स्ट्रींग सिद्धांत(String Theory) भाग 07 : विसंगतियों का निराकरण


इसके पहले के हम देख चुके है कि स्ट्रींग सिद्धांत सफलता पूर्वक गुरुत्वाकर्षण को क्वांटम सिद्धांत के साथ एकीकृत कर चुका है। लेकिन इसमे कुछ ऐसी विसंगतिया थी, जो इसे हास्यास्पद बनाती थी। इन विसंगतियो मे टेक्यान और 26 आयामो का अस्तित्व का समावेश है। स्ट्रींग सिद्धांत मे कुछ परिवर्तनो के साथ एक नये सिद्धांत का जन्म हुआ जिसे सुपरस्ट्रींग नाम दिया गया। लेकिन इस सिद्धांत को समझने से पहले हमे इतिहास मे जाकर दो और सिद्धांतो को समझना होगा, ये सिद्धांत है कालुजा़ केलिन का सुझाव(Kaluza-Klein Idea) तथा महासममीती (SuperSymettry)।

कालुजा़ केलिन का सुझाव
1920 मे जब क्वांटम भौतिकी का जन्म हो रहा था और उस समय विद्युत-चुंबकीय बल तथा गुरुत्वाकर्षण बल ही के बारे मे जानकारी थी। अन्य बल उस समय खोजे नही गये थे। इस समय दो वैज्ञानिको कालुजा़(Th. Kaluza) तथा आस्कर केलिन (Oskar Klein) ने स्वतंत्र रूप से यह महसूस किया कि हो ना हो विद्युत चुंबकिय बल तथा गुरुत्वाकर्षण बल का श्रोत एक ही मूलभूत बल है।

कालुजा और केलिन के सुझाव के अनुसार अंतराल मे तीन साधारण आयामो के अतिरिक्त भी आयामों का अस्तित्व है। सरलता के लिये चार आयामो को मानकर चलते है, इसमे एक आयाम अनंत रूप से विस्तारीत नही है जिससे हम उसे महसूस नही कर सकते है, उसके आरपार भ्रमण नही कर सकते है। यह चतुर्थ आयाम अपने आप मे ही लिपटा हुआ है। यह कुछ एक बंधी रस्सी पर चलते कलाबाज के जैसे है, यह कलाबाज आगे-पीछे ही जा सकता है, अर्थात एक ही आयाम मे गति कर सकता है। लेकिन उसी रस्सी पर एक चिंटी दो आयामो मे गति कर सकती है, आगे-पीछे और दायें-बायें। लेकिन चिटी यदि दायें या बायें गति करे तो वह चलकर उसी स्थान पर आ जायेगी जहां से उसने प्रारंभ किया था क्योंकि यह आयाम लिपटा हुआ है। अर्थात एक बंधी रस्सी मे दो आयाम है जिसमे से एक लिपटा हुआ है। कलाबाज एक ही आयाम महसूस कर सकता है लेकिन चिंटी दोनो आयाम महसूस कर सकती है।

कालुजा और केलीन ने प्रस्तावित किया कि यह विश्व चार आयामो वाला है और इसमे केवल गुरुत्वाकर्षण का अस्तित्व है, विद्युत-चुंबकीय बल का नही। उनकी गणनाओं के अनुसार इसमे से एक आयाम अपने आपमे लिपटा हुआ है, जिससे चार आयाम विश्व का स्पिन 2 का कण ग्रेवीटान, तीन आयाम के विश्व मे स्पिन 2(ग्रेवीटान) तथा स्पिन 1 (विद्युत-चुंबकीय) के कण मे बंट जाता है। यह दोनो कण भौतिक विश्व मे गुरुत्वाकर्षण और विद्युत-चुंबकीय बल की व्याख्या करने वाले समीकरणो को संतुष्ट भी करते है।

कालुजा और केलीन का यह सुझाव जिसमे एक/एक से ज्यादा आयामी दिशायें संक्षिप्त है, अगले कई दशकों तक चर्चा का विषय रहा। लेकिन यह सुझाव आइंस्टाइन के गुरुत्वाकर्षण और मेक्सवेल के विद्युत चुंबकीय बल के ही एक ही श्रोत होने की व्याख्या करता था, अन्य मूलभूत बल इसमे अनुपस्थित थे। इसमे इन वैज्ञानिको का कोई दोष नही था क्योंकि क्वांटम सिद्धांत अभी तक प्रकाश मे नही आया था। इसके अगले वर्षो मे कालुजा और केलीन के सुझाव के विकास मे सबसे बड़ी समस्या यह थी कि कोई भी क्वांटम सिद्धांत इस सुझाव को आगे बढाने मे असमर्थ था। क्वांटम सिद्धांत तीन आयामो मे ही गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या नही कर पाता है, तीन से ज्यादा आयामो के बारे मे सोचना अपनी जटिलता के कारण असंभव था। हम देख चुके है कि स्ट्रींग सिद्धांत मे यह समस्या अपने आप चली जाती है और इसमे क्वांटम गुरुत्व तथा उच्च अंतराल के आयामो की व्याख्या और गणना असंभव नही है।

