जुलाई 29, 2014

ब्रह्माण्ड की 13 महत्वपूर्ण संख्यायें

by Ashish Shrivastava

कुछ संख्याये जैसे आपका फोन नंबर या आपका आधार नंबर अन्य संख्याओं से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इस लेख मे हम जिन संख्याओं पर चर्चा करेंगे वे ब्रह्मांड के पैमाने पर महत्वपूर्ण है, ये वह संख्याये है जो हमारे ब्रह्मांड को पारिभाषित करती है, हमारे आस्तित्व को संभव बनाती है और ब्रह्माण्ड के अंत को तय करेंगी।

1. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक( The Universal Gravitational Constant)

Universeयह वर्ष 2014 एक महत्वपूर्ण वर्ष ना हो लेकिन 1665 इस वर्ष से बहुत बुरा था, विशेषतः लंदन वासीयों के लिये। लंदन मे बुबोनिक प्लेग फैला हुआ था, उस समय शहर से बाहर जाने के अतिरिक्त इस महामारी से बचने का कोई अन्य उपाय या औषधी ज्ञात नही थी। बादशाह चार्लस द्वितिय(King Charles II ) ने अपनी राजधानी लंदन से आक्सफोर्ड स्थानांतरित कर दी थी और कैंब्रीज विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया था। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी ने अपने गृहनगर वूल्सथोर्पे(Woolsthorpe) जाने का निश्चय किया और अपने अगले 18 महिने आधुनिक विज्ञान के लिये नये दरवाजे खोलने मे बिताये, इस विद्यार्थी का नाम था आइजैक न्युटन

300px-NewtonsLawOfUniversalGravitationहम ऐसे तकनीकी युग मे रह रहे है जिसमे संख्यात्मक(परिमाणात्मक) अनुमान नही लगाये जा सके तो जीना दूभर हो जाये। और परिमाणात्मक अनुमान लगाने मे शायद सबसे पहली सफलता न्युटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत(Universal Gravitation) से मीली थी। उनकी अवधारणा के अनुसार दो पिंडो मे मध्य का गुरुत्विय आकर्षण उनके द्रव्यमान के गुणनफल के आनुपातिक तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग के विलोमानुपातिक होता है। अपनी इस अवधारणा से न्युटन ने पता लगाया कि किसी ग्रह की कक्षा एक दिर्घवृत्त(ellipse) के आकार की होती है जिसके एक केंद्रबिंदु(focus) पर सूर्य होता है। जोहानस केप्लर ने ग्रहो की कक्षा के बारे मे यह अनुमान न्युटन से पहले लगाया था लेकिन वह निरीक्षण पर आधारित था। न्युटन ने यह अनुमान गणितिय गणनाओं और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के आधार पर लगाया था। उन्होने इस गणना के लिये गणित की एक नयी शाखा कलन गणित(calculus) भी खोज निकाली थी।

यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इस लेख के तेरह स्थिरांको मे से गुरुत्विय स्थिरांक(G) सबसे पहले खोजा गया है लेकिन इसका मान सबसे कम सटिक रूप से ज्ञात है। इसकी सटिकता मे कमी का कारण यह है कि यह बल अन्य सभी मूलभूत बलों मे सबसे कमजोर बल है। न्युटन के लंदन छोड़कर जाने की तीन शताब्दियों बाद  पृथ्वी का द्रव्यमान 6 x 10‍24 किग्रा होने के बावजूद मानव इस बल को मात देते हुये एक रासायनिक राकेट के प्रयोग से प्रयोग द्वारा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर एक उपग्रह स्पूतनिक कक्षा मे भेजने मे सफल हुआ था।
सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक G: 6.67×10−11 N·(m/kg)2

2. प्रकाशगति(The Speed of Light)

LightSpeedमध्ययुग मे तोप के आविष्कार से यह सिद्ध हो गया था कि ध्वनि की गति सीमित है, तोप के गोले की रोशनी को , उसके विस्फोट की आवाज से पहले देखा जा सकता था। उसी के पश्चात बहुत से वैज्ञानिको को जिनमे महान गैलेलीयो भी शामिल थे लगने लगा था कि प्रकाशगति भी सीमित होनी चाहिये। गैलेलीयो ने इसे प्रमाणित करने के लिये दूरबीन और प्रकाश स्रोत लिये दूरी पर खड़े व्यक्तियों के साथ एक प्रयोग भी किया था। लेकिन प्रकाश कि अत्याधिक तेज गति और 17 वी शताब्दी की तकनीकी सीमाओं के कारण यह प्रयोग असफल रहा था।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक तकनीक और प्रयोगविधियों मे इतना विकास हो गया था कि प्रकाशगति को उसकी वास्तविक गति के 0.02 समीप मान तक माप लिया गया था।

अलबर्ट मिशेलसन और एडवर्ड मार्ले (Albert Michelson and Edward Morley) ने दिखाया कि प्रकाशगति उसकी दिशा पर निर्भर नही करती है। इस प्रयोग के परिणामो मे आइंस्टाइन को उनके प्रसिद्ध कार्य सापेक्षतावाद के सिद्धांत के लिये मार्ग दिया जोकि 20 वी सदी की सबसे महत्वपूर्ण खोज थी और शायद अब तक की भी।
अक्सर यह कहा जाता है कि प्रकाश से तेज यात्रा असंभव है। यह सही है कि कोई भी भौतिक वस्तु प्रकाश से तेज यात्रा नही कर सकती लेकिन हमारे कंप्युटर प्रकाशगति के निकट गति से सूचना संसाधन करते है उसके बावजूद हम दस्तावेजों के डाउनलोड होने के लिये अधिरता से इंतजार करते है। प्रकाशगति तेज है लेकिन निराशा की गति उससे भी तेज है।

c=299,792,458 m/s

3. आदर्श गैस स्थिरांक(The Ideal Gas Constant)

