सापेक्षतावाद : विशेष एवं सामान्य सापेक्षतावाद के प्रयोगात्मक प्रमाण


सापेक्षतावाद केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं है; यह प्रयोग और अवलोकन द्वारा प्रमाणित हुआ है। विशेष और सामान्य सापेक्षतावाद के सिद्धांतों ने हमें ब्रह्मांड के व्यवहार को समझने और आधुनिक तकनीक में अनुप्रयोग करने का मार्ग दिखाया है।

विशेष सापेक्षतावाद के प्रमुख प्रायोगिक प्रमाण

विशेष सापेक्षतावाद (Special Theory of Relativity) आधुनिक भौतिकी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे 1905 में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रस्तुत किया। यह सिद्धांत मुख्य रूप से उच्च वेग (प्रकाश के वेग के समीप) से गतिमान वस्तुओं के व्यवहार का वर्णन करता है। इस सिद्धांत के दो मुख्य सिद्धांत हैं:

  1. भौतिकी के नियम सभी जड़त्वीय संदर्भ तंत्रों में समान होते हैं।
  2. निर्वात में प्रकाश का वेग सभी प्रेक्षकों के लिए समान रहता है।

यह सिद्धांत केवल गणितीय नहीं है, बल्कि अनेक प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है। इन प्रयोगों ने समय प्रसार (Time Dilation), लंबाई संकुचन (Length Contraction), और द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध जैसे प्रभावों की पुष्टि की है।

माइकेलसन-मॉर्ले प्रयोग (Michelson–Morley Experiment)

माइकेलसन–मॉर्ले प्रयोग भौतिकी का एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण प्रयोग है, जिसे 1887 में अल्बर्ट ए. माइकेलसन तथा एडवर्ड मॉर्ले ने किया। इस प्रयोग का उद्देश्य प्रकाश के संचरण के लिए माने जाने वाले काल्पनिक माध्यम “ईथर (Ether)” के अस्तित्व का पता लगाना था। उस समय यह माना जाता था कि जैसे ध्वनि के लिए वायु माध्यम है, उसी प्रकार प्रकाश के लिए ईथर माध्यम है। यदि ईथर का अस्तित्व होता और पृथ्वी उसमें गति कर रही होती, तो पृथ्वी की गति के कारण प्रकाश की गति अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग होनी चाहिए थी।

उदाहरण:

  • ईथर की दिशा में प्रकाश की गति कम होनी चाहिए
  • ईथर के लंबवत दिशा में प्रकाश की गति अलग होनी चाहिए

इस अंतर को इंटरफेरेंस (Interference) द्वारा मापा जा सकता था।

इस प्रयोग में Michelson Interferometer नामक उपकरण का उपयोग किया गया। इसके मुख्य भाग थे:

  1. प्रकाश स्रोत
  2. अर्ध-परावर्तक दर्पण (Beam Splitter)
  3. दो समतल दर्पण
  4. दूरबीन या स्क्रीन

प्रयोग की विधि

  1. प्रकाश स्रोत (S) से प्रकाश किरण भेजी गई।
  2. अर्ध-परावर्तक दर्पण द्वारा प्रकाश को दो किरणों में विभाजित किया गया।
  3. एक किरण पृथ्वी की गति की दिशा में(l2) और दूसरी उसके लंबवत दिशा (l1)में भेजी गई।
  4. दोनों किरणें दर्पण (M1, M2)से परावर्तित होकर वापस आईं।
  5. दोनों किरणों को मिलाकर (T) इंटरफेरेंस पैटर्न देखा गया।
  6. उपकरण को घुमाकर पुनः परीक्षण किया गया।

परिणाम

  • इस प्रयोग में प्रकाश की गति सभी दिशाओं में समान पाई गई।
  • पृथ्वी की गति का प्रकाश की गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

यह परिणाम विशेष सापेक्षतावाद के दूसरे सिद्धांत की पुष्टि करता है कि प्रकाश का वेग स्थिर रहता है। माइकेलसन–मॉर्ले प्रयोग का आधुनिक भौतिकी में अत्यधिक महत्व है, इसने ईथर सिद्धांत को समाप्त कर दिया और आधुनिक भौतिकी की नई दिशा प्रदान की ।

