जुलाई 25, 2015

केप्लर 452b: पृथ्वी की जुड़वा बहन – पृथ्वी -2 की खोज

by आशीष श्रीवास्तव

चित्रकार की कल्पना मे केप्लर 452B

चित्रकार की कल्पना मे केप्लर 452B

नासा की अंतरिक्ष वेधशाला ने अपने अभियान मे एक बड़ी सफलता पायी है। उसने एक नये ग्रह केप्लर 452B को खोज निकाला है जो अब तक के पाये गये गैर सौर ग्रह मे पृथ्वी से सबसे ज्यादा मिलता जुलता ग्रह है। केप्लर 452बी नामक इस ग्रह को ‘अर्थ-2′ के नाम से भी पुकारा जा रहा है। यह हमारी आकाशगंगा में पृथ्वी की तरह ही ग्रह है। अब हमारे पास केप्लर 186f के अतिरिक्त दूसरे ग्रह की जानकारी है जो पृथ्वी के जैसे ही है।

नोट 1: सामान्यत: सौर बाह्य ग्रहो का नामकरण खोजने उपकरण, तारे के नाम पर किया जाता है। केप्लर 452B मे "केप्लर" अंतरिक्ष वेधशाला का नाम है, केप्लर 452 तारे का नाम तथा केप्लर 452B ग्रह का नाम है।

सामान्यत: सौर बाह्य ग्रहो का नामकरण खोजने उपकरण, तारे के नाम पर किया जाता है। केप्लर 452B मे “केप्लर” अंतरिक्ष वेधशाला का नाम है, केप्लर 452 तारे का नाम तथा केप्लर 452B ग्रह का नाम है।

केप्लर 186f ग्रह की खोज 2014 मे हुयी थी और यह नये खोजे गये ग्रह 452B से छोटा है लेकिन एक लाल वामन तारे की परिक्रमा करता है, जोकि हमारे सूर्य से अपेक्षा कृत रूप से ठंडा है।

केप्लर 452, केप्लर 186 तथा सौर मंडल की तुलना

केप्लर 452, केप्लर 186 तथा सौर मंडल की तुलना

केप्लर 452B केप्लर-452 तारे की परिक्रमा करता है तथा यह तारा पृथ्वी से 1400 प्रकाशवर्ष दूर है। इसका तापमान सूर्य के तापमान के लगभग बराबर है। इस तारे का द्रव्यमान सूर्य से 4% अधिक है, सूर्य की तुलना में यह 20 प्रतिशत अधिक चमकीला है। यह सूर्य से 150 करोड़ वर्ष पुराना है।

केप्लर 452बी के एक वर्ष की अवधि यानी समय और इसकी सतह की खूबियां भी लगभग हमारी पृथ्वी जैसी ही हैं। इसका एक साल 385 दिनों का यानी हमारी पृथ्वी से सिर्फ 20 दिन अधिक है, जिसका अर्थ है कि इसकी परिक्रमा अवधि पृथ्वी से 5% अधिक है।

केप्लर 452बी ग्रह का द्रव्यमान अभी ज्ञात नही है, लेकिन खगोलशास्त्री संभावनाओं के आधार पर मान रहे हैं कि इसका द्रव्यमान पृथ्वी से पांच गुणा अधिक होना। यदि यह ग्रह पृथ्वी या मंगल के जैसे चट्टानी ग्रह तो संभव है कि इस ग्रह पर सक्रिय ज्वालामुखी होगें। माना जा रहा है कि गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले दोगुनी होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने गुरुत्वाकर्षण में मानव जीवित रह सकता हैं।केप्लर 452बी, अरबों सालों से अपने तारे से उचित दूरी पर है, गोल्डीलाक क्षेत्र अर्थात जीवन के योग्य क्षेत्र मे है। केप्लर 452बी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व पानी होने की सबसे ज्यादा संभावना मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी सतह के नीचे ज्वालामुखी भी हो सकते हैं।

गोल्डीलाक क्षेत्र तारे से उस दूरी वाले क्षेत्र को कहा जाता है जहां पर कोई ग्रह अपनी सतह पर द्रव जल रख सकता है तथा पृथ्वी जैसे जीवन का भरण पोषण कर सकता है।

गोल्डीलाक क्षेत्र तारे से उस दूरी वाले क्षेत्र को कहा जाता है जहां पर कोई ग्रह अपनी सतह पर द्रव जल रख सकता है तथा पृथ्वी जैसे जीवन का भरण पोषण कर सकता है। चित्र मे इसे हरे रग से दर्शाया है।

