेकिन अंतरिक्ष में हमें कोई अचरज नहीं हुआ, न ही कोई अप्रत्याशित बात हुई।”

मसग्रेव विनम्रता से कहते हैं कि हबल की मुश्किलों को सही करने का असली काम जमीन पर मौजूद वैज्ञानिकों की टीम ने किया था। 11 दिन तक चले इस मिशन में सैकड़ों इंजीनियर, तकनीशियन और कंट्रोल करने वालों ने अपना काम बखूबी किया। इस दौरान मसग्रेव की टीम ने कुल 35 घंटे और 28 मिनट तक अंतरिक्षक्राफ्ट से बाहर जाकर काम किया।

कामयाब रहा मिशन

हबल की मरम्मत

हबल की मरम्मत

मसग्रेव और हॉफ़मैन की जोड़ी ने तीन बार अंतरिक्ष चहलकदमी की जबकि उनके साथी कैथरिन थोर्नटन और टॉम एकेर्स ने भी इतनी ही बार अंतरिक्ष चहलकदमी कर इस अभियन को पूरा किया।

हबल की गड़बड़ियां नासा की सबसे बड़ी चूक थीं, वहीं एसटीएस-61 की कामयाबी एजेंसी का सर्वोत्तम काम। जब हबल वेधशाला पूरी तरह से ठीक हो गया और ठीक से काम करने लगा तो राजनेताओं ने नासा के वैज्ञानिकों को सबसे पहले बधाई दी। एसटीएस-61 की टीम की वजह से हबल अंतरिक्ष इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मिशन साबित हुआ। वैसे मसग्रेव के लिए अंतरिक्ष वेधशाला एक वैज्ञानिक अभियान से भी ज़्यादा था।

वे कहते हैं,

“हबल ने ब्रह्माण्ड विज्ञान, थियोलॉजी, दर्शनशास्त्र और अंतरिक्ष विज्ञान सबको एक साथ ला खड़ा किया। हबल से मिली तस्वीरों ने ब्रह्माण्ड की शुरूआत के बारे में हमें बताया और साथ ही ये भी बताया कि हम कौन हैं और मानवता क्या है?

अप्रैल 27, 2015

भूकंप : क्या, क्यो और कैसे?

by आशीष श्रीवास्तव

पृथ्वी के भूपटल में उत्पन्न तनाव का, उसकी सतह पर अचानक मुक्त होने के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना या कांपना, भूकंप कहलाता है। भूकंप प्राकृतिक आपदाओं में से सबसे विनाशकारी विपदा है जिससे मानवीय जीवन की हानि हो सकती है। आमतौर पर भूकंप का प्रभाव अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में होता है। भूकंप, व्यक्तियों को घायल करने और उनकी मौत का कारण बनने के साथ ही व्यापक स्तर पर तबाही का कारण बनता है। इस तबाही के अचानक और तीव्र गति से होने के कारण जनमानस को इससे बचाव का समय नहीं मिल पाता है।

बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों के दौरान पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर 26 बड़े भूकंप आए, जिससे वैश्विक स्तर पर करीब डेढ़ लाख लोगों की असमय मौत हुई। यह दुर्भाग्य ही है कि भूकंप का परिणाम अत्यंत व्यापक होने के बावजूद अभी तक इसके बारे में सही-सही भविष्यवाणी करने में सफलता नहीं मिली है। इसी कारण से इस आपदा की संभावित प्रतिक्रिया के अनुसार ही कुछ कदम उठाए जाते हैं।

विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत भूकंप का अध्ययन किया जाता है, भूकंप विज्ञान (सिस्मोलॉजी) कहलाती है और भूकंप विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को भूकंपविज्ञानी कहते हैं। अंग्रेजी शब्द ‘सिस्मोलॉजी’ में ‘सिस्मो’ उपसर्ग ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ भूकंप है। भूकंपविज्ञानी भूकंप के परिमाण को आधार मानकर उसकी व्यापकता को मापते हैं। भूकंप के परिमाण को मापने की अनेक विधियां हैं।

earthquakeहमारी धरती मुख्य तौर पर चार परतों से बनी हुई है, इनर कोर, आउटर कोर, मैनटल और क्रस्ट। क्रस्ट और ऊपरी मैन्टल को लिथोस्फेयर कहते हैं। ये 50 किलोमीटर की मोटी परत, वर्गों में बंटी हुई है, जिन्हें टैकटोनिक प्लेट्स कहा जाता है। ये टैकटोनिक प्लेट्स अपनी जगह से हिलती रहती हैं लेकिन जब ये बहुत ज्यादा हिल जाती हैं, तो भूकंप आ जाता है। ये प्लेट्स क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर, दोनों ही तरह से अपनी जगह से हिल सकती हैं। इसके बाद वे अपनी जगह तलाशती हैं और ऐसे में एक प्लेट दूसरी के नीचे आ जाती है।