समय फैलाव का प्रमाण : म्यूऑन क्षय प्रयोग (Muon Decay Experiment)

म्यूऑन क्षय प्रयोग विशेष सापेक्षतावाद के समय फैलाव (Time Dilation) का सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक प्रमाण है। इस प्रयोग से यह सिद्ध होता है कि जब कोई कण प्रकाश के वेग के निकट गति करता है, तो उसका समय धीमा हो जाता है। म्यूऑन (Muon) एक प्राथमिक (elementary) कण है। इसकी मुख्य विशेषताओं में : यह इलेक्ट्रॉन के समान होता है, लेकिन अधिक भारी होता है। इसका आवेश ऋणात्मक होता है। यह अस्थिर (unstable) होता है और कुछ समय बाद क्षय (decay) हो जाता है।

सामान्य स्थिति

  • स्थिर अवस्था में म्यूऑन का जीवनकाल लगभग 2.2 माइक्रोसेकंड होता है।

प्रयोगात्मक अवलोकन

  • जब म्यूऑन प्रकाश के वेग के निकट गति करते हैं, तो उनका जीवनकाल बढ़ जाता है।
  • वे पृथ्वी की सतह तक पहुँच जाते हैं, जबकि सामान्य स्थिति में उन्हें पहले ही नष्ट हो जाना चाहिए था।

म्यूऑन का जीवनकाल बहुत कम होता है: 2.2 माइक्रोसेकंड

प्रकाश की गति:3×108m/s3 \times 10^8 \, m/s

तो अपने जीवन काल में म्यूऑन अधिकतम दूरी तय कर सकता है:

Distance=Speed×Timeदूरी = गति × समय =3×108×2.2×106= 3×10^8 × 2.2×10^{-6}=660meter= 660 \, meter

म्यूऑन 10,000 मीटर की ऊँचाई पर बनते हैं, इसलिए उन्हें पृथ्वी तक नहीं पहुंचना चाहिए था। लेकिन प्रयोगों में पाया गया कि बड़ी संख्या में म्यूऑन पृथ्वी की सतह तक पहुँचते हैं।

जब म्यूऑन बहुत तेज गति से चलते हैं (लगभग प्रकाश की गति के बराबर), तब उनका समय धीमा हो जाता है। इस कारण पृथ्वी के प्रेक्षक के अनुसार म्यूऑन का जीवनकाल बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए यह 2.2 माइक्रोसेकंड से बढाकर 20 माइक्रोसेकंड या अधिक हो जाता है इसलिए वे पृथ्वी तक पहुँच जाते हैं।

समय प्रसार का सूत्र:t=t01v2c2t = \frac{t_0}{\sqrt{1 – \frac{v^2}{c^2}}}

t0t_0= वास्तविक जीवनकाल , tt= प्रेक्षक के अनुसार जीवनकाल . vv= म्यूऑन की गति , cc= प्रकाश की गति

निष्कर्ष

यह समय फैलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

हाफेले-कीटिंग परमाणु घड़ी प्रयोग (Hafele-Keating Atomic Clock Experiment)

हैफेल-कीटिंग प्रयोग सापेक्षता के सिद्धांत का परीक्षण था। अक्टूबर 1971 में, भौतिक विज्ञानी जोसेफ सी. हैफेल और खगोलशास्त्री रिचर्ड ई. कीटिंग ने चार सीज़ियम-बीम परमाणु घड़ियों को वाणिज्यिक विमानों में रखा। उन्होंने इन घडीयो के साथ विश्व की दो बार परिक्रमा की. पहली परिक्रमा पूर्व दिशा में थी जबकि दूसरी पश्चिम की ओर। दोनों परिक्रमा के बाद घड़ियों के समय की तुलना संयुक्त राज्य नौसेना वेधशाला में रखी घड़ियों के समय से तुलना की। जब तुलना हुई तो पाया गया कि वे स्थिर और गतिमान घड़ियों का समय एक-दूसरे से भिन्न था और उनके समय का अंतर विशेष और सामान्य सापेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप था।

