सूर्य की परिक्रमा करता हुये प्रस्तावित लीसा के तीन उपग्रह जो लेसर किरणो के प्रयोग से गुरुत्विय तरंगो की जांच करेंगे।

ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 02 : मूलभूत कण और मूलभूत बल


भौतिकी मे विभिन्न कणो द्वारा एक दूसरे कणो पर डाला गया प्रभाव मूलभूत बल कहलाता है। यह प्रभाव दूसरे किसी प्रभाव के द्वारा प्रेरीत नही होना चाहीये। अब तक चार ज्ञात मूलभूत बल है, विद्युत-चुंबकिय बल, कमजोर नाभिकिय बल, मजबूत नाभिकिय बल तथा गुरुत्वाकर्षण।

क्वांटम भौतिकी के अनुसार पदार्थ के कणो के मध्य विभिन्न बल पूर्णांक स्पिन(0,1,2) वाले कणो के द्वारा वहन किये जाते है। यह कुछ इस प्रकार है कि जब कोई पदार्थ-कण (इलेक्ट्रान या क्वार्क) किसी बल-वाहक कण(Force Carrying Particle) का उत्सर्जन करता है, इस उत्सर्जन से उस पदार्थ-कण(इलेक्ट्रान या क्वार्क) की गति मे परिवर्तन आता है। बल-वाहक कण किसी पदार्थ कण से टकराकर अवशोषित कर लिया जाता है, इस टकराव से पदार्थ-कण की गति मे परिवर्तन आता है, जैसे इन दोनो पदार्थ कणो के मध्य किसी बल ने अपना प्रभाव दिखाया हो। बल वाहक कण पाली के व्यतिरेक सिद्धांत(Exclusion Principal) का पालन नही करते है अर्थात दो पदार्थ-कणो के मध्य कितने ही बलवाहक कणो का आदान प्रदान हो सकता है, जोकि मजबूत बलो के लिए आवश्यक है। लेकिन अधिक द्रव्यमान वाले बलवाहक कणो का ज्यादा दूरी के पदार्थ कणो के मध्य आदान प्रदान कठिन है, इस कारण इन बलो का प्रभाव कम दूरी पर ही होता है। दूसरी ओर यदि बलवाहक कण का द्रव्यमान न हो तब बल का प्रभाव ज्यादा दूरी पर होगा। पदार्थ कणो के मध्य आदान प्रदान होने वाले इन बल वाहक कणो को आभासी कण(Virtual Particle) कहा जाता है क्योंकि उन्हे वास्तविक कणो की तरह कण जांचको(particle detector) द्वारा पकड़ा नही जा सकता है। हम जानते है कि बल-वाहक कणो का आस्तित्व है क्योंकि इनका मापन करने योग्य प्रभाव होता है तथा वे पदार्थ कणो के मध्य बलो को उत्पन्न करते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों मे 0,1,2 स्पिन के कण वास्तविक कणो की तरह पकड़ा जा सकता है। इन परिस्थितियो मे ये कण तरंगो के जैसे व्यव्हार करते है जैसे प्रकाश किरणे या गुरुत्वाकर्षण की तरंगे। कभी कभी ये कण पदार्थ कणो के मध्य बल-वाहक आभासी(virtual) कणो के आदानप्रदान के दौरान भी उत्सर्जित होते है। उदाहरण के लिए दो इलेक्ट्रान के मध्य विद्युत बल उनके मध्य आभासी फोटानो के आदान प्रदान के कारण होता है जिन्हे देखा नही जा सकता है। लेकिन कोई इलेक्ट्रान किसी दूसरे इलेक्ट्रान के पास से गुजरने पर वास्तविक फोटान को उत्सर्जित कर सकता है जिसे हम प्रकाश किरण के रूप मे देख सकते है। पढ़ना जारी रखें “ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 02 : मूलभूत कण और मूलभूत बल”

कणो की स्पिन

ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 01 : मूलभूत कण और मूलभूत बल



यह श्रंखला ‘पदार्थ और उसकी संरचना‘ पर आधारित है।  इस विषय पर हिन्दी में लेखो का अभाव है ,इन विषय को हिन्दी में उपलब्ध कराना ही इस श्रंखला को लिखे जाने का उद्देश्य है। इन श्रंखला के विषय होंगे:

  • 1. मूलभूत कण(Elementary particles)
  • 2.मूलभूत बल(Elementary Forces)
  • 3.मानक प्रतिकृति(Standard Model)
  • 4.प्रति पदार्थ(Antimatter)
  • 5. ऋणात्मक पदार्थ(Negative Matter)
  • 6. ग्रह, तारे, आकाशगंगा  और निहारिका
  • 7. श्याम वीवर(Black Hole)
  • 8.श्याम  पदार्थ तथा श्याम ऊर्जा (Dark Matter and Dark Energy)
  • 9. ब्रह्मांड का अंत (Death of Universe)

पदार्थ पृथक सूक्ष्म   कणो से बना होता है और उसे मनमाने ढंग से सूक्ष्म  से सूक्ष्मतम रूप मे तोड़ा नही जा सकता है, यह सिद्धांत पिछले सहस्त्र वर्षो से सर्वमान्य है। लेकिन यह सिद्धांत दार्शनिक आधार पर ही था, इसके पिछे प्रयोग और निरिक्षण का सहारा नही था। दर्शनशास्त्र मे इस पृथक सूक्ष्म कण अर्थात परमाणु की प्रकृती विभिन्न संस्कृती और सभ्यताओ मे अलग अलग तरह से परिभाषित की गयी थी। एक परमाणु का मूलभूत सिद्धांत वैज्ञानिको द्वारा रसायन शास्त्र मे नये आविष्कार के पश्चात पिछली कुछ शताब्दी मे मान्य हुआ है। पढ़ना जारी रखें “ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 01 : मूलभूत कण और मूलभूत बल”

तारे का जन्म

लाखों तारे आसमां मे


आप से एक मासूम सा प्रश्न है। कितने दिनों पहले आपने रात्रि में आसमान में सितारों को देखा है ? कुछ दिन, कुछ माह या कुछ वर्ष पहले ? कब आप अपने घर की छत पर या आंगन में आसमानी सितारों के तले सोये है ? बच्चों को तारों को दिखाकर बताया है कि वह जो तारा दिख रहा है वह ध्रुव तारा है, उसके उपर सप्तऋषि है ? वो देखो आकाश के मध्य में व्याघ्र है ?