कालुजा़ केलिन का सुझाव क्रांतिकारी सुझाव था लेकिन अन्य मूलभूत बलो तथा ढेर सारे कणो के चिड़ीयाघर की खोज के बाद यह सुझाव भुला दिया गया।

महासममीती (Supesymmetry)

महासममीती(Supersymmetry)

महासममीती(Supersymmetry)

1960 के दशक मे कण-त्वरक(particle-acclerator) नये कणो की खोज किये जा रहे थे, हर कुछ दिनो मे नये कण की खोज का समाचार आ रहा था। 1970 के दशक की शुरुवात मे इन कणो की संख्या कम करने के लिये एक नया महासममीती का प्रस्ताव आया। यह एक गणितिय रूपांतरण था जो पूर्णांक वाले कणो(बोसान) तथा अर्ध-पूर्णांक वाले कणो (फर्मीयान) के मध्य एक संबंध स्थापित करता था।

भौतिक वैज्ञानिकों के  अनुमानो के अनुसार हर मूलभूत कण का एक भारी बलवाहक “छाया” कण होना चाहीये है तथा हर बलवाहक कण का एक भारी पदार्थ “छाया” कण होना चाहीये। पदार्थ कण और बलवाहक कण के इस संबध को महासममिति नाम दिया गया है। उदाहरण के लिये हर क्वार्क के लिये एक स्क्वार्क कण होना चाहीये।

जैसा कि हम जानते है कि बोसान बल वाहक कण है तथा फर्मीयान पदार्थ बनाने वाले, बलों से प्रभावित होने वाले कण है। महासममीती से यह आशा थी कि बोसान तथा फर्मीयान को किसी मूलभूत तरीके से जोड़ा जा सकेगा।  इस सिद्धांत के अंतर्गत हर बोसान कण का एक छाया फर्मीयान कण होना चाहीये, जो द्रव्यमान, क्वांटम संख्या इत्यादि क्वांटम गुणो मे समान होगा।

लेकिन दुर्भाग्य से इन कणो और बलो के गणितीय विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया कि उस समय तक ज्ञात मूलभूत कण महासममीती के अंतर्गत एक दूसरे से निश्चित रूप से संबंधित नही है। कालुजा़ केलिन के सुझाव की तरह ही, महासममीती अनसुलझे प्रश्नो को हल करने की बजाये नये प्रश्न खड़े कर रहा था।

लेकिन जब वैज्ञानिको ने महसूस किया कि बहुत से कण अभी भी ज्ञात नही है,तब अचानक आश्चर्यजनक रूप से महासममीती सिद्धांत एक असफल सिद्धांत से सशक्त सफल सिद्धांत बन गया। महासममीती सिद्धांत द्वारा ज्ञात बोसानो और फर्मीयानो को एक दूसरे से जोड़ने की बजाये, ज्ञात बोसानो और फर्मीयानो को अज्ञात बोसानो और फर्मीयानो से जोड़ा गया। इससे कणो के चिड़ीयाघर मे कणो की संख्या न केवल दुगनी हो गयी तथा  अब तक के अज्ञात कणो के अब तक ना पाये जाने के कारण जानना भी आवश्यक हो गया। ये सभी प्रश्न इस सिद्धांत की सफलता के सामने नगण्य थे।

महासममीती के द्वारा बनाये जाने वाले सभी कण युग्म द्रव्यमान मे समान होना चाहीये। लेकिन अब तक के ज्ञात कण समान द्रव्यमान के युग्म मे नही होते है, अर्थात महासममीती को कुछ ऊर्जा के स्तरों पर “तोडा़ जाना” आवश्यक हो गया। इन ऊर्जा स्तरों के उपर महासममीती स्पष्ट होगी और इसके निचे अस्पष्ट। इसके परिणाम स्वरूप कण-युग्म के अज्ञात साथी कण कण-त्वरको मे महासममीती के इस ऊर्जा स्तर के उपर ही निरीक्षित होंगे।

