अगस्त 12, 2015

ब्रह्माण्ड के बाहर क्या है?

by आशीष श्रीवास्तव

मान ही लिजिये की आपके मन मे कभी ना कभी यह प्रश्न आया होगा कि ब्रह्माण्ड के बाहर क्या है? खगोलशास्त्री जानते है कि बिग बैंग के पश्चात से ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है, लेकिन यह विस्तार किसमे हो रहा है? किसी भी खगोल शास्त्री से आप यह प्रश्न पूछें, आपको एक असंतोषजनक उत्तर मिलेगा। मै भी आपको एक असंतोषजनक उत्तर देने का प्रयास करता हुं लेकिन आपके असंतोष को दबाने के लिये कुछ स्पष्टीकरण, व्याख्या भी दुंगा।

इस प्रश्न का छोटा उत्तर है कि यह एक निरर्थक बेहुदा प्रश्न है। ब्रह्माण्ड का किसी मे विस्तार नही हो रहा है, केवल ब्रह्माण्ड का ही विस्तार हो रहा है।

ब्रह्माण्ड की परिभाषा है कि वह सब कुछ को समेटे हुये है। यदि ब्रह्माण्ड के बाहर कुछ है अर्थात वह भी ब्रह्माण्ड का ही भाग है। उसके बाहर ? वह भी ब्रह्मांड का भाग है। उसके बाहर, वह भी ब्रह्माण्ड मे ही है। आप पुछते जाइय़े, उत्तर ब्रह्माण्ड ही मिलेगा। मै जानता हुं कि आपके लिये यह संतोषजनक उत्तर है, इसके लिये कुछ अन्य स्पष्टीकरण देखते है।

सबसे बड़ी संख्या कौनसी होती है ? आप कहेंगे ∞ या अनंत। चलो मान लिया। अब बताईये कि (∞ + 1) का मूल्य क्या है? क्या (∞ + 1 ) संख्या ∞ से बड़ी नही है ?

लेकिन ∞ + 1= ∞ , अर्थात अनंत से बड़ी संख्या भी तो अनंत ही होती है। इसी तरह से ब्रह्माण्ड के बाहर भी ब्रह्माण्ड ही है, असिमित!

ब्रह्मांड का 13.7 अरब वर्ष मे हुआ विस्तार

ब्रह्मांड का 13.7 अरब वर्ष मे हुआ विस्तार

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बिग बैंग के 1.6 अरब वर्ष के पश्चात ब्रह्मांड

रूकिये रूकिये, संतोष नही हुआ ? कंप्युटर पर क्रोध ना निकाले, एक और उदाहरण लेते है।

ब्रह्माण्ड के बारे मे दो संभावनाये है, पहली कि वह अनंत है, उसकी कोई सीमा नही है। दूसरी संभावना है कि ब्रह्माण्ड सीमित है, सीमित आयतन है। लेकिन दोनो ही संभावनाओं मे ब्रह्माण्ड का कोई छोर, या कोई सिरा संभव नही है। जब भी हम बिग बैंग घटना की कल्पना करते है तब हम एक विस्फोट की कल्पना करते है जिसमे एक बिंदु से पदार्थ बिखरते हुये दिखाती देता है। लेकिन यह उपमा या उदाहरण सही नही है।

बिग बैंग का अधिक सही उदाहरण किसी फुलते गुब्बारे की सतह है। इस उदाहरण मे आप त्रीआयामी गुब्बारे के बारे मे ना सोच कर द्विआयामी गुब्बारे के बारे की कल्पना करें। यदि आप किसी विशालकाय गुब्बारे की सतह पर चलती चिंटी है और वह गुब्बारा समस्त ब्रह्माण्ड है तब आपको अपने पैरो के निचे वह गुब्बारा सपाट ही लगेगा।

motion_2अब मान लिजिये कि वह गुब्बारा फुल रहा है। अब आप किसी भी दिशा मे देखें तो पायेंगे कि अन्य चिटीयां आपसे दूर जा रही है। वे जितनी ज्यादा दूर है वे आपसे उतनी ज्यादा तेजी से दूर जाते दिखायी देंगी। यह गुब्बारा आपको सपाट सतह जैसा लगेगा लेकिन आप किसी भी दिशा मे चलना प्रारंभ करें आप अपने शुरुवाती बिंदु पर पहुंच जायेंगे।