गोल्डीलाक क्षेत्र तारे से उस दूरी वाले क्षेत्र को कहा जाता है जहां पर कोई ग्रह अपनी सतह पर द्रव जल रख सकता है तथा पृथ्वी जैसे जीवन का भरण पोषण कर सकता है। यह निवास योग्य क्षेत्र दो क्षेत्रो का प्रतिच्छेदन(intersection) क्षेत्र है जिन्हे जीवन के लिये सहायक होना चाहिये; इनमे से एक क्षेत्र ग्रहीय प्रणाली का है तथा दूसरा क्षेत्र आकाशगंगा का है। इस क्षेत्र के ग्रह और उनके चन्द्रमा जीवन की सम्भावना के उपयुक्त है और पृथ्वी के जैसे जीवन के लिये सहायक हो सकते है। सामान्यत: यह सिद्धांत चन्द्रमाओ पर लागू नही होता क्योंकि चन्द्रमाओ पर जीवन उसके मातृ ग्रह से दूरी पर भी निर्भर करता है तथा हमारे पास इस बारे मे ज्यादा सैद्धांतिक जानकारी नही है।

निवासयोग्य क्षेत्र (गोल्डीलाक क्षेत्र) ग्रहीय जीवन क्षमता से अलग है। किसी ग्रह के जीवन के सहायक होने की परिस्थितियों को ग्रहीय जीवन क्षमता कहा जाता है। ग्रहीय जीवन क्षमता मे उस ग्रह के कार्बन आधारित जीवन के सहायक होने के गुण का समावेश होता है; जबकि निवासयोग्य क्षेत्र (गोल्डीलाक क्षेत्र) मे अंतरिक्ष के उस क्षेत्र के कार्बन आधारित जीवन के सहायक होने के गुण का। यह दोनो अलग अलग है। उदाहरण के लिये हमारे सौर मंडल के गोल्डीलाक क्षेत्र मे शुक्र, पृथ्वी और मंगल तीनो ग्रह आते है लेकिन पृथ्वी के अलावा दोनो ग्रह(शुक्र और मंगल) मे जीवन के सहायक परिस्थितियां अर्थात ग्रहीय जीवन क्षमता नही है।

पृथ्वी तथा केप्लर 452b

पृथ्वी तथा केप्लर 452b

यह नया खोजा गया ग्रह केप्लर द्वारा खोजे गये नये दूरस्थ तारो की परिक्रमा करते 500 ग्रहो मे से एक है। इनमे से 12 ग्रहो का व्यास पृथ्वी के व्यास के दोगुने से कम है और वे जीवन योग्य क्षेत्र(गोल्डीलाक क्षेत्र ) मे अपने मातृ तारे की परिक्रमा कर रहे है। इन 500 उम्मीदवार ग्रहों मे से केप्लर 452B पहला प्रमाणित ग्रह है। वैज्ञानिको के अनुसार किसी तारे के जीवन योग्य क्षेत्र मे पृथ्वी के व्यास के दोगुने से कम व्यास के 12 ग्रहो का पाया जाना अब तक के आंकड़ो के अनुसार कम है।

केप्लर-452 तारा हमारे सूर्य के जैसा ही है लेकिन उससे 1.5 अरब वर्ष पुराना है। इससे वैज्ञानिक यह मानकर चल रहे है कि इस ग्रह पर हम अपनी पृथ्वी का भविष्य देख सकते हौ। उनके अनुसार यदि केप्लर 452B चट्टानी ग्रह है तो उसके मातृ तारे की दूरी के अनुसार पर यह माना जा सकता है कि इस ग्रह के वातावरण के इतिहास मे अब अनियंत्रित ग्रीनहाउस प्रभाव का दौर प्रारंभ हो गया होगा। उसके वृद्ध होते हुये मातृ तारे से बढती हुयी उष्मा से उसकी सतह गर्म होने लगी होगी और उस पर यदि महासागर है तो उसका जल बास्पित होकर अंतरिक्ष मे विलिन हो रहा होगा। केप्लर 452B पर आज जो भी हो रहा है वह पृथ्वी पर आज से एक अरब वर्ष पश्चात प्रारंभ होगा, जब हमारा सूर्य वृद्धावस्था की ओर बढ़ेगा और अधिक चमकिला हो जायेगा।

 केप्लर से प्राप्त आंकडो के अनुसार हमारी आकाशगंगा मे पृथ्वी के जैसे 40 अरब ग्रह होना चाहीये।

केप्लर से प्राप्त आंकडो के अनुसार हमारी आकाशगंगा मे पृथ्वी के जैसे 40 अरब ग्रह होना चाहीये।

वैज्ञानिको के अनुसार केप्लर यान के आंकड़े तारे के सापेक्ष किसी ग्रह के आकार का अनुमान लगाने मे सहायता करते है। यदि आप तारे का आकार जानते है तो आप ग्रह का आकार जान सकते है। ग्रह चटटानी है या नही यह जानने के लिये ग्रह का द्रव्यमान जानना आवश्यक है, आकार और द्रव्यमान ज्ञात होने पर घनत्व की गणना की जा सकती है। घनत्व के आधार पर बताया जा सकता है कि ग्रह गैसीय है या चट्टानी। लेकिन इन तारो के अत्याधिक दूर होने से ग्रहो के द्रव्यमान की गणना कठीन हो जाती है। इसका अर्थ यह है कि हम नही बता सकते है कि यह ग्रह किस पदार्थ से बना है। वह चट्टानी ग्रह हो सकता है या गैस का एक गोला या कुछ अज्ञात सी संरचना जो हमारे लिये एक पहेली हो सकती है।