भूकंप को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि “पृथ्वी के भूपटल में उत्पन्न तनाव के आकस्मिक मुक्त होने से धरती की सतह के हिलने की घटना भूकंप कहलाती है”। इस तनाव के कारण हल्का सा कंपन उत्पन्न होने पर पृथ्वी में व्यापक स्तर पर उथल-पुथल विस्तृत क्षेत्र में तबाही का कारण बन सकती है।

जस बिंदु पर भूकंप उत्पन्न होता है उसे भूकंपी केंद्रबिंदु और उसके ठीक ऊपर पृथ्वी की सतह पर स्थित बिंदु को अधिकेंद्र अथवा अंतःकेंद्र के नाम से जाना जाता है। अधिकेंद्र की स्थिति को उस स्थान के अक्षांशों और देशांतरों के द्वारा व्यक्त किया जाता है।

भूकंप के समय एक हल्का सा झटका महसूस होता है। फिर कुछ अंतराल के बाद एक लहरदार या झटकेदार कंपन महसूस होता है, जो पहले झटके से अधिक प्रबल होता है। छोटे भूकंपों के दौरान भूमि कुछ सेकंड तक कांपती है, लेकिन बड़े भूकंपों में यह अवधि एक मिनट से भी अधिक हो सकती है। सन् 1964 में अलास्का में आए भूकंप के दौरान धरती लगभग तीन मिनट तक कंपित होती रही थी।

भूकंप के कारण धरती के कांपने की अवधि विभिन्न कारणों जैसे अधिकेंद्र से दूरी, मिट्टी की स्थिति, इमारतों की ऊंचाई और उनके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री पर निर्भर करती है। Continue reading

अप्रैल 24, 2015

हबल दूरबीन के शानदार 25 वर्ष पूरे

by आशीष श्रीवास्तव

हबल दूरबीन

हबल दूरबीन

आज 25 अप्रैल 2015 को हबल दूरबीन ने अपने जीवन के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिये है। इस दूरबीन ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल डाला है।

सृष्टि के आरंभ और उम्र के बारे में हबल ने अनेक नए तथ्यों से हमें अवगत कराया है। इसकी उपलब्धियों मे एक ब्रह्मांड की उम्र के बारे में सबूत जुटाने की है। हबल के सहारे खगोलविदों की एक टोली ने 7000 प्रकाश वर्ष दूर ऊर्जाहीन अवस्था की ओर बढ़ते प्राचीनतम माने जाने वाले तारों के एक समूह को खोज निकाला है। इन तारों के बुझते जाने की रफ़्तार के आधार पर ब्रह्मांड की उम्र 13 से 14 अरब वर्ष के बीच आँकी गई है। इसके अतिरिक्त पिछले 12 वर्षों के दौरान इस दूरबीन ने सुदूरवर्ती अंतरिक्षीय पिंडों के हज़ारों आकर्षक चित्र भी उपलब्ध कराए हैं।

हबल दूरबीन की कक्षा

हबल दूरबीन की कक्षा

हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी (Hubble Space Telescope (HST)) वास्तव में एक खगोलीय दूरदर्शी है जो अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थित है, इसे 25 अप्रैल सन् 1990 में अमेरिकी अंतरिक्ष यान डिस्कवरी की मदद से इसकी कक्षा में स्थापित किया गया था। हबल दूरदर्शी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘ नासा ‘ ने यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से तैयार किया था। अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पोंवेल हबल के नाम पर इसे ‘ हबल ‘ नाम दिया गया। यह नासा की प्रमुख वेधशालाओं में से एक है। पहले इसे वर्ष 1983 में लांच करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन कुछ तकनीकी खामियों और बजट समस्याओं के चलते इस परियोजना में सात साल की देरी हो गई। Continue reading