GasConstantsसत्रहवी शताब्दी मे वैज्ञानिको पदार्थ की तीन अवस्थायें ही ज्ञात थी, ठोस,द्रव तथा गैस(चौथी अवस्था प्लाज्मा की खोज इसके सदीयों पश्चात हुयी है)। उस समय ठोस और द्रव के साथ प्रयोग करना गैस की तुलना मे कठिन था क्योंकि ठोस/द्रव मे किसी भी परिवर्तन को उस समय के उपकरणो से मापना आसान नही था। इसलिये अधिकतर प्रायोगिक वैज्ञानिक मूलभूत भौतिकी नियमो को खोजने के लिये प्रयोगो मे गैस का प्रयोग करते थे।

राबर्ट बायल(Robert Boyle) शायद ऐसे पहले महान प्रायोगिक वैज्ञानिक थे और वे वर्तमान प्रायोगिक विधि की आधारशीला रखने वालो मे से है जिसमे किसी भी प्रयोग मे एक या एकाधिक ही कारक मे परिवर्तन कर अन्य कारको पर परिवर्तन का मापन किया जाता है। पुनरावलोकन मे यह प्रत्यक्ष दिखायी देता है लेकिन यह एक दूरदर्शिता भरा कदम था।

राबर्ट बायल ने गैस के दबाव और आयतन के मध्य संबध को खोजा था, इसकी एक सदी बाद जैक्स चार्ल्स(Jacques Charles) तथा जोसेफ गे लुसाक(Joseph Gay-Lussac ) ने आयतन और तापमान के मध्य संबध खोजा था। यह खोज सफ़ेद जैकेट पहनकर किसी वातावनुकुलित प्रयोगशाला मे आधुनिक उपकरणो के प्रयोग से नही हुयी थी। इस प्रयोग के लिये गे-लुसाक एक गर्म हवा के गुब्बारे मे 23,000 फ़ीट की ऊंचाई पर गये थे, जोकि उस समय का विश्व रिकार्ड था।

बायल, चार्ल्स तथा गे-लुसाक के प्रयोगो के परिणामो को एक साथ सम्मिलित करने पर कहा जा सकता है कि किसी गैस की निश्चित मात्रा मे तापमान, दबाव तथा आयतन के गुणनफल के अनुपात मे होता है। इस अनुपात के स्थिरांक को आदर्श गैस स्थिरांक कहा जाता है।
R=8.3144621(75) J/ K/ mol

4. परम शून्य( Absolute Zero)

AbslouteZeroउष्मा उत्पन्न करना आसान है। मानव प्रागऐतिहासिक काल से ही अग्नि उत्पन्न कर उष्मा का प्रयोग कर रहा है। लेकिन शीतलन आसान कार्य नही है। लेकिन ब्रह्माण्ड को संपूर्ण रूप मे लेने से पता चलता है कि ब्रह्माण्ड मे यह कार्य बहुत ही सरलता से हुआ है, संपूर्ण ब्रह्माण्ड का औसत तापमान परम शून्य से कुछ ही डीग्री ज्यादा है। ब्रह्मांड का शीतलन भी उसी तरिके से हुआ है जो हम अपने घर के रेफ़्रीजरेटर मे करते है, गैस के विस्तार द्वारा।

माइकल फैराडे जिन्हे विद्युत के अध्यन के लिये जाना जाता है, ने गैस के विस्तार द्वारा शीतल तापमान की संभावना जतायी थी। फैराडे ने एक बंद परखनली मे कुछ द्रव क्लोरीन का निर्माण किया था, जब इस परखनली को तोड़ा गया , क्लोरीन का दबाव कम हुआ और क्लोरीन तत्क्षण गैस मे परिवर्तित हो गयी। फ़ैराडे ने पाया कि यदि दबाव कम करने पर द्रव गैस मे परिवर्तित की जा सकती है तब गैस पर दबाव डाल कर गैस को द्रव मे परिवर्तित किया जा सकता है जिसका तापमान कम होगा। यही प्रक्रिया रेफ़्रिजरेटर मे होती है, गैस को दबाव से संपिडित किया जाता है और उसे विस्तारित होने दिया जाता है जिससे वह अपने आसपास के पदार्थ को शीतल कर देती है।

20 वी सदी के प्रारंभ से ही वैज्ञानिक दबाव के द्वारा आक्सीजन , हायड्रोजन, हिलीयम को द्रवित करने मे सफल हो गये थे। इस प्रक्रिया मे वे परम शून्य से कुछ डीग्री तक पहुंच गये थे। लेकिन गति से उष्मा प्राप्त होती है और लेजर तकनीक द्वारा परमाणुओं की गति रोकने से हम परम शून्य के पास एक डीग्री के लांखवे हिस्से पास तक शीतल तापमान प्राप्त कर चूके है जोकि −273.15° C से अल्पमात्रा मे ही अधिक है। परम शून्य तक पहुंचना प्रकाशगति प्राप्त करने जैसा ही कठिन है, पदार्थ इस सीमा के समीप तक पहुंच सकता है लेकिन उसे कभी पा नही सकता है।

परम शून्य न्यूनतम सम्भव ताप हैं तथा इससे कम कोई ताप संभव नही हैं । इस ताप पर गैसों के परमाणुओं की गति शून्य हो जाती हैं । इसे 0° केल्विन में दर्शाते हैं ।

5.एवेगाड्रो संख्या( Avogadro’s Number)

Avogadro's Numberरसायन शास्त्र के रहस्यो को उजागर करना किसी ताले को खोलने जैसा नही है। इस कार्य के लिये एक नही दो कुंजीयाँ चाहिये होती है।