इन यात्राओं में यात्रा के वास्तविक उड़ान पथ के अनुसार सापेक्षतावाद के सिद्धांत ने भविष्यवाणी की कि अमेरिकी नौसेना वेधशाला रखी में संदर्भ घड़ियों की तुलना में, पूर्व दिशा में उड़ने वाली घड़ियों को यात्रा के दौरान 40+/-23 नैनोसेकंड धीमा होना चाहिए था जबकि पश्चिम की ओर यात्रा के दौरान 275+/-21 नैनोसेकंड आगे होना चाहिए। अमेरिकी नौसेना वेधशाला के परमाणु समय पैमाने के सापेक्ष, पूर्व की ओर उड़ने वाली घड़ियां यात्रा के दौरान 59+/-10 नैनोसेकंड का धीमी चली और पश्चिम की ओर यात्रा के दौरान 273+/-7 नैनोसेकंड आगे हुई। इस मापन में त्रुटियां मानक विचलन के अंदर ही हैं।

हैफेल-कीटिंग प्रयोग में प्रयुक्त वास्तविक एचपी 5061ए सीज़ियम बीम परमाणु घड़ी इकाइयों में से एक

निष्कर्ष

यह सिद्ध करता है कि गति करने वाली घड़ी धीमी चलती है।

द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध का प्रमाण

अल्बर्ट आइंस्टीन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत (1905) के अनुसार, द्रव्यमान (m) और ऊर्जा (e) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे में परिवर्तनीय हैं, जिसे निचे दिए गए प्रसिद्ध समीकरण “द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध” द्वारा व्यक्त किया जाता है। यहाँ निर्वात में प्रकाश की गति (c) है, जिसका अर्थ है कि द्रव्यमान की थोड़ी सी मात्रा में विशाल ऊर्जा निहित है।

विशेष सापेक्षतावाद का प्रसिद्ध समीकरण है:E=mc2E = mc^2

इसका अर्थ है: द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो सकता है।

  • संरक्षण का नियम: अब द्रव्यमान और ऊर्जा को अलग-अलग नहीं, बल्कि ‘द्रव्यमान-ऊर्जा’ के एक एकीकृत संरक्षित रूप में देखा जाता है।
  • नाभिकीय ऊर्जा: यह सिद्धांत नाभिकीय विखंडन और संलयन (जैसे सूर्य की ऊर्जा) का आधार है, जहाँ नाभिकीय प्रतिक्रिया के बाद द्रव्यमान में कमी, ऊर्जा में बदल जाती है।
  • प्रायोगिक साक्ष्य: यह परमाणु भौतिकी, कणों के क्षय और एंटीमैटर-मैटर के विनाश (annihilation) में बड़ी मात्रा में ऊर्जा के निकलने से सिद्ध होता है।

प्रयोगात्मक प्रमाण

यह सिद्धांत परमाणु बम, परमाणु रिएक्टर और सूर्य में ऊर्जा उत्पादन में देखा जाता है, जहाँ द्रव्यमान ऊर्जा में बदलता है।

कण त्वरक (Particle Accelerator) प्रयोग

कण त्वरक (Particle Accelerators) आधुनिक भौतिकी की ऐसी मशीनें हैं जो आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) का जीता-जागता प्रमाण हैं। इन मशीनों में जैसे-जैसे कण प्रकाश की गति के करीब पहुँचते हैं, वे न्यूटन के नियमों को छोड़कर ‘सापेक्षकीय’ (relativistic) व्यवहार करने लगते हैं।

कण त्वरक और सापेक्षता के बीच मुख्य संबंध निम्नलिखित हैं:

