माइकल फैराडे: प्रयोगशाला के उस जादूगर की कहानी जिसने बिजली को दुनिया की ताकत बना दिया


उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बिजली और चुंबकत्व आज की तरह समझे हुए विज्ञान नहीं थे। बिजली कभी रहस्यमय चिंगारी थी, तो चुंबक एक विचित्र प्राकृतिक पदार्थ। यह स्पष्ट नहीं था कि बिजली और चुंबकत्व के बीच कोई गहरा संबंध है। इसी दौर में एक साधारण परिवार में जन्मे एक ऐसे व्यक्ति ने विज्ञान की दुनिया में कदम रखा, जिसके पास न विश्वविद्यालय की डिग्री थी, न किसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान की औपचारिक शिक्षा। उसके पास था—असीम जिज्ञासा, प्रयोग करने का जुनून और प्रकृति को अपने हाथों से समझने की अद्भुत क्षमता।

उस व्यक्ति का नाम था माइकल फैराडे (Michael Faraday)

फैराडे ने विद्युतचुंबकत्व और विद्युत-रसायन के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग किए जिन्होंने आधुनिक विद्युत युग की नींव रखी। आज बिजली पैदा करने वाले जनरेटर, विद्युत मोटर, ट्रांसफॉर्मर और अनेक विद्युत उपकरण जिन सिद्धांतों पर काम करते हैं, उनमें फैराडे के प्रयोगों की केंद्रीय भूमिका है।

लेकिन फैराडे की कहानी केवल वैज्ञानिक खोजों की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी भी है जिसने औपचारिक शिक्षा की सीमाओं को पार कर अपनी जिज्ञासा और प्रयोगशीलता के बल पर विज्ञान के इतिहास में अमिट स्थान बनाया।

एक साधारण परिवार में जन्म

माइकल फैराडे का जन्म 22 सितंबर 1791 को लंदन के निकट न्यूइंगटन बट्स में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था। उनके पिता जेम्स फैराडे एक लोहार थे और परिवार को जीवन चलाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

फैराडे की औपचारिक शिक्षा बहुत सीमित रही। उन्होंने स्कूल में बुनियादी पढ़ाई की, लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर उन्हें नहीं मिला।

लगभग तेरह वर्ष की उम्र में उन्होंने एक पुस्तक विक्रेता और जिल्दसाज के यहाँ काम करना शुरू किया। यही काम उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। पुस्तकों को जिल्द में बांधते समय फैराडे के हाथों से विज्ञान की अनेक पुस्तकें गुजरती थीं। वे केवल पुस्तकें बांधते नहीं थे, उन्हें पढ़ते भी थे।

विज्ञान उनके लिए किसी विश्वविद्यालय की कक्षा में पढ़ाया जाने वाला विषय नहीं था। वह उनके लिए एक ऐसी पहेली थी जिसे वे स्वयं सुलझाना चाहते थे। विशेष रूप से बिजली, रसायन और प्राकृतिक दर्शन से जुड़ी पुस्तकों ने उन्हें आकर्षित किया।

धीरे-धीरे उनके भीतर यह इच्छा पैदा हुई कि वे केवल विज्ञान के बारे में पढ़ें नहीं, बल्कि स्वयं प्रयोग करें।

रॉयल इंस्टीट्यूशन तक पहुँचने की कहानी

फैराडे के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर हम्फ्री डेवी (Humphry Davy) के व्याख्यान सुने। डेवी उस समय ब्रिटेन के प्रमुख रसायनज्ञों में से एक थे और लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूशन में व्याख्यान देते थे।

फैराडे ने उनके व्याख्यानों के विस्तृत नोट्स बनाए। उन्होंने उन नोट्स को व्यवस्थित करके एक पुस्तक के रूप में तैयार किया और डेवी को भेज दिया। यह केवल प्रशंसा पाने की कोशिश नहीं थी। फैराडे वास्तव में प्रयोगशाला में काम करना चाहते थे। कुछ समय बाद उन्हें रॉयल इंस्टीट्यूशन में डेवी के सहायक के रूप में काम करने का अवसर मिला।

यहीं से फैराडे के वैज्ञानिक जीवन की वास्तविक शुरुआत हुई। दिलचस्प बात यह है कि जिस व्यक्ति ने विश्वविद्यालय में विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, वही आगे चलकर दुनिया के महानतम प्रयोगात्मक वैज्ञानिकों में गिना जाने लगा।

