अर्ध-प्रकाशगति(149,896 किमी/सेकंड) से घूर्णन करता श्याम विवर


श्याम विवर(black hole) इस ब्रह्मांड की सबसे विचित्र संरचनाओं मे से एक है। वे ब्रह्माण्ड के ऐसे निरंकुश दानव है जो अपने आसपास फटकने वाले चंद्रमा, ग्रह, तारे और समूचे सौर मंडलो को निगल जाते है। इनकी पकड़ से प्रकाश … पढ़ना जारी रखें अर्ध-प्रकाशगति(149,896 किमी/सेकंड) से घूर्णन करता श्याम विवर

सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!

प्रयोगशाला मे सूर्य का निर्माण : नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) मे एक बड़ी सफलता


सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!
सूर्य की ऊर्जा नाभिकिय संलयन से प्राप्त होती है!

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन के समय से ही नियंत्रित नाभिकिय संलयन(nuclear fusion) द्वारा अनंत ऊर्जा का निर्माण वैज्ञानिको का एक सपना रहा है। यह ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया जो कि किसी भी तरह के प्रदुषण से मुक्त है। लेकिन बहुत से वैज्ञानिक इसे विज्ञान फतांशी की प्रक्रिया मानकर नकार चूके है। अभी भी लक्ष्य दूर है लेकिन पहली बार वैज्ञानिको को नाभिकिय संलयन की प्रक्रिया मे ऊर्जा के उत्पादन करने मे सफलता मीली है। यह घोषणा लारेंस लिवेरमोर नेशनल प्रयोगशाला(Lawrence Livermore National Laboratory) के नेशनल इग्नीशन विभाग(National Ignition Facility) के वैज्ञानीक ओमार हरीकेन(Omar Hurricane) द्वारा की गयी है और इसे नेचर पत्रिका मे प्रकाशित किया गया है।

जब दो हल्के परमाणु नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के परमाणु नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है। जिसे अल्बर्ट आइंस्टीन के समीकरण E = mc2 से ज्ञात करते हैं। तारों के अन्दर यह क्रिया निरन्तर जारी है। सबसे सरल संयोजन की प्रक्रिया है चार हाइड्रोजन परमाणुओं के संयोजन द्वारा एक हिलियम परमाणु का निर्माण।

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M82 आकाशगंगा का हब्बल दूरबीन से लिया चित्र

नया सुपरनोवा: M82 आकाशगंगा मे एक श्वेत वामन तारे की मृत्यु


M82 आकाशगंगा की सुपरनोवा विस्फोट से पहले और पश्चात के चित्र का एनीमेशन
M82 आकाशगंगा की सुपरनोवा विस्फोट से पहले और पश्चात के चित्र का एनीमेशन

अंतरिक्ष और खगोल भौतिकी मे रूची रखने वालो के लिये एक बेहतरीन समाचार है। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी की पडोसी आकाशगंगा M82(Messier 82 ,NGC 3034, Cigar Galaxy या M82) मे 22 जनवरी को एक सुपरनोवा विस्फोट देखा गया है। इस सुपरनोवा विस्फोट की दीप्ति इतनी अधिक है कि इसे छोटी दूरबीन से भी देखा जा सकता है। M82 आकाशगंगा को उत्तरी गोलार्ध मे सूर्यास्त के पश्चात रात्री आकाश मे आसानी से देखा जा सकता है। यह एक टाईप -Ia सुपरनोवा विस्फोट है। खगोल वैज्ञानिको को इस तरह के सुपरनोवा विस्फोटो का इंतजार रहता है, और यह एक बेहतरीन अवसर है।

M82 आकाशगंगा की सुपरनोवा विस्फोट से पहले और पश्चात के चित्र, इसकी दीप्ति 11.7 है। यह सुपरनोवा आकाशगंगा के प्रतल मे उसके केंद्र से 54″ पश्चिम तथा 21″ दक्षिण है।
M82 आकाशगंगा की सुपरनोवा विस्फोट से पहले और पश्चात के चित्र, इसकी दीप्ति 11.7 है। यह सुपरनोवा आकाशगंगा के प्रतल मे उसके केंद्र से 54″ पश्चिम तथा 21″ दक्षिण है।