  1. द्रव्यमान और ऊर्जा (Mass-Energy Equivalence)
    द्रव्यमान में वृद्धि: जब किसी कण को त्वरित किया जाता है, तो उसकी गतिज ऊर्जा बढ़ने के साथ-साथ उसका “प्रभावी द्रव्यमान” भी बढ़ने लगता है। प्रकाश की गति के 99.9% पर, कण इतना भारी हो जाता है कि उसे और अधिक गति देने के लिए अनंत ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
    ऊर्जा से पदार्थ: Large Hadron Collider (LHC) जैसे कोलाइडर में, जब दो कण आपस में टकराते हैं, तो उनकी विशाल गतिज ऊर्जा नए भारी कणों (जैसे हिग्स बोसॉन) में बदल जाती है।
  2. समय फैलाव/विस्तार (Time Dilation)
    सापेक्षता के अनुसार, उच्च गति पर चल रहे कणों के लिए समय धीमा हो जाता है। अस्थिर कण (जैसे म्यूऑन) जो बहुत कम समय में नष्ट हो जाते हैं, एक्सेलेरेटर में अपनी सामान्य आयु से 30 गुना या उससे भी अधिक समय तक जीवित रहते हैं क्योंकि उनके लिए “घड़ी” धीमी चल रही होती है।
  3. चुंबकीय डिजाइन और सिंक्रोट्रॉन (Synchrotron)
    सिक्लोट्रोन (Cyclotron) जैसे पुराने त्वरक एक सीमा के बाद काम करना बंद कर देते हैं क्योंकि कणों का बढ़ता द्रव्यमान उनकी आवृति(फ्रीक्वेंसी) बिगाड़ देता है। आधुनिक सिंक्रोट्रॉन को इस सापेक्षकीय बदलाव को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाता है ताकि मैग्नेटिक फील्ड को कणों के बढ़ते ‘भारीपन’ के साथ तालमेल बिठाया जा सके।
    सिंक्रोट्रॉन विकिरण: जब आवेशित कण मुड़ते हैं, तो वे ऊर्जा छोड़ते हैं जिसे Synchrotron Radiation कहते हैं। इसकी गणना केवल सापेक्षता के नियमों का उपयोग करके ही सटीक रूप से की जा सकती है।
  4. प्रकाश की गति की सीमा
    कण त्वरक इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि द्रव्यमान वाला कोई भी कण प्रकाश की गति तक नहीं पहुँच सकता। LHC में प्रोटॉन प्रकाश की गति के 99.9999991% तक पहुँचते हैं, लेकिन उसे पार नहीं कर पाते क्योंकि प्रकाश गति ब्रह्मांड की अंतिम गति सीमा है।
ज़मीन के नीचे, यह सुरंग लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) का हिस्सा है, जहाँ प्रोटॉन 299,792,455 m/s की रफ़्तार से गुज़रते हैं जो प्रकाश गति से सिर्फ़ 3 m/s कम है।

लंबाई संकुचन (Length Contraction) : उच्च गति से चलने वाली वस्तु की लंबाई कम हो जाती है।

सूत्र:L=L01v2c2L = L_0 \sqrt{1 – \frac{v^2}{c^2}}कण त्वरक प्रयोग इस प्रभाव की पुष्टि करते हैं।

GPS प्रणाली में प्रयोगात्मक प्रमाण

GPS प्रणाली विशेष सापेक्षतावाद के बिना काम नहीं कर सकती। GPS उपग्रह बहुत तेज गति से चलते हैं।

इस कारण:

  • उनकी घड़ियाँ पृथ्वी की घड़ियों से अलग चलती हैं।
  • समय प्रसार को सुधारना आवश्यक होता है।

यह प्रणाली NASA और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा उपयोग की जाती है। यदि सापेक्षतावाद के सुधार न किए जाएं, तो GPS में प्रतिदिन कई किलोमीटर की त्रुटि हो जाएगी।

सामान्य सापेक्षतावाद के प्रयोगात्मक प्रमाण

सामान्य सापेक्षतावाद (General Relativity) आधुनिक भौतिकी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे 1915 में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण कोई साधारण बल नहीं है, बल्कि द्रव्य और ऊर्जा द्वारा उत्पन्न स्पेस-टाइम (अंतरिक्ष-समय) की वक्रता का परिणाम है।

किसी भी वैज्ञानिक सिद्धांत की सत्यता उसके प्रयोगात्मक प्रमाणों पर निर्भर करती है। सामान्य सापेक्षतावाद के कई महत्वपूर्ण प्रयोगात्मक प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने इस सिद्धांत को सही सिद्ध किया।

