2026 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : कार्ल डाइसेरोथ (Karl Deisseroth), पीटर हेगेमैन (Peter Hegemann) और जॉर्ज नागेल (Georg Nagel)


चिकित्सा के लिए 2026 का नोबेल पुरस्कार कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को “लाइट-गेटेड आयन चैनल और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी उनकी खोजों के लिए” दिया गया है।

चिकित्सा में 2026 का नोबेल पुरस्कार ‘ऑप्टोजेनेटिक्स’ के लिए दिया गया है ; यह एक ऐसी तकनीक है जिससे यह पता लगाना संभव हो गया है कि जीवित मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएं (nerve cells) यादों, भावनाओं और व्यवहारों को कैसे आकार देती हैं। पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने एक कोशिकीय शैवाल (single-celled alga) में ‘चैनलरोडोप्सिन’ (channelrhodopsin) नामक एक अद्भुत प्रोटीन की खोज की। कार्ल डेइसेरोथ ने इस प्रोटीन को तंत्रिका कोशिकाओं के लिए प्रकाश-नियंत्रित स्विच में बदल दिया। इन पुरस्कार विजेताओं ने न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में एक नए युग की नींव रखी है।

प्रकाश से मस्तिष्क को नियंत्रित करने की खोज

कल्पना कीजिए कि किसी वैज्ञानिक के हाथ में एक ऐसी “टॉर्च” हो, जिसकी रोशनी से वह मस्तिष्क की किसी एक विशेष तंत्रिका कोशिका को सक्रिय कर सके और अगली ही क्षण उसी कोशिका को शांत भी कर सके। वह यह भी देख सके कि उस एक छोटे-से बदलाव से किसी जीव के व्यवहार, उसकी स्मृति, उसकी भावना या उसकी गतिविधि में क्या परिवर्तन आता है।

कुछ दशक पहले तक यह लगभग विज्ञान-कथा जैसा विचार लगता था।

लेकिन आज वैज्ञानिक वास्तव में प्रकाश की सहायता से मस्तिष्क की विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं को “चालू” और “बंद” कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों ने नर्व सेल्स के लिए एक स्विच का इस्तेमाल करने का सपना देखा था।

इसी क्रांतिकारी तकनीक ऑप्टोजेनेटिक्स (Optogenetics) की नींव रखने वाले तीन वैज्ञानिकों पीटर हेगेमैन, जॉर्ज नागेल और कार्ल डिसेरोथ को 2026 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है। उनका काम आधुनिक न्यूरोसाइंस के सबसे शक्तिशाली उपकरणों में से एक बन चुका है।

मस्तिष्क का सबसे बड़ा रहस्य

मानव मस्तिष्क अरबों तंत्रिका कोशिकाओं “न्यूरॉन्स” से बना है। ये कोशिकाएँ विद्युत और रासायनिक संकेतों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करती हैं। इन्हीं जटिल संकेतों से हमारी यादें बनती हैं, हम भावनाएँ अनुभव करते हैं, निर्णय लेते हैं और शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं।

लेकिन एक मूलभूत प्रश्न लंबे समय तक वैज्ञानिकों के सामने बना रहा :

किस विशेष न्यूरॉन के सक्रिय होने से कौन-सा व्यवहार उत्पन्न होता है?

बीसवीं शताब्दी में वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग कार्यों से जोड़ना शुरू किया। वे यह पहचान सकते थे कि मस्तिष्क का कौन-सा क्षेत्र देखने, चलने, बोलने या स्मृति जैसे कार्यों में शामिल है।

लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या थी। यदि मस्तिष्क के किसी क्षेत्र को उत्तेजित किया जाए और कोई प्रतिक्रिया दिखाई दे, तो इससे यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि वही क्षेत्र उस प्रतिक्रिया का कारण है।

मानो हमारे पास किसी विशाल शहर का नक्शा हो, लेकिन उस नक्शे में सड़कें तो बनी हों, यह न पता हो कि किस सड़क से किस स्थान तक जाने के लिए कौन-सा रास्ता वास्तव में इस्तेमाल होता है।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने इस समस्या को बदल दिया।

