महिला दिवस विशेष : मैरी-ऐन पॉल्ज़ लावोज़िए (1758-1836)


मैरी-ऐन पॉल्ज़ लावोइसियर ने अपने पति एंटोनी के साथ मिलकर कुछ महत्वपूर्ण काम किए, जिसकी वजह से उन्हें आज आधुनिक रसायन विज्ञान की जननी के रूप में याद किया जाता है। 20 जनवरी, 1758 को, मैरी-ऐन का जन्म फ्रांस के लॉयर के मोंटब्रिसन में हुआ था। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, 18वीं सदी में, एंटोनी ही थे, जो उसी काम के लिए दुनिया के शीर्ष पर पहुँचे। हालाँकि, यह मैरी-ऐन ही थीं, जिनकी अवैतनिक और बदनाम मेहनत के बिना, शोध और परिणामी प्रकाशन बिल्कुल असंभव होते। आज, सोमवार, 20 जनवरी को, मैडम लावोइसियर अपना 267वाँ जन्मदिन मना रही होतीं। पढ़ना जारी रखें महिला दिवस विशेष : मैरी-ऐन पॉल्ज़ लावोज़िए (1758-1836)

महिला दिवस विशेष : रोजालिंड फ्रैंकलिन (1920-1958) : डीएनए (DNA) की डबल हेलिक्स संरचना


20वीं शताब्दी की सबसे बड़ी खोज, निर्विवाद रूप से, डीएनए की संरचना की खोज है, जिसने एफएचसी क्रिक, जेडी वॉटसन और मौरिस विल्किंस को 1962 में नोबेल पुरस्कार दिलाया। हालाँकि, इस खोज से जुड़ा एक और नाम है, रोज़ालिंड फ्रैंकलिन, जिसे हमेशा भुला दिया जाता है। फ्रैंकलिन की कहानी, अफसोस की बात है कि 20वीं शताब्दी में विज्ञान में देखा गया सबसे बुरा विश्वासघात है।

25 जुलाई, 1920 को लंदन में जन्मी, रोसालिंड एल्सी फ्रैंकलिन बुद्धिजीवियों, नेताओं और मानवतावादियों के एक प्रसिद्ध एंग्लो-यहूदी परिवार से थीं, जो शिक्षा और सेवा को महत्व देते थे। उसकी माँ के अनुसार, फ्रैंकलिन एक होनहार युवा थी, जो सोलह साल की उम्र में, “अपने पूरे जीवन में जानती थी कि वह कहाँ जा रही थी और अपने विषय के लिए विज्ञान ले रही थी।” फ्रैंकलिन तर्क और निष्पक्षता के साथ-साथ भाषाई योग्यता की मजबूत भावना के साथ एक मेहनती और प्रतिभाशाली छात्र भी थी । अपने पूरे जीवन में, उन्होंने बौद्धिक तर्क को सीखने, पढ़ाने और अपनी समझ को स्पष्ट करने के साधन के रूप में अपनाया। फ्रैंकलिन लोगों को उनके विश्वासों की रक्षा करने के लिए चुनौती देने में कामयाब रही। पढ़ना जारी रखें महिला दिवस विशेष : रोजालिंड फ्रैंकलिन (1920-1958) : डीएनए (DNA) की डबल हेलिक्स संरचना

महिला दिवस विशेष : एलिस बॉल (1892-1916)- अमेरिकी रसायनशास्त्री 


20वीं सदी की शुरुआत में, अपने ज़बरदस्त काम से, एक बहुत तेज़ अफ़्रीकी-अमेरिकी केमिस्ट, एलिस बॉल ने कुष्ठ रोग का इलाज बनाकर मेडिसिन के क्षेत्र में क्रांति ला दी। बॉल 1915 में कॉलेज ऑफ़ हवाई (अब यूनिवर्सिटी ऑफ़ हवाई) से साइंस (केमिस्ट्री) में मास्टर डिग्री पाने वाली पहली महिला थीं। कॉलेज के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में, वह पहली अफ़्रीकी-अमेरिकी रिसर्च केमिस्ट और इंस्ट्रक्टर थीं। 