बुध ग्रह की कक्षा का अग्रगमन (Perihelion Precession of Mercury)

बुध (Mercury) ग्रह की कक्षा का अग्रगमन खगोल विज्ञान की वह घटना है जिसमें सूर्य के सबसे निकटतम ग्रह बुध की कक्षा का निकटतम बिंदु (Perihelion) समय के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। यह घटना भौतिकी के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने आइजैक न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की सीमाओं को उजागर किया और अल्बर्ट आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता (General Relativity) के सिद्धांत की पुष्टि करने वाले पहले प्रमुख परीक्षणों में से एक बनी।

बुध का पेरिहेलियन लगभग 574.1 आर्कसेकंड प्रति शताब्दी की दर से आगे बढ़ता है। न्यूटन के नियमों के अनुसार, सौर मंडल के अन्य ग्रहों (जैसे शुक्र और बृहस्पति) के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण यह दर 531.6 आर्कसेकंड प्रति शताब्दी होनी चाहिए थी। न्यूटन के सिद्धांत और वास्तविक प्रेक्षणों के बीच लगभग 43 आर्कसेकंड प्रति शताब्दी का अंतर था, जिसे 19वीं सदी के वैज्ञानिक समझाने में असमर्थ थे।

1915 में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने दिखाया कि यह अतिरिक्त 43 आर्कसेकंड सूर्य के विशाल द्रव्यमान के कारण होने वाले स्पेस-टाइम (spacetime) के घुमाव (curvature) का परिणाम है। मान्य सापेक्षता के अनुसार, सूर्य के पास अंतरिक्ष इतना अधिक मुड़ा हुआ है कि बुध की कक्षा पूरी तरह से बंद अंडाकार (ellipse) नहीं रहती, बल्कि हर चक्कर के बाद थोड़ी खिसक जाती है।

महत्त्व:
यह सामान्य सापेक्षतावाद का पहला और महत्वपूर्ण प्रमाण था।

प्रकाश का गुरुत्वाकर्षण द्वारा मुड़ना (Gravitational Bending of Light)

सामान्य सापेक्षतावाद के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को भी मोड़ सकता है। सापेक्षतावाद ने सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को मोड़ सकता है। इसके अनुसार जब किसी दूर के तारे से प्रकाश सूर्य के पास से गुजरेगा, तो सूर्य का विशाल गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को मोड़ देगा, जिससे तारे की स्थिति थोड़ी बदली हुई दिखेगी।


सर आर्थर एडिंगटन (Sir Arthur Eddington) एक ब्रिटिश खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने इस सिद्धांत का प्रायोगिक परीक्षण करने के लिए इस अभियान का नेतृत्व किया। 29 मई 1919 को एक पूर्ण सूर्य ग्रहण लगा था, जो परीक्षण के लिए एकदम सही था क्योंकि इससे सूर्य के पास के तारे दिन में भी दिखाई दे सकते थे। एडिंगटन ने पश्चिमी अफ्रीका के प्रिन्सिपे (Príncipe) द्वीप से और एक अन्य टीम ने ब्राजील के सोब्राल (Sobral) शहर से सूर्य ग्रहण के समय तारों की तस्वीरें लीं।

जब ग्रहण के दौरान ली गई तस्वीरों की तुलना रात के समय ली गई उन तारों की सामान्य तस्वीरों से की गई, तो एडिंगटन ने पाया कि तारे अपनी वास्तविक स्थिति से हट गए थे। इस प्रयोग में मापा गया विचलन (Deflection) सापेक्षतावाद सिद्धांत द्वारा गणना किये गए विचलन के बराबर था।

इस प्रयोग ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के पुराने सिद्धांत की जगह आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को सही साबित किया।

गुरुत्वीय लाल विचलन (Gravitational Redshift)

इस प्रभाव के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलते समय प्रकाश की तरंगदैर्घ्य बढ़ जाती है।

पाउंड-रेबका प्रयोग (1959) भौतिकी का एक ऐतिहासिक प्रयोग है जिसने अल्बर्ट आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता (General Relativity) सिद्धांत द्वारा प्रस्तावित गुरुत्वीय लाल विचलन (Gravitational Redshift) की पुष्टि की।