खगोल वैज्ञानिको के अनुसार वर्तमान मे इस सुपरनोवा की दीप्ति +11 से +12 तक है, इस कारण से इसे नंगी आंखो से नही देखा जा सकता है। इसे देखने के लिये आपको 4 ईंच की दूरबीन चाहीये होगी। हमसे लगभग 120 लाख प्रकाशवर्ष दूर यह सबसे दीप्तिमान और समीप का सुपरनोवा है, इसके पहले ऐसा नज़दीकी सुपरनोवा M81 आकाशगंगा मे 21 वर्ष पूर्व 1993 मे देखा गया था। M81, M82 तथा NGC 3077 एक दूसरे से बंधी हुयी आकाशगंगाये है।(नंगी आखो से आप +6 तक की दीप्तिमान तारे ही देख सकते है, यह मानक जितना कम होगा पिंड उतना ही ज्यादा चमकदार होगा। पौर्णिमा के चंद्रमा की दीप्ति –12.7 है।) पढ़ना जारी रखें “नया सुपरनोवा: M82 आकाशगंगा मे एक श्वेत वामन तारे की मृत्यु”

टर्मीनेटर फिल्म श्रृंखला का "टर्मीनेटर रोबोट"

आत्म चेतन मशीन – संभावना, तकनीक और खतरे(Self-aware machine : Possibilities, Technology and associated dangers)


टर्मीनेटर फिल्म श्रृंखला का "टर्मीनेटर रोबोट"
टर्मीनेटर फिल्म श्रृंखला का “टर्मीनेटर रोबोट”

मशीनी मानव। एक ऐसी मानव कल्पना जिसमे मशीनें मानव को विस्थापित कर उसके अधिकतर कार्य करेंगी। मानवों का विस्थापन दोहरा अर्थ रखता है, यदि उसके द्वारा किये गये श्रम का विस्थापन हो तो वह मानव जाति के उत्थान मे सहायक हो सकता है। लेकिन यदि मशीनें मानव जाति को ही विस्थापित करने लग जाये तब यह स्थिति एक दू:स्वप्न को जन्म देती है।

क्या मशीनी मानव संभव है ? क्या मशीने मानव को विस्थापित कर सकती है? क्या मशीने मानव मस्तिष्क के तुल्य हो सकती है? क्या उनमें मानवों जैसी भावनायें आ सकती है? क्या कृत्रिम बुद्धी का निर्माण संभव है ? ढेर सारे प्रश्न है, ढेर सारी संभावनाएं !

टर्मीनेटर 2 : जजमेंट डे

“लास एन्जेल्स, वर्ष 2029. सभी स्टील्थ बमवर्षक विमानो मे नये तंत्रिकीय संसाधक(neural processors) लगा दिये गये है और वे पूर्णतः मानव रहित बन गये है। उनमे से एक स्कायनेट ने ज्यामितीय दर से सीखना प्रारंभ किया है। वह 2:14 बजे सुबह पूर्वी अमरीकी समय अगस्त 29 को आत्म चेतन हो गया।

“Los Angeles, year 2029. All stealth bombers are upgraded with neural processors, becoming fully unmanned. One of them, Skynet, begins to learn at a geometric rate. It becomes self-aware at 2:14 a.m. eastern time, August 29.”

यह जेम्स कैमरान द्वारा निर्देशित फ़िल्म “टर्मीनेटर 2- जजमेंट डे” मे दर्शाया गया भविष्य है। स्कायनेट का आत्म-चेतन होना और उसका मानवता पर आक्रमण मानव और रोबोट के मध्य एक युद्ध का आरंभ करता है और यही युद्ध टर्मीनेटर फिल्म श्रृंखला की हर फिल्म का पहला दृश्य होता है।