केप्लर की  कुछ महत्वपूर्ण खोजे

केप्लर की कुछ महत्वपूर्ण खोजे

अन्य केप्लर तारों के जीवन योग्य क्षेत्र के ग्रह भी पृथ्वी के जैसे हो सकते है। उदाहरण के लिये केप्लर 186f का व्यास पृथ्वी के व्यास का 1.17 गुणा है, तथा केप्लर 438b का व्यास पृथ्वी के व्यास का 1.12 गुणा है।

इस नये ग्रह का व्यास पृथ्वी के व्यास का 1.6 गुणा होना उसे महा-पृथ्वी की श्रेणी मे डालेगा। हमारे सौर मंडल मे इस आकार का कोई ग्रह नही है, इसलिये इस तरह के ग्रह हमारे लिये एक पहेली के जैसे है। लेकिन हम कह सकते है कि अन्य तथ्यों के देखते हुये यह पृथ्वी के जैसा ही होना चाहीये।

यदि हम केप्लर 452b की अपने मातृ तारे के वर्ग को देखे तो वह हमारे सूर्य के जैसे G वर्ग का है। अन्य केप्लर तारे M वर्ग के वामन तारे है जो कि हमारे सूर्य की तुलना मे शीतल है, और इन तारो मे जीवन योग्य क्षेत्र तारे के समीप होता है।

इस तरह से देखा जाये तो केप्लर 452b ग्रह अब तक का खोजा गया जीवन की सबसे ज्यादा संभावना वाला ग्रह है।

केप्लर यान

केप्लर वेधशाला

केप्लर वेधशाला

केप्लर अंतरिक्ष यान अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसन्धान संस्थान, नासा, का एक अंतरिक्ष वेधशाला है, जिसका काम सूर्य से भिन्न किंतु उसी तरह के अन्य तारों के इर्द-गिर्द ऐसे ग़ैर-सौरीय ग्रहों को ढूंढना है जो पृथ्वी से मिलते-जुलते हों और उन पर जीवन की संभावना हो। कॅप्लर को 7 मार्च 2009 में अंतरिक्ष में भेजा गया था, जहाँ यह अब पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है और अन्य तारों पर अपनी नज़रें रखे हुए है

केप्लर अंतरिक्ष में जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा टेलीस्कोपिक कैमरा है। यह हमारे सूर्य जैसे एक लाख तारों पर नजर रखते हुए अंतरिक्ष मे रहेगा। इसे फ्लोरिडा के केप कनैवरल एयरफोर्स स्टेशन से प्रक्षेपित किया गया था। इसे कॉलराडो के बॉल एयरोस्पेस टेक्नॉलजीस ने बनाया है। इस मिशन पर लगभग 30 अरब रुपये के बराबर खर्च आया है। केप्लर तारों के सामने से ग्रहों के गुजरने के दौरान तारों की चमक में आई कमी को दर्ज करके इन ग्रहों को खोज रहा है।

ग्रहो की खोज की संक्रमण विधी

ग्रहो की खोज की संक्रमण विधी

ग्रहो की खोज की संक्रमण विधी

कुछ ग्रहो की कक्षाये पृथ्वी और उनके मातृ तारे के मध्य एक ही प्रतल मे पड़ती है; जिससे जब ये ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से गुजरते है अपने मातृ तारे के प्रकाश को थोड़ा मंद कर देते है। केप्लर वेधशाला इस रोशनी मे आयी कमी को जान लेता है। एक अंतराल मे एक से ज्यादा बार आयी प्रकाश मे कमी से ग्रहो के परिक्रमा काल की गणना की जा सकती है; रोशनी मे आयी कमी से ग्रह का आकार जाना जा सकता है। जितना बड़ा ग्रह होगा वह अपने मातृ तारे का उतना प्रकाश मंद करता है। संक्रमण विधी इस तरह से ग्रहो की स्थिती(मातृ तारे के संदर्भ मे), परिक्रमा काल और उसका आकार बता देती है।

इसके पहले 1995 से 2009 तक तारों के गिर्द चक्कर काटते लगभग 300 ग्रहों की खोज की जा चुकी थी। लेकिन इनमें से अधिकतर बड़े आकार के गैसीय ग्रह हैं जिन पर जीवन की संभावना नहीं है। केप्लर के मिशन का मकसद ऐसे पथरीले ग्रह की खोज करनी है जो अपने सितारे से सुरक्षित दूरी पर हो। मतलब न तो इतनी दूर हो कि बर्फ से जम जाए और न इतना पास हो कि गमीर् से जल जाए। नासा के एमीस रिसर्च सेंटर के विलियम बॉरूकी का कहना है, हम ऐसे ग्रह खोज रहे हैं जहां इतना तापमान हो कि उसकी सतह पर पानी तरल अवस्था में मिले। हमारे ख्याल से जीवन की संभावना का यह सबसे महत्वपूर्ण लक्षण होगा।

केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला अपने अभियान मे सफ़ल रहा है और इसने जनवरी 2015 तक 1000 से ज्यादा ग्रह खोज निकाले है। केप्लर से प्राप्त आंकडो के अनुसार हमारी आकाशगंगा मे पृथ्वी के जैसे 40 अरब ग्रह होना चाहीये।

 

 

जुलाई 23, 2015

अंतरग्रहीय अभियान : गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist)

by आशीष श्रीवास्तव

अंतरग्रहीय अभियानो मे विशाल गैस दानव ग्रहो(बृहस्पति, शनि, युरेनस, नेपच्युन) तथा अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग के यानो को गति दी जाती है, इस तरिके को गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) कहते है। इस तरिके मे इंधन का प्रयोग नही होता है और यान की गति बढ़ जाती है।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

अगस्त 1977 मे प्रक्षेपित वायेजर 2 बृहस्पति पहुंचने के बाद उसके गुरुत्वाकर्षण की सहायता से गति प्राप्त की और तेज गति से शनि की ओर पहुंचा। उसके बाद वायेजर 1 भी यही कार्य किया। वायेजर 2 ने शनि से गुरुत्विय सहायता ली और ज्यादा तेज गति से युरेनस पहुंचा, उसके बाद और युरेनस से सहायता ले अधिक तेज गति से नेपच्युन पहुंचा और उसके आगे निकल गया। गैलेलीयो यान ने शुक्र से एक बार, पृथ्वी से दो बार, सूर्य से एक बार सहायता लेकर अपने लक्ष्य बृहस्पति पहुंचा। शनि की परिक्रमा कर रहे कासीनी यान ने शुक्र से दो बार, पृथ्वी से एक बार, बृहस्पति से एक बार सहायता ली और शनि तक पहुंचा।

ध्यान रहे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है, वे एक जगह नही रहते है। इन सभी अभियानो मे इन अंतरिक्ष यानो का पथ इस तरह से बनाया जाता है कि वे निर्धारित समय पर ग्रह के पहुंचने के स्थान पर पहुंच जाये और तेज गति प्राप्त कर अगले पड़ाव पर समय पर पहुंचे ताकि अगले पड़ाव से भी गति त्वरण प्राप्त करने मे सहायता ले सके। इस तरह के पथ बनाने के लिये ग्रहों की स्थिति पर ध्यान मे रख कर पथ बनाया जाता है। वायेजर ने बृहस्पति, शनि, युरेनस से सहायता प्राप्त की थी, लेकिन इस तरह की स्थिति 175 वर्ष मे एक बार होती है। यह स्थिति 1977 मे बनी थी और अब 2152 मे बनेगी।

न्यु हारीजोंस के पथ मे वह केवल बृहस्पति से ही सहायता ले पाया था।

अब यह जानते है कि यह कार्य कैसे करता है :

जब कोई पिंड किसी ग्रह के पास पहुंचता है तो उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण से उस पिंड की गति मे वृद्धि होती है। लेकिन जब वह पिंड उस ग्रह से दूर जाता है तब उस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण से गति कम होती है। कुल मिला कर लाभ शून्य हो जाता है, जितनी गति मीली थी वह वापस ले ली गयी। तब यह तकनीक कार्य कैसे करती है ?

एक साधारण उदाहरण लेते है, चित्र मे दिखाये अनुसार इस उदाहरण मे एक शैतान बच्चा ’धरतीसिंह’ , एक चलती हुयी ट्रेन ’जुपिटर एक्सप्रेस’ है जो कि  ’सोलर जंक्सन’ स्टेशन से 50 किमी/घंटा गति गुजर रही है। धरतीसिंह एक गेंद को ट्रेन की दिशा मे जुपिटर एक्सप्रेस के सामने फेंक रहा है।

gravity-asist-cartoonमानलें की धरतीसिंग ने गेंद को 30 किमी प्रतिघंटा की गति से फेंका, तब धरतीसिंह तथा सोलर जंकसन मे बैठे सूर्यसिंह दोनो को गेंद 30 किमी प्रतिघंटा की गति से जाते दिखेगी। लेकिन ट्रेन चालक को गेंद 80 किमी/घंटा से आते दिखेगी (गेंद की गति ट्रेन की ओर 30 किमी घंटा + ट्रेन की गति 50 किमी + घंटा)। जब गेंद ट्रेन से टकरायेगी तब गेंद अपनी लचक के कारण 80 किमी/घंटा की गति से उछलेगी। जुपिटर एक्सप्रेस के चालक के लिये गेंद की गति 80 किमी/घंटा ही होगी लेकिन सोलर स्टेशन पर बैठे सूर्यसिंह और धरतीसिंह के लिये गेंद की गति मे ट्रेन की गति 50 किमी/प्रति घंटा भी जुड़ जायेगी, उनके लिये गेंद की गति अब 130 किमी/घंटा होगी।