प्रथम कुंजी है, परमाणु सिद्धांत, जिसे 19 वी सदी के आरंभ मे जान डाल्टन(John Dalton) ने खोजी थी। प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक रिचर्ड फ़ेयनमैन(Richard Feynman) के अनुसार परमाणु सिद्धांत इतना महत्वपूर्ण है कि वह कहते है

” किसी भी प्रलय की अवस्था मे यदि समस्त वैज्ञानिक ज्ञान नष्ट होने वाला हो और अगली पीढ़ी के लिये उन्हे एक वाक्य मे ज्ञान देना हो तो कौन सा वाक्य कम से कम शब्दो मे अधिकतम ज्ञान रखेगा ? मुझे लगता है कि वह परमाणु सिद्धांत है, जिसके अनुसार सभी वस्तुये परमाणुओं से बनी है , ऐसे छोटे कण जो अविराम गतिमान रहते है।”

प्रकृति मे 92 तत्व पाये जाते है जोकि ब्रह्मांड के समस्त साधारण पदार्थ का निर्माण करते है। लेकिन ब्रह्माण्ड का अधिकतर पदार्थ यौगिक है जिसमे भिन्न प्रकार के तत्वो का मिश्रण है। इस तरह से आधुनिक रसायन की दूसरी कुंजी है वह खोज है जिसके अनुसार हर यौगिक एक जैसे अणुओं(molecules) से बना है। उदाहरण के लिये शुद्ध जल एक जैसे असंख्य H2O अणुओं से बना है।
लेकिन किसी आयतन मे कुल कितने अणु हो सकते है? हम किसी भी रासायनिक प्रक्रिया के परिणाम का अनुमान लगा सकते है, यह आधुनिक रसायनशास्त्र की एक बड़ी सफलता है। इटालीयन रसायन शास्त्री एमेडीओ एवेगाड्रो ने प्रस्ताव दिया कि समान तापमान और दबाव पर विभिन्न गैसो की समान मात्रा मे समान संख्या मे अणु होंगे। जब उन्होने यह सिद्धांत प्रस्तावित किया तब उनकी काफी आलोचना हुयी लेकिन इस सिद्धांत द्वारा रसायनशास्त्रीयों को किसी रासायनिक प्रक्रिया के पहले और पश्चात मे मात्रा के मापन द्वारा अणुओं की संरचना के अनुमान मे सहायता मीली। एवेगाड्रो संख्या अर्थात 12 ग्राम कार्बन मे परमाणुओं की संख्या को कहते है और यह लगभग 6 के पश्चात 23 शून्य है। इसे एक मोल मे अणुओं की संख्या भी कहते है, रसायनशास्त्री इस इकाई का प्रयोग किसी पदार्थ की मात्रा के मापन मे करते है।

एवेगाड्रो संख्या : 6.022169 x 10 23

6. विद्युत और गुरुत्वाकर्षण की सापेक्ष क्षमता (The Relative Strength of Electricity and Gravity)

RelativeStrengthशीतकालीन सुबह मे जब आप किसी कालीन पर से गुजरते है तब आप इतनी स्थैतिक विद्युत ऊर्जा जमा कर लेते है कि छोटे छोटी वस्तुये आपके कपड़ो से चिपक जाती है या आपके शरीर के रोंये/केश खड़े हो जाते है। यह दर्शाता है कि विद्युत ऊर्जा गुरुत्विय ऊर्जा से कितनी ज्यादा शक्तिशाली है। पृथ्वी का समस्त द्रव्यमान आपके शरीर से चिपकी उन वस्तुओं को खींच रहा है लेकिन स्थैतिक विद्युत ऊर्जा का एक नन्हा सा भाग उसे मात दे रहा है।
लेकिन यह भी अच्छा है कि विद्युत ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण से इतनी ज्यादा शक्तिशाली होने से जीवन इस रूप मे संभव है। जीवन रासायनिक और विद्युत प्रक्रियाओं का एक सम्मिश्रण है, लेकिन रासायनिक प्रक्रियायें भी जो हमारी मासंपेशीयों को ताकत देती है या हमारे भोजन की पाचन प्रक्रियायें भी अपने मूल मे विद्युत ऊर्जा पर ही निर्भर है। रासायनिक प्रक्रियाये परमाणुओं की बाह्य सीमाओं पर स्थित इलेक्ट्रानो के एक परमाणु से दूसरे परमाणु के मध्य पाला बदलने से ही होती है। इस सारी प्रक्रियाओं मे ही विभिन्न यौगिक बनते है क्योंकि इलेक्ट्रानो द्वारा पाला बदलने या एकाधिक परमाणुओं को साझा करने से वे परमाणु अब जुड़ गये है। इलेक्ट्रानो को ही गति से हमारा तंत्रिका तंत्र हमारी मांसपेशीयों को संकेत भेजता है जिससे हम चलफ़िर पाते है, हमारा मस्तिष्क सूचना संग्रहण और निर्णय लेता है और हमारी चेतना का प्रादुर्भाव होता है।

यदि विद्युत ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण से कमजोर होती तो ब्रह्माण्ड वर्तमान रूप मे संभव नही होता, ना ही वर्तमान स्वरूप मे जीवन। हो सकता है कि उस स्थिति मे भी जीवन अपने लिये मार्ग खोज लेता लेकिन हमे उसके लिये कोई दूसरा ब्रह्माण्ड खोजना होगा।

विद्युत ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण बल से 103‍6 ज्यादा शक्तिशाली है।

7. बोल्ट्जमैन स्थिरांक( Boltzmann’s Constant)