अप्रैल 24, 2015

25 अप्रैल को हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला के 25 वर्ष पूरे होने पर विशेष

by आशीष श्रीवास्तव

हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी (Hubble Space Telescope (HST)) वास्तव में एक खगोलीय दूरदर्शी है जो अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थित है, इसका प्रक्षेपण 24 अप्रैल 1990 को अमरीकी अंतरिक्ष शटल डिस्कवरी ने किया था तथा इसे 25 अप्रैल सन् 1990 को इसकी कक्षा में स्थापित किया गया था। हबल दूरदर्शी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘ नासा ‘ ने यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से तैयार किया था। अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पोंवेल हबल के नाम पर इसे ‘ हबल ‘ नाम दिया गया।

हब्बल दूरबीन ने ब्रह्माण्ड विज्ञान मे हमारे लिये ज्ञान का एक नया द्वार खोला। इस अवसर पर प्रस्तुत है हब्बल द्वारा लिये गये कुछ खूबसूरत चित्र।

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अप्रैल 19, 2015

क्या अदृश्य मानव संभव है?

by आशीष श्रीवास्तव

हाल ही मे एक हिन्दी फिल्म आयी है ’मिस्टर ए़क्स” जिसमे नायक अदृश्य हो सकता है। कहानीयों मे , फिल्मो मे अदृश्य होने का कथानक नया नही है, एच जी वेल्स की कहानी ’The invisible man(अदृश्य मानव)‘ मे अदृश्यता का कथानक है। 50 के दशक मे आयी हिंदी फिल्म ’मिस्टर एक्स इन बांबे’ , 80 के दशक की ’मिस्टर इंडीया’ या कुछ वर्षो पहले आयी फिल्म ’गायब’ इन सभी मे नायक अदृश्य हो सकता है। हालीवुड की फिल्म ’The Hollow Man’ मे भी यही कथानक है। इस लेख मे हम चर्चा करेंगे कि क्या अदृश्य मानव संभव है?

सबसे पहले हम समझने है कि प्रयास करते है कि हमारी आंखे किसी वस्तु को कैसे देखती है?

हमारी आंखे किसी वस्तु को कैसे देखती है?

800px-Blausen_0388_EyeAnatomy_01हमारी आंखे किसी कैमरे की तरह होती है। आंखो मे एक लॆंस और एक पर्दा होता है। इस परदे पर हमारी आंखो द्वारा देखे जा सकने वाली किसी भी वस्तु की छवि बनती है। लेंस पारदर्शी होता है जिससे जब हम किसी भी वस्तु को देखते है तब उस उस वस्तु द्वारा परावर्तित प्रकाश की किरणे आंखो के लेंस द्वारा हमारी आंखो के पर्दे अर्थात रेटिना पर केंद्रित की जाती है। रेटीना अपारदर्शी होता है, जिससे उस पर छवि बनती है। इस रेटिना मे दो तरह की प्रकाश संवेदक तंत्रिकायें होती है जिन्हे शंकु और राड कहते है। ये तंत्रिकाये उन पर पड़ने वाली प्रकाश किरणो को महसूस कर उन संकेतो को हमारे मस्तिष्क तक पहुंचाती है जिससे हमारा मस्तिष्क उस छवि को देख पाता है।

इस सारी प्रक्रिया मे महत्वपुर्ण है पारदर्शी लेंस और अपारदर्शी रेटिना, लेंस प्रकाश को केद्रित कर रेटिना पर छवि बना रहा है।

कोई दृश्य वस्तु क्या होती है ?

दृश्य/अदृश्य

दृश्य/अदृश्य

किसी भी वस्तु के हमारी आंखो द्वारा देखे जा सकने के लिये आवश्यक है कि उस वस्तु से परावर्तित प्रकाश हमारी आंखो तक पहुंचे। यदि उस वस्तु के आरपार प्रकाश निकल जाये तो उस वस्तु को देखा नही जा सकेगा। अर्थात वह वस्तु अदृश्य होगी। किसी मानव के अदृश्य होने का अर्थ है कि प्रकाश उसके शरीर के भी आर पार चला जाना चाहिये। उसी स्थिति मे मानव अदृश्य हो पायेगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी होगा कि मानव शरीर  पारदर्शी होगा, अर्थात आंखो के अंदर का रेटिना भी पारदर्शी होगा।

जब रेटिना भी पारदर्शी होगा तो छवि कहाँ बनेगी? जब छवि ही नही बनेगी तो हम देख ही नही पायेंगे! अर्थात अदृश्य मानव अंधा होगाContinue reading

अप्रैल 3, 2015

कैसा लगता है अंतरिक्ष में सबसे लंबे समय तक अकेले रहना…

by आशीष श्रीवास्तव

सारे ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक एकाकी मानव होना कैसा लगेगा? जब आपसे हजारो किमी तक कोई सजीव वस्तु, मानव ना हो?

