रिवो निग्रो तथा रिवो सोलिमोएस का संगम अंतरिक्ष से

दो नदीयों के संगम के बावजूद जल अलग अलग बहता है: विचित्र किंतु सत्य।


मनाउस ब्राजिल (Manaus, Brazil)मे दो नदीयाँ रिवो निग्रो(Rio Negro) तथा रिवो सोलिमोएस(Rio Solimões) का संगम होता है और वे मिलकर नीचली अमेजान(Lower Amazon) नदी का निर्माण करती है। लेकिन इन दोनो नदीयों का जल एक दूसरे मे विलिन होने से इंकार … पढ़ना जारी रखें दो नदीयों के संगम के बावजूद जल अलग अलग बहता है: विचित्र किंतु सत्य।

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?


सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)
सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य काफी विशाल है, बहुत ही विशाल। वह चौड़ाई मे पृथ्वी से सौ से भी ज्यादा गुणा है, उसके अंदर 10 लाख से ज्यादा पृथ्वीयाँ समा सकती है। यदि आप पृथ्वी और सूर्य को किसी ब्रह्माण्डीय तराजु पर तौले तो पायेंगे कि सूर्य पृथ्वी से 300,000 गुणा ज्यादा द्रव्यमान रखता है।

लेकिन सूर्य का द्रव्यमान कम हो रहा है। समय के साथ धीमे धीमे उसके द्रव्यमान मे ह्रास हो रहा है, यह दो तरह से हो रहा है, प्रथम है सौर वायु और द्वितीय है द्रव्यमान का ऊर्जा के रूप मे परिवर्तन जिससे सूर्य से प्रकाश और उष्मा का उत्सर्जन होता है।

सूर्य के द्रव्यमान मे उपरोक्त मे से किस विधि से द्रव्यमान ह्रास तेज गति से हो रहा है ? दोनो विधि को विस्तार से देखते है। पढ़ना जारी रखें “सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?”

महान विज्ञानी : निकोला टेस्ला


Tesla_circa_1890.jpegनिकोला टेस्ला (अंग्रेजी: Nikola Tesla; सर्बियाई सिरिलिक: Никола Тесла, 10 जुलाई 1856 – 7 जनवरी 1943) एक सर्बियाई अमेरिकी आविष्कारक, भौतिक विज्ञानी, यांत्रिक अभियन्ता, विद्युत अभियन्ता और भविष्यवादी थे। उनका थॉमस एडीसन के आविष्कारों में बहुत बड़ा योगदान रहा है। टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को ऑस्ट्रियन स्टेट (अब क्रोशिया) में हुआ था। बाद में उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली। उनके बारे में कहा जाता है कि वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को प्रकाश से सजाया। टेस्ला की प्रसिद्धि उनके आधुनिक प्रत्यावर्ती धारा (एसी) विद्युत आपूर्ति प्रणाली के क्षेत्र में दिये गये अभूतपूर्व योगदान के कारण है। टेस्ला के विभिन्न पेटेंट और सैद्धांतिक कार्य, बेतार संचार और रेडियो के विकास का आधार साबित हुये हैं। वैद्युत चुंबकत्व के क्षेत्र में किये गये उनके कई क्रांतिकारी विकास कार्य, माइकल फैराडे के विद्युत प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों पर आधारित थे।

जीवनयात्रा

टेस्ला का जन्म 10 जुलाई 1856 को सर्बियन मातापिता मिलुटिन टेस्ला और ड्युका टेस्ला के परिवार मे आस्ट्रीयन साम्राज्य(वर्तमान क्रोएशिया) मे हुआ था। 1870 मे निकोला टेस्ला ने कार्लोवैक के स्कूल मे प्रवेश लिया और उस स्कूल मे अपने गणित शिक्षक मार्टिन सेकुलिक से प्रभावित हुये थे। टेस्ला उस समय समाकलन(Integral Calculus) के प्रश्नो को अपने मन मे ही हल करने मे सक्षम थे। उनके शिक्षको को उन पर विश्वास नही होता था लेकिन उन्होने अपना चार वर्ष का अभ्यासक्रम तीन वर्षो मे ही पूरा कर लिया। 1875 मे उन्होने आस्ट्रीयन पालीटेक्निक मे प्रवेश लिया, और अपने प्रथम वर्ष मे उन्होने सभी कक्षाओं मे उपस्थित रहे, नौ परिक्षायें उतीर्ण की और सभी मे सर्वोत्तम संभव गुण प्राप्त किये। पढ़ना जारी रखें “महान विज्ञानी : निकोला टेस्ला”

भारत का लिएनार्दो दा विंची : होमी जहाँगीर भाभा


होमी जहाँगीर भाभाभारत के वैज्ञानिक सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण होमी जहाँगीर भाभा को भारत का लिएनार्दो दा  विंची कहा करते थे। अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी। वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं। “आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्पोरेरी हिस्ट्री” की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, “मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे। यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था। जानेमाने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था। उनका कहना है कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता। प्रोफ़ेसर यशपाल बताते हैं,

“संगीत में उनकी बहुत रुचि थी… चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत। किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए.. फ़र्नीचर कैसा बनना है.. हर चीज़ के बारे में बहुत गहराई से सोचते थे वह। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को कोलोकियम हुआ करता था और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम मिस किया हो। इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है।”

“एक प्रचलित कहावत है कि महापुरुष किसी परम्परागत पथ पर नहीं चलते बल्कि वह अपना लक्ष्य और पथ स्वयं तय करते हैं।” पढ़ना जारी रखें “भारत का लिएनार्दो दा विंची : होमी जहाँगीर भाभा”