Boltzmann's Constantहम जानते है कि जल का प्रवाह नीचे ही ओर होता है, उपर की दिशा मे नही क्योंकि गुरुत्वाकर्षण ऐसे ही कार्य करता गुरुत्वाकर्षण एक बल है और गुरुत्विय आकर्षण इस तरह व्यवहार करता है कि वह पृथ्वी के केंद्र मे स्थित हो और जल नीचे की ओर खींचता है। लेकिन हमारे पास इस तथ्य का कोई सरल व्याख्या नही है कि क्यों किसी गर्म जल के पात्र मे बर्फ़ के टूकड़े पिघल जाते है, और किसी शीतल जल के पात्र मे बर्फ़ के टूकड़े क्यों अपने आप नही बनते है? इसका उष्मा की वितरण से संबध है और इस समस्या का हल 19 वी सदी की सबसे बड़ी सफलता थी।

इस समस्या का हल आस्ट्रियन भौतिक वैज्ञानिक लुडविग बोल्टजमैन ने पाया था, उन्होने खोज की थी कि शीतल जल की तुलना मे बर्फ़ के टूकड़ो साथ गर्म जल मे उष्मा वितरण के ज्यादा तरिके है। प्रकृति का खेल प्रतिशत मे चलता है। वह अक्सर सबसे ज्यादा संभव तरिके को चूनती है और इस संबध को बोल्ट्जमैन स्थिरांक परिभाषित करता है। अव्यवस्था व्यवस्था से ज्यादा सामान्य है, किसी कमरे को साफ करने की बजाये उसे खराब करने के ज्यादा तरिके होते है। व्यवस्थित बर्फ के टूकड़े बनाने की अपेक्षा पिघले बर्फ़ के रूप मे अव्यवस्थित स्थिति बनाना आसान है।

बोल्टजमैन का एन्ट्रापी समीकरण जो बोल्टजमैन स्थिरांक को समाविष्ट करता है, मर्फ़ी के नियम की भी व्याख्या करता है :

यदि कोई चीज गलत हो सकती है तो वह होगी ही। कोई दुष्ट शक्ति आपके साथ कुछ भी गलत होने के लिये जिम्मेदार नही है, गलत चीज होने के तरिके सही चीज होने के तरिके की संख्या मे बहुत ज्यादा होते है।

1.3807 x 10 -23 joule/kelvin (J · K -1 )

8. प्लैंक स्थिरांक(Planck’s Constant)

Planck's Constantवैज्ञानिक हमेशा मानते आयें है कि उनके सभी विश्लेषणो का अंतिम निर्णायक प्रकृति(Nature) होती है, और कभी कभी प्रकृति को निर्णय लेने मे लंबा समय लग जाता है। ऐसे ही एक दिन दोपहर के भोजन के समय मैक्स प्लैंक ने अपने पुत्र को भौतिक विश्व के बारे मे एक नयी अवधारणा के संबंध मे कहा कि

” आज मेरे पास एक ऐसी अवधारणा है जो न्युटन के सिद्धांतो के जैसे ही क्रांतिकारी और महान सिद्ध होगी”।

मैक्स प्लैंक का विश्वास इतना मजबूत था और समय ने उन्हे सही साबित भी किया। उनके चौंका देने वाले रहस्योद्घाटन के अनुसार ब्रह्माण्ड मे ऊर्जा का वितरण छोटे छोटे पैकेटो के रूप मे होता है, यह परमाण्विक सिद्धांत से मेल खाता था जिसके अनुसार पदार्थ भी छोटे कणॊ अर्थात परमाणुओं से बना है। इन ऊर्जा के छोटे पैकेटो को क्वांटा कहा गया और इन पैकेटो के आकार को प्लैंक स्थिरांक (h) का नाम दिया गया।
मैक्स प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत ने ना केवल ब्रह्माण्ड की संरचना की व्याख्या की , उसके अतिरिक्त इसने 20 वी और 21 वी सदी मे तकनिकी क्रांति को एक चिंगारी भी दी। इलेक्ट्रानिक्स मे हर नयी खोज, लेजर से लेकर कंप्युटर, से चुंबकिय अनुनाद छवि निर्माण( magnetic resonance imagers), ये सभी क्वांटम सिद्धांत के आधार पर बने है। इसके अतिरिक्त क्वांटम सिद्धांत हमे वास्तविकता की सहज ज्ञान के विपरीत एक अनोखी तस्विर दिखाता है। कुछ अवधारणायें जैसे समानांतर ब्रह्माण्ड जोकि विज्ञान फंतांशी के भाग हुआ करते थे, अब उन्हे मान्यता मिल रही है। यह सब क्वांटम सिद्धांत की बदौलत संभव हुआ जो यह बताती है कि कोई भी स्थिती ऐसी क्यों है या ऐसा क्यो हो सकता है, यह सिद्धांत हर परिणाम या घटना की सुसंगत व्याख्या करने मे सक्षम है या संतोषजनक रूप से कर पाता है।

h=6.62606957 × 10-34 m2 kg / s

9. स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या( The Schwarzschild Radius)

Schwarzschild Radiusश्याम विवर का अर्थ होता है, अंतरिक्ष मे एक ऐसा क्षेत्र जिसमे पदार्थ का घनत्व इतना ज्यादा हो कि उससे उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से प्रकाश भी नही बच सकता है। श्याम विवर की संभावना आइन्सटाइन के साधाराण सापेक्षतावाद के सिद्धांत से मजबूत हुयी थी, इस सिद्धाअंत ने न्युटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का विस्तार करते हुये नये आयाम दिये थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इस सिद्धांत की एक प्रति जर्मन भौतिक वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री कार्ल स्कवार्जचाइल्ड को मीली।