आप कल्पना कर सकते है कि एक विस्तार करता हुआ वृत्त है और चकित हो सकते है कि यह वृत्त किस चीज मे बढ़ रहा है। लेकिन यह प्रश्न निरर्थक है। ऐसी कोई दिशा नही है कि आप उस दिशा मे बढ़े और सतह के बाहर पहुंच जाये। चिंटी का द्विआयामी मस्तिष्क किसी त्रीआयामी वस्तु के बारे मे कल्पना नही कर सकता है। गुब्बारे का केंद्र हो सकता है लेकिन उसकी सतह का कोई केंद्र बिंदु नही है, वह एक ऐसा आकार है जो हर दिशा मे विस्तृत है और अपने आप मे सिमटा हुआ है। आपकी इस गुब्बारे की हर परिक्रमा पिछली परिक्रमा से बड़ी है क्योंकि गुब्बारा फुलते जा रहा है।

अब इसे अपने ब्रह्मांड से जोड़कर देखते है, उसके लिये हमे एक आयाम से दो आयाम, दो आयाम से तीन आयाम और तीन आयाम से चार आयाम मे सोचना होगा। खगोलवैज्ञानिको के अनुसार आप किसी भी दिशा मे यात्रा प्रारंभ करे आप अपने शुरुवाती बिंदु पर पहुंच जायेंगे। यदि आप अंतरिक्ष बहुत दूर देख रहे है तो आप अपने सिर के पिछले भाग को देख रहे है।

ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है जिससे आपको ब्रह्मांड की परिक्रमा कर प्रारंभ बिंदु पर पहुंचने मे हर बार पिछली बार से अधिक समय लगेगा। लेकिन आप किसी भी दिशा मे यात्रा करने पर आप ब्रह्माण्ड के बाहर नही जा सकते है। यदि आप प्रकाशगति से भी तेज यात्रा करें तब भी आप अपने प्रारंभिक बिंदु पर शिघ्र पहुंच जायेंगे लेकिन ब्रह्माण्ड के बाहर नही। हम हर दिशा मे अपने से दूर जाती हुयी आकाशगंगाओं को देखते है, वह किसी फूलते गुब्बारे की सतह पर बैठी चिंटीयो को अन्य चिटीयो के अपने से दूर होते जाने के तुल्य ही है।

शायद अब तक आपको लग ही गया होगा कि इस प्रश्न का कोई उत्तर नही है कि ब्रह्माण्ड का विस्तार किस मे हो रहा है! ब्रह्मांड का कोई छोर नही है, उसका किसी भी वस्तु मे विस्तार नही हो रहा है, केवल ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है।

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जुलाई 25, 2015

केप्लर 452b: पृथ्वी की जुड़वा बहन – पृथ्वी -2 की खोज

by आशीष श्रीवास्तव

चित्रकार की कल्पना मे केप्लर 452B

चित्रकार की कल्पना मे केप्लर 452B

नासा की अंतरिक्ष वेधशाला ने अपने अभियान मे एक बड़ी सफलता पायी है। उसने एक नये ग्रह केप्लर 452B को खोज निकाला है जो अब तक के पाये गये गैर सौर ग्रह मे पृथ्वी से सबसे ज्यादा मिलता जुलता ग्रह है। केप्लर 452बी नामक इस ग्रह को ‘अर्थ-2’ के नाम से भी पुकारा जा रहा है। यह हमारी आकाशगंगा में पृथ्वी की तरह ही ग्रह है। अब हमारे पास केप्लर 186f के अतिरिक्त दूसरे ग्रह की जानकारी है जो पृथ्वी के जैसे ही है।

