इंसुलिन का वह पहला इंजैक्शन


लेखक : देवेंन मेवाड़ी

आज के ही दिन 11 जनवरी, 1922 को इंसुलिन हार्मोन के खोजकर्त्ता सर फ्रेडरिक ग्रांट बैंटिंग और चार्ल्स बेस्ट ने दुनिया में पहली बार डायबिटीज से गंभीर रूप से पीड़ित 14-वर्षीय बालक लियोनार्ड थॉम्पसन को कनाडा के टोरंटों जनरल हास्पिटल में इंसुलिन का इंजेक्शन लगा कर उसकी जान बचाई थी।

कौन थे डा. बैंटिंग और चार्ल्स बेस्ट?

Frederick G Banting एंड Charles H Best 31 अक्टूबर सन् 1920। रात के दो बजे थे। वह एकाएक अपने बिस्तरे से कूद कर खड़ा हो गया और अपने काले रंग की डायरी खोज कर उसने लिखाः कुत्तों की अग्नाशयी नलिकाओं को बांधो। छः से आठ सप्ताह तक प्रतीक्षा करो। अलग करके सत्व बनाओ।

केवल तीन वाक्य। लेकिन, इन्हीं तीन वाक्यों के आधार पर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसी महान खोज हो सकी, जिसने दुनिया के करोड़ों लोगों को मौत के मुख से बाहर खींच निकाला। आज करोड़ों लोग इसी खोज के बल पर जी रहे हैं। दो बजे रात्रि को अपने बिस्तरे से कूद कर उठने वाला वह व्यक्ति था फ्रेडरिक ग्रांट बैंटिंग और इन तीन वाक्यों के आधार पर हुई ‘इंसुलिन’ नामक हॉर्मोन की खोज, जिसके बल पर आज अग्नाशयी मधुमेह उर्फ डायबिटीज मेलाइटस के अनगिनत रोगी पूरी जिंदगी जी रहे हैं। तब तक इस रोग का कोई उपचार नहीं था।

चित्रकारी तथा जासूसी कहानियां पढ़ने का शौकीन बैंटिंग अपने चिकित्सा विज्ञान के छात्रों से कहा करता था कि मेरी राय में तुम लोग शरलॉक होम्स पढ़ा करो। उसने हर एक चीज की जांच की, स्वयं प्रश्न किए, विश्लेषण किए और इस तरह रहस्यों का पता लगाया। वस्तुतः इस महान खोज में बैंटिंग ने भी यही किया। उन दिनों वह पश्चिमी टोरंटो विश्वविद्यालय के चिकित्सा कालेज में पढ़ा रहा था। 30 अक्टूबर 1920 की शाम को वह पुस्तकालय गया। अगले दिन उसे छात्रों को अग्नाशयी ग्रंथि के संबंध में पढ़ाना था। पुस्तकालय में उसने ‘सर्जरी, गाइनेकोलॉजी एंड आब्स्टीट्रिक्स’ शोध पत्रिका के नवंबर अंक को पलटा तो उसमें पहले ही शोध लेख पर उसकी नजर पड़ी। लेख था- डायबिटीज का लैंगरहैंस द्वीपिकाओं से संबंध, अग्नाशयी लिथियासिस की घटनाओं के विशेष संदर्भ सहित। शोध पत्रिका को बैंटिंग रात भर के लिए घर ले गया और उसी रात वह बिस्तरे से उठ खड़ा हुआ और उसने वे तीन वाक्य लिखे थे।

दूसरे दिन बैंटिंग ने अपने विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मिलर से इस बारे में बातचीत की और इस विषय पर खोज करने की इच्छा भी प्रकट की। चिकित्सा विज्ञान के बड़े-बड़े महारथी इस समस्या के सामने हार मान चुके थे, तब इस विषय पर वे बैंटिंग को कैसे खोज करने की राय देते। वे चाहते थे बैंटिंग उन्हें मस्तिष्क की सर्जरी में सहयोग दे। परंतु बैंटिंग की जिद को देख कर उन्होंने उसे टोरेंटो विश्वविद्यालय में शरीर-क्रिया विज्ञान विभाग के प्रमुख तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर मेकलिऑड से राय लेने की सलाह दी। उन्होंने भी मना कर दिया मगर बैंटिंग हतोत्साहित नहीं हुआ। बाद में कुछ प्रभावशाली लोगों की पहुंच के कारण उसे प्रयोगशाला के एक बेकार भाग में काम करने की अनुमति मिल गई। साथ ही खून में शर्करा की मात्रा मापने में दक्ष चार्ल्स बैस्ट नामक एक छात्र शोध सहायक भी मिल गया।