सरल शब्दो मे गेंद की अपनी गति है, ट्रेन की अपनी गति है, लेकिन जब गेंद ट्रेन से टकराती है, तब गेंद की गति मे ट्रेन की गति भी जुड़ जाती है।

अब वास्तविकता मे धरतीसिंह हमारे राकेट होते है, जो गेंद अर्थात यान का प्रक्षेपण करते है, जुपिटर एक्सप्रेस अर्थात बृहस्पति ग्रह है। जब भी कोई यान भेजा जाता है तब ध्यान रखा जाता है कि जब यान बृहस्पति की कक्षा मे पहुंचे तब उसकी दिशा और बृहस्पति की सूर्य की परिक्रमा की दिशा समान हो।

200px-Gravitational_slingshot.svgबृहस्पति सूर्य से 806,000,000 किमी दूरी पर है, वह सूर्य 5,060,000,000 किमी की परिक्रमा 12 वर्ष मे करता है अर्थात बृहस्पति की गति 48,000 किमी/घंटा है। जब कोई यान बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव मे आता है तब उस यान की गति मे 48,000 किमी/घंटा जुड़ जाती है। गति मे यह वृद्धि मुफ़्त की है।

गुरुत्वीय सहायता को इस तरह से भी समझ सकते है कि यान v किमी/घंटा की गति से किसी ग्रह की ओर आता है और उसके गुरुत्विय प्रभाव मे आ जाता है। उस ग्रह की गति U किमी/घंटा, अब यान की गति 2U + v किमी घंटा होगी।

नोट : इस लेख मे प्रयुक्त सभी गणनायें सटिक नही है, उन्हे सरल कर के लिखा गया है। वास्तविकता मे इस गणना मे सदिश(vector) राशीयों का प्रयोग होता है तथा त्रिआयामी सदिश राशीयो x,y तथा z दिशाओं के प्रयोग से गणना की जाती है। गति मे वास्तविक वृद्धि हमारी गणना से कम या अधिक हो सकती है। इसे संलग्न चित्रो मे दिखाया है।

gravityasistb gravityasista

पहले चित्र मे(बायें) बृहस्पति स्थिर है जिससे यान की गति मे प्रारंभ मे बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण से वृद्धि होती है, लेकिन बाद मे वह गति मे वृद्धि गुरुत्वाकर्षण के विपरित जाने पर कम हो कर प्रारंभिक गति पर ही आ जाती है, परिणाम स्वरूप प्रारंभिक गति और पश्चात गति समान रहती है। चित्र मे गति को तीरो से दर्शाया गया है, गति मे परिवर्तन तीर के आकार मे परिवर्तन से दर्शाया गया है ।

दूसरे चित्र (दायें)मे बृहस्पति सूर्य की परिक्रमा कर रहा है, जिससे बृहस्पति की गति यान की गति मे जुड़ जाती है। फलस्वरूप पश्चात गति प्रारंभिक गति से अधिक होती है। गति मे वृद्धि, बृहस्पति की परिक्रमा की दिशा तथा यान की दिशा पर निर्भर करती है। ध्यान दे कि यान की दिशा मे परिवर्तन अपेक्षित होता है, इसलिये पथ भी उस तरह से निर्धारित किया जाता है।

जुलाई 20, 2015

न्यु हारीजोइन्स : प्लूटो की यात्रा सम्पन्न कर आगे रवाना

by आशीष श्रीवास्तव

न्यु हारीजोन्स

न्यु हारीजोन्स

अंतरिक्ष सदीयों से मानव को आकर्षित करता रहा है। खगोलिय पिंड मानव मन को हमेशा चुनौति देते आये है, और सदियों से मानव उनका निरीक्षण और अध्ययन करता आया है। ज्ञान की इस यात्रा मे महत्वपूर्ण मोड़ 4 अक्टूबर 1957 को आया जब पहली बार कोई मानव निर्मित वस्तु स्पूतनिक उपग्रह के रूप मे पृथ्वी के वातावरण को पार कर अंतरिक्ष मे पंहुची। इसके पश्चात तो अंतरिक्ष अभियानो की एक श्रृंखला प्रारंभ हो गयी।

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

अपोलो अभियान के तहत मानव 20 जुलाई 1969 को चांद पर जा पहुंचा। अंतरग्रहीय अभियान के तहत 19 मई 1961 को सोवियत संघ का वेनेरा 1 शुक्र ग्रह के 100,000 किमी दूरी से गुजरा। इस यान के शुक्र के पास पहुंचने से पहले ही संपर्क टूट गया था लेकिन यह पहला अभियान था जब कोई मानव निर्मित यान किसी अन्य ग्रह के पास से गुजरा था। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 2 पहला सफल अभियान था जिसमे दिसंबर 1962 मे शुक्र के 35,000 किमी दूरी से आंकड़े भेजे। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 4 जुलाई 1965 को मंगल के पास से गुजरा। मार्च 1966 मे सोवियत संघ का यान वेनेरा 3 शुक्र की सतह से टकरा कर नष्ट हो गया और वह कोई भी सुचना भेजने मे असफल रहा था, लेकिन वह पहला यान था जो किसी अन्य ग्रह की सतह पर पहुंचा था। अक्टूबर 1967 मे सोवियत संघ का वेनेरा 4 किसी अन्य ग्रह की सतह पर उतरने वाला पहला सफल अभियान था।