अब वैज्ञानिक विशिष्ट न्यूरॉन्स को लगभग स्विच की तरह नियंत्रित कर सकते हैं, वह भी प्रकाश की सहायता से।

कहानी शुरू होती है एक छोटे-से शैवाल से

इस कहानी की शुरुआत मानव मस्तिष्क से नहीं, बल्कि एक अत्यंत साधारण-से जीव से हुई। इसका नाम है क्लैमाइडोमोनस (Chlamydomonas) एक एककोशिकीय हरा शैवाल।

यह सूक्ष्म जीव प्रकाश की दिशा में तैर सकता है। पीटर हेगेमैन के मन में प्रश्न उठा , “यह इतना छोटा जीव आखिर प्रकाश को पहचानता कैसे है?“

क्लैमाइडोमोनास शैवाल अपने आईस्पॉट (eyespot) का इस्तेमाल करके रोशनी का पता लगाता है। जब रोशनी काफ़ी तेज़ होती है, तो यह उसके स्रोत की ओर तैरता है।

इस प्रश्न ने आगे चलकर न्यूरोसाइंस की दिशा बदल दी। हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने अध्ययन करते हुए एक असाधारण प्रोटीन की पहचान की। इसका नाम रखा गया, चैनलरोडोप्सिन(Channelrhodopsin)।

यह प्रोटीन शैवाल की कोशिका की सतह पर पाया जाता है और इसकी विशेषता अद्भुत थी। जब इस प्रोटीन पर नीली रोशनी पड़ती है, तो यह एक आयन चैनल की तरह खुल जाता है। इसके खुलते ही विद्युत आवेश वाले आयन कोशिका के भीतर प्रवेश करने लगते हैं। इससे कोशिका की विद्युत अवस्था बदल जाती है।

जब नागेल और हेगेमैन ने मेंढक के अंडों में क्लैमाइडोमोनास जीन डाले, तो उनमें आयन चैनल प्रोटीन बनने लगे जो अंडों की सतह पर आ गए। जब ​​शोधकर्ताओं ने आयन चैनलों पर रोशनी डाली, तो वे खुल गए। इसके बाद आयन चैनलों से होकर बहने लगे, जिससे एक इलेक्ट्रिक सिग्नल बना।

अर्थात् प्रकाश सीधे कोशिका की विद्युत गतिविधि को प्रभावित कर सकता था।

यह एक असाधारण खोज थी। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात अभी सामने आनी बाकी थी।

वैज्ञानिकों ने पाया कि इस प्रोटीन को यदि किसी दूसरी कोशिका में पहुँचाया जाए, तो वह कोशिका भी प्रकाश के प्रति संवेदनशील बन सकती है। यहीं से एक बिल्कुल नई वैज्ञानिक संभावना पैदा हुई।

क्या प्रकाश की सहायता से किसी भी चुनी हुई कोशिका को नियंत्रित किया जा सकता है?

शैवाल से न्यूरॉन तक

यह प्रश्न कार्ल डिसेरोथ के काम का आधार बना। डिसेरोथ ने चैनलरोडोप्सिन(Channelrhodopsin) से संबंधित जीन को चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचाया। अब इन न्यूरॉन्स में एक ऐसा प्रोटीन मौजूद था जो प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करता था।

जब वैज्ञानिकों ने इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डाली, तो वे न्यूरॉन्स सक्रिय हो गए और उनमें तंत्रिका संकेत उत्पन्न हुआ। 2005 में डिसेरोथ ने इस महत्वपूर्ण सफलता को प्रकाशित किया।

डाइसेरोथ ने पेट्री डिश में कल्चर की गई नर्व सेल्स में चैनलरोडोप्सिन-2 बनाने वाले जीन को डाला, जिससे वे सेल्स रोशनी के प्रति संवेदनशील हो गईं। नीली रोशनी का इस्तेमाल करके, रिसर्चर्स तेज़ी से नर्व सिग्नल शुरू करने में कामयाब रहे।

लेकिन उन्होंने यहीं रुकने से इनकार कर दिया। अगला प्रश्न था:

क्या यह तकनीक केवल प्रयोगशाला में रखी कोशिकाओं पर काम करेगी, या जीवित मस्तिष्क में भी?

