विज्ञान की नित नयी जानकारी इन्द्रजाल मे उपलब्ध कराने का एक प्रयास !
लेखक: आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी में 22 वर्षों से कार्यरत। विज्ञान पर शौकिया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग 'विज्ञान विश्व' तथा खगोल शास्त्र को समर्पित 'अंतरिक्ष' । एक संशयवादी (Skeptic) व्यक्तित्व!
आपको बरमूडा त्रिभुज कोई ऐसा नक्शा नही मिलेगा जो इस क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता हो। कुछ व्यक्तियों की मान्यताओं के अनुसार यह एक ऐसा रहस्यमय क्षेत्र है जहाँ पर वायुयान और जलयान रहस्यमय रूप से लापता होते हैं। 1964 मे एक पत्रिका ने इस क्षेत्र को बरमूडा त्रिभुज नाम दिया था, तब से इस क्षेत्र सनसनीखेज समाचारों/कहानियों के लेखकों की कलम चलती रही है। यह बरमूडा त्रिभुज , जिसे “शैतान के त्रिभुज” के रूप में भी जाना जाता है , उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर का एक क्षेत्र है जिसमे कुछ विमान और सतही जहाज (surface vessels) गायब हो गए हैं. कुछ लोगों का दावा है कि ये गायब होने की बातें “मानव त्रुटि (human error)” या “प्रकृति के कृत्यों (acts of nature)” की सीमाओं के परे है. लोकप्रिय संस्कृति ने गायब होने की कुछ घटनाओं को अपसामान्य (paranormal), भौतिकी के नियमों (laws of physics) के निलंबन, या भूमि से परे की जीवित वस्तुओं (extraterrestrial beings) की गतिविधियों से सम्बद्ध बताया है।लेकिन जब आप इस क्षेत्र की और उससे जुडी दुर्घटनाओं की गहराई से जांच पड़ताल करते है तो पाते है कि इस रहस्यमय क्षेत्र मे कोई रहस्य ही नही है। इस क्षेत्र मे हुयी अधिकतर दुर्घटना का संतोषजनक स्पष्टीकरण उपलब्ध है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि बरमूडा त्रिभुज मे विचित्र अनुभव के दावे आधारहीन है?
ऐसा भी नही है, वैज्ञानिको ने इस क्षेत्र मे सामान्य समुद्री क्षेत्र की तुलना मे कुछ अलग गुण पाये है और इस क्षेत्र की सागर तलहटी पर कुछ विचित्र संरचनाये भी पायी है। और इस क्षेत्र के कथित रहस्यमय व्यवहार की अवधारणा पर विश्वास करने वालों के लिये इतना ही पर्याप्त है और वे तिल का ताड़ बनाने मे सक्षम है।
इस लेख मे हम इस क्षेत्र से जुड़े कुछ तथ्यों और हुयी दुर्घटनाओं पर चर्चा करेंगे। साथ ही मे हम इस क्षेत्र से जुड़ी हुयी कुछ विचित्र मनगढ़ंत कहानीयाँ जैसे परग्रही द्वारा अपहरण(Alien Abduction), अटलांटीस सभ्यता की मशीनें या श्याम विवर जैसी कहानियो को भी देखेंगे। इसके अतिरिक्त हम इस क्षेत्र मे होने वाली दुर्घटनाओं के साधारण और संभव कारणों की जांच पड़ताल भी करेंगे।
आधिकारिक रूप से बरमूडा त्रिभुज जैसे किसी क्षेत्र का अस्तित्व नही है। सं रा अमरीका का भौगोलिक नामकरण संस्थान किसी भी ऐसे क्षेत्र की उपस्थिति से इंकार करता है। लेकिन आम मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र अटलांटिक महासागर मे सं रां अमरीका के दक्षिणी समूद्री सीमा मे स्थित है और इसके तीन शीर्ष बिंदु बरमूडा द्वीप, फ्लोरिडा राज्य का मियामी शहर और प्युर्टो रीको राज्य का सान जुआन द्वीप है। यह क्षेत्र 500,000 वर्ग मील मे फैला हुआ है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार को जियोसिनक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण वाहन) यानी जीएसएलवी डी-5 (GSLV D5)का सफल प्रक्षेपण किया जो इस लिहाज़ से अहम था कि भारत का अपना क्रायोजेनिक इंजन लगा हुआ था। जीएसएलवी डी-5 को रविवार शाम 4।18 बजे श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी डी-5 ने जीसैट-14 संचार उपग्रह को सफलतापूर्व उसकी कक्षा में स्थापित कर दिया।
