2025 भौतिकी नोबेल पुरस्कार: जॉन क्लार्क(John Clarke), मिशेल एच. डेवोरेट (Michel H. Devoret) और जॉन एम. मार्टिनिस(John M. Martinis)


रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को “इलेक्ट्रिक सर्किट में मैक्रोस्कोपिक क्वांटम मैकेनिकल टनलिंग और ऊर्जा क्वांटाइजेशन की खोज के लिए” 2025 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार देने का फैसला किया है। पढ़ना जारी रखें 2025 भौतिकी नोबेल पुरस्कार: जॉन क्लार्क(John Clarke), मिशेल एच. डेवोरेट (Michel H. Devoret) और जॉन एम. मार्टिनिस(John M. Martinis)

2025 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : मैरी ई. ब्रुनको(Mary E. Brunkow), फ्रेड रामस्डेल(Fred Ramsdell ) और शिमोन साकागुची(Shimon Sakaguchi )


कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल असेंबली ने 2025 का फिजियोलॉजी या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार “परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता से संबंधित उनकी खोजों के लिए” निम्नलिखित को देने का निर्णय लिया है: मैरी ई. ब्रुनकोइंस्टीट्यूट फॉर सिस्टम्स बायोलॉजी,सिएटल, अमेरिका फ्रेड रैम्सडेलसोनोमा बायोथेरेप्यूटिक्स,सैन … पढ़ना जारी रखें 2025 चिकित्सा नोबेल पुरस्कार : मैरी ई. ब्रुनको(Mary E. Brunkow), फ्रेड रामस्डेल(Fred Ramsdell ) और शिमोन साकागुची(Shimon Sakaguchi )

फर्मी विरोधाभास या पैराडॉक्स


फर्मी विरोधाभास, जिसे फर्मी पैराडॉक्स भी कहा जाता है, अंतर खगोलीय विकसित सभ्यताओं के अस्तित्व की उच्च संभावना और उनके अस्तित्व के प्रमाणों के अभाव के बीच का विरोधाभास है। यह प्रश्न उठाता है कि ब्रह्मांड की विशालता और आयु के बावजूद, मनुष्य ने अन्य बुद्धिमान जीवन के कोई संकेत क्यों नहीं खोजे हैं। इस विरोधाभास को सबसे पहले 1950 में भौतिक विज्ञानी एनरिको फर्मी ने उजागर किया था, जिन्होंने प्रसिद्ध प्रश्न पूछा था, “सब लोग कहाँ हैं?” पढ़ना जारी रखें फर्मी विरोधाभास या पैराडॉक्स

बारबरा मैकक्लिंटॉक

बारबरा मैकक्लिंटॉक : दुनिया के सबसे महान आनुवंशिकीविदों में से एक


दुनिया के सबसे महान आनुवंशिकीविदों में से एक बारबरा मैकक्लिंटॉक थीं, जो अब तक की सबसे प्रेरणादायक अमेरिकी महिलाओं में से एक हैं। 1902 में हार्टफोर्ड, कनेक्टिकट में जन्मी मैकक्लिंटॉक ने ‘जंपिंग जीन’ की खोज की, डीएनए के टुकड़े जो एक कोशिका में दिए गए गुणसूत्र पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। मैकक्लिंटॉक ने 1992 में 90 वर्ष की उम्र में अपनी मृत्यु तक अपनी प्रयोगशाला में काम किया। सोमवार, 16 जून 2025 को उनकी उम्र 123 वर्ष हो जाती। मैकक्लिंटॉक आज भी अपने आत्मविश्वास, बुद्धिमत्ता और असाधारण निडर भावना से सभी उम्र के वैज्ञानिकों को प्रेरित करती हैं। उन्होंने सभी के लिए एक कालातीत सबक छोड़ा है। बेजोड़ दृढ़ता का सबक। उन्होंने एक बार कहा था, “अगर आपको पता है कि आप सही रास्ते पर हैं, अगर आपके पास यह आंतरिक ज्ञान है, तो कोई भी आपको रोक नहीं सकता… चाहे वे कुछ भी कहें”। पढ़ना जारी रखें बारबरा मैकक्लिंटॉक : दुनिया के सबसे महान आनुवंशिकीविदों में से एक