2007 में डिसेरोथ और उनके सहयोगियों ने जीवित चूहों के मस्तिष्क में प्रकाश की सहायता से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने की क्षमता प्रदर्शित की। अब वैज्ञानिक पहली बार जीवित मस्तिष्क में विशिष्ट न्यूरॉन्स को नियंत्रित करने के लिए प्रकाश का इस्तेमाल कर सकते थे।

यही तकनीक आगे चलकर ऑप्टोजेनेटिक्स कहलायी।

डाइसेरोथ के रिसर्च ग्रुप ने ज़िंदा चूहों के दिमाग में चैनलरोडोप्सिन-2 का जीन पहुँचाया। फिर उन्होंने दिमाग में एक पतला ऑप्टिकल फ़ाइबर डाला। जब उन्होंने ऑप्टिकल फ़ाइबर के ज़रिए नर्व सेल्स पर रोशनी डाली, तो एक नर्व सिग्नल पैदा हुआ जिससे मूंछों में हरकत हुई।

ऑप्टोजेनेटिक्स आखिर है क्या?

नाम को दो हिस्सों में बाँटकर समझिए:

Opto = प्रकाश
Genetics = आनुवंशिकी

अर्थात ऐसी तकनीक जिसमें आनुवंशिक इंजीनियरिंग की सहायता से किसी विशेष कोशिका को प्रकाश-संवेदनशील बनाया जाता है और फिर प्रकाश के माध्यम से उसकी गतिविधि को नियंत्रित किया जाता है।

सरल भाषा में : “वैज्ञानिक तय करते हैं कि किस प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करना है।“

फिर उस कोशिका में एक प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन बनाने वाला जीन पहुँचाया जाता है। इसके बाद उपयुक्त प्रकाश पहुँचाकर उस कोशिका की विद्युत गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है। यह नियंत्रण अत्यंत विशिष्ट हो सकता है। यही ऑप्टोजेनेटिक्स की सबसे बड़ी शक्ति है।

मस्तिष्क के लिए यह इतनी बड़ी क्रांति क्यों है?

हमारे मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन्स हैं और प्रत्येक न्यूरॉन हजारों दूसरे न्यूरॉन्स से जुड़ा हो सकता है। जब हम कोई स्मृति बनाते हैं, डर महसूस करते हैं, आनंद लेते हैं, कोई निर्णय लेते हैं या हाथ-पैर चलाते हैं, तो असंख्य न्यूरॉन्स के बीच जटिल गतिविधि होती है। यदि वैज्ञानिक एक साथ हजारों या लाखों कोशिकाओं की गतिविधि देखते हैं, तो यह समझना कठिन हो सकता है कि इनमें से कौन-सी कोशिकाएँ वास्तव में किसी व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने एक नया रास्ता दिया। अब वैज्ञानिक किसी विशेष प्रकार के न्यूरॉन्स को चुन सकते हैं और फिर उन्हें सक्रिय कर सकते हैं। या उन्हें शांत कर सकते हैं।

फिर वे देख सकते हैं कि जीव के व्यवहार में क्या परिवर्तन होता है। इस तरह सहसंबंध से आगे बढ़कर कारण और प्रभाव को समझना संभव हुआ। यही कारण है कि नोबेल समिति ने ऑप्टोजेनेटिक्स को मस्तिष्क के अध्ययन में एक नए युग की शुरुआत माना है।

स्मृति, भावनाएँ और व्यवहार

हमारा मस्तिष्क केवल सूचनाओं को संग्रहित करने वाली मशीन नहीं है। यह हमारी स्मृतियों को बनाता है। भावनाओं को जन्म देता है। भय और आनंद जैसे अनुभवों को संसाधित करता है। हमारे व्यवहार को नियंत्रित करता है।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने वैज्ञानिकों को इन प्रक्रियाओं में शामिल विशिष्ट न्यूरल सर्किटों का अध्ययन करने का अभूतपूर्व अवसर दिया। वैज्ञानिक अब यह जाँच सकते हैं कि किसी विशेष न्यूरॉन्स के समूह को सक्रिय करने पर कोई विशिष्ट व्यवहार उत्पन्न होता है या नहीं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष न्यूरल सर्किट की गतिविधि किसी स्मृति से जुड़ी है, तो वैज्ञानिक प्रकाश की सहायता से उस सर्किट को नियंत्रित करके यह समझने का प्रयास कर सकते हैं कि स्मृति वास्तव में किस प्रकार बनती और पुनः सक्रिय होती है।