फैराडे और रसायन विज्ञान

फैराडे की प्रसिद्धि केवल बिजली और चुंबकत्व तक सीमित नहीं थी। उन्होंने रसायन विज्ञान में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने गैसों और रासायनिक पदार्थों पर प्रयोग किए तथा बेंजीन (benzene) की खोज की, जो आधुनिक कार्बनिक रसायन विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण यौगिक है।

बाद में बेंजीन पेट्रोकेमिकल उद्योग, प्लास्टिक, दवाइयों, रंगों और अनेक रासायनिक उत्पादों के निर्माण में महत्वपूर्ण आधार बना।

फैराडे ने द्रवीभूत गैसों और पदार्थों के व्यवहार का भी अध्ययन किया। लेकिन उनकी वैज्ञानिक यात्रा का सबसे प्रसिद्ध अध्याय अभी शुरू होना था,बिजली और चुंबकत्व का संबंध।

बिजली और चुंबक का अद्भुत संबंध

1820 में डेनमार्क के वैज्ञानिक हैंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया था। उन्होंने देखा कि जब किसी तार में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसके पास रखा चुंबकीय कंपास अपनी दिशा बदल देता है।

इसका अर्थ था कि विद्युत धारा किसी प्रकार चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करती है।

यह खोज वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत रोमांचक थी। यदि बिजली से चुंबकीय प्रभाव पैदा किया जा सकता है, तो क्या चुंबक से बिजली पैदा की जा सकती है?

यही प्रश्न फैराडे के मन में था। और इसी प्रश्न ने आधुनिक विद्युत उत्पादन की दिशा बदल दी।

विद्युत मोटर की दिशा में पहला कदम

फैराडे ने विद्युत धारा और चुंबकीय क्षेत्र के बीच परस्पर क्रिया का अध्ययन किया। 1821 में उन्होंने ऐसा उपकरण बनाया जिसमें विद्युत धारा और चुंबकीय क्षेत्र की परस्पर क्रिया से यांत्रिक गति उत्पन्न हुई।

इसे विद्युत मोटर के शुरुआती रूपों में गिना जाता है। यह विचार आज हमें बहुत साधारण लगता है।

लेकिन उस समय यह एक क्रांतिकारी विचार था:

विद्युत ऊर्जा → यांत्रिक गति

आज पंखे, पंप, वॉशिंग मशीन, औद्योगिक मशीनें, इलेक्ट्रिक वाहन और असंख्य उपकरण इसी व्यापक सिद्धांत के विभिन्न रूपों पर आधारित हैं।

फैराडे ने दिखाया कि बिजली केवल चिंगारी पैदा करने वाली चीज नहीं है; वह काम कर सकती है।

1831: वह प्रयोग जिसने विद्युत युग की नींव रखी

यदि फैराडे के जीवन में किसी एक वर्ष को सबसे महत्वपूर्ण कहा जाए, तो वह था 1831। फैराडे ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना खोजी, विद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)। उन्होंने पाया कि बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र किसी चालक में विद्युत धारा उत्पन्न कर सकता है।

सरल शब्दों में:

बदलता चुंबकीय क्षेत्र → विद्युत धारा

यह खोज बिजली के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ थी। अब वैज्ञानिकों के पास बिजली पैदा करने का एक व्यावहारिक सिद्धांत था। फैराडे ने लोहे की एक रिंग के चारों ओर तार की कुंडलियाँ लपेटकर प्रयोग किए। एक कुंडली में धारा प्रवाहित करने पर दूसरी कुंडली में क्षणिक विद्युत धारा उत्पन्न हुई।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्थिर चुंबकीय प्रभाव पर्याप्त नहीं था। परिवर्तन आवश्यक था। जब चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तब विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।

इसी घटना को आज हम विद्युतचुंबकीय प्रेरण कहते हैं।

फैराडे का डिस्क जनरेटर

उसी वर्ष फैराडे ने एक और शानदार प्रयोग किया। उन्होंने एक तांबे की डिस्क को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाकर विद्युत धारा उत्पन्न की। यह उपकरण फैराडे डिस्क (Faraday disk) या होमोपोलर जनरेटर (homopolar generator) के नाम से जाना जाता है।

इस प्रयोग ने पहली बार स्पष्ट रूप से दिखाया कि:

यांत्रिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा

अब विद्युत मोटर और जनरेटर की मूल अवधारणाएँ सामने थीं। एक ओर विद्युत से गति उत्पन्न की जा सकती थी। दूसरी ओर गति से बिजली पैदा की जा सकती थी। यहीं से आधुनिक विद्युत ऊर्जा प्रणाली की वैचारिक नींव तैयार हुई।