आइन्सटाइन ने साधाराण सापेक्षतावाद के सिद्धांत को कुछ समीकरणो के रूप मे प्रस्तुत किया था। इन समीकरणो को हल करना अत्याधिक दूष्कर कार्य था लेकिन युद्ध कि विभिषिका के मध्य स्कवार्जचाइल्ड ने उनका हल खोज निकाला। यही नही उन्होने प्रामाणित किया कि किसी भी मात्रा मे पदार्थ को एक विशिष्ट त्रिज्या के गोले मे सांपिडित किया जाये तो वह श्याम विवर बन जायेगा। इस गोले की त्रिज्या स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या कहलाती है। स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या का कोई एक मान नही है, हर विशिष्ट द्रव्ययमान के लिये एक विशिष्ट स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या है।

अधिकतर व्यक्ति यह मानकर चलते है कि श्याम विवर कल्पनातित रूप से लघु, घने और काले होना चाहिये। उदाहरण के लिये पृथ्वी के द्रव्यमान के लिये स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या केवल 1 सेमी है। अर्थात पृथ्वी को श्याम विवर बनाने के लिये उसके संपूर्ण द्रव्यमान को 1 सेमी त्रिज्या मे संपिड़ित करना होगा। लेकिन श्याम विवर खोखले(कम घनत्व के) भी हो सकते है। यदि किसी संपूर्ण आकाशगंगा के द्रव्यमान को उसके तुल्य स्कवार्जचाइल्ड त्रिज्या मे समान घनत्व मे फैलाया जाये तब उस श्याम विवर का घनत्व पृथ्वी के वातावरण का 0.0002 भाग ही होगा।

10. हायड्रोजन संलयन की कार्यक्षमता(The Efficiency of Hydrogen Fusion)

HydrogenEfficiency “हम सब सितारो की धूल है।” – कार्ल सागन

और वे सही है। और इसका कारण “हायड्रोजन संलयन की कार्यक्षमता”है।

ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा भाग हायड्रोजन का है। इससे अधिक जाटिल तत्व निर्माण के लिये , विशेषतः जीवन के लिये आवश्यक तत्वो के निर्माण के लिये किसी उपाय से हायड्रोजन से उन तत्वो का निर्माण आवश्यक है। ब्रहाण्ड मे इस कार्य के लिये ढेर सारे कारखाने है जिन्हे हम तारे कहते है, जोकि हायड्रोजन गैस के विशाल गोले है और गुरुत्वाकार्षण से बंधे हुये है। इनका गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा है कि इनकॆ केंद्र मे हायड्रॊजन के केण्द्र्क आपस मे जुड़कर हिलियम बनाते है, इसी प्रक्रिया को हायड्रोजन संलयन कहते है।

इस प्रक्रिया मे उत्सर्जित ऊर्जा की गणना आइन्सटाइन के प्रसिद्ध समीकरण E = mc2 से की जाती है। इस प्रक्रिया मे हायड्रोजन का केवल 0.7 प्रतिशत भाग ही ऊर्जा मे परिवर्तित होता है। यही संख्या 0.007 हायड्रोजन संलयन की कार्यक्षमता है और ब्रह्माण्ड मे जीवन का आस्तित्व इसी संख्या पर निर्भर है, इसमे थोड़ी कमी या बढ़ोत्तरी से जीवन वर्तमान स्वरूप मे संभव नही होगा।

हायड्रोजन संलयन प्रक्रिया के प्रथम चरण मे ड्युटेरीयम (हायड्रोजन का भारी समस्थनिक) का उत्पादन होता है, यदि हायड्रोजन संलयन की कार्यक्षमता 0.006 से कम होती है तो यह चरण सफल नही हो पायेगा। इस अवस्था मे तारों का निर्माण होगा लेकिन वे सिर्फ एक बड़ी चमकती गेंद होंगे जिससे ऊर्जा का उत्सर्जन अल्प मात्रा मे ही होगा जैसे हमारे ग्रह बहस्पति से होता है। यदि हायड्रोजन संलयन की कार्यक्षमता 0.008 या उससे ज्यादा हो तो, संलयन प्रक्रिया अत्यन्त कार्यक्षम होगी और हायड्रोजन से हिलियम का निर्माण अल्पावधि मे होकर समस्त ब्रह्माण्ड की हायड्रोजन समाप्त हो जाती। जल के अणु मे दो हायड्रोजन के परमाणु होते है, इस अवस्था मे जल का निर्माण असंभव होता और जिस रूप मे हम जीवन जानते है, उस रूप मे जीवन का अस्तित्व असंभव होता।

11. चंद्रशेखर सीमा (The Chandrasekhar Limit)

Chandrasekhar Limitहम जीवन के जीस स्वरूप को जानते है वह कार्बन आधारित है लेकिन जीवन को और भी बहुत सारे भारी परमाणु वाले तत्वो की आवश्यकता होती है। ब्रह्माण्ड मे भारी तत्वों के निर्माण की केवल एक ही प्रक्रिया है, जिसे सुपरनोवा कहते है, अर्थात किसी विशाल तारे की मृत्यु का प्रलंयंकारी विस्फोट। सुपरनोवा विस्फोट मे जीवन के लिये आवश्यक सभी भारी तत्वो का निर्माण होता है वे समस्त ब्रह्मांड मे वितरित होते है, जिनसे ग्रहो का निर्माण होता अहि और उन ग्रहों पर जीवन का उद्भव। सुपरनोवा दूर्लभ किंतु भव्य होते है। 1987 मे आकाश मे दिखायी दिया सुपरनोवा पृथ्वी से 150,000 प्रकाशवर्ष दूरी पर था लेकिन उसे नंगी आखों से देखा जा सकता था।