एलिस ऑगस्टा बॉल का जन्म 24 जुलाई, 1892 को सिएटल, वाशिंगटन में हुआ था और वे केमिकल्स के बीच पली-बढ़ीं। उनके दादा, जे. पी. बॉल, सीनियर, एक जाने-माने फोटोग्राफर थे और US में डैगरियोटाइप में महारत हासिल करने वाले पहले अफ्रीकी-अमेरिकियों में से एक थे। बॉल की मां, पिता और चाची भी फोटोग्राफर थे। 1910 में सिएटल हाई स्कूल से ग्रेजुएशन के बाद, बॉल ने चार साल तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ वाशिंगटन में पढ़ाई की, जहाँ उन्होंने दो डिग्री हासिल कीं: एक फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री में (1912) और दूसरी फार्मेसी में (1914)। पढ़ना जारी रखें महिला दिवस विशेष : एलिस बॉल (1892-1916)- अमेरिकी रसायनशास्त्री 

महिला दिवस विशेष : हेनरीटा स्वान लेविट (1868-1921)


हार्वर्ड कॉलेज वेधशाला ने 1895 में हेनरीटा स्वान लेविट को स्वयंसेवक के रूप में नियुक्त किया, जो कॉलेज में पढ़ाई के दौरान बीमार पड़ने के बाद बहरी हो गई थी। लेविट को निदेशक एडवर्ड पिकरिंग द्वारा प्रति घंटे 30 सेंट का मामूली, लेकिन नियमित भुगतान दिया गया, लेकिन केवल उसके सात साल के परिश्रम के बाद। वेधशाला के फोटोग्राफिक फोटोमेट्री विभाग का नेतृत्व जल्द ही लेविट ने किया, जिन्होंने रैडक्लिफ कॉलेज से स्नातक किया था।

1868 में मैसाचुसेट्स में जन्मी लीविट उन चंद अमेरिकी महिलाओं में से एक थीं जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम थीं। 4 जुलाई 2025 को उनकी आयु 157 वर्ष हो जाती। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के महिला विद्यालय में दाखिला लेने से पहले, जिसका बाद में नाम बदलकर रैडक्लिफ कर दिया गया, लीविट ने ओबरलिन कॉलेज में पढ़ाई की। वहाँ उन्होंने गणित, दर्शन, कला और भाषा का अध्ययन किया। लीविट ने अपने अंतिम वर्ष के दौरान हार्वर्ड कॉलेज वेधशाला में खगोल विज्ञान पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। पढ़ना जारी रखें महिला दिवस विशेष : हेनरीटा स्वान लेविट (1868-1921)

2025 की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ


वर्ष 2025 विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस वर्ष अनुसंधान का केंद्र केवल नई खोजें ही नहीं, बल्कि उन खोजों का समाज, पर्यावरण और मानव जीवन पर सकारात्मक प्रभाव भी रहा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी से लेकर ऊर्जा तक—हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली।
वर्ष 2025 की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ यह दर्शाती हैं कि जब अनुसंधान, तकनीक और मानव-मूल्य एक साथ चलते हैं, तो प्रगति टिकाऊ और व्यापक होती है। यह वर्ष केवल नई खोजों का नहीं, बल्कि विज्ञान को समाज के हर स्तर तक पहुँचाने का भी रहा। आने वाले वर्षों के लिए 2025 ने एक मज़बूत, जिम्मेदार और नवोन्मेषी आधार तैयार किया। पढ़ना जारी रखें 2025 की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ

विज्ञान संचार का जाना-पहचाना चेहरा : प्रोफेसर यश पाल


आसमान में गुब्बारों से ब्रह्मांड के रहस्यों का पता लगाने वाले प्रोफेसर यश पाल को सन् 1972 में अंतरिक्ष अनुसंधान की राह को आगे बढ़ाने के लिए अहमदाबाद में स्पेस एप्लिकेशन सेंटर यानी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र की स्थापना के लिए निदेशक नियुक्त किया गया। उन्होंने कुशलतापूर्वक इस केंद्र की स्थापना की। यह उनका संस्था संस्थापक रूप था जिसे उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी से निभाया। उनमें इतना आत्मविश्वास था कि जब उस केंद्र से कुछ वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजने की बात उठी तो प्रोफेसर यश पाल ने कहा, “अमेरिका हमें क्या सिखाएगा? यह काम हम खुद करके दिखाएंगे।” इतिहास गवाह है कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता में उनके द्वारा स्थापित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई है।