इसी तरह भावनाओं और व्यवहार से जुड़े न्यूरल सर्किटों का अध्ययन भी संभव हुआ है।

मानसिक और न्यूरोलॉजिकल रोगों को समझने की नई राह

ऑप्टोजेनेटिक्स का महत्व केवल मस्तिष्क को समझने तक सीमित नहीं है। मस्तिष्क से संबंधित अनेक रोगों में न्यूरॉन्स की गतिविधि असामान्य हो जाती है। पार्किंसन रोग, मिर्गी, अवसाद और अन्य न्यूरोलॉजिकल तथा मनोरोग संबंधी विकारों को समझने में यह तकनीक वैज्ञानिकों को नए प्रयोग करने की अनुमति देती है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऑप्टोजेनेटिक्स स्वयं इन सभी रोगों का स्थापित उपचार नहीं है। इसका सबसे बड़ा वर्तमान योगदान रोग की जैविक प्रक्रियाओं और न्यूरल सर्किटों को समझने के लिए शोध उपकरण के रूप में है।

लेकिन विज्ञान का इतिहास बताता है कि किसी रोग की मूल प्रक्रिया को बेहतर समझना अक्सर भविष्य के उपचारों की नींव बनता है।

क्या प्रकाश से मनुष्य की आँखों की रोशनी लौटाई जा सकती है?

यहाँ ऑप्टोजेनेटिक्स की एक और रोमांचक संभावना सामने आती है। वैज्ञानिक इस तकनीक का उपयोग दृष्टि बहाल करने की दिशा में भी शोध कर रहे हैं।

यदि आँख की कुछ कोशिकाएँ प्रकाश को ठीक से ग्रहण नहीं कर पातीं, तो सैद्धांतिक रूप से दूसरी कोशिकाओं को प्रकाश-संवेदनशील बनाने की कोशिश की जा सकती है। इसी विचार ने दृष्टिबाधित लोगों में दृष्टि बहाल करने के संभावित उपचारों की दिशा में शोध को प्रेरित किया है।

नोबेल समिति के अनुसार, ऑप्टोजेनेटिक तकनीकों का उपयोग दृश्य क्षमता में कमी वाले लोगों की दृष्टि बहाल करने के प्रयासों में भी किया जा रहा है।

तीन वैज्ञानिकों का योगदान—एक वैज्ञानिक यात्रा

इस नोबेल पुरस्कार की खूबसूरती यह है कि यह किसी एक प्रयोग का पुरस्कार नहीं है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक यात्रा का सम्मान है जिसमें अलग-अलग चरणों पर तीन वैज्ञानिकों के योगदान एक-दूसरे से जुड़े।

पीटर हेगेमैन ने यह समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि एककोशिकीय शैवाल प्रकाश को किस तरह महसूस करता है।

जॉर्ज नागेल के साथ मिलकर उन्होंने चैनलरोडोप्सिन(Channelrhodopsin) जैसे प्रकाश-सक्रिय आयन चैनलों की प्रकृति और क्षमता को समझा।

फिर कार्ल डिसेरोथ ने इस खोज को न्यूरॉन्स तक पहुँचाया और दिखाया कि इस प्रकार के प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों का उपयोग करके तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस प्रकार एक सूक्ष्म शैवाल की प्रकाश-संवेदनशीलता से शुरू हुई कहानी जीवित मस्तिष्क में न्यूरॉन्स को नियंत्रित करने वाली तकनीक तक पहुँच गई।