नोट 1: सामान्यत: सौर बाह्य ग्रहो का नामकरण खोजने उपकरण, तारे के नाम पर किया जाता है। केप्लर 452B मे

सामान्यत: सौर बाह्य ग्रहो का नामकरण खोजने उपकरण, तारे के नाम पर किया जाता है। केप्लर 452B मे “केप्लर” अंतरिक्ष वेधशाला का नाम है, केप्लर 452 तारे का नाम तथा केप्लर 452B ग्रह का नाम है।

केप्लर 186f ग्रह की खोज 2014 मे हुयी थी और यह नये खोजे गये ग्रह 452B से छोटा है लेकिन एक लाल वामन तारे की परिक्रमा करता है, जोकि हमारे सूर्य से अपेक्षा कृत रूप से ठंडा है।

केप्लर 452, केप्लर 186 तथा सौर मंडल की तुलना

केप्लर 452, केप्लर 186 तथा सौर मंडल की तुलना

केप्लर 452B केप्लर-452 तारे की परिक्रमा करता है तथा यह तारा पृथ्वी से 1400 प्रकाशवर्ष दूर है। इसका तापमान सूर्य के तापमान के लगभग बराबर है। इस तारे का द्रव्यमान सूर्य से 4% अधिक है, सूर्य की तुलना में यह 20 प्रतिशत अधिक चमकीला है। यह सूर्य से 150 करोड़ वर्ष पुराना है।

केप्लर 452बी के एक वर्ष की अवधि यानी समय और इसकी सतह की खूबियां भी लगभग हमारी पृथ्वी जैसी ही हैं। इसका एक साल 385 दिनों का यानी हमारी पृथ्वी से सिर्फ 20 दिन अधिक है, जिसका अर्थ है कि इसकी परिक्रमा अवधि पृथ्वी से 5% अधिक है।

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जुलाई 23, 2015

अंतरग्रहीय अभियान : गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist)

by आशीष श्रीवास्तव

अंतरग्रहीय अभियानो मे विशाल गैस दानव ग्रहो(बृहस्पति, शनि, युरेनस, नेपच्युन) तथा अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग के यानो को गति दी जाती है, इस तरिके को गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) कहते है। इस तरिके मे इंधन का प्रयोग नही होता है और यान की गति बढ़ जाती है।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

अगस्त 1977 मे प्रक्षेपित वायेजर 2 बृहस्पति पहुंचने के बाद उसके गुरुत्वाकर्षण की सहायता से गति प्राप्त की और तेज गति से शनि की ओर पहुंचा। उसके बाद वायेजर 1 भी यही कार्य किया। वायेजर 2 ने शनि से गुरुत्विय सहायता ली और ज्यादा तेज गति से युरेनस पहुंचा, उसके बाद और युरेनस से सहायता ले अधिक तेज गति से नेपच्युन पहुंचा और उसके आगे निकल गया। गैलेलीयो यान ने शुक्र से एक बार, पृथ्वी से दो बार, सूर्य से एक बार सहायता लेकर अपने लक्ष्य बृहस्पति पहुंचा। शनि की परिक्रमा कर रहे कासीनी यान ने शुक्र से दो बार, पृथ्वी से एक बार, बृहस्पति से एक बार सहायता ली और शनि तक पहुंचा।

