विभा चौधरी : भारतीय विज्ञान का वह सितारा, जिसकी चमक को दुनिया पहचानने में देर कर गई


ब्रह्मांडीय किरणों, मेसॉन और मूलभूत कणों की खोज में अपना जीवन समर्पित करने वाली भारत की अग्रणी महिला भौतिक विज्ञानी

विज्ञान के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनका योगदान उनके जीवनकाल में उतनी पहचान नहीं पाता, जितना वे वास्तव में हकदार होते हैं। उनकी प्रयोगशालाओं में की गई मेहनत, उनके शोध और उनकी वैज्ञानिक दृष्टि आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते खोलती है, लेकिन इतिहास के पन्नों में उनका उल्लेख कहीं पीछे छूट जाता है। भारत की ऐसी ही एक विलक्षण वैज्ञानिक थीं डॉ. बिभा चौधुरी (Bibha Chowdhuri)। उन्होंने उस दौर में आधुनिक भौतिकी के कठिनतम विषयों पर शोध किया, जब भारत में महिलाओं के लिए विज्ञान की उच्च शिक्षा और शोध के अवसर बेहद सीमित थे।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक प्रतिभा को न तो सामाजिक परिस्थितियां रोक सकती हैं और न ही संसाधनों की कमी। उनका पूरा जीवन ब्रह्मांड के रहस्यों और पदार्थ के सबसे सूक्ष्म कणों को समझने की जिज्ञासा को समर्पित रहा।

एक असाधारण वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत

बिभा चौधुरी का जन्म 3 जुलाई 1913 को बंगाल के हुगली जिले के भंडारहाटी में हुआ था। उनके पिता बांगू बिहारी चौधुरी चिकित्सक थे। परिवार में शिक्षा के प्रति सकारात्मक वातावरण था और बेटियों की उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाता था।

उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध बेथ्यून स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से भौतिकी में स्नातक किया।

इसके बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। वर्ष 1936 में जब उन्होंने एमएससी की पढ़ाई पूरी की, तब वे अपने बैच की एकमात्र महिला विद्यार्थी थीं।

यह वह समय था जब भौतिकी जैसे विषयों में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत कम थी। लेकिन बिभा के लिए विज्ञान केवल एक विषय नहीं, बल्कि प्रकृति के रहस्यों को समझने का माध्यम था।

स्नातकोत्तर शिक्षा के बाद उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर डी. एम. बोस के मार्गदर्शन में शोधकार्य शुरू किया।

मेसॉन की खोज और बोस इंस्टीट्यूट में शोध

बोस इंस्टीट्यूट

वर्ष 1938 में बिभा चौधुरी, प्रोफेसर डी. एम. बोस के साथ बोस इंस्टीट्यूट से जुड़ गईं। यहां उन्होंने उपपरमाण्विक कणों (Subatomic Particles) के अध्ययन पर काम किया।

उनके शोध का प्रमुख विषय था मेसॉन (Mesons)।

मेसॉन ऐसे मूलभूत कण हैं जो क्वार्क और एंटीक्वार्क से मिलकर बने होते हैं। इनका अध्ययन परमाणु नाभिक में कार्य करने वाले बलों तथा पदार्थ की मूलभूत संरचना को समझने में महत्वपूर्ण है।

उस समय इन कणों का अध्ययन करना अत्यंत कठिन था। आधुनिक पार्टिकल डिटेक्टर और कण त्वरक उपलब्ध नहीं थे। वैज्ञानिकों को प्रकृति में उपलब्ध कॉस्मिक रे अर्थात ब्रह्मांडीय किरणों का सहारा लेना पड़ता था।

बिभा चौधुरी और डी. एम. बोस ने विशेष फोटोग्राफिक इमल्शन प्लेटों का उपयोग करके इन कणों के मार्ग और उनके व्यवहार का अध्ययन किया।

इन प्लेटों पर आवेशित कणों के गुजरने से सूक्ष्म निशान बनते थे। इन निशानों का विश्लेषण करके वैज्ञानिक कणों की पहचान और उनकी ऊर्जा के बारे में जानकारी प्राप्त करते थे।

इस शोध के परिणामस्वरूप उनके तीन महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित हुए।

यह उपलब्धि इसलिए भी असाधारण थी क्योंकि उस समय भारत में इस स्तर का प्रायोगिक कण भौतिकी अनुसंधान बहुत सीमित संसाधनों के साथ किया जा रहा था।

द्वितीय विश्व युद्ध के कारण शोध के लिए आवश्यक फोटोग्राफिक प्लेटों की उपलब्धता प्रभावित हुई और उनका यह काम बाधित हो गया।

मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और ब्रह्मांडीय किरणों का अध्ययन

भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर पैट्रिक मेनार्ड स्टुअर्ट ब्लैकेट (P. M. S. Blackett)

बिभा चौधुरी ने शोध जारी रखने के लिए इंग्लैंड जाने का निर्णय लिया। वे मैनचेस्टर विश्वविद्यालय पहुंचीं और वहां प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर पैट्रिक मेनार्ड स्टुअर्ट ब्लैकेट (P. M. S. Blackett) के साथ काम करने लगीं।

ब्लैकेट उस समय कॉस्मिक रे और परमाणु भौतिकी के क्षेत्र में अग्रणी वैज्ञानिकों में से थे। उन्हें 1948 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

बिभा ने उनके मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों से उत्पन्न कणों की बौछारों का अध्ययन किया।

इस शोध का एक महत्वपूर्ण विषय था:

Extensive Air Showers Associated with Penetrating Particles

इसे सरल भाषा में समझें तो जब अंतरिक्ष से आने वाली अत्यधिक ऊर्जा वाली कॉस्मिक किरणें पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं, तो वे वायुमंडल के परमाणुओं से टकराकर अनेक नए कण उत्पन्न करती हैं।

इस प्रक्रिया में कणों की एक विशाल बौछार बनती है, जिसे Extensive Air Shower कहा जाता है।

इन कणों का अध्ययन करके वैज्ञानिक ब्रह्मांड से आने वाली अत्यधिक ऊर्जा वाली किरणों और उनके स्रोतों को समझने का प्रयास करते हैं।

वर्ष 1952 में उन्होंने मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की।

यह उपलब्धि भारतीय महिला वैज्ञानिकों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और होमी भाभा के साथ काम

TIFR

भारत लौटने के बाद वर्ष 1949 में बिभा चौधुरी मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) से जुड़ीं।

इस संस्थान की स्थापना डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने की थी।

वे TIFR में काम करने वाली पहली महिला शोधकर्ताओं में शामिल थीं।

यहां उन्होंने होमी भाभा, एम. जी. के. मेनन और अन्य वैज्ञानिकों के साथ कॉस्मिक रे तथा उच्च ऊर्जा भौतिकी (High Energy Physics) पर शोध किया।

उनका काम उस समय विकसित हो रहे भारतीय परमाणु एवं कण भौतिकी अनुसंधान का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

बिभा चौधुरी का वैज्ञानिक योगदान केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं था। वे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थीं। वर्ष 1955 में इटली के पीसा में आयोजित मूलभूत कणों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में उनकी भागीदारी भी उल्लेखनीय रही।

कोलार गोल्ड फील्ड्स : धरती की गहराई में छिपे ब्रह्मांड के रहस्य

कोलार गोल्ड फील्ड्स :

बिभा चौधुरी के वैज्ञानिक जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) से जुड़ा है।

वर्ष 1957 में वे अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) से जुड़ गईं। उस समय संस्थान का नेतृत्व डॉ. विक्रम साराभाई कर रहे थे।

यहां उन्होंने एम. जी. के. मेनन और अन्य वैज्ञानिकों के साथ KGF के भूमिगत प्रयोगों में हिस्सा लिया।

लेकिन सवाल यह था कि सोने की खदान में जाकर वैज्ञानिक क्या खोज रहे थे?

इसका उत्तर कॉस्मिक रे और न्यूट्रिनो जैसे सूक्ष्म कणों में छिपा था।

पृथ्वी के वायुमंडल में आने वाली कॉस्मिक किरणों से उत्पन्न कुछ कण अत्यधिक गहराई तक पहुंच सकते हैं। भूमिगत प्रयोगशालाएं ऐसे कणों का अध्ययन करने के लिए विशेष परिस्थितियां उपलब्ध कराती हैं, क्योंकि धरती की मोटी चट्टानें अधिकांश अन्य विकिरणों को रोक देती हैं।

इस प्रकार वैज्ञानिकों को दुर्लभ और अत्यधिक ऊर्जावान कणों का अध्ययन करने का अवसर मिलता है।

कोलार गोल्ड फील्ड्स के प्रयोग भारतीय कण भौतिकी के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन प्रयोगों ने भारत में भूमिगत कण अनुसंधान की मजबूत आधारशिला तैयार करने में योगदान दिया।

बिभा चौधुरी ने इन प्रयोगों में सक्रिय वैज्ञानिक भूमिका निभाई।

यह काम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि भारत उस समय सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर के मूलभूत विज्ञान अनुसंधान में अपनी जगह बना रहा था।

जीवन का अंतिम अध्याय : साहा इंस्टीट्यूट में शोध

डॉ. विक्रम साराभाई के निधन के बाद PRL में परिस्थितियां बदलने लगीं। अंततः बिभा चौधुरी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर कोलकाता लौटने का निर्णय लिया।