जनरेटर: फैराडे की विरासत

आज जब किसी विद्युत संयंत्र में टर्बाइन घूमती है और उससे बिजली उत्पन्न होती है, तो उसके पीछे फैराडे का वही सिद्धांत काम करता है।

चाहे टर्बाइन को:

  • कोयले से गर्म किए गए पानी की भाप घुमाए,
  • परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न भाप घुमाए,
  • किसी जलविद्युत बाँध का पानी घुमाए,
  • हवा से पवन टर्बाइन घूमे,

मूल ऊर्जा रूपांतरण में विद्युतचुंबकीय प्रेरण की भूमिका रहती है।

यांत्रिक घूर्णन → चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन → विद्युत ऊर्जा

इसलिए फैराडे को आधुनिक विद्युत उत्पादन के बौद्धिक संस्थापकों में गिना जाता है।

फैराडे का नियम

विद्युतचुंबकीय प्रेरण की खोज को आगे चलकर गणितीय रूप में व्यक्त किया गया। इसे आज फैराडे का विद्युत चुंबकीय प्रेरण का नियम (Faraday’s law of electromagnetic induction) कहा जाता है।

सरल रूप में:E=dΦBdt\mathcal{E} = -\frac{d\Phi_B}{dt}

जहाँ E\mathcal{E} प्रेरित विद्युत वाहक बल है और ΦB\Phi_B चुंबकीय फ्लक्स है।

समीकरण में उपस्थित ऋणात्मक चिह्न लेंज का नियम( Lenz’s law) से संबंधित दिशा को दर्शाता है : लेंज का नियम बताता है कि किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा (Induced Current) की दिशा हमेशा उस कारण या परिवर्तन का विरोध करती है जिसके कारण वह स्वयं उत्पन्न होती है।

फैराडे ने स्वयं आधुनिक गणितीय भाषा में इस नियम को नहीं लिखा था। उनका योगदान मुख्यतः अत्यंत सूक्ष्म प्रयोगों और भौतिक अंतर्दृष्टि में था। बाद के वैज्ञानिकों ने उनके प्रयोगात्मक निष्कर्षों को गणितीय रूप दिया।

यहीं फैराडे की वैज्ञानिक शैली की विशेषता दिखाई देती है।

फैराडे और विद्युत क्षेत्र की अवधारणा

फैराडे का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान था—field अर्थात क्षेत्र की अवधारणा को भौतिक सोच के केंद्र में लाना। उनके लिए चुंबक के चारों ओर केवल कोई अदृश्य “खींचने वाली शक्ति” नहीं थी। उन्होंने चुंबकीय प्रभाव को क्षेत्र के रूप में समझने और प्रदर्शित करने की कोशिश की।

लोहे के बुरादे पर चुंबक रखने से बनने वाली रेखाओं को हम आज  चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं (magnetic field lines) के रूप में देखते हैं। ये वास्तविक भौतिक तार नहीं हैं। वे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और संरचना को समझाने का एक उपयोगी तरीका हैं।

फैराडे ने वैद्युत/चुंबकीय बल रेखाएँ (lines of force) की कल्पना के माध्यम से ऐसी भौतिक तस्वीर प्रस्तुत की, जिसने बाद में भौतिकी की दिशा बदल दी।

जेम्स क्लर्क मैक्सवेल और फैराडे

फैराडे गणितज्ञ नहीं थे। दूसरी ओर, बाद की पीढ़ी में जेम्स क्लार्क़े मैक्सवेल(James Clerk Maxwell) जैसे महान गणितीय भौतिक विज्ञानी आए। मैक्सवेल ने फैराडे की क्षेत्र संबंधी अवधारणाओं को गणितीय रूप दिया। आगे चलकर मैक्सवेल के समीकरणों ने विद्युत और चुंबकत्व को एकीकृत सिद्धांत में बदल दिया।

इस तरह फैराडे की प्रयोगात्मक अंतर्दृष्टि और मैक्सवेल के गणितीय ढाँचे ने मिलकर आधुनिक विद्युतचुंबकीय सिद्धांत की नींव रखी।

यह विज्ञान के इतिहास में एक सुंदर उदाहरण है कि कभी-कभी प्रयोगशाला में विकसित एक सहज भौतिक विचार दशकों बाद अत्यंत शक्तिशाली गणितीय सिद्धांत का आधार बन सकता है।

फैराडे और विद्युत-रसायन

फैराडे का एक अन्य महान क्षेत्र था विद्युत रसायन (electrochemistry), अर्थात बिजली और रासायनिक परिवर्तन के बीच संबंध। उन्होंने इलेक्ट्रोलिसिस का गहन अध्ययन किया और ऐसे नियम प्रस्तुत किए जिन्हें आज फैराडे का विद्युत अपघटन का नियम (Faraday’s laws of electrolysis) कहा जाता है।