ध्यान रहे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है, वे एक जगह नही रहते है। इन सभी अभियानो मे इन अंतरिक्ष यानो का पथ इस तरह से बनाया जाता है कि वे निर्धारित समय पर ग्रह के पहुंचने के स्थान पर पहुंच जाये और तेज गति प्राप्त कर अगले पड़ाव पर समय पर पहुंचे ताकि अगले पड़ाव से भी गति त्वरण प्राप्त करने मे सहायता ले सके। इस तरह के पथ बनाने के लिये ग्रहों की स्थिति पर ध्यान मे रख कर पथ बनाया जाता है। वायेजर ने बृहस्पति, शनि, युरेनस से सहायता प्राप्त की थी, लेकिन इस तरह की स्थिति 175 वर्ष मे एक बार होती है। यह स्थिति 1977 मे बनी थी और अब 2152 मे बनेगी।

न्यु हारीजोंस के पथ मे वह केवल बृहस्पति से ही सहायता ले पाया था।

अब यह जानते है कि यह कार्य कैसे करता है :

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जुलाई 20, 2015

न्यु हारीजोइन्स : प्लूटो की यात्रा सम्पन्न कर आगे रवाना

by आशीष श्रीवास्तव

न्यु हारीजोन्स

न्यु हारीजोन्स

अंतरिक्ष सदीयों से मानव को आकर्षित करता रहा है। खगोलिय पिंड मानव मन को हमेशा चुनौति देते आये है, और सदियों से मानव उनका निरीक्षण और अध्ययन करता आया है। ज्ञान की इस यात्रा मे महत्वपूर्ण मोड़ 4 अक्टूबर 1957 को आया जब पहली बार कोई मानव निर्मित वस्तु स्पूतनिक उपग्रह के रूप मे पृथ्वी के वातावरण को पार कर अंतरिक्ष मे पंहुची। इसके पश्चात तो अंतरिक्ष अभियानो की एक श्रृंखला प्रारंभ हो गयी।

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

अपोलो अभियान के तहत मानव 20 जुलाई 1969 को चांद पर जा पहुंचा। अंतरग्रहीय अभियान के तहत 19 मई 1961 को सोवियत संघ का वेनेरा 1 शुक्र ग्रह के 100,000 किमी दूरी से गुजरा। इस यान के शुक्र के पास पहुंचने से पहले ही संपर्क टूट गया था लेकिन यह पहला अभियान था जब कोई मानव निर्मित यान किसी अन्य ग्रह के पास से गुजरा था। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 2 पहला सफल अभियान था जिसमे दिसंबर 1962 मे शुक्र के 35,000 किमी दूरी से आंकड़े भेजे। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 4 जुलाई 1965 को मंगल के पास से गुजरा। मार्च 1966 मे सोवियत संघ का यान वेनेरा 3 शुक्र की सतह से टकरा कर नष्ट हो गया और वह कोई भी सुचना भेजने मे असफल रहा था, लेकिन वह पहला यान था जो किसी अन्य ग्रह की सतह पर पहुंचा था। अक्टूबर 1967 मे सोवियत संघ का वेनेरा 4 किसी अन्य ग्रह की सतह पर उतरने वाला पहला सफल अभियान था।

सं रा अमरीका का यान मैरीनर 10 पहला अभियान था जो एक बार मे एकाधिक ग्रहो के पास से गुजरा। यह यान फरवरी 1974 मे शुक्र के पास से तथा बुध के पास से तीन बार मार्च , सितंबर 1974 तथा मार्च 1975 मे गुजरा।

इन अभियानो के बाद मानव के सबसे सफल अंतरग्रहीय अभियान वायेजर 1 तथा वायेजर 2 रहे। ये दोनो यानो ने बृहस्पति, शनि, युरेनस तथा नेपच्युन की यात्रा की थी। उसके पश्चात वे सौर मंडल के बाहर की यात्रा पर निकल गये। इस तरह से 2006 प्लूटो के ग्रह माने जाने तक मानव द्वारा सभी ग्रह तक खोजी अंतरिक्ष यान भेजे जा चुके थे केवल प्लूटो ही ऐसा अकेला ’ग्रह’ था जिसपर मानव यान नही भेजा गया था।