2000 ए स्पेस ओडीसी का Hal 9000
2000 ए स्पेस ओडीसी का Hal 9000

1950 के दशक के प्रारंभ से ही विज्ञान फतांसी फिल्मो मे रोबोट को मानव निर्मित एक ऐसी परिष्कृत मशीन के रूप मे दर्शाया जाता रहा है  जो वह ऐसे जटिल कार्य आसानी से कर सकती है जो मानव के लिये करना कठिन है। उदाहरण स्वरूप गहरी खतरनाक खानो मे खुदायी करना, सागर की तलहटी मे कार्य करना इत्यादि। इन  फिल्मो मे अक्सर रोबोट को आकाशगंगाओं के मध्य यात्रा करने वाले अंतरिक्षयानो के चालक और नियंत्रक के रूप मे दर्शाया जाता रहा है। दूसरी ओर इन रोबोटो को एक ऐसे खलनायक के रूप मे भी दर्शाया गया है जो भस्मासूर की तरह अपने निर्माता मानव को ही नष्ट कर देना चाहते है। इसके सबसे बडा उदाहरण आर्थर क्लार्के और स्टेनली कुब्रिक की फिल्म “2001 ए स्पेस ओडीसी” का कंप्यूटर “HAL 9000” है।

इस फिल्म मे HAL सारे अंतरिक्ष यान के परिचालन के अतिरिक्त , अंतरिक्षयात्रीयों से प्यार से बातें करता है, शतरंज खेलता है, चित्रो की सुंदरता का विश्लेष्ण करता है, यानकर्मीयों की भावनाओं को समझ लेता है लेकिन वह अभियान के पूर्व निर्धारित मूल उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह पांच अंतरिक्षयात्रीयों मे से चार की हत्या भी कर देता है। अन्य विज्ञान फंतासी फिल्म जैसे “मैट्रिक्स” और “टर्मीनेटर” मे इससे भी भयावह चित्र का चित्रण किया गया है जिसमे रोबोट बुद्धिमान और आत्म जागृत हो कर मानव जाति को अपना ग़ुलाम बना लेते है।

बहुत कम ही फिल्मो मे रोबोट को एक विश्वसनिय सहयोगी के रूप मे दर्शाया गया है जो मानव के साथ सहयोग करते है और उनके खिलाफ षडयंत्र नही रचते है। राबर्ट वाईज की 1951 मे आई फिल्म “द डे द अर्थ स्टूड स्टिल” मे गार्ट पहला रोबोट(परग्रही रोबोट) है जो कैप्टन कलातु को मानवता को एक संदेश देने मे सहायता करता है। यह फिल्म दोबारा बनी जिसमे कैप्टन कलातु का पात्र किनु रीव्ज(मैट्रीक्स श्रृंखला के नियो) ने निभाया था।

जेम्स कैमरान द्वारा निर्देशीत एलीयंस 2 मे ’बिशप” एन्ड्राईड(एन्ड्राईड- मानव सदृश्य रोबोट)  का कार्य यात्रा के दौरान अंतरिक्षयान का परिचालन और यात्रीयों की सुरक्षा है। HAL और एलीयन 1 के रोबोट के विपरित बिशप पूरे अभियान के दौरान किसी त्रुटि का शिकार नही होता है और अपने कार्य के लिये ईमानदार रहता है। इस फिल्म के अंतिम दृश्यो मे बिशप को एलीयन दो टुकड़ो मे तोड देता है लेकिन वह एलन रीप्ले को बचाने ले लिये अपना हाथ देता है। जेम्स कैमरान की फिल्मो मे पहली बार किसी रोबोट पर विश्वास किया गया था और उसे एक नायक के रूप मे दर्शाया गया था।

रोबोकाप
रोबोकाप

1987 मे आयी रोबोकाप मे एक रोबोट कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये मानवता की मदद करता है लेकिन वह पूर्णतः यांत्रिक नही है, वह सायबोर्ग है जोकि यंत्र और जैविक प्रणाली का मिश्रण है; आधा मानव, आधा मशीन।