महाएकीकरण सिद्धांत(GUT)* द्वारा पहले ही विद्युत-चुंबकीय बल, कमजोर नाभिकिय बल और मजबूत नाभिकिय बल को एकीकृत किया जा चुका है। अब महासममीती और महाएकीकरण सिद्धांत(GUT)* के मिश्रण से एक नया सिद्धांत प्रस्तावित किया जा सकता है जिसके अनुसार “महाएकीकरण सममीती( Grand Unification Symmetry)” अत्यंत उच्च ऊर्जा पर खंडीत होती है लेकिन महासममीती तुलनात्मक रूप से अत्यंत कम ऊर्जा पर खंडीत होती है लेकिन यह ऊर्जा भी हमारे अब तक के कण-त्वरको(particle accelerators) की ऊर्जा से ज्यादा है। इस स्थिति मे महासमीमीती द्वारा अनुक्रम समस्या (hierarchy problem)# का भी हल हो जाता है, अर्थात इस तरह के महासममीतीक एकीकृत सिद्धांत(supersymmetric unified theory) मे कुछ कणो का प्राकृतिक रूप से उच्च ऊर्जा पर रहते हुये भी द्रव्यमान का कम होना संभव है। इस तरह से महासममीती सिद्धांत और महाएकीकरण सिद्धांत अलग अलग रहने की बजाये एक साथ ज्यादा सुसंगत होते है।

इसका एक और अतिरिक्त लाभ है, -उच्च ऊर्जा पैमाने पर युग्मन स्थिरांको का एकीकरण महासममीती के बिना नही होता है। स्टैंडर्ड माडेल मे तीन युग्मन बल है जो तीन मूलभूत बलों से संबधित है। स्टैंडर्ड माडेल से यह स्पष्ट है कि किसी विशिष्ट एकल ऊर्जा स्तर पर वे सभी समान नही होते है। लेकिन महासममीती को स्टैंडर्ड माडेल मे जोड़ने पर युग्मन की दर ऊर्जास्तर के अनुपात मे परिवर्तित होती है। महसममीती सिद्धांत मे यह युग्मन एक बिंदु पर एकीकृत हो जाता है। यह एक अतिरिक्त कारण है कि अनुक्रम समस्या(hierarchy problem)# को हल करने के अतिरिक्त भी महासममीती(Supersymmetry) सिद्धांत  को एकीकरण सिद्धांत(GUT) मे जोड़ा जा सकता है।

वर्तमान मे हम यदि स्ट्रींग सिद्धांत हो उपेक्षित भी कर दे, तब महासममीती तथा महाएकीकरण सिद्धांत(GUT)* का संयुक्त सिद्धांत पर प्रायोगिक तथा सैधांतिक शोध जारी है। लेकिन इन सभी माडेलो मे कई अन्य समस्यायें है, और वे अभी तक चौथे और सबसे परिचित बल गुरुत्वाकर्षण का समावेश नही करते हैं।

 सुपरस्ट्रींग सिद्धांत

सुपर स्ट्रींग सिद्धांत मे कल्पित द्रव्यमान(imaginary mass) वाले कण टेक्यान(Tachyon) नही है और इस सिद्धांत के लिए 26 आयामों की आवश्यकता नही है, लेकिन यह सिद्धांत मे द्रव्यमान रहित ग्रेवीटान जैसे कण का अस्तित्व संभव है। सबसे विलक्षण यह है कि यह सिद्धांत महासममीती, महाएकीकरण तथा कालुजा-केलीन सुझाव सभी का समावेश करता है।

सुपरस्ट्रींग सिद्धांत को हम अगले भाग मे विस्तार से देखेंगे।

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टिप्पणीयाँ

* महाएकीकरण सिद्धांत(Grand Unifiation Theory): यह शब्द पूर्णतया सही नही है क्योंकि यह सिद्धांत न तो महान है, नयी ही समस्त बलो को एकीकृत करता है। यह सिद्धांत गुरुत्वाकर्षण का समावेश नही करता है।

# अनुक्रम समस्या(hierarchy problem): यह आधुनिक भौतिकी के अनसुलझे रहस्यों मे से एक है। यदि हम चारों मूलभूत बलों की तुलना करें तब पायेंगे कि इनकी तुलनात्मक क्षमता स्पष्ट रूप से दो अलग अलग पैमाने पर है:

बल संयोजक स्थिरांक(Coupling constant)
मजबूत नाभिकिय 1
विद्युत-चुंबक 1/137
कमजोर नाभिकिय 1/10^6
गुरुत्वाकर्षण 1/10^39

प्रकृति स्पष्ट रूप से द्रव्यमान के लिए दो अलग अलग पैमानें का प्रयोग कर रही है। लेकिन क्यों? यह एक पहेली है। गुरुत्वाकर्षण प्रतिक्रियांओ के लिए प्लैंक पैमाने का प्रयोग होता है, यह एक विशालकाय द्रव्यमान पैमाना है लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल द्रव्यमान के वर्ग के व्युत्क्रम अनुपात मे होता है, जो गुरुत्वाकर्षण को एक कमजोर बल बना देता है। द्रव्यमान मापन की इकाई GeV मे प्लैंक पैमाना 10 से 19 GeV तक है। इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रोवीक पैमाना है, जो W तथा Z बोसान के द्रव्यमान को तय करता है। ये कण विद्युत-चुंबकिय प्रतिक्रियाओं के फोटान के जैसे होते है जिनका अध्य्यन और निरीक्षण किया जा चुका है। इनका द्रव्यमान 100 GeV तक है। यही अनुक्रम समस्या है! सरल शब्दो मे किसी कण का भार इतना कम कैसे हो सकता है जब उसके मापने का पैमाना इतना विशाल है? ऊर्जा अत्यधिक होते हुये भी इन कणों का द्रव्यमान इतना कम क्यों है?