किसी तारे का भविष्य उसका द्रव्यमान तय करता है। सूर्य के जैसे तारों का जीवन अपेक्षाकृत लंबा होता है, सूर्य का अभी 5 अरब वर्ष जीवन शेष है उसके पस्चात वह लाल महादानव बन कर पृथ्वी को भी निगल जायेगा। सूर्य से थोड़े बड़े तारे स्वेत वामन बनते है, जोकि अत्यंत उष्ण लेकिन छोटे होते है और धीमे धीमे शीतल होकर मृत हो जाते है। लेकिन यदि तारे एक विशिष्ट द्रव्यमान, चन्द्रशेखर सीमा से ज्यादा द्रव्यमान पार करें तो उनका सुपरनोवा बनना तय होता है।

चंद्रशेखर सीमा सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1.4 गुणा द्रव्यमान है। सुब्रमण्यण चंद्रशेखर ने इस सीमा की खोज उस समय की थी जब वे केवल 20 वर्ष के थे और उन्होने भारत सॆ इंग्लैंड की भाप के इंजन से चलने वाले जहाज से यात्रा के दौरान खगोलीय संयोजन, सापेक्षतावाद और क्वांटम सिद्धांतो का एकीकरण करते हुये इस सीमा की खोज की थी।

12.हब्बल स्थिरांक (The Hubble Constant)

Hubble Constantब्रह्माण्ड के बारे मे केवल दो ही संभावनायें है: या तो ब्रह्मांड हमेशा से आस्तित्वमान है या कभी भूतकाल मे किसी समय इसक जन्म हुआ था। इस दुविधा का हल 1960 के दशक मे मिल गया था, जब बिग बैंग(महाविस्फोट) के निर्णायक प्रमाण मिल गये थे। इस महाविस्फोट का सारा विवरण किसी शोधपत्र मे समाविष्ट करना एक दूश्कर/असंभव कार्य है। इस ब्रह्माण्ड का सारा पदार्थ , समस्त तारे और आकाशगंगाये एक ऐसे नन्हे से आयतन मे समाये थे कि उसकी तुलना मे एक अकेले हायड्रोजन परमाणु का आयतन विशालकाय, महाकाय है।

यदि ब्रह्माण्ड का जन्म एक महाविस्फोट मे हुआ था तब यह घटना कितने समय पहले हुयी थी और ब्रह्माण्ड का वर्तमान आकार कितना है? इन दोनो प्रश्नो मे एक गहरा संबंध है, एक ऐसा संबंध जिसकी संभावना 1920 मे एडवीन हब्बल के लास एन्जेल्स की माउंट विल्सन वेधशाला मे किये निरीक्षणो से सामने आयी थी।

हब्बल ने राडारगन मे प्रयुक्त होने वाली तकनीक जोकि डाप्लर प्रभाव पर आधारित है, के प्रयोग से पाया था कि सारेऎ आकाशगंगाये पृथ्वी से दूर जा रही है। ब्रह्माण्ड मे पृथ्वी की स्थिती खगोलिय दृष्टि से महत्वहीन है, इसका अर्थ यह है कि आकाशगंगाओं का एक दूसरे से दूर जाना सारे ब्रह्माण्ड मे हो रहा होगा। किसी आकाशगंगाअ के पृथ्वी से दूर जाने की गति और उस आकाशगंगा की पृथ्वी से दूरी के मध्य का अनुपात हब्ब्ल स्थिरांक से मिलता है। इससे यह ज्ञात होता है कि ब्रह्माण्ड का जन्म अब से लगभग 13.7 अरब वर्ष पहले हुआ था।

13. ओमेगा(Omega)

Omegaहम जानते है कि ब्रह्माण्ड का जन्म कैसे हुआ था और उसकी आयु कितनी है। लेकिन हम नही जानते है कि उसका अंत कैसे होगा। लेकिन ब्रह्माण्ड के अंत के निर्धारण के लिये कुछ उपाय है, लेकिन इसके लिये हमे एक स्थिरांक के मूल्य की गणना करनी होगी, यहा स्थिरांक है ओमेगा।

यदि आप किसी ग्रह से एक राकेट का प्रक्षेपण करें और आपको राकेट की गति ज्ञात हो तब उस राकेट के उसके गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होने की संभावना, ग्रह के द्रव्यमान पर निर्भर है। उदाहरण के लिये चंदमा के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होने के लिये आवश्यक गति(पलायन वेग-Escape Velocity) रखने वाला राकेट की गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होने के लिये पर्याप्त ना हो।

ब्रह्माण्ड का भविष्य का ज्ञान भी कुछ ऐसी ही गणनाओं पर आधारित है। यदि बिग बैंग ने आकाशगंगाओ को आवश्यक गति दे दी थी तब वे हमेशा एक दूसरे से दूर जाते रहेंगी। यदि उनके पास पर्याप्त गति नही हो तो उनका भविष्य भी पर्याप्त पलायन वेग ना होने वाले राकेट के जैसे होगा। सभी आकाशगंगायें वापिस एक महासंकुचन की स्थिति मे वाफिस खिंची जायेंगी।

यह सब ब्रह्माण्ड के कुल द्रव्यमान पर निर्भर करता है। हम जानते है कि यदि ब्रह्मांड का घनत्व 5 हायड्रोजन परमाणु प्रति वर्ग मीटर हो तो वह सारी आकाशगंगाओं को वापिस एक महासंकुचन की स्थिति मे वापिस खिंचने के लिये पर्याप्त होगा।इस शिरोबिंदु को ओमेगा कहा जाता है, यह ब्रह्माण्ड के कुल द्रव्यमान तथा महासंकुचन को रोकने के लिये आवश्यक न्युनतम द्रव्यमान का अनुपात है। यदि ओमेगा का मूल्य 1 से कम है तॊ ब्रह्माण्ड का सतत विस्तार होते रहेगा। यदि यह 1 से ज्यादा है तब दूरस्थ भविष्य मे कभी महासंकुचन प्रारंभ होगा।