इन सभी फिल्मो मे मानव मन मे तकनीक पर चल रहे अंतर्द्वद्व  को सफलतापूर्वक दर्शाया गया है, एक ओर इन फिल्मो मे मानव की तकनीक से चाहत दर्शायी गयी है; दूसरी ओर मानव मन मे अपनी ही द्वारा निर्मित तकनीक से भय दर्शाया गया है। एक ओर मानव रोबोट को अपनी एक ऐसी चाहत के रूप मे देखता है जो उसे अमरता प्रदाण कर सकती है और एक ऐसे मजबूत और अविनाशी कलेवर मे है जिसकी बुद्धिमत्ता, तंत्रिकातंत्र और क्षमता किसी मानव से कई गुणा बेहतर है। दूसरी ओर उसके मन मे डर समाया हुआ है कि अत्याधुनिक तकनीक जो आम लोगो के लिये रहस्यमयी है ,उसके नियंत्रण से बाहर जा सकती है और अपने ही निर्माता के विरोध मे कार्य कर सकती है, और यही डर HAL 9000, टर्मीनेटर और मैट्रिक्स मे दिखाया गया है। आइजैक आसीमोव द्वारा उनके रोबोटो मे प्रयुक्त पाजीट्रानीक मस्तिष्क मे भी यही भय अंतर्निहीत है, वह ऐसी आधुनिक तकनीक से निर्मित है जिसकी सूक्ष्म स्तर पर कार्यप्रणाली को वर्तमान मे कोई नही जानता है और इन रोबोटो का निर्माण कार्य पूर्णतः स्वचालित है।

कंप्यूटर विज्ञान मे हालिया प्रगति ने नये विज्ञान फतांशी रोबोटो के गुणों को भी प्रभावित किया है।  कृत्रिम न्युरल नेटवर्क ने टर्मीनेटर रोबोट पर प्रभाव डाला है, वह बुद्धिमान है तो है ही, साथ ही मे वह अनुभव से सीख भी सकता है।

इस फिल्म मे टर्मीनेटर रोबोट काल्पनिक रोबोट की प्राथमिक अवस्था वाला प्रतिरूप है। वह चल सकता है, बोल सकता है, मानव के जैसे देख और व्यवहार कर सकता है। उसकी बैटरी 120 वर्ष तक ऊर्जा दे सकती है साथ मे ही किसी अप्रत्याशित दुर्घटना की अवस्था मे उसके पास पर्यायी ऊर्जा व्यवस्था है। लेकिन इस सबसे  महत्वपूर्ण है कि वह सीख सकता है। उसे नियंत्रण करने के लिये न्युरल-नेट प्रोसेसर है, जो अपने अनुभव से सीखने वाले कंप्यूटर है।

इस फिल्म मे दार्शनिक कोण से सबसे रोचक बात यह है कि यह एक ऐसा न्युरल प्रोसेसर है कि वह घातांकी दर(exponential rate) से सीखता है और कुछ समय पश्चात आत्म-जागृत हो जाता है। इस तरह से यह फिल्म महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है जो कृत्रिम चेतना से संबधित है। क्या रोबोट मे कृत्रिम चेतना आ सकती है, क्या वे आत्म जागृत हो सकते है ? यदि हाँ तो इसके क्या परिणाम होंगे ? इस कृत्रिम चेतना, आत्म जागृति के दुष्परिणामो से कैसे बचा जाये ? पढ़ना जारी रखें “आत्म चेतन मशीन – संभावना, तकनीक और खतरे(Self-aware machine : Possibilities, Technology and associated dangers)”

हिग्स बोसान, नोबेल पुरस्कार, धर्म और भारत


 वैज्ञानिक पीटर हिग्स और फ्रांसोआ एंगलर्ट
वैज्ञानिक पीटर हिग्स और फ्रांसोआ एंगलर्ट

स्विट्जरलैंड में महाप्रयोग के दौरान ब्रह्मांड का सबसे छोटा कण खोजने वाले दो वैज्ञानिकों को इस साल भौतिक शास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस कण ही खोज पिछले साल हुई है।

ब्रिटेन के 80 साल के वैज्ञानिक पीटर हिग्स और बेल्जियम के फ्रांसवा एंगलर्ट को भौतिकी के लिए 2013 का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा। उन्होंने इस अति सूक्ष्म कण हिग्स बोसान के अस्तित्व के बारे में 1964 में ही भविष्यवाणी की थी। नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा है कि इस भविष्यवाणी के बाद यह बताना संभव हुआ कि हिग्स कण का भी द्रव्यमान होता है।

दोनों वैज्ञानिकों को 80 लाख क्रोनर की इनामी राशि दी जाएगी। पिछले साल जुलाई में दुनिया के सबसे बड़े प्रयोग के बाद स्विट्जरलैंड की सर्न(CERN) प्रयोगशाला ने इस सूक्ष्म कण के अस्तित्व का एलान किया था। इसके बाद से ही इन दोनों को नोबेल पुरस्कार का दावेदार बताया जाने लगा।

