सभ्यताओं का उदय: जब खगोलविज्ञान और ज्यामिति ने आकार लिया


संध्या का समय था। घर की छत पर अपनी दूरबीन स्थापित कर रहा था। छत पर मेरे साथ और अनुषा इस सारी प्रक्रिया को देख रहे थे। आकाश साफ़ था, तारे धीरे धीरे चमकने लगे थे, चन्द्रमा भी क्षितिज में ऊपर आ रहा था।

गार्गी : “पापा, ये तारे कैसे बने?”
अनुषा : “और लोग पहले बिना घड़ी के समय कैसे जानते थे?”

मै अपनी दूरबीन को स्थापित कर चूका था, जानता था कि ये सारे प्रश्न आने ही वाले है।

मै : “तुम्हारे प्रश्न ही विज्ञान की शुरुआत हैं, क्या तुम समय की यात्रा कर विज्ञान की कहानी देखना चाहोगे?”

दोनों बच्चे उत्साह से उछल पड़े “हाँ!”

मैने एक चित्रों वाली एक पुस्तक खोली और अचानक चारों ओर प्रकाश फैल गया।

पुस्तक में एक चमकीले तारे का चित्र था। उस चित्र को बच्चों को दिखाया और पूछा इस तारें को जानते हो ?

दोनों समवेत स्वर में बोले, “नहीं!”

यह सिरिअस तारा है, और अपनी दूरबीन को आसमान में उस तारे की और घुमा दिया। इस तारे को अब दूरबीन से देखो और बताओ कि इसमें क्या विशेषता है ?

गार्गी : ये नीले रंग का तारा है।
अनुषा : ये बाकी तारों से अधिक चमकीला तारा है।

बिलकुल सही पहचाना। क्या तुम जानते हो कि यह तारा प्राचीन मानव सभ्यताओं को भी ज्ञात था, लगभग सारी सभ्यताओं ने इसे कोई ना कोई नाम दिया था। प्राचीन मिस्र में इस तारे को ‘सोपडेट’ कहा जाता था, यूनानी इसे ‘डॉग स्टार’ कहते थे जबकि भारत में इसे ‘मृगव्याध’ या ‘लुब्धक’ कहा गया। प्राचीन चीन में इस तारे को ‘स्वर्गीय भेड़िया’ (Heavenly Wolf) कहा जाता था।

अब एक रहस्य सुनो अफ्रिका के माली में एक जनजाति रहती है, ‘डोगन (Dogon)’ उनका दावा था कि सिरिअस के साथ एक अदृश्य साथी तारा भी है। आधुनिक विज्ञान ने बाद में सीरिअस B की खोज की लेकिन डोगोन जनजाति को इसका ज्ञान पहले से था। यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है कि उन्हें यह जानकारी कैसे मिली।”

जब अगली बार तुम रात में सिरिअस को देखो तो उसे केवल एक साधारण तारा मत समझना, वह हजारों वर्षों की मानव सभ्यता की कहानी है।

क्या तुम तारे के महत्त्व के बारे में और जानना चाहोगे ?

गार्गी : “बिलकुल जानना चाहेंगे!”

चलो हम समय यात्रा कर प्राचीन मिस्र में चलते है, जहाँ नील नदी किनारे एक बड़ी समस्या पर चर्चा हो रही है। पढ़ना जारी रखें सभ्यताओं का उदय: जब खगोलविज्ञान और ज्यामिति ने आकार लिया

विज्ञान यात्रा : शून्य से अनंत की ओर


कल्पना कीजिए एक अंधेरी रात में

मिश्र में नील के किनारे एक मिस्री पुजारी।

गंगा के तट पर एक यज्ञ के लिए वेदी निर्माण की योजना बनाता ऋषि।

बीजिंग में एक खगोल अधिकारी।

माया पिरामिड पर खड़ा एक विद्वान।

एथेंस में प्लेटो का शिष्य।

ये सभी आकाश देख रहे हैं। वे एक दूसरे को नहीं जानते, उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता नहीं। पर वे एक ही काम कर रहे हैं, समय को पकड़ने की कोशिश।