यह विज्ञान के इतिहास में उन खूबसूरत यात्राओं में से एक है जहाँ एक मूलभूत प्रश्न, “एक छोटा जीव प्रकाश को कैसे पहचानता है?” अंततः मानव मस्तिष्क के सबसे गहरे रहस्यों को समझने का उपकरण बन जाता है।

प्रकाश, आनुवंशिकी और मस्तिष्क का संगम

ऑप्टोजेनेटिक्स की विशेषता केवल यह नहीं है कि इसमें प्रकाश का इस्तेमाल होता है।

इसमें तीन अलग-अलग क्षेत्रों का असाधारण मेल दिखाई देता है :

आनुवंशिकी, जो यह तय करने में मदद करती है कि कौन-सी कोशिका प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनेगी।

प्रकाशिकी, जो उस कोशिका को नियंत्रित करने के लिए प्रकाश उपलब्ध कराती है।

और

न्यूरोसाइंस, जो यह समझने का प्रयास करती है कि उन कोशिकाओं की गतिविधि से मस्तिष्क का व्यवहार कैसे बदलता है।

यही अंतरविषयकता इस तकनीक को इतना शक्तिशाली बनाती है।

मस्तिष्क—अब केवल एक “ब्लैक बॉक्स” नहीं

लंबे समय तक मस्तिष्क वैज्ञानिकों के लिए लगभग एक ब्लैक बॉक्स था। हम जानते थे कि मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग कार्यों से जुड़े हैं, लेकिन अंदर चलने वाली सूक्ष्म गतिविधियों को समझना अत्यंत कठिन था।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने इस ब्लैक बॉक्स में एक नई खिड़की खोल दी है। अब वैज्ञानिक अधिक सटीकता से पूछ सकते हैं, कौन-सा न्यूरॉन सक्रिय हुआ? किस समय सक्रिय हुआ? किस दूसरे न्यूरॉन को उसने संकेत भेजा? उस गतिविधि से कौन-सा व्यवहार उत्पन्न हुआ?

और यदि उसी न्यूरॉन को फिर से सक्रिय किया जाए तो क्या वही व्यवहार दोबारा उत्पन्न होगा?

ऐसे प्रश्न मस्तिष्क विज्ञान को केवल निरीक्षण से आगे ले जाकर प्रयोगात्मक कारण-कार्य संबंधों की ओर ले जाते हैं।

भविष्य की ओर

आज ऑप्टोजेनेटिक्स मुख्यतः एक शोध तकनीक है, लेकिन इसके प्रभाव पहले ही प्रयोगशालाओं से बहुत आगे पहुँच चुके हैं।

भविष्य में प्रकाश-सक्रिय जैविक प्रणालियों और न्यूरल इंटरफेस का संयोजन मस्तिष्क तथा तंत्रिका तंत्र से जुड़े रोगों के उपचार के नए रास्ते खोल सकता है।

दृष्टि बहाली, न्यूरोलॉजिकल विकारों की समझ, मस्तिष्क के विशिष्ट सर्किटों का अध्ययन और अत्यधिक लक्षित न्यूरोमॉड्यूलेशन, ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें इस खोज का प्रभाव दिखाई दे रहा है।

लेकिन शायद इसका सबसे बड़ा योगदान किसी एक बीमारी का इलाज नहीं है।

इसका सबसे बड़ा योगदान है :मस्तिष्क को समझने की हमारी क्षमता में क्रांतिकारी वृद्धि।

एक छोटे शैवाल से मानव मस्तिष्क तक

विज्ञान अक्सर सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। कभी-कभी एक वैज्ञानिक किसी ऐसे प्रश्न का पीछा करता है जिसका तत्काल कोई चिकित्सकीय महत्व दिखाई नहीं देता।

पीटर हेगेमैन ने यह समझने की कोशिश की कि एक छोटा-सा शैवाल प्रकाश की दिशा कैसे पहचानता है। जॉर्ज नागेल के साथ उस प्रश्न की खोज ने प्रकाश-सक्रिय आयन चैनलों की दुनिया खोली। कार्ल डिसेरोथ ने उसी ज्ञान को तंत्रिका कोशिकाओं तक पहुँचाया।