पुरस्कार की घोषणा करते हुए रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ साइंसेज ने एक बयान में कहा, “पुरस्कृत सिद्धांत पार्टिकल भौतिकी के मानक का केंद्रीय हिस्सा है, जो बताता है कि हमारे ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ।”
हिग्स कण का सिद्धांत 1964 में एडिनबरा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रोफेसर पीटर हिग्स ने अपनी टीम के पांच सदस्यों के साथ दिया। प्रोफेसर हिग्स ने तब कहा था कि एक दिन विज्ञान हिग्स कणों तक पहुंच जाएगा। उन्होंने इस दिन के बारे में कभी कहा था, “मुझे अपने जीवन में ऐसा होने की उम्मीद नहीं है और मैं अपने परिवार वालों से कहूंगा कि वह फ्रिज में कुछ शैंपेन रख दें। एक न एक दिन विज्ञान यहां तक पहुंच ही जाएगा, तब फ्रिज वाली शैंपेन निकाल कर जश्न मनाया जाएगा।” हालांकि हिग्स के जीते जी न सिर्फ इस कण के अस्तित्व का पता चला, बल्कि उन्हें इस विशाल खोज के लिए नोबेल पुरस्कार भी दिया जा रहा है। यानी उनके लिए फ्रिज से शैंपेन निकालने का वक्त आ गया है।

बोसान कणों की अवधारणा भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस ने रखी थी। बोस के ही नाम पर इन कणों को बोसान कहा जाता है। पढ़ना जारी रखें “हिग्स बोसान, नोबेल पुरस्कार, धर्म और भारत”

हिग्स बोसान संबधित 10 महत्वपूर्ण तथ्य


  1.  हिग्स बोसान ’ईश्वर कण’ नही है। जी हाँ लोग उसे ईश्वर कण कहते है क्योंकि लेओन लेडरमैन ने अपननी ’ईश्वर कण” नामक पुस्तक मे हिग्स बोसान को यह नाम दिया था। यह पुस्तक के विपणन के लिये एक अच्छा नाम था लेकिन वैज्ञानिक रूप से गलत था। इसी पुस्तक मे लेखक लेओन लेडरमैन तथा सह लेखक डीक टेरेसी ने लिखा है कि प्रकाशक इस पुस्तक का नाम ’गाडडैम पार्टीकल’ रखने के लिये तैयार नही था जबकि यह नाम हिग्स कण को खोजने मे आने वाली कठिनाईयों तथा अधिक लागत के संदर्भ मे उपयुक्त नाम था।
  2.  हिग्स बोसान के लिये नोबेल मिलेगा लेकिन किसे ? हम नही जानते है। हिग्स बोसान का आईडीया 1963 तथा 1964 के बहुत से शोधपत्रो के द्वारा प्रकाश मे आया था। एक शोधपत्र फ्रांसवा एन्ग्लेर्ट(Francois Englert) तथा राबर्ट ब्राउट (Robert Brout) का था, दो शोधपत्र पिटर हिग्स(Peter Higgs) के और एक शोधपत्र गेराल्ड गुरानिक(Gerald Guralnik) ,रिचर्ड हेगन(Richard Hagen) तथा टाम किबल(Tom Kibble) का था। परंपराओं के अनुसार एक वर्ष मे भौतिकी का नोबेल अधिकतम तीन लोगों को दिया जाता है। इसलिये चयन कठिन है। हिग्स बोसान की सैद्धांतिक खोज के साथ प्रायोगिक खोज भी महत्वपूर्ण है लेकिन इसमे समस्त विश्व मे फैले लगभग 7000 वैज्ञानिको का योगदान है जोकि नोबेल पुरस्कार के चयन को और कठिन बनाता है। यह संभव है कि लार्ज हेड्रान कोलाइडर( Large Hadron Collider) के निर्माताओं मे से किसी को नोबेल दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी संभव है कि तीन व्यक्तियों के नियमो से बाहर जाकर शांति के नोबेल की तरह इसे एक संस्था को दिया जाये। पढ़ना जारी रखें “हिग्स बोसान संबधित 10 महत्वपूर्ण तथ्य”