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15 विचार “स्ट्रींग सिद्धांत(String Theory) भाग 07 : विसंगतियों का निराकरण&rdquo पर;

  1. गुरुत्वाकर्षण तो दूरी के वर्ग के व्युत्क्रम अनुपात के बराबर होता है ?द्रव्यमान कि नहीं।सर, जिस तरह प्रकाश तरंगे फोटोस से मिलकर बनी हुई हैं क्या उसी तरह गुरुत्वीय तिरंगे ग्रेविटॉन से मिलकर बनी हैं अगर हां ,तो फिर क्या ग्रेवीटोंस का भी स्थिर द्रव्यमान शून्य होता है? क्योंकि वह भी तो प्रकाश की गति से ट्रैवल करती हैं

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    • सभी बोसानो का स्थिर द्रव्यमान शून्य होता है जिनमे ग्रेविटान, फोटान, हिग्स बोसान, ग्लुआन, W,Z बोसान का समावेश है।
      प्रकाश की ऊर्जा भी दूरी के साथ कम होती है।

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      • पल्सर
        पल्सर : अत्यधिक चुम्बकीय, बहुत तेज घूर्णन करने वाले न्यूट्रॉन तारे हैं, जो की विद्युतचुम्बकीय विकरण उतपन्न करते हैं। इनका विकरण तभी आभासित होता है जब विकरण पैदा होने की दिशा प्रथ्वी की ओर हो। क्योंकि इनके द्वारा उतपन्न विकरण निश्चित अंतराल के बाद ही पृथ्वी पर आता है (यानी इनका सिग्नल निरंतर ना आकर रुक रुक कर आता है), इसलिए इन्हें प्रकाशस्तंभ प्रभाव देने वाले तारों की संज्ञा भी दी जाती है। चूँकि न्यूट्रॉन तारे बहुत ही घने निकाय होते हैं, उसकी घूर्णन अवधि और इसी तरह उनकी पल्स (धड़कन) के बीच का अंतराल बहुत ही नियमित होता है। कुछ पल्सर की धड़कन की नियमितता सटीक रूप में एक परमाणु घड़ी जैसी होती है। उनके पल्स विस्तार की प्रेक्षित अवधि १.४ मिली सेकण्ड से लेकर ८.५ मिली सेकण्ड है।

        क्वासर जो “क्वासी स्टेलर रेडियो स्त्रोत” (quasi-stellar radio source; quasar) का संक्षिप्त रूप है, अरबों प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारों जैसे पिंड है। क्वासर का फैलाव केवल एक प्रकाश माह का होता है। सभी क्वासर रेडियो स्रोत नही होते। क्वासर से आने वाली विधुत चुंबकीय तरंगे क्योंकि पृथ्वी तक पहुँचती है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि इनसे काफी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। अर्थात यदि आकाशगंगा मंदाकिनी की कल्पना एक फुटबॉल मैदान के रूप में करें तो क्वासर उसमें स्थित एक धूल के कण के समान होगा। किंतु आकाशगंगा मंदाकिनी की तुलना में इससे 100 गुना अधिक ऊर्जा निकलती है।
        क्वासर

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      • सर यदि हम दो कणो को entagled state पृथ्वी पर लाते हैं और हमें उनमे से एक टेलिप्रोट चांद पर करना है तो क्या हमे उस दूसरे कण को पहले चाँद पर भेजना होग

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  2. वाकई हिंदी में पढ़ लेने का अलग मजा है….
    धन्यवाद आशीष जी ..हालांकि में कॉमर्स क्षेत्र से हु लेकिन फिज़िक्स इतना आसान कभी नहीं लगा…कृपया फोटान और प्लाज़्मा त्वरण केबारे में बताए

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  3. अच्छी जानकारी दी आपनेँ। आपनेँ तो ऐसे सिध्दान्त को भी बताया जिनको आज कोई जानता ही नहीँ है।

    अच्छा क्या आप भौतिक विज्ञान के ऐसे रहस्य बता सकते हैँ जो अभी तक सुलझाये नहीँ जा सके हैँ।

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