आप प्राचीन मिस्र में हैं। आपके सामने रेगिस्तान फैला है और  दूर बह रही है एक नदी, नील।

हर वर्ष नील उफनती है, बाढ़ आती है। सारे खेत डूब जाते है। सारी सीमाएँ मिट जातीं है। लेकिन नील वरदान दे जाती है , जब पानी उतरता तो भूमि उर्वर हो जाती।

पर समस्या यह थी, सीमाएँ कहाँ थीं? खेत किसका था?

यहीं से गणित की शुरुआत हुई। मिस्र के “रस्सी खींचने वाले” (rope stretchers) लोग लंबी गांठदार रस्सियों से भूमि नापते। वे समकोण बनाते, त्रिभुज बनाते, क्षेत्रफल निकालते। उन्हें पता था, यदि एक त्रिभुज में भुजाओं का अनुपात 3:4:5 हो, तो वह समकोण त्रिभुज है।

आज हम इसे इस रूप में जानते हैं: a2 + b2 = c2

यह सूत्र बाद में यूनान में प्रसिद्ध हुआ, लेकिन मिस्र और भारत में इसका व्यावहारिक उपयोग पहले से ज्ञात था।

यह केवल ज्यामिति नहीं थी। यह कृषि, कर-व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का आधार था।

इन मिस्री पुजारियों के सामने एक और जीवन मरण का प्रश्न था, कि नील  कब बहेगी? पढ़ना जारी रखें विज्ञान यात्रा : शून्य से अनंत की ओर

2020 एबेल पुरस्कार : हिलेल फ़स्टनबर्ग एवं ग्रिगोरी मारग्यूलस्


गणित की अभूतपूर्व खोजों को सम्मानित करने के लिए नोबेल पुरस्कारों के समकक्ष ‘एबेल पुरस्कार’ दिया जाता है। कह सकते हैं कि यह गणित का नोबेल है। एबेल पुरस्कार की शुरूआत यूरोप महाद्वीप में बसे एक देश नाॅर्वे ने साल … पढ़ना जारी रखें 2020 एबेल पुरस्कार : हिलेल फ़स्टनबर्ग एवं ग्रिगोरी मारग्यूलस्

महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन


RamanujanSrinivasa-Color800pxश्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीयगणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।

ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किमी दूर इरोड नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जब एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार पवित्र तीर्थस्थल कुंभकोणम में आकर बस गया था। इनके पिता यहाँ एक कपड़ा व्यापारी की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। पाँच वर्ष की आयु में रामानुजन का दाखिला कुंभकोणम के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया। पढ़ना जारी रखें “महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन”

हमने अंको के बारे मे कैसे जाना ? : आइजैक आसीमोव


अंक उन चिह्नों को कहते हैं जिनसे गिनतियाँ सूचित की जाती हैं, जैसे 1, 2, 3. . .4। स्वयं गिनतियों को संख्या कहते हैं। यह निर्विवाद है कि आदिम सभ्यता में पहले वाणी का विकास हुआ और उसके बहुत काल … पढ़ना जारी रखें हमने अंको के बारे मे कैसे जाना ? : आइजैक आसीमोव

आर्यभट : प्राचीन भारत की महान खगोलीय प्रतिभा


लेखक : प्रदीप आर्यभट प्राचीन भारत के सर्वाधिक प्रतिभासंपन्न गणितज्ञ-ज्योतिषी थे। वर्तमान में पश्चिमी विद्वान भी यह स्वीकार करते हैं कि आर्यभट प्राचीन विश्व के एक महान वैज्ञानिक थे। यद्यपि हम आर्यभट का महत्व इसलिए देते हैं क्योंकि सम्भवतः वे … पढ़ना जारी रखें आर्यभट : प्राचीन भारत की महान खगोलीय प्रतिभा