दोस्तों के लाख समझाने पर भी बैंटिंग इस्तीफा देकर, मकान बेच कर प्रयोगशाला में चला आया। उसकी प्रेमिका ने अपनी मंगनी तक तोड़ ली। बैंटिंग और बैस्ट मन से अपने प्रयोगों में जुट गए और प्रोफेसर मैकलिऑड यूरोप की सैर पर निकल गए। 6 जुलाई को उन दोनों ने दो कुत्तों को क्लोरोफॉर्म सुंघाया। सात सप्ताह पूर्व उन दोनों कुत्तों की अग्नाशयी नलिकाएं बांधी गईं थीं। कुत्तों का पेट खोल कर देखा गया तो वे बहुत दुखी हुए। अग्नाशय ज्यों के त्यों थे। मैकलिऑड ने जितना समय दिया था वह पूरा होने जा रहा था। बैंटिंग ने अपनी फोर्ड कार बेच कर कुछ कुत्ते तथा अन्य सामान खरीद लिया। इस बार उन्होंने रेशम की डोरियों से अग्नाशयी नलिकाओं को खूब कस कर बांध दिया। 27 जुलाई को उन्होंने एक कुत्ते को क्लोरोफॉर्म सुंघा कर उसका पेट खोला। अग्नाशय सिकुड़ कर एक तिहाई भर रह गया था। बैंटिंग ने अग्नाशय निकाल कर उसके टुकड़े-टुकड़े करके सत्व तैयार किया और मधुमेह से तड़प रहे एक दूसरे कुत्ते को उसकी सुई लगा दी। कुत्ते के शर्करामय खून में शर्करा का स्तर घटने लगा और धीरे-धीरे कुत्ता होश में आ गया।

यानी शरीर में शर्करा पर नियत्रंण करने वाले हॉर्मोन रसायन का पता लग गया। इसका नाम उन्होंने ‘आइलेटिन’ रख दिया। बाद में मैकलिऑड ने इसका नाम ‘इंसुलिन’ रखा। यही है वह हॉर्मोन हरकारा जो आपके शरीर में चीनी पर नियत्रंण रखता है और इसी की अनुपस्थिति में जानलेवा मधुमेह रोग हो जाता है। प्रारंभ में इंसुलिन की बहुत थोड़ी ही मात्रा तैयार हो सकी। बैंटिंग और बैस्ट ने तब अजन्मे बछड़ों और वयस्क पशुओं के अग्नाशयों से इसे काफी मात्रा में प्राप्त किया। टोरंटो जर्नल अस्पताल में तब पहली बार उन्होंने चौदह वर्षीय लियोनार्ड थॉम्पसन को इसी सत्व की सुई लगाई। छह सप्ताह बाद उसे बायोकैमिस्ट डाक्टर जेबी कोलिप द्वारा तैयार किए गए शोधित सत्व की सुई लगाई गई। लियोनार्ड के खून में शर्करा की मात्रा घट गई और उसका स्वास्थ्य सुधरता गया।

सन् 1923 में चिकित्सा विज्ञान के नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, लेकिन उसमें मैकलिऑड के बाद बैंटिंग का नाम था। बैंटिंग को इससे बहुत कष्ट हुआ और उसने नोबेल पुरस्कार ठुकरा दिया। बाद में बैंटिंग तथा मैकलिऑड क्रम में नाम की घोषणा पर उसने यह पुरस्कार तो स्वीकार किया परंतु बैस्ट का नाम नोबेल ट्रस्टी द्वारा न दिए जाने पर सार्वजनिक रूप से अपना रोष व्यक्त किया। बैंटिंग ने पुरस्कार के रूप में प्राप्त धनराशि बैस्ट के साथ बांट ली।

साभार : देवेंन मेवाड़ी सर

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