ऊर्जा संकट : थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर


भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से समस्त विश्व जूझ रहा है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम ऊर्जा की चर्चा में आ गई है। इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है। थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और ‘ग्रीन(पर्यावरण हितैषी)’ है।

समस्त विश्व में थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और यह पूरी पृथ्वी पर लगभग हर जगह उपलब्ध है। किसी परमाणु भट्टी में सक्रिय होने के दौरान इसकी कुछ रासायनिक और भौतिक विशेषताएँ होती हैं जो इसे यूरेनियम से बेहतर बना देती है। परमाणु भट्टियों में थोरियम का प्रयोग यूरेनियम से अधिक सुरक्षित होंता है| जब कोई परमाणु रिएक्टर ज्यादा गर्म हो जाता है और ईंधन की छड़ें श्रृंखलाबद्ध में विस्फोटों का सिलसिला जारी नहीं रख पाती हैं और संकट जारी कहता है। यही फुकुशिमा में हुआ था। लेकिन अगर किसी थोरियम रिएक्टर में कुछ होता है तो तकनीशियन आसानी से उत्प्रेरक को बंद कर सकेंगे और इसकी प्रतिक्रिया ख़ुद ब ख़ुद रुक जाएगी। थोरियम बिना किसी मानवीय दख़ल के बंद हो जाएगा। आपको बस एक स्विच ऑफ़ करना होगा।

परमाणु भट्टियों में थोरियम अधिक सुरक्षित है और इसके ज़रिए बम बनाना भी तक़रीबन नामुमकिन है। ये वो महत्वपूर्ण वजहें हैं जिनकी वजह से दुनिया भविष्य के ईंधन की आपूर्ति की ओर देख रही है।

इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है।

क्या है थोरियम?

थोरियम (Thorium) आवर्त सारणी के ऐक्टिनाइड श्रेणी (actinide series) का प्रथम तत्व है। पहले यह चतुर्थ अंतर्वर्ती समूह (fourth transition group) का अंतिम तत्व माना जाता था, परंतु अब यह ज्ञात है कि जिस प्रकार लैथेनम (La) तत्व के पश्चात् 14 तत्वों की लैथेनाइड शृंखला (lanthanide series) प्रांरभ होती है, उसी प्रकार ऐक्टिनियम (Ac) के पश्चात् 14 तत्वों की दूसरी शृंखला आरंभ होती है, जिसे एक्टिनाइड शृंखला कहते हैं। थोरियम के अयस्क में केवल एक समस्थानिक(द्रव्यमान संख्या 232) पाया जाता है, जो इसका सबसे स्थिर समस्थानिक (अर्ध जीवन अवधि 1.4 x 1010 वर्ष) है। परंतु यूरेनियमरेडियम तथा ऐक्टिनियम अयस्कों में इसके कुछ समस्थानिक सदैव वर्तमान रहते हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 227, 228, 230, 231 तथा 234 हैं। इनके अतिरिक्त 224, 225, 226, 229 एवं 233 द्रव्यमान वाले समस्थानिक कृत्रिम उपायों द्वारा निर्मित हुए हैं।

थोरियम धातु की खोज 1828 ई में बर्ज़ीलियस ने थोराइट अयस्क में की थी। यद्यपि इसके अनेक अयस्क ज्ञात हैं, परंतु मोनेज़ाइट (monazite) इसका सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं, जिसमें थोरियम तथा अन्य विरल मृदाओं के फॉस्फेट रहते हैं। संसार में मोनेज़ाइट का सबसे बड़ा भंडार भारत के केरलराज्य में हैं। बिहार प्रदेश में भी थोरियम अयस्क की उपस्थिति ज्ञात हुई है। इनके अतिरिक्त मोनेज़ाइट अमरीका, आस्ट्रलिया, ब्राज़िल और मलाया में भी प्राप्त है। पढ़ना जारी रखें “ऊर्जा संकट : थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर”

'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।

चंद्रमा की उत्पत्ति की नयी अवधारणा


'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।
‘थिया’ ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।

चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में एक नया शोध सामने आया है। इसका मानना है कि अरबों साल पहले एक बड़ा ग्रह पृथ्वी से टकराया था। इस टक्कर के फलस्वरूप चंद्रमा का जन्म हुआ। शोधकर्ता अपने इस सिद्धांत के पीछे अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों के ज़रिये चंद्रमा से लाए गए चट्टानों के टुकड़ों का हवाला दे रहे हैं। इन चट्टानी टुकड़ों पर ‘थिया‘ नाम के ग्रह की निशानियां दिखती हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी खोज पुख़्ता करती है कि चंद्रमा की उत्पत्ति टक्कर के बाद हुए भारी बदलाव का नतीजा थी।

'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्तिये अध्ययन एक साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैसे ये कोई नया सिद्धांत नहीं है। ये पहले से माना जाता रहा है कि चंद्रमा का उदय खगोलीय टक्कर के परिणाम स्वरूप हुआ था। हालांकि एक दौर ऐसा भी आया जब कुछ लोग कहने लगे कि ऐसी कोई टक्कर हुई ही नहीं। लेकिन वर्ष 1980 से आसपास से इस सिद्धांत को स्वीकृति मिली हुई है कि 4.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी और थिया के बीच हुई टक्कर ने चंद्रमा की उत्पत्ति की थी। पढ़ना जारी रखें “चंद्रमा की उत्पत्ति की नयी अवधारणा”