अब तक के हमारी गणना के अनुसार ओमेगा का मूल्य 0.98 तथा 1.1 के मध्य है । ब्रह्माण्ड का भविष्य अभी भी अज्ञात है।

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जुलाई 25, 2014

दो नदीयों के संगम के बावजूद जल अलग अलग बहता है: विचित्र किंतु सत्य।

by Ashish Shrivastava

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम

मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil)मे दो नदीयाँ रिवो निग्रो(Rio Negro) तथा रिवो सोलिमोएस(Rio Solimões) का संगम होता है और वे मिलकर नीचली अमेजान(Lower Amazon) नदी का निर्माण करती है। लेकिन इन दोनो नदीयों का जल एक दूसरे मे विलिन होने से इंकार कर देता है और लगभग 6 किमी तक एक धारा मे ही अलग अलग बहता है। यह विचित्र घटना दोनो नदीयो के जल के परस्पर-विरोधी गुणो के कारण होती है।

रिओ निग्रो का जल अपने नाम के अनुरूप काला है। इसके जल मे तलछट/मिट्टी नही है लेकिन इसका काली चाय के जैसा रंग कोलंबीया के जंगलो के मध्य बहते समय वनस्पतिक अवशेषो के इसके जल मे मिलने से बन जाता है। इसके जल का तापमान लगभग 28° C है और धीमी गति अर्थात 2 किमी/घंटा की रफ़्तार से बहता है।

दूसरी ओर रिओ सोलिमोएस का रंग क्रीमी काफ़ी के जैसा है जोकि एंडीस पर्वत श्रृंखला से बहने के दौरान उसमे मिली तलछट/मिट्टी के रंग के कारण है। इसका जल थोड़ा शीतल 22°C तापमान का है, लेकिन इसके जल की रफ्तार तेज अर्थात 6 किमी/घंटा है।

दोनो नदीयों के जल के संघटको, गति, तापमान और घनत्व मे अंतर के कारण दोनो नदीयो का जल संगम होने पर एक दूसरे मे विलिन नही होता है, दोनो का जल 6 किमी तक साथ मे अलग अलग बहने के पश्चात धाराओ मे भंवर द्वारा उत्पन्न बाधाओं के फलस्वरूप एक दूसरे मे मजबूरन मीलता है। दोनो नदियों के रंगो मे अंतर इतना स्पष्ट है कि वह अंतरिक्ष से ली गयी तस्विरों मे भी स्पष्ट दिखायी देता है।

इसी विचित्रता के कारण इन दोनो नदियों का संगम स्थल मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil) एक प्रसिध्द पर्यटन स्थल बन गया है।

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

जुलाई 18, 2014

सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?

by Ashish Shrivastava

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य काफी विशाल है, बहुत ही विशाल। वह चौड़ाई मे पृथ्वी से सौ से भी ज्यादा गुणा है, उसके अंदर 10 लाख से ज्यादा पृथ्वीयाँ समा सकती है। यदि आप पृथ्वी और सूर्य को किसी ब्रह्माण्डीय तराजु पर तौले तो पायेंगे कि सूर्य पृथ्वी से 300,000 गुणा ज्यादा द्रव्यमान रखता है।

लेकिन सूर्य का द्रव्यमान कम हो रहा है। समय के साथ धीमे धीमे उसके द्रव्यमान मे ह्रास हो रहा है, यह दो तरह से हो रहा है, प्रथम है सौर वायु और द्वितीय है द्रव्यमान का ऊर्जा के रूप मे परिवर्तन जिससे सूर्य से प्रकाश और उष्मा का उत्सर्जन होता है।

सूर्य के द्रव्यमान मे उपरोक्त मे से किस विधि से द्रव्यमान ह्रास तेज गति से हो रहा है ? दोनो विधि को विस्तार से देखते है। Continue reading

जुलाई 10, 2014

महान विज्ञानी : निकोला टेस्ला

by Ashish Shrivastava

Tesla_circa_1890.jpegनिकोला टेस्ला (अंग्रेजी: Nikola Tesla; सर्बियाई सिरिलिक: Никола Тесла, 10 जुलाई 1856 – 7 जनवरी 1943) एक सर्बियाई अमेरिकी आविष्कारक, भौतिक विज्ञानी, यांत्रिक अभियन्ता, विद्युत अभियन्ता और भविष्यवादी थे। उनका थॉमस एडीसन के आविष्कारों में बहुत बड़ा योगदान रहा है। टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को ऑस्ट्रियन स्टेट (अब क्रोशिया) में हुआ था। बाद में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली। उनके बारे में कहा जाता है कि वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को प्रकाश से सजाया। टेस्ला की प्रसिद्धि उनके आधुनिक प्रत्यावर्ती धारा (एसी) विद्युत आपूर्ति प्रणाली के क्षेत्र में दिये गये अभूतपूर्व योगदान के कारण है। टेस्ला के विभिन्न पेटेंट और सैद्धांतिक कार्य, बेतार संचार और रेडियो के विकास का आधार साबित हुये हैं। वैद्युत चुंबकत्व के क्षेत्र में किये गये उनके कई क्रांतिकारी विकास कार्य, माइकल फैराडे के विद्युत प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों पर आधारित थे।