इस प्रयोग का उद्देश्य था कि क्या गुरुत्वाकर्षण प्रकाश (फोटॉन) की आवृत्ति (frequency) को प्रभावित करता है ? इसे गुरुत्वाकर्षण लाल विचलन(Gravitational Redshift) कहा जाता है। यह प्रयोग हार्वर्ड विश्वविद्यालय की जेफरसन लैब में एक 22.6 मीटर ऊंची मीनार में किया गया था। इसमें मोसबॉयर प्रभाव (Mössbauer Effect) का उपयोग किया गया, जो गामा किरणों के सटीक उत्सर्जन और अवशोषण की अनुमति देता है। प्रयोग के लिए आयरन-57 (Fe-57) आइसोटोप का चुनाव किया गया था।

गुरुत्वाकर्षण प्रकाश (फोटॉन) की आवृत्ति (frequency) को प्रभावित करता है

निष्कर्ष :

  • ऊर्जा में परिवर्तन: जब गामा किरणें ऊपर की ओर भेजी गईं, तो उनकी ऊर्जा कम हो गई (रेडशिफ्ट) और जब नीचे भेजी गईं, तो ऊर्जा बढ़ गई (ब्लूशिफ्ट)।
  • समय फैलाव (Time Dilation): इस प्रयोग ने साबित किया कि गुरुत्वाकर्षण समय के प्रवाह को धीमा कर देता है। एक मजबूत गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में घड़ी, कमजोर क्षेत्र की तुलना में धीमी चलती है।
  • सटीकता: परिणाम आइंस्टीन की भविष्यवाणियों के 1.6% के भीतर थे, जिसे बाद में 1964 में और भी सटीक बनाया गया।

गुरुत्वीय समय फैलाव (Gravitational Time Dilation)

सामान्य सापेक्षतावाद के अनुसार,

  • अधिक गुरुत्वाकर्षण वाले स्थान पर समय धीमा चलता है।

प्रमाण

  • परमाणु घड़ियों को पृथ्वी और उपग्रह में रखा गया।
  • दोनों के समय में अंतर पाया गया।

व्यावहारिक उपयोग:

GPS प्रणाली में इसका उपयोग किया जाता है। जीपीएस उपग्रह पृथ्वी से लगभग 20,200 किमी ऊपर होते हैं। वहाँ गुरुत्वाकर्षण कम होने के कारण, उनकी घड़ियाँ पृथ्वी की घड़ियों की तुलना में हर दिन लगभग 45 माइक्रोसेकंड तेज़ चलती हैं। अगर वैज्ञानिक इस अंतर को ठीक न करें, तो जीपीएस की लोकेशन कुछ ही घंटों में कई किलोमीटर गलत हो जाएगी।

गुरुत्वीय तरंगों की खोज (Gravitational Waves)

सामान्य सापेक्षतावाद ने गुरुत्वीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। गुरुत्वीय तरंगों (Gravitational Waves) की पहली प्रत्यक्ष खोज 14 सितंबर 2015 को अमेरिका में LIGO (लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी) वेधशाला द्वारा की गई थी, जिसकी पुष्टि 2016 में की गई। यह ऐतिहासिक खोज, जो अल्बर्ट आइंस्टीन की 100 साल पुरानी सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत की भविष्यवाणी को सिद्ध करती है, दो ब्लैक होल के विलय से उत्पन्न हुई थी।

2015 में LIGO Scientific Collaboration और Virgo Collaboration ने गुरुत्वीय तरंगों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। इसके लिए 2017 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार रैनर वीस, बैरी बैरिश और किप थॉर्न को दिया गया।

युग्मपल्सर (Binary Pulsar) का प्रमाण

युग्मपल्सर (Binary Pulsar) के अस्तित्व और उससे जुड़े भौतिकी सिद्धांतों का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण PSR B1913+16 की खोज से मिलता है, जिसे ‘हल्स-टेलर बाइनरी पल्सर’ भी कहा जाता है। 1974 में रसेल हल्स और जोसेफ टेलर ने एक युग्म तारा प्रणाली की खोज की।

आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार, दो भारी पिंड जब एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं, तो वे गुरुत्वाकर्षण तरंगों (Gravitational Waves) के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस युग्मपल्सर की कक्षा हर साल लगभग 75 माइक्रोसेकंड कम हो रही है, जो बिल्कुल आइंस्टीन की गणनाओं के अनुरूप है।

पल्सर से आने वाले संकेतों के समय में नियमित उतार-चढ़ाव देखा गया। जब पल्सर पृथ्वी की ओर आता है, तो संकेत तेज होते हैं, और दूर जाने पर धीमे। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पल्सर किसी अन्य अदृश्य साथी (न्यूट्रॉन स्टार) के साथ कक्षा में घूम रहा है।

1993 में रसेल हल्स और जोसेफ टेलर को इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह खोज गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पहला अप्रत्यक्ष प्रमाण (Indirect Evidence) थी। बुध ग्रह की तरह ही, इस युग्मपल्सर की कक्षा भी समय के साथ घूमती (Precession) है। इसकी दर सौर मंडल की तुलना में बहुत अधिक (लगभग 4.2 डिग्री प्रति वर्ष) है, जो मजबूत गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में सापेक्षता के प्रभाव को सिद्ध करती है।

ब्लैक होल की तस्वीर

ब्लैक होल की पहली ऐतिहासिक तस्वीरें विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि हैं।

2019 में इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (Event Horizon Telescope) ने मेसियर 87 (M87) ब्लैक होल की पहली तस्वीर ली। जिसे 10 अप्रैल 2019 को जारी किया गया था। यह पृथ्वी से 5.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक विशाल ब्लैक होल है।

धनु ए (Sagittarius A) की तस्वीर: यह हमारी अपनी आकाशगंगा के केंद्र में स्थित ब्लैक होल की पहली तस्वीर है, जिसे 12 मई 2022 को सार्वजनिक किया गया था।

चूंकि ब्लैक होल से प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए वह खुद अदृश्य होता है। तस्वीर में दिखने वाला नारंगी घेरा दरअसल ब्लैक होल के चारों ओर घूमती हुई अत्यधिक गर्म गैस और प्लाज्मा है, जिसे ‘एक्रीशन डिस्क’ कहा जाता है। बीच का काला हिस्सा ब्लैक होल की ‘परछाई’ (Shadow) है।

इससे साबित हुआ:

  • ब्लैक होल वास्तव में अस्तित्व में हैं।
  • और उनका व्यवहार सामान्य सापेक्षतावाद के अनुसार है।

उपरोक्त सभी प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि सामान्य सापेक्षतावाद एक सत्य और सफल सिद्धांत है। बुध ग्रह की कक्षा, प्रकाश का मुड़ना, गुरुत्वीय लाल विचलन, समय विलंब तथा गुरुत्वीय तरंगें इसके महत्वपूर्ण प्रयोगात्मक प्रमाण हैं।

अतः सामान्य सापेक्षतावाद आधुनिक भौतिकी, खगोल विज्ञान तथा ब्रह्मांड विज्ञान का आधार है।

निष्कर्ष

सापेक्षतावाद का महत्व केवल सैद्धांतिक नहीं है। इसके सिद्धांतों ने हमें यह समझने का मार्ग दिखाया कि समय और स्थान सापेक्ष हैं, और गुरुत्व केवल बल नहीं बल्कि स्पेसटाइम की वक्रता है। इन सिद्धांतों के प्रयोगात्मक प्रमाण और आधुनिक तकनीकी अनुप्रयोग, जैसे GPS, ब्लैक होल इमेजिंग और गुरुत्व तरंगों का पता लगाना, यह दर्शाते हैं कि सापेक्षतावाद वास्तविक दुनिया में अमूल्य और क्रांतिकारी है

सापेक्षतावाद ने न केवल हमारे ब्रह्मांड की समझ बदल दी, बल्कि विज्ञान और तकनीक में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए।

सापेक्षतावाद : विशेष एवं सामान्य सापेक्षतावाद के प्रयोगात्मक प्रमाण&rdquo पर एक विचार;

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