USPS_Pluto_Stamp_-_October_19911991 मे सं रा अमरीका डाक विभाग ने प्लूटो ग्रह पर एक डाक टिकट जारी किया, जिस पर लिखा था “Pluto Not Yet Explored”। डाक टिकट पर लिखे इस संदेश ने वैज्ञानिको को प्लूटो पर एक अभियान भेजने के लिये चुनौति दी। इस चुनौति ने न्यु हारीजोंस अभियान का आधार बनाया और 2006 मे यह यान अपनी यात्रा पर रवाना हो गया।

प्लूटो के बारे में हमें जितनी जानकारी है उसे एक डाक-टिकट के पीछे लिखा जा सकता है। इस मिशन के पूरा होने के बाद सौर मंडल संबंधी किताबों को दोबारा लिखे जाने की ज़रूरत होगी।

-2006 मे एक वरिष्ठ नासा अधिकारी कॉलिन हार्टमैन Continue reading

जुलाई 14, 2015

प्लूटो : न्यु हारीजोंस की प्लूटो यात्रा पर विशेष भाग 1

by आशीष श्रीवास्तव

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

प्लूटो के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यह पहले अपने सौरमंडल का 9वां ग्रह था। लेकिन अब इसे ग्रह नहीं माना जाता। आओ आज प्लूटो के बारे में जानते हैं।

रोमन मिथक कथाओं के अनुसार प्लूटो (ग्रीक मिथक में हेडस) पाताल का देवता है। इस नाम के पीछे दो कारण है, एक तो यह कि सूर्य से काफ़ी दूर होने की वजह से यह एक अंधेरा ग्रह (पाताल) है, दूसरा यह कि प्लूटो का नाम PL से शुरू होता है जो इसके अन्वेषक पर्सीयल लावेल के आद्याक्षर है।

सूर्य की रोशनी को प्लूटो तक पहुंचने में छह घंटे लग जाते है जबकि पृथ्वी तक यही रोशनी महज आठ मिनट में पहुँच जाती है। प्लूटो की दूरी का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। बड़ी कक्षा होने के कारण सूर्य की परिक्रमा के लिए भी प्लूटो को अधिक वर्ष लगते है, 248 पृथ्वी वर्ष। प्लूटो अपनी धूरी के इर्दगिर्द भी घूमता है। यह अपने अक्ष पर छह दिवसों में एक बार घूमता है। प्लूटो की कक्षा अंडाकार है। अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हुए कभी यह नेप्चून की कक्षा को लांघ जाता है। तब नेप्चून की बजाय प्लूटो सूर्य के समीप होता है। हालांकि प्लूटो को यह सौभाग्य केवल बीस वर्षों के लिए मिलता है। 1979 से लेकर 1999 तक प्लूटो आठवां जबकि नेप्चून नौवां ग्रह था।

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो का आकार हमारे चंद्रमा का एक तिहाई है। यानी हमारे चंद्रमा के तीसरे हिस्से के बराबर है प्लूटो। इसका व्यास लगभग 2,300 किलोमीटर है। पृथ्वी प्लूटो से लगभग 6 गुना बड़ी है। प्लूटो सूर्य से औसतन 6 अरब किलोमीटर दूर है। इस कारण इसे सूर्य का एक चक्कर लगाने में हमारे 248 साल के बराबर समय लग जाता है।

यह नाइट्रोजन की बर्फ, पानी की बर्फ और पत्थरों से बना है। इसके वायुमंडल में नाइट्रोजन, मिथेन और कार्बन मोनोक्साइड गैस है। इस कारण यहां का तापमान काफी कम रहता है। शून्य से 200 डिग्री सेल्सियस नीचे यानी -200 डिग्री सेल्सियस रहता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है यहां कितनी ठंड लगती होगी। इतने कम तापमान में कोई यहां नहीं रह सकता है। Continue reading