जीवनयात्रा

टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को सर्बियन मातापिता मिलुटिन टेस्ला और ड्युका टेस्ला के परिवार मे आस्ट्रीयन साम्राज्य(वर्तमान क्रोएशिया) मे हुआ था। 1870 मे निकोला टेस्ला ने कार्लोवैक के स्कूल मे प्रवेश लिया और उस स्कूल मे अपने गणित शिक्षक मार्टिन सेकुलिक से प्रभावित हुये थे। टेस्ला उस समय समाकलन(Integral Calculus) के प्रश्नो को अपने मन मे ही हल करने मे सक्षम थे। उनके शिक्षको को उन पर विश्वास नही होता था लेकिन उन्होने अपना चार वर्ष का अभ्यासक्रम तीन वर्षो मे ही पूरा कर लिया। 1875 मे उन्होने आस्ट्रीयन पालीटेक्निक मे प्रवेश लिया, और अपने प्रथम वर्ष मे उन्होने सभी कक्षाओं मे उपस्थित रहे, नौ परिक्षायें उतीर्ण की और सभी मे सर्वोत्तम संभव गुण प्राप्त किये। Continue reading

जुलाई 5, 2014

भारत का लिएनार्दो दा विंची : होमी जहाँगीर भाभा

by Ashish Shrivastava

होमी जहाँगीर भाभाभारत के वैज्ञानिक सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण होमी जहाँगीर भाभा को भारत का लिएनार्दो दा  विंची कहा करते थे। अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी। वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं। “आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्पोरेरी हिस्ट्री” की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, “मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे। यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था। जानेमाने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था। उनका कहना है कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। प्रोफ़ेसर यशपाल बताते हैं,

“संगीत में उनकी बहुत रुचि थी… चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत। किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए.. फ़र्नीचर कैसा बनना है.. हर चीज़ के बारे में बहुत गहराई से सोचते थे वह। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को कोलोकियम हुआ करता था और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम मिस किया हो। इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है।”

“एक प्रचलित कहावत है कि महापुरुष किसी परम्परागत पथ पर नहीं चलते बल्कि वह अपना लक्ष्य और पथ स्वयं तय करते हैं।” Continue reading

जुलाई 2, 2014

ऊर्जा संकट : थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर

by Ashish Shrivastava

भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से समस्त विश्व जूझ रहा है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम ऊर्जा की चर्चा में आ गई है। इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है। थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और ‘ग्रीन(पर्यावरण हितैषी)’ है।

समस्त विश्व में थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और यह पूरी पृथ्वी पर लगभग हर जगह उपलब्ध है। किसी परमाणु भट्टी में सक्रिय होने के दौरान इसकी कुछ रासायनिक और भौतिक विशेषताएँ होती हैं जो इसे यूरेनियम से बेहतर बना देती है। परमाणु भट्टियों में थोरियम का प्रयोग यूरेनियम से अधिक सुरक्षित होंता है| जब कोई परमाणु रिएक्टर ज्यादा गर्म हो जाता है और ईंधन की छड़ें श्रृंखलाबद्ध में विस्फोटों का सिलसिला जारी नहीं रख पाती हैं और संकट जारी कहता है। यही फुकुशिमा में हुआ था। लेकिन अगर किसी थोरियम रिएक्टर में कुछ होता है तो तकनीशियन आसानी से उत्प्रेरक को बंद कर सकेंगे और इसकी प्रतिक्रिया ख़ुद ब ख़ुद रुक जाएगी। थोरियम बिना किसी मानवीय दख़ल के बंद हो जाएगा। आपको बस एक स्विच ऑफ़ करना होगा।

परमाणु भट्टियों में थोरियम अधिक सुरक्षित है और इसके ज़रिए बम बनाना भी तक़रीबन नामुमकिन है। ये वो महत्वपूर्ण वजहें हैं जिनकी वजह से दुनिया भविष्य के ईंधन की आपूर्ति की ओर देख रही है।

इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है।

क्या है थोरियम?

थोरियम (Thorium) आवर्त सारणी के ऐक्टिनाइड श्रेणी (actinide series) का प्रथम तत्व है। पहले यह चतुर्थ अंतर्वर्ती समूह (fourth transition group) का अंतिम तत्व माना जाता था, परंतु अब यह ज्ञात है कि जिस प्रकार लैथेनम (La) तत्व के पश्चात् 14 तत्वों की लैथेनाइड शृंखला (lanthanide series) प्रांरभ होती है, उसी प्रकार ऐक्टिनियम (Ac) के पश्चात् 14 तत्वों की दूसरी शृंखला आरंभ होती है, जिसे एक्टिनाइड शृंखला कहते हैं। थोरियम के अयस्क में केवल एक समस्थानिक(द्रव्यमान संख्या 232) पाया जाता है, जो इसका सबसे स्थिर समस्थानिक (अर्ध जीवन अवधि 1.4 x 1010 वर्ष) है। परंतु यूरेनियमरेडियम तथा ऐक्टिनियम अयस्कों में इसके कुछ समस्थानिक सदैव वर्तमान रहते हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 227, 228, 230, 231 तथा 234 हैं। इनके अतिरिक्त 224, 225, 226, 229 एवं 233 द्रव्यमान वाले समस्थानिक कृत्रिम उपायों द्वारा निर्मित हुए हैं।

थोरियम धातु की खोज 1828 ई में बर्ज़ीलियस ने थोराइट अयस्क में की थी। यद्यपि इसके अनेक अयस्क ज्ञात हैं, परंतु मोनेज़ाइट (monazite) इसका सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं, जिसमें थोरियम तथा अन्य विरल मृदाओं के फॉस्फेट रहते हैं। संसार में मोनेज़ाइट का सबसे बड़ा भंडार भारत के केरलराज्य में हैं। बिहार प्रदेश में भी थोरियम अयस्क की उपस्थिति ज्ञात हुई है। इनके अतिरिक्त मोनेज़ाइट अमरीका, आस्ट्रलिया, ब्राज़िल और मलाया में भी प्राप्त है। Continue reading