उन्होंने साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स में अपना शोध जारी रखा।

उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा जीवन के अंतिम वर्षों तक बनी रही। वे शोधपत्र लिखती रहीं और उच्च ऊर्जा भौतिकी के विभिन्न पहलुओं पर काम करती रहीं।

उनका अंतिम शोधपत्र 1990 में प्रकाशित हुआ, जो उनके जीवनभर के वैज्ञानिक समर्पण का प्रमाण है।

2 जून 1991 को उनका निधन हो गया।

एक वैज्ञानिक जिसे इतिहास ने देर से पहचाना

बिभा चौधुरी का जीवन भारतीय विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा करता है।

आखिर क्यों ऐसी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक को उनके जीवनकाल में वह सार्वजनिक पहचान नहीं मिली जिसकी वे अधिकारी थीं?

उन्होंने डी. एम. बोस, पी. एम. एस. ब्लैकेट, होमी भाभा, विक्रम साराभाई और एम. जी. के. मेनन जैसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों के साथ काम किया। उनके शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। उन्होंने भारत में आधुनिक कण भौतिकी और कॉस्मिक रे अनुसंधान को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

फिर भी उनका नाम लंबे समय तक आम लोगों और विज्ञान के इतिहास में अपेक्षाकृत अपरिचित रहा।

विज्ञान इतिहासकार राजिंदर सिंह और सुप्रकाश सी. राय ने उनके जीवन और वैज्ञानिक योगदान पर 2018 में प्रकाशित पुस्तक A Jewel Unearthed: Bibha Chowdhuri – The Story of an Indian Woman Scientist के माध्यम से उनके योगदान को सामने लाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

वर्ष 2019 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने एक तारे का नाम ‘Bibha’ रखा। यह उनके सम्मान में एक सुंदर प्रतीकात्मक पहचान है।

आज PRL में उनके नाम से स्मृति व्याख्यान भी आयोजित किए जाते हैं।

विज्ञान विश्व : एक ऐसी प्रेरणा जो कभी धूमिल नहीं होगी

बिभा चौधुरी की कहानी केवल एक महिला वैज्ञानिक की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस वैज्ञानिक जिज्ञासा की कहानी है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपना रास्ता बनाती है।

कल्पना कीजिए, लगभग एक शताब्दी पहले एक भारतीय महिला वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बैठकर उन कणों का अध्ययन कर रही थी, जिन्हें उस समय दुनिया के अग्रणी वैज्ञानिक भी पूरी तरह समझने का प्रयास कर रहे थे। उसके सामने आधुनिक कंप्यूटर नहीं थे, अत्याधुनिक डिटेक्टर नहीं थे और न ही आज जैसी प्रयोगशाला सुविधाएं थीं। फिर भी उसने फोटोग्राफिक प्लेटों पर बने सूक्ष्म निशानों में ब्रह्मांड के रहस्यों को पढ़ने का प्रयास किया।

आज जब CERN के विशाल लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में वैज्ञानिक हिग्स बोसॉन और अन्य मूलभूत कणों की प्रकृति का अध्ययन करते हैं, तब हमें उन शुरुआती वैज्ञानिकों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने सीमित संसाधनों में कण भौतिकी की नींव मजबूत करने में योगदान दिया था।

बिभा चौधुरी उन्हीं वैज्ञानिकों में से एक थीं।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई एक खोज या शोधपत्र नहीं, बल्कि वह साहस था जिसके साथ उन्होंने अपने समय की सामाजिक और वैज्ञानिक सीमाओं को चुनौती दी।

उन्होंने यह साबित किया कि विज्ञान किसी लिंग, देश या सामाजिक परिस्थिति की सीमा में बंधा नहीं होता। विज्ञान केवल उन लोगों का है जिनमें प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और सत्य की खोज में अपना जीवन लगाने का साहस होता है।

बिभा चौधुरी भारतीय विज्ञान के आकाश की ऐसी ही एक अनमोल तारिका थीं, जिनकी चमक को पहचानने में हमें भले ही देर हुई, लेकिन उनका वैज्ञानिक योगदान सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

विज्ञान विश्व की ओर से इस विस्मृत वैज्ञानिक को विनम्र श्रद्धांजलि।

संदर्भ एवं आगे पढ़ने के लिए

  1. A Jewel Unearthed: Bibha Chowdhuri – The Story of an Indian Woman Scientist — राजिंदर सिंह एवं सुप्रकाश सी. राय।
  2. जागरण – भौतिक विज्ञानी विभा चौधरी का जीवन और वैज्ञानिक योगदान।
  3. Feminism in India – बिभा चौधरी की वैज्ञानिक यात्रा।
  4. Physical Research Laboratory – वार्षिक रिपोर्ट एवं स्मृति व्याख्यान।

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