प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी प्रोफेसर सतीश धवन ने प्रोफेसर यश पाल से भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए उपग्रह के उपयोग की परियोजना पर काम शुरू करने के लिए कहा। वे जानते थे कि इस कठिन काम को प्रोफेसर यश पाल जैसा वैज्ञानिक ही अपनी दूरदर्शिता, लगन और मेहनत से मूर्त रूप दे सकता है। यही हुआ। हालांकि कई बाधाएं सामने आईं लेकिन प्रोफेसर यश पाल और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों तथा तकनीशियनों की मेहनत रंग लाई। भारत के 2,400 गांवों में पहली बार सामुदायिक टेलीविजन के सेट लगा दिए गए। और, इस तरह अमेरिकी उपग्रह एटीएस-6 के जरिए शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण करके 1 अगस्त 1975 को सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपरिमेंट यानी ‘साइट’ कार्यक्रम शुरू हो गया। उपग्रह से शिक्षा के क्षेत्र में देश में यह पहला सफल प्रयोग था। इस शैक्षिक कार्यक्रम में विज्ञान की शिक्षा पर अधिक जोर दिया गया।

प्रोफेसर यश पाल शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन लाना चाहते थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इस दिशा में हर संभव प्रयास भी किए। उन्होंने शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कई नए कार्यक्रमों की शुरूआत की। शोध को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालयी केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया। इसी के परिणाम स्वरूप प्रसिद्ध इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फाॅर एस्ट्रोनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स की स्थापना हुई।

प्रचलित शिक्षा पद्धति पर गहराई से विचार करने पर उन्होंने तो यह सुझाव भी दे दिया था कि सभी कालेजों तथा विश्वविद्यालयों को एक साल तक बंद कर देना चाहिए ताकि शिक्षक समाज में जाएं, लोगों से और विद्यार्थियों से मिलें, उनकी कठिनाइयां समझें और उन्हें किस तरह की शिक्षा की जरूरत है, इस पर गंभीरता से विचार कर सकें। उनका यह सुझाव राजनैतिक परिवर्तन के कारण लागू न हो सका। अगर यह सुझाव लागू हो गया होता तो आज शिक्षा पद्धति का चेहरा शायद कुछ और होता। वे चाहते थे कि शिक्षा बोझ न बने। उन्हें सन् 1993 में शिक्षा के राष्ट्रीय सलाहकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उस समिति की रिपोर्ट ‘लर्निंग विदआउट बर्डन’ को आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ माना जाता है। सन् 2009 में उच्च शिक्षा में सुधार के लिए उनकी अध्यक्षता में सरकार ने एक समिति का गठन किया। तब भी प्रोफेसर यश पाल ने इस बात पर जोर दिया था कि स्कूली बच्चों के भारी-भरकम बस्ते का भार कम करना जरूरी है। विद्यार्थियों से वे कहा करते थे, रटो नहीं, विज्ञान को समझो। वे कोचिंग के कुचक्र को भी शिक्षा के खिलाफ साजिश मानते थे और उसे खत्म करने के लिए उन्होंने सिफारिश की थी। छत्तीसगढ़ के फर्जी विश्वविद्यालयों को बंद कराने का ऐतिहासिक मुकदमा प्रोफेसर यश पाल ने स्वयं लड़ा जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की खंड पीठ ने अप्रैल 2005 में वहां के 112 फर्जी विश्वविद्यालयों को बंद करने का फैसला सुनाया।

प्रोफेसर यश पाल ने वैज्ञानिक, शिक्षक, विज्ञान संचारक और प्रशासक के रूप में जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ कई और उत्तरदायित्व भी संभाले। वे योजना आयोग के प्रमुख सलाहकार और यूनीस्पेस के महासचिव और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के सचिव भी रहे। सन् 2007 से 2012 तक वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चांसलर भी रहे। वे इंडियन फिजिक्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी रहे। प्रोफेसर यश पाल भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, इंडियन एस्ट्रोनोमिकल सोसायटी, गुजरात साइंस एकेडमी आदि कई अकादमियों के फैलो थे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रोफेसर यश पाल को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें सन् 1976 में पद्मभूषण और 2013 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए उन्हें 2009 में यूनेस्को का प्रसिद्ध कलिंग पुरस्कार और विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनके समग्र योगदान के लिए सन् 2000 के राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (एनसीएसटीसी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार) के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। विज्ञान संचार में उनके योगदान के लिए उन्हें सन् 1994 में आर्थर क्लाक्र्स पुरस्कार भी दिया गया।

जन विज्ञान के चहेते चेहरे वाले, एक में अनेक प्रोफेसर यश पाल 25 जुलाई 2017 को रात्रि लगभग 8 बजे दिल्ली के निकट नोएडा में इस ग्रह से विदा हो गए। पढ़ना जारी रखें विज्ञान संचार का जाना-पहचाना चेहरा : प्रोफेसर यश पाल