26 जुलाई 1971 को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से अपोलो 15 यान को प्रक्षेपित किया गया.

26 जुलाई 1971 को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से अपोलो 15 यान को प्रक्षेपित किया गया.

मानव सभ्यता के इतिहास में केवल सात लोग ऐसे हैं जो हम सभी से अलग हैं। और ये हैं अपोलो के कमांड मॉड्यूल के चालक अंतरिक्ष यात्री जिन्होंने चंद्रमा की कक्षा में बिल्कुल एकाकी समय बिताया। इस दौरान उनके सहकर्मी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की सतह पर चहलकदमी कर रहे थे। जब ये अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की कक्षा में दूसरी ओर थे तो इनका बाकी सहकर्मी अंतरिक्ष यात्री और धरती से भी सम्पर्क पूरी तरह कट गया
था। इससे पहले उनसे ज़्यादा, शायद ही कोई ऐसे एकाकीपन से होकर गुज़रा हो। इन सात लोगों में अब केवल पांच जीवित हैं। बीबीसी फ्यूचर के लिए रिचर्ड होलिंगम (विज्ञान पत्रकार, बीबीसी फ़्यूचर) को अपोलो 15 कमांड मॉड्यूल के चालक एल वोर्डन से मिलने का मौका मिला। पहली नज़र में वे किसी वेटरन अंतरिक्ष यात्री की तरह ही नज़र आए। उत्तरी इंग्लैंड के यार्कशायर के एक भीड़-भाड़ वाले रेस्तरां में उनसे मुलाकात हुई। वे अपने प्रशंसकों से घिरे थे।

इस अभियान में शामिल डेविड स्कॉट, एल्फ़्रेड वोर्डन और जेम्स इरविन तस्वीर में नज़र आ रहे हैं

इस अभियान में शामिल डेविड स्कॉट, एल्फ़्रेड वोर्डन और जेम्स इरविन तस्वीर में नज़र आ रहे हैं

वोर्डन जुलाई, 1971 में चंद्रमा की यात्रा पर गए थे। उनके साथ कमांडर डेव स्कॉट और लूनर मॉड्यूल पायलट जिम इरविन थे। अपनी इसी चंद्रमा यात्रा के दौरान उन्होंने अबतक के ‘सबसे एकाकी इंसान‘ होने का रिकॉर्ड बनाया। जब यह रिकॉर्ड बना तो उनके साथी अंतरिक्ष यात्री उनसे 3,600 किलोमीटर दूर चंद्रमा की सतह पर थे। रिचर्ड होलिंगम ने अपनी मुलाकात में अपोलो अभियान की क़ामयाबी के बारे में वोर्डन से  बात की। वैसे उनका अपोलो 15 अभियान वैज्ञानिक रूप से काफ़ी मुश्किल और चुनौती भरा था। उनसे बातचीत के अंश। प्रश्न: कमांड मॉड्यूल पायलट को इतिहास याद नहीं रखता, ये कम ग्लैमरस काम है? हर किसी की नज़र उन अंतरिक्ष यात्रियों पर होती है जो चंद्रमा की सतह पर उतरते हैं, लेकिन उनका काम सतह से पत्थरों को चुनना होगा। वे उसे चुनते हैं और लेकर आते हैं, जिसका बाद में विश्लेषण होता है। लेकिन वैज्ञानिक तौर पर, आप कक्षा से कहीं ज़्यादा जानकारी जुटा पाते हैं। मसलन मैंने ढेर सारी तस्वीरें लीं। चंद्रमा के बाहरी सतह की क़रीब 25 फ़ीसदी हिस्से की तस्वीरें लीं। उसको मैप भी किया, काफी कुछ चीजें थीं। शायद पहली बार ऐसा किया गया था। Continue reading

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