आज इन तारों के बारे में बात की जाये ।

आसमान में जो टिमटिमाते बिन्दु जैसे तारे दिखायी दे रहे है, वह हमारे सूर्य जैसे विशाल है। इनमें से कुछ तो सूर्य से हज़ारों गुणा बड़े और विशालकाय है। ये तारे हमारी पृथ्वी से हज़ारों अरबों किमी दूर है, इसलिये इतने छोटे दिखायी दे रहे है।

एक तारा एक विशालकाय चमकता हुआ गैस का पिण्ड होता है जो गुरुत्वाकर्षण के कारण बंधा हुआ होता है। पृथ्वी के सबसे पास का तारा सूर्य है, यही सूर्य पृथ्वी की अधिकतर ऊर्जा का श्रोत है। अन्य तारे भी पृथ्वी से दिखायी देते है लेकिन रात में क्योंकि दिन में वे   सूर्य की रोशनी से दब जाते है। एक कारण हमारा वायुमंडल में होनेवाला प्रकाश किरणो का विकिरण है जो धूल के कणों से सूर्य की किरणों के टकराने से उत्पन्न होता है। यह विकिरण वायु मण्डल को ढंक सा लेता है जिससे हम दिन में तारे नहीं देख पाते है। पढ़ना जारी रखें “लाखों तारे आसमां मे”

तारों का जीवन और मृत्यु


सितारे का जीवनचक्र सामान्यतः सितारे का जीवन चक्र दो तरह का होता है और लगभग सभी तारे इन दो जीवन चक्र मे से किसी एक का पालन करते है। इन दो जीवन चक्र मे चयन का पैमाना उस तारे का … पढ़ना जारी रखें तारों का जीवन और मृत्यु

श्याम पदार्थ(Dark Matter)


भौतिकी में श्याम पदार्थ उस पदार्थ को कहते है जो विद्युत चुंबकीय विकिरण (प्रकाश, क्ष किरण) का उत्सर्जन या परावर्तन पर्याप्त मात्रा में नहीं करता जिससे उसे महसूस किया जा सके किंतु उसकी उपस्थिति साधारण पदार्थ पर उसके गुरुत्व प्रभाव से महसूस की जा सकती है। श्याम पदार्थ की उपस्थिति के लिये किये गये निरीक्षणों में प्रमुख है, आकाशगंगाओं की घूर्णन गति, किसी आकाशगंगाओं के समुह में आकाशगंगा की कक्षा मे गति और आकाशगंगा या आकाशगंगा के समुह में गर्म गैसो में तापमान का वितरण है। श्याम पदार्थ की ब्रह्मांड के आकार ग्रहण प्रक्रिया(१) तथा महा विस्फोट केन्द्रीय संश्लेषण(Big Bang Ncleosynthesis)(२)प्रमुख भूमिका रही है। श्याम पदार्थ का प्रभाव ब्रह्मांडीय विकिरण के फैलाव और वितरण में भी रहा है। यह सभी सबूत यह बताते है कि आकाशगंगाये, आकाशगंगा समुह(Cluster) और ब्रह्मांड में पदार्थ की मात्रा निरीक्षित मात्रा से कही ज्यादा है, जो कि मुख्यतः श्याम पदार्थ है जिसे देखा नहीं जा सकता। पढ़ना जारी रखें “श्याम पदार्थ(Dark Matter)”

श्याम उर्जा (Dark Energy)


यह विषय एक विज्ञान फैटंसी फिल्म की कहानी के जैसा है। श्याम ऊर्जा(Dark Energy), एक रहस्यमय बल जिसे कोई समझ नहीं पाया है, लेकिन इस बल के प्रभाव से ब्रह्मांड के पिंड एक दूसरे से दूर और दूर होते जा रहे है।

यह वह काल्पनिक बल है जिसका दबाव ऋणात्मक है और सारे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। सापेक्षता वाद के सिद्धांत के अनुसार , इस ऋणात्मक दबाव का प्रभाव गुरुत्वाकर्षण के विपरीत प्रभाव के समान है।

श्याम ऊर्जा 1998 मे उस वक्त प्रकाश में आयी , जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के 2 समुहों ने विभिन्न आकाशगंगाओं में विस्फोट की प्रक्रिया से गुजर रहे सितारों(सुपरनोवा)(1) पर एक सर्वे किया। उन्होने पाया की ये सुपरनोवा की प्रकाश दीप्ति अपेक्षित प्रकाश दीप्ति से कम है, इसका मतलब यह कि उन्हें जितने पास होना चाहिये थी , वे उससे ज्यादा दूर है। इसका एक ही मतलब हो सकता था कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति कुछ काल पहले की तुलना में बढ़ गयी है!(लाल विचलन भी देखे) पढ़ना जारी रखें “श्याम उर्जा (Dark Energy)”