सं रा अमरीका का यान मैरीनर 10 पहला अभियान था जो एक बार मे एकाधिक ग्रहो के पास से गुजरा। यह यान फरवरी 1974 मे शुक्र के पास से तथा बुध के पास से तीन बार मार्च , सितंबर 1974 तथा मार्च 1975 मे गुजरा।

इन अभियानो के बाद मानव के सबसे सफल अंतरग्रहीय अभियान वायेजर 1 तथा वायेजर 2 रहे। ये दोनो यानो ने बृहस्पति, शनि, युरेनस तथा नेपच्युन की यात्रा की थी। उसके पश्चात वे सौर मंडल के बाहर की यात्रा पर निकल गये। इस तरह से 2006 प्लूटो के ग्रह माने जाने तक मानव द्वारा सभी ग्रह तक खोजी अंतरिक्ष यान भेजे जा चुके थे केवल प्लूटो ही ऐसा अकेला ’ग्रह’ था जिसपर मानव यान नही भेजा गया था।

USPS_Pluto_Stamp_-_October_19911991 मे सं रा अमरीका डाक विभाग ने प्लूटो ग्रह पर एक डाक टिकट जारी किया, जिस पर लिखा था “Pluto Not Yet Explored”। डाक टिकट पर लिखे इस संदेश ने वैज्ञानिको को प्लूटो पर एक अभियान भेजने के लिये चुनौति दी। इस चुनौति ने न्यु हारीजोंस अभियान का आधार बनाया और 2006 मे यह यान अपनी यात्रा पर रवाना हो गया।

प्लूटो के बारे में हमें जितनी जानकारी है उसे एक डाक-टिकट के पीछे लिखा जा सकता है। इस मिशन के पूरा होने के बाद सौर मंडल संबंधी किताबों को दोबारा लिखे जाने की ज़रूरत होगी।

-2006 मे एक वरिष्ठ नासा अधिकारी कॉलिन हार्टमैन Continue reading

जुलाई 14, 2015

प्लूटो : न्यु हारीजोंस की प्लूटो यात्रा पर विशेष भाग 1

by आशीष श्रीवास्तव

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

प्लूटो के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यह पहले अपने सौरमंडल का 9वां ग्रह था। लेकिन अब इसे ग्रह नहीं माना जाता। आओ आज प्लूटो के बारे में जानते हैं।

रोमन मिथक कथाओं के अनुसार प्लूटो (ग्रीक मिथक में हेडस) पाताल का देवता है। इस नाम के पीछे दो कारण है, एक तो यह कि सूर्य से काफ़ी दूर होने की वजह से यह एक अंधेरा ग्रह (पाताल) है, दूसरा यह कि प्लूटो का नाम PL से शुरू होता है जो इसके अन्वेषक पर्सीयल लावेल के आद्याक्षर है।

सूर्य की रोशनी को प्लूटो तक पहुंचने में छह घंटे लग जाते है जबकि पृथ्वी तक यही रोशनी महज आठ मिनट में पहुँच जाती है। प्लूटो की दूरी का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। बड़ी कक्षा होने के कारण सूर्य की परिक्रमा के लिए भी प्लूटो को अधिक वर्ष लगते है, 248 पृथ्वी वर्ष। प्लूटो अपनी धूरी के इर्दगिर्द भी घूमता है। यह अपने अक्ष पर छह दिवसों में एक बार घूमता है। प्लूटो की कक्षा अंडाकार है। अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हुए कभी यह नेप्चून की कक्षा को लांघ जाता है। तब नेप्चून की बजाय प्लूटो सूर्य के समीप होता है। हालांकि प्लूटो को यह सौभाग्य केवल बीस वर्षों के लिए मिलता है। 1979 से लेकर 1999 तक प्लूटो आठवां जबकि नेप्चून नौवां ग्रह था।

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो का आकार हमारे चंद्रमा का एक तिहाई है। यानी हमारे चंद्रमा के तीसरे हिस्से के बराबर है प्लूटो। इसका व्यास लगभग 2,300 किलोमीटर है। पृथ्वी प्लूटो से लगभग 6 गुना बड़ी है। प्लूटो सूर्य से औसतन 6 अरब किलोमीटर दूर है। इस कारण इसे सूर्य का एक चक्कर लगाने में हमारे 248 साल के बराबर समय लग जाता है।

यह नाइट्रोजन की बर्फ, पानी की बर्फ और पत्थरों से बना है। इसके वायुमंडल में नाइट्रोजन, मिथेन और कार्बन मोनोक्साइड गैस है। इस कारण यहां का तापमान काफी कम रहता है। शून्य से 200 डिग्री सेल्सियस नीचे यानी -200 डिग्री सेल्सियस रहता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है यहां कितनी ठंड लगती होगी। इतने कम तापमान में कोई यहां नहीं रह सकता है। Continue reading