उन्होंने यह समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया कि विद्युत धारा किसी इलेक्ट्रोलाइट में रासायनिक पदार्थ की मात्रा को किस प्रकार प्रभावित करती है।

विद्युत-रसायन में प्रयुक्त कई मूलभूत शब्दों को लोकप्रिय बनाने में भी उनका योगदान रहा, जैसे: आयन , इलेक्ट्रोड, इलेक्ट्रोलाइट एनोड और कैथोड

इन शब्दों का इस्तेमाल आज स्कूल की प्रयोगशाला से लेकर बैटरी, ईंधन सेल और औद्योगिक इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रियाओं तक होता है।

फैराडे का पिंजरा: Faraday Cage

फैराडे के नाम से जुड़ी एक और प्रसिद्ध अवधारणा है: फैराडे पिंजरा (Faraday cage)।

जब किसी बंद चालक संरचना पर विद्युत आवेश मौजूद होता है, तो विद्युत क्षेत्र के वितरण के कारण संरचना के अंदर का क्षेत्र बाहरी विद्युत प्रभावों से काफी हद तक सुरक्षित किया जा सकता है। इसी सिद्धांत पर आधारित संरचनाओं को फैराडे केज कहा जाता है।

आज इस सिद्धांत के अनेक उपयोग हैं: कारों और विमानों में विद्युतचुंबकीय सुरक्षा के कुछ पहलू, संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा, प्रयोगशालाओं में विद्युतचुंबकीय परिरक्षण (electromagnetic shielding) और कई औद्योगिक अनुप्रयोग।

यह एक बार फिर दिखाता है कि फैराडे के प्रयोग केवल उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिक प्रयोग नहीं थे, उनके विचार आधुनिक तकनीक में जीवित हैं।

प्रकाश और चुंबकत्व

1845 में फैराडे ने एक और महत्वपूर्ण घटना खोजी जिसे आज फैराडे प्रभाव (Faraday effect) कहा जाता है। उन्होंने पाया कि चुंबकीय क्षेत्र किसी पदार्थ से गुजरने वाले प्रकाश के ध्रुवण की अवस्था को प्रभावित कर सकता है।

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे प्रकाश, विद्युत और चुंबकत्व के बीच गहरे संबंध की ओर संकेत मिला। बाद में विद्युतचुंबकीय सिद्धांत के विकास ने इन संबंधों को और स्पष्ट किया। आज फैराडे प्रभाव का उपयोग , प्रकाशिय संचार (optical communication), संवेदन (sensing) और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में किया जाता है।

फैराडे की प्रयोगशाला: जहाँ विज्ञान जनता के लिए भी था

फैराडे केवल वैज्ञानिक नहीं थे; वे विज्ञान के अद्भुत शिक्षक भी थे। रॉयल इंस्टीटूशन (Royal Institution) में उन्होंने विज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाने के लिए लोकप्रिय व्याख्यान दिए।

उनकी सबसे प्रसिद्ध परंपराओं में से एक थी क्रिसमस व्याख्यायन(Christmas Lectures)। उन्होंने बच्चों और सामान्य दर्शकों के सामने कठिन वैज्ञानिक विचारों को प्रयोगों के माध्यम से समझाया।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक The Chemical History of a Candle उनके व्याख्यानों पर आधारित थी। मोमबत्ती जैसी साधारण वस्तु को लेकर उन्होंने दहन, गैसों, रासायनिक परिवर्तन और पदार्थ के संरक्षण जैसे विचारों को समझाया।

उनका संदेश था कि विज्ञान केवल प्रयोगशाला में बंद विषय नहीं है। प्रकृति हमारे आसपास मौजूद है, बस उसे ध्यान से देखने की आवश्यकता है।

फैराडे का वैज्ञानिक दर्शन

फैराडे की सबसे बड़ी ताकत उनकी प्रयोगात्मक सोच थी। वे केवल किसी सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। वे उसे प्रयोग करके देखना चाहते थे। उनकी कार्यशैली में कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं:

प्रश्न पूछना।

प्रयोग करना।

परिणाम को ध्यान से देखना।

गलत परिणाम को भी स्वीकार करना।

फिर नए प्रयोग से प्रश्न को दोबारा परखना।

उनका विज्ञान अत्यधिक जटिल गणित पर निर्भर नहीं था। वे भौतिक घटनाओं की कल्पना और प्रयोगात्मक प्रदर्शन में असाधारण रूप से सक्षम थे। यही कारण है कि फैराडे को इतिहास के महानतम प्रायोगिक भौतिक वैज्ञानिक (experimental physicists) में गिना जाता है।