कैरोलीन हर्शेल (1750-1848) – धूमकेतु की पहचान करने वाली पहली महिला


कैरोलीन हर्शेल (जन्म 16 मार्च, 1750,  हनोवर [जर्मनी] – मृत्यु 9 जनवरी, 1848, हनोवर) एक जर्मन मूल की ब्रिटिश खगोलशास्त्री थीं। उन्हें पहली पेशेवर महिला खगोलशास्त्री माना जाता है। अपनी कड़ी मेहनत के लिए कैरोलीन रॉयल सोसाइटी की सदस्यता से सम्मानित होने वाली पहली महिला थीं जोकि एक रूढ़िवादी संगठन था जिसमें तब तक केवल पुरुष सदस्य थे।

कैरोलीन ने अपने भाई सर विलियम हर्शेल के काम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अकेले ही 1783 में दूरबीन से तीन नीहारिकाओं का पता लगाया और 1786 में वे धूमकेतु की खोज करने वाली पहली महिला बनीं ; अगले 11 वर्षों में उन्होंने सात अन्य धूमकेतुओं को देखा। पढ़ना जारी रखें कैरोलीन हर्शेल (1750-1848) – धूमकेतु की पहचान करने वाली पहली महिला

हिन्दूकुश-हिमालय हुआ अधीर


आजकल हिमालयी क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ खूब हुड़दंग मचा रहा है। जाड़ों के मौसम की उठापटक जो पहले से दिसंबर-जनवरी के महीनों में देखी जाती थी इधर के सालों में जाड़ों की वही बारिश, ओलावृष्टि, बर्फ़बारी की हरकतें फ़रवरी के आख़िरी हफ्तों से मार्च के आख़िर यहाँ तक गर्मियों में भी देखने को मिल रही हैं। पहले ऐसा किसी साल अचानक से देखने को मिलता था अब तो यह लेटलतीफी मौसम की एक आदत सी बन गई है। वहीं बर्फ़ पड़ने में आई कमी आमजन की आँखों ने भी पकड़ी है। बर्फ़ खिसकने की दुर्घटनाएं तो जुबाँ पर चढ़ी ही हुई हैं। माणा में तो अवधाव के चलते 8 मजदूरों की जान भी चली गई। पहाड़ों में बर्फ़ अब कम टिकती है, तो खासोआम सभी आए दिन कहते-सुनते हैं। हिमालय और उसके पार खड़े बर्फ़ के बड़े-बड़े पर्वत, पूरा हिन्दूकुश, वो तिब्बत का पठार, जहाँ-जहाँ तक हमें ये बर्फ़ का अकूत भण्डार मिलता है वहाँ के मिज़ाज में गड़बड़ी आ रही है। पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण ध्रुव के अलावा, उस पूरे क्षेत्र में बिना किसी शोर-शराबा के भारी बदलाव आ रहे हैं। वहाँ की हवा, पानी, मिट्टी, नदी-नाले, जंगलों की दुनिया सबकुछ बदल रहा है बल्कि साफ कहें तो बिगड़ रहा है, बिगड़ चुका है। ये खतरनाक बदलाव क्या हैं, क्यों हैं और इनके क्या भयावह परिणाम होंगे इन सब पर वैज्ञानिक रिपोर्ट आती रहती हैं। ऐसे ही कुछ रिपोर्टों के आधार पर कुछ बातें आपके सामने इस लेख के जरिए लाया हूँ। यह लेख वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान की हिन्दी भाषा पत्रिका अश्मिका में प्रकाशित हुआ है। लेख पोस्ट में टेक्स्ट और तस्वीरों दोनों तौर पर सबकी आसानी के लिए दिया जा रहा है। पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया, राय ज़रूर दीजिएगा। साथ ही हिन्दूकुश-हिमालय के लिए भी सोचने-विचारने के लिए समय निकालएगा। पढ़ना जारी रखें हिन्दूकुश-हिमालय हुआ अधीर