जुलाई 11, 2015

ब्रह्माण्ड का अंत : अब से 22 अरब वर्ष पश्चात

by आशीष श्रीवास्तव

जो भी कुछ हम जानते है और उसके अतिरिक्त भी सब कुछ एक महाविस्फोट अर्थात बिग बैंग के बाद अस्तित्व मे आया था। अब वैज्ञानिको के अनुसार इस ब्रह्मांड का अंत भी बड़े ही नाटकीय तरिके से होगा, महाविच्छेद(The Big Rip)

ये नये सैद्धांतिक माडेल के अनुसार ब्रह्मांड के विस्तार के साथ, सब कुछ, आकाशगंगाओं से लेकर, ग्रह, तारे, परमाण्विक कण से लेकर काल-अंतराल (Space-Time)तक अंततः दृश्य से बाहर होने से पहले विदीर्ण हो जायेंगे!

अभी से घबराने की बात नही है लेकिन इस महा-भयानक प्रलयंकारी घटना का प्रारंभ अब से 22 अरब वर्ष बाद होगा।

सं रा. अमरीका की वांडेरबिल्ट विश्वविद्यालय टेनेसी(Vanderbilt University Tennessee) के गणितज्ञ डा मार्शेलो डिस्कोंजी (Dr Marcelo Disconzi)के अनुसार :

“महाविच्छेद के सिद्धांत के अनुसार अंततोगत्वा पदार्थ का निर्माण करने वाले कण भी एक दूसरे से अलग होना प्रारंभ कर देंगे, परमाणु भी विदीर्ण हो जायेंगे, सब कुछ बिखर जायेगा और यह एक बहुत ही सनसनीखेज नाटकीय घटना होगी।”

वैज्ञानिक अब लगभग एकमत है कि ब्रह्माण्ड का जन्म अब से 13.8 अरब वर्ष पहले एक महाविस्फोट अर्थात बिग बैंग मे हुआ था, जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड ने एक अत्याधिक घनिभुत बिंदु से प्रारंभ कर विस्तार करते हुये आज वर्तमान आकार प्राप्त किया है।

लेकिन ब्रह्माण्ड के अंत के बारे मे वैज्ञानिक अभी भी एक मत नही है, और वादविवाद चलते रहता है।

डाक्टर डिस्कोंजी के अनुसार

” हम यह तय रूप से जानते है कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है और इस विस्तार की गति मे वृद्धि हो रही है। बस यही तथ्य है, जिसमे कोई वाद विवाद नही है।”

इस विषय पर नयी शोधो के अनुसार ब्रह्मांड के विस्तार की गति मे यह वृद्धि उस बिंदु तक जारी रहेगी अब अंतरिक्ष का हर बिंदु दूसरे बिंदु से अनंत गति से दूर होने लगेगा और उसी क्षण महाविच्छेद होगा!

डाक्टर डिस्कोंजी कहते है कि

“गणितिय रूप से हम इस घटना का अर्थ जानते है लेकिन भौतिक रूप मे पूर्ण रूप से समझना कठीन है।”

विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड के प्रमाण, दूरस्थ सुपरनोवाओं के निरीक्षण से प्राप्त हुये है। वे जितनी दूरी पर होते है, उतने ही ज्यादा लाल दिखायी देते है, क्योंकि उनसे निकलने वाला प्रकाश अंतरिक्ष की यात्रा करते हुये हम तक पहुंचते पहुंचते फैल जाता है, इस घटना को “लाल विचलन(Red Shift)” कहते है।

ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे हो रही वृद्धि को समझने के लिये वैज्ञानिक श्याम ऊर्जा(Dark Energy) को उत्तरदायी मानते है, जोकि ब्रह्माण्ड की कुल मात्रा का 70% भाग है।

डरहम विश्वविद्यालय(University of Durham) के खगोल वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर कार्लोस फ़्रेंक( Professor Carlos Frenk) के अनुसार ” भौतिक वैज्ञानिक अपनी अनभिज्ञता को छुपाने के लिये रहस्यमय नाम रखते है। हमारे पास श्याम ऊर्जा की व्याख्या करने के लिये अभी कुछ नही है।”

ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे वृद्धि होते रहेगी या इस विस्तार की गति थम जायेगी, इसका नतिजा दो ब्रह्माण्डीय शक्तियों मे चल रहे महायुद्ध के नतीजे पर निर्भर करेगा।

एक योद्धा श्याम ऊर्जा है जो ब्रह्माण्ड को विस्तार दे रही है, दूसरा योद्धा गुरुत्वाकर्षण है जो ब्रह्माण्ड को वापस सिकोड़ना चाहता है। दोनो मे युद्ध जारी है, प्रश्न यह है कि विजेता कौन होगा ?