फैराडे और सम्मान

फैराडे की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ इतनी बड़ी थीं कि वे अपने समय के अत्यंत सम्मानित वैज्ञानिक बन गए। उन्हें अनेक सम्मान और प्रतिष्ठित पदों के प्रस्ताव मिले। लेकिन उनकी व्यक्तिगत जीवनशैली अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रही। उनकी प्राथमिकता वैज्ञानिक खोज और प्रयोग थे।

वे रॉयल इंस्टीटूशन (Royal Institution) से लंबे समय तक जुड़े रहे और जीवन के अंतिम वर्षों तक विज्ञान से उनका संबंध बना रहा।

जीवन के अंतिम वर्षों में फैराडे का स्वास्थ्य कमजोर होने लगा। फिर भी वे विज्ञान से पूरी तरह अलग नहीं हुए।

उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा Royal Institution में बिताया। 25 अगस्त 1867 को लंदन के हैम्पटन कोर्ट (Hampton Court) क्षेत्र में उनका निधन हुआ। उन्हें वेस्ट मिन्स्टर एबी (Westminster Abbey) में दफनाने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें अपेक्षाकृत सादे तरीके से हाईगेट सिमेट्री (Highgate Cemetery) में दफनाया गया।

फैराडे की विरासत

आज फैराडे का नाम विज्ञान की अनेक अवधारणाओं में जीवित है:

फैराड (Farad) : विद्युत धारिता की SI इकाई।

फैराडे स्थिरांक (Faraday constant) : इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री में महत्वपूर्ण स्थिरांक।

फैराडे नियम Faraday’s law : विद्युतचुंबकीय प्रेरण का मूल नियम।

फैराडे प्रभाव (Faraday effect) : प्रकाश और चुंबकीय क्षेत्र के बीच प्रभाव।

फैराडे पिंजरा (Faraday cage) : विद्युतचुंबकीय shielding की महत्वपूर्ण अवधारणा।

लेकिन फैराडे की सबसे बड़ी विरासत इनमें से कोई एक इकाई या नियम नहीं है। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह विचार है कि प्रकृति को समझने के लिए जिज्ञासा, प्रयोग और धैर्य आवश्यक हैं।

एक मोमबत्ती से लेकर बिजली के युग तक

फैराडे की कहानी में एक अद्भुत विरोधाभास है। एक ओर वे सीमित औपचारिक शिक्षा वाले एक साधारण परिवार के युवक थे। दूसरी ओर उनके प्रयोगों ने आधुनिक विद्युत सभ्यता की नींव रखी।

आज हम बिजली के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। हमारे घरों में पंखे घूमते हैं, मोटरें चलती हैं, कंप्यूटर काम करते हैं, मोबाइल फोन चार्ज होते हैं, अस्पतालों की मशीनें चलती हैं, कारखाने उत्पादन करते हैं और विशाल विद्युत ग्रिड महाद्वीपों तक ऊर्जा पहुँचाते हैं। इन सबके पीछे विज्ञान के अनेक महान लोगों का योगदान है।

लेकिन उस कहानी के एक महत्वपूर्ण अध्याय पर यदि कोई नाम सबसे स्पष्ट रूप से लिखा दिखाई देता है, तो वह है

माइकल फैराडे।

उन्होंने बिजली को केवल एक रहस्यमय प्राकृतिक घटना के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने पूछा: क्या बिजली से गति पैदा की जा सकती है?

फिर पूछा : क्या गति से बिजली पैदा की जा सकती है?

और अंततः उनके प्रयोगों ने दोनों प्रश्नों का उत्तर दे दिया।

यही वह क्षण था जब बिजली ने प्रयोगशाला से निकलकर मानव सभ्यता की शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाया।

22 सितंबर 1791 को जन्मा वह साधारण जिल्दसाज का शागिर्द आधुनिक विद्युत युग के महान वास्तुकारों में से एक बन गया।

और शायद फैराडे की कहानी का सबसे सुंदर संदेश यही है—

महान वैज्ञानिक बनने के लिए हमेशा महान संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती; कभी-कभी एक जिज्ञासु मन, एक साधारण प्रयोगशाला और प्रकृति से सही प्रश्न पूछने का साहस ही पर्याप्त होता है।

इस लेख पर आपकी राय:(टिप्पणी माड़रेशन के कारण आपकी टिप्पणी/प्रश्न प्रकाशित होने मे समय लगेगा, कृपया धीरज रखें)