और परिणामस्वरूप मानवता के पास मस्तिष्क के अध्ययन के लिए एक ऐसा उपकरण आया जिसने न्यूरोसाइंस को बदल दिया। यह कहानी हमें विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सबक भी देती है :

मूलभूत विज्ञान का महत्व हमेशा तत्काल दिखाई नहीं देता।

कभी-कभी किसी छोटे जीव की कोशिका में छिपा एक प्रोटीन दशकों बाद मानव मस्तिष्क के सबसे बड़े रहस्यों को समझने की चाबी बन जाता है। 2026 का नोबेल पुरस्कार इसी वैज्ञानिक यात्रा को सलाम करता है।

प्रकाश की एक किरण ने कोशिका का दरवाजा खोला—और उसी दरवाजे से वैज्ञानिक मानव मस्तिष्क के भीतर प्रवेश करने लगे।

विजेता वैज्ञानिको के बारे में

कार्ल डेइसेरोथ, जन्म 1971 : स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, USA से 1998 में Ph.D. और 2000 में MD की डिग्री ली। हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, USA में D.H. चेन प्रोफेसर, बायोइंजीनियरिंग और साइकियाट्री एंड बिहेवियरल साइंसेज के प्रोफेसर हैं।

पीटर हेगेमैन, जन्म 1954: मैक्स-प्लैंक-इंस्टीट्यूट फॉर बायोकेमिस्ट्री, मार्टिंसरीड, जर्मनी से 1984 में Ph.D. की। हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्लिन, जर्मनी में न्यूरोसाइंस के हर्टी सीनियर प्रोफेसर हैं। पुरस्कार के लिए चुनी गई खोजें मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोकेमिस्ट्री, मार्टिंसरीड, जर्मनी में की गई थीं।

जॉर्ज नागेल, जन्म 1953: फ्रैंकफर्ट यूनिवर्सिटी, जर्मनी से 1988 में Ph.D. की। यूनिवर्सिटी ऑफ़ वुर्ज़बर्ग, जर्मनी में मॉलिक्यूलर प्लांट फिजियोलॉजी और बायोफिजिक्स – बॉटनी I विभाग में मॉलिक्यूलर प्लांट फिजियोलॉजी के प्रोफेसर हैं। पुरस्कार के लिए चुनी गई खोजें मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोफिजिक्स, फ्रैंकफर्ट, जर्मनी में की गई थीं।

क्या आप जानते हैं?

  • 1901 से अब तक चिकित्सा नोबेल (फिजियोलॉजी या मेडिसिन) में 115 नोबेल पुरस्कार प्रदान किए जा चुके हैं।
  • अब तक 12 महिलाओं को चिकित्सा नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
  • अब तक के सबसे कम उम्र के चिकित्सा नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रेडरिक जी बैंटिंग की उम्र 32 वर्ष थी, जिन्हें इंसुलिन की खोज के लिए 1923 में चिकित्सा नोबेलपुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • अब तक के सबसे उम्रदराज़ चिकित्सा नोबेल पुरस्कार विजेता पीटन राउज़ की उम्र 87 वर्ष थी, जब उन्हें ट्यूमर-उत्प्रेरण वायरस की खोज के लिए 1966 में चिकित्सा नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन कौन करता है?

अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी अंतिम वसीयत में नोबेल पुरस्कार देने के लिए निर्णय लेनेवालों संस्थानों को नामित किया था।

  • भौतिकी और रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार के लिए रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज
  • फिजियोलॉजी या मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार के लिए करोलिंस्का इंस्टीट्यूट
  • साहित्य में नोबेल पुरस्कार के लिए स्वीडिश अकादमी
  • नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉर्वेजियन संसद (स्टॉर्टिंग) द्वारा चुनी जाने वाली पांच व्यक्तियों की एक समिति।

1968 में, स्वेरिजेस रिक्सबैंक ने अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में अर्थशास्त्र में स्वेरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार की स्थापना की। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज को 1969 से शुरू होने वाले अर्थशास्त्र में पुरस्कार विजेताओं का चयन करने का काम दिया गया था।

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