यदि गुरुत्वाकर्षण जितेगा तो ब्रह्माण्ड का अंत महा-संकुचन(Big Crunch) के रूप मे होगा जिसमे सारा ब्रह्माण्ड गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से सिकुड़ना प्रारंभ करेगा और वापस एक बिंदु के रूप मे संपिडित हो जायेगा। यह प्रक्रिया बिग बैंग/महाविस्फोट की विपरीत प्रक्रिया होगी। ठीक उसी तरह जब आप किसी विडियो को उल्टा(Reverse) देखते है।

श्याम ऊर्जा के विजेता होने की स्थिति मे महा-विच्छेद होगा, सभी पिंड, सभी पदार्थ , सभी परमाणु विदिर्ण हो जायेंगे।

दोनो का महायुद्ध टाई होने पर, एक भिन्न अंत होगा, जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड शीतल होकर अपनी मृत्यु को प्राप्त होगा। इसके अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार इतना हो जायेगा कि नये तारो के जन्म के लिये गैसो का घनत्व पर्याप्त नही होगा। पुराने तारो की मृत्यु के पश्चात नये तारों का निर्माण नही होगा, उष्मा/ऊर्जा का निर्माण बंद हो जायेगा। ब्रह्माण्ड इतना शीतल हो जायेगा कि परमाणु तथा अन्य परमाण्विक कण गति बंद कर देंगे और समय का भी अर्थ समाप्त हो जायेगा।

लेकिन फिजिक्स रीव्यु मे प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार इस महायुद्ध मे श्याम ऊर्जा/डार्क ऊर्जा की विजय होगी, अर्थात महाविच्छेद!

डाक्टर डिस्कोंजी के अनुसार यह समीकरणो का सबसे प्राकृतिक निष्कर्ष है।

इसे समझने के लिये आप एक कार की कल्पना करे कि वह 10 किमी/घंटा से जा रही है और हर किमी के बाद अपनी गति मे 10 किमी/घंटा की वृद्धि करती है। उसके बाद उसकी गति मे 10 किमी/घंटा की वृद्धि आधे किमी पर, कुछ समय बाद चौथाई किमी पर, अंत मे कुछ मिटर पर होती है। इस स्थिति मे कार का अगला बंपर और पिछला बंपर अलग हो जायेगें क्योंकि अब कार की गति मे वृद्धि उनके मध्य की दूरी से कम मे ही हो रही है। कुछ समय बाद उस कार का हर हिस्सा एक दूसरे से अलग हो जायेगा।

यह घटना ब्रह्माण्ड मे होगी या नही होगी ? उसका उत्तर श्याम ऊर्जा के सूदूर भविष्य पर निर्भर है। और यह उत्तर पूर्ण रूप से एक परिकल्पना/अटकलबाजी है।

वर्तमान निरीक्षण और प्रमाण सभी के सभी इशारा कर रहे है कि अंतत: श्याम ऊर्जा की विजय होगी और इसका अंत महाविच्छेद के रूप मे होगा, जिसमे ब्रह्मांड विदिर्ण होकर अदृश्य हो जायेगा।

जुलाई 10, 2015

भविष्य के विमान नाभिकिय शक्ति से चालित हो सकते है: बोइंग द्वारा पेटेंट प्राप्त

by आशीष श्रीवास्तव

जुलाई 2015 के प्रथम सप्ताह मे सं रां अमरीका के पेटेंट कार्यालय ने विमान निर्माता कंपनी बोइंग के राबर्ट बुडिका, जेम्स हर्जबर्ग तथा फ़्रैंक चांडलर के “लेजर तथा नाभिकिय शक्ति” से चलने वाले विमान इंजन के पेटेंट आवेदन को अनुमति दे दी है।

विमान निर्माता कंपनी सामान्यत: अपने उत्पादो को उन्नत बनाने के लिये हमेशा नयी और पहले से बेहतर तकनीक की तलाश मे रहती है, इसी क्रम मे लेजर तथा नाभिकिय शक्ति से चालित विमान इंजन बोइंग के इंजिनीयरो का नया आइडीया है।

आधुनिक विमान जैसे बोइंग ड्रीमलाईनर मे एकाधिक टर्बोफ़ैन इंजन होते है। इन इंजनो मे पंखो और टर्बाइन की एक श्रृंखला होती है जो हवा के संपिड़न तथा ईंधन के प्रज्वलन से प्रणोद(Thrust) उत्पन्न करते है।

बोइंग के नये पेटेंट किये गये नये इंजन मे प्रणोद एक पुर्णतय भिन्न तथा अभिनव तरिके से किया जायेगा। पेटेंट आवेदन के अनुसार यह लेक्जर नाभिकिय इंजन राकेट, प्रक्षेपास्त्र तथा अंतरिक्षयान मे भी प्रयोग किया जा सकेगा।

वर्तमान मे यह इंजन केवल पेटेंटे के दस्तावेजो मे दर्ज है। इसे बनाने की तकनीक भी उपलब्ध है लेकिन इसे कोई बनायेगा या नही अभी स्पष्ट नही है।

अब देखते है कि यह इंजन कैसे कार्य करेगा। Continue reading

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 5,314 other followers