जुलाई 11, 2015

ब्रह्माण्ड का अंत : अब से 22 अरब वर्ष पश्चात

by आशीष श्रीवास्तव

जो भी कुछ हम जानते है और उसके अतिरिक्त भी सब कुछ एक महाविस्फोट अर्थात बिग बैंग के बाद अस्तित्व मे आया था। अब वैज्ञानिको के अनुसार इस ब्रह्मांड का अंत भी बड़े ही नाटकीय तरिके से होगा, महाविच्छेद(The Big Rip)

ये नये सैद्धांतिक माडेल के अनुसार ब्रह्मांड के विस्तार के साथ, सब कुछ, आकाशगंगाओं से लेकर, ग्रह, तारे, परमाण्विक कण से लेकर काल-अंतराल (Space-Time)तक अंततः दृश्य से बाहर होने से पहले विदीर्ण हो जायेंगे!

अभी से घबराने की बात नही है लेकिन इस महा-भयानक प्रलयंकारी घटना का प्रारंभ अब से 22 अरब वर्ष बाद होगा।

सं रा. अमरीका की वांडेरबिल्ट विश्वविद्यालय टेनेसी(Vanderbilt University Tennessee) के गणितज्ञ डा मार्शेलो डिस्कोंजी (Dr Marcelo Disconzi)के अनुसार :

“महाविच्छेद के सिद्धांत के अनुसार अंततोगत्वा पदार्थ का निर्माण करने वाले कण भी एक दूसरे से अलग होना प्रारंभ कर देंगे, परमाणु भी विदीर्ण हो जायेंगे, सब कुछ बिखर जायेगा और यह एक बहुत ही सनसनीखेज नाटकीय घटना होगी।”

वैज्ञानिक अब लगभग एकमत है कि ब्रह्माण्ड का जन्म अब से 13.8 अरब वर्ष पहले एक महाविस्फोट अर्थात बिग बैंग मे हुआ था, जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड ने एक अत्याधिक घनिभुत बिंदु से प्रारंभ कर विस्तार करते हुये आज वर्तमान आकार प्राप्त किया है।

लेकिन ब्रह्माण्ड के अंत के बारे मे वैज्ञानिक अभी भी एक मत नही है, और वादविवाद चलते रहता है।

डाक्टर डिस्कोंजी के अनुसार

” हम यह तय रूप से जानते है कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है और इस विस्तार की गति मे वृद्धि हो रही है। बस यही तथ्य है, जिसमे कोई वाद विवाद नही है।”

इस विषय पर नयी शोधो के अनुसार ब्रह्मांड के विस्तार की गति मे यह वृद्धि उस बिंदु तक जारी रहेगी अब अंतरिक्ष का हर बिंदु दूसरे बिंदु से अनंत गति से दूर होने लगेगा और उसी क्षण महाविच्छेद होगा!

डाक्टर डिस्कोंजी कहते है कि

“गणितिय रूप से हम इस घटना का अर्थ जानते है लेकिन भौतिक रूप मे पूर्ण रूप से समझना कठीन है।”

विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड के प्रमाण, दूरस्थ सुपरनोवाओं के निरीक्षण से प्राप्त हुये है। वे जितनी दूरी पर होते है, उतने ही ज्यादा लाल दिखायी देते है, क्योंकि उनसे निकलने वाला प्रकाश अंतरिक्ष की यात्रा करते हुये हम तक पहुंचते पहुंचते फैल जाता है, इस घटना को “लाल विचलन(Red Shift)” कहते है।

ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे हो रही वृद्धि को समझने के लिये वैज्ञानिक श्याम ऊर्जा(Dark Energy) को उत्तरदायी मानते है, जोकि ब्रह्माण्ड की कुल मात्रा का 70% भाग है।

डरहम विश्वविद्यालय(University of Durham) के खगोल वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर कार्लोस फ़्रेंक( Professor Carlos Frenk) के अनुसार ” भौतिक वैज्ञानिक अपनी अनभिज्ञता को छुपाने के लिये रहस्यमय नाम रखते है। हमारे पास श्याम ऊर्जा की व्याख्या करने के लिये अभी कुछ नही है।”

ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे वृद्धि होते रहेगी या इस विस्तार की गति थम जायेगी, इसका नतिजा दो ब्रह्माण्डीय शक्तियों मे चल रहे महायुद्ध के नतीजे पर निर्भर करेगा।

एक योद्धा श्याम ऊर्जा है जो ब्रह्माण्ड को विस्तार दे रही है, दूसरा योद्धा गुरुत्वाकर्षण है जो ब्रह्माण्ड को वापस सिकोड़ना चाहता है। दोनो मे युद्ध जारी है, प्रश्न यह है कि विजेता कौन होगा ?

यदि गुरुत्वाकर्षण जितेगा तो ब्रह्माण्ड का अंत महा-संकुचन(Big Crunch) के रूप मे होगा जिसमे सारा ब्रह्माण्ड गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से सिकुड़ना प्रारंभ करेगा और वापस एक बिंदु के रूप मे संपिडित हो जायेगा। यह प्रक्रिया बिग बैंग/महाविस्फोट की विपरीत प्रक्रिया होगी। ठीक उसी तरह जब आप किसी विडियो को उल्टा(Reverse) देखते है।

श्याम ऊर्जा के विजेता होने की स्थिति मे महा-विच्छेद होगा, सभी पिंड, सभी पदार्थ , सभी परमाणु विदिर्ण हो जायेंगे।

दोनो का महायुद्ध टाई होने पर, एक भिन्न अंत होगा, जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड शीतल होकर अपनी मृत्यु को प्राप्त होगा। इसके अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार इतना हो जायेगा कि नये तारो के जन्म के लिये गैसो का घनत्व पर्याप्त नही होगा। पुराने तारो की मृत्यु के पश्चात नये तारों का निर्माण नही होगा, उष्मा/ऊर्जा का निर्माण बंद हो जायेगा। ब्रह्माण्ड इतना शीतल हो जायेगा कि परमाणु तथा अन्य परमाण्विक कण गति बंद कर देंगे और समय का भी अर्थ समाप्त हो जायेगा।

लेकिन फिजिक्स रीव्यु मे प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार इस महायुद्ध मे श्याम ऊर्जा/डार्क ऊर्जा की विजय होगी, अर्थात महाविच्छेद!

डाक्टर डिस्कोंजी के अनुसार यह समीकरणो का सबसे प्राकृतिक निष्कर्ष है।

इसे समझने के लिये आप एक कार की कल्पना करे कि वह 10 किमी/घंटा से जा रही है और हर किमी के बाद अपनी गति मे 10 किमी/घंटा की वृद्धि करती है। उसके बाद उसकी गति मे 10 किमी/घंटा की वृद्धि आधे किमी पर, कुछ समय बाद चौथाई किमी पर, अंत मे कुछ मिटर पर होती है। इस स्थिति मे कार का अगला बंपर और पिछला बंपर अलग हो जायेगें क्योंकि अब कार की गति मे वृद्धि उनके मध्य की दूरी से कम मे ही हो रही है। कुछ समय बाद उस कार का हर हिस्सा एक दूसरे से अलग हो जायेगा।

यह घटना ब्रह्माण्ड मे होगी या नही होगी ? उसका उत्तर श्याम ऊर्जा के सूदूर भविष्य पर निर्भर है। और यह उत्तर पूर्ण रूप से एक परिकल्पना/अटकलबाजी है।

वर्तमान निरीक्षण और प्रमाण सभी के सभी इशारा कर रहे है कि अंतत: श्याम ऊर्जा की विजय होगी और इसका अंत महाविच्छेद के रूप मे होगा, जिसमे ब्रह्मांड विदिर्ण होकर अदृश्य हो जायेगा।

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