ये वही इंजन है जिसे भारत को विकसित करने में बीस वर्ष का समय लगा, जिसकी तकनीक को भारत अपने पड़ोसी देश रूस से हासिल करना चाहता था। लेकिन अमरीका के दबाव में रूस ने भारत को ये तकनीक नहीं दी थी। बीस वर्ष बाद ही सही भारत ने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक में महारथ हासिल कर ली है। इस तकनीक का महत्व इस तथ्य में निहित है कि दो हज़ार किलो वज़नी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए क्रायोजेनिक इंजन की सख़्त ज़रूरत पड़ती है। इसकी वजह ये है कि इसी इंजन से वो ताक़त मिलती है, जिसके बूते किसी उपग्रह को 36,000 किलोमीटर दूर स्थित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया जाता है। इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही ये कहा जा सकता है कि भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में अब हर तरह की उपलब्धि हासिल कर ली है।
इस रॉकेट के सफल प्रक्षेपण से दूसरे देशों के संचार उपग्रह भी भारत के लॉन्च पैड से छोड़े जा सकेंगे। इसकी कामयाबी इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले “20 साल में कोई देश ऐसा नहीं है” जिसने क्रायोजेनिक तकनीक का विकास किया हो।
भारत का छोटा रॉकेट पीएसएलवी (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल PSLV) यानी ध्रुवीय प्रक्षेपण यान बहुत क़ामयाब है। भारत अपने उपग्रह ख़ुद बना रहा है। क्रायोजनिक इंजन भारत के संचार उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करेगा। भारत जब अपना चंद्रयान-2 मिशन आरंभ करेगा, उसके लिए भी जीएसएलवी की ज़रूरत होगी।
2013 की यह वार्षिक रपट WordPress.com सांख्यिकी विभाग के सहायक बंदरों द्वारा विज्ञान विश्व के लिये तैयार की गयी है. इस रपट के मुख्य अंश: लुवरे संग्रहालय (The Louvre Museum) में सालाना 85 लाख दर्शक आते है। इस ब्लाग पर 2013 मे 120,000 पाठक आये। यह सँख्या लुवरे संग्रहालय के पाँच दिन की दर्शक संख्या के बराबर है। Click here to see the complete report. पढ़ना जारी रखें 2013 में विज्ञान विश्व
सोने से मानव सभ्यता का लगाव दिलचस्प है। रसायन विज्ञान की नज़र से देखें तो यह उतना धातु उदासीन सी है क्योंकि यह शायद ही किसी धातु से अभिक्रिया करता है।
सोना एक धातु एवं तत्व है । शुद्ध सोना चमकदार पीले रंग का होता है जो कि बहुत ही आकर्षक रंग है। यह धातु बहुत मूल्यवान है और प्राचीन काल से सिक्के बनाने, आभूषण बनाने एवं धन के संग्रह के लिये प्रयोग की जाती रही है। सोना घना, मुलायम, चमकदार, सर्वाधिक संपीड्य (malleable) एवं तन्य (ductile) धातु है। रासायनिक रूप से यह एक तत्व है जिसका प्रतीक (symbol) Au एवं परमाणु क्रमांक 79 है। यह एक ट्रांजिशन धातु है। अधिकांश रसायन इससे कोई क्रिया नहीं करते। सोने के आधुनिक औद्योगिक अनुप्रयोग हैं – दन्त-चिकित्सा में, इलेक्ट्रॉनिकी में।
स्वर्ण के तेज से मनुष्य अत्यंत पुरातन काल से प्रभावित हुआ है क्योंकि बहुधा यह प्रकृति में मुक्त अवस्था में मिलता है। प्राचीन सभ्यताकाल में भी इस धातु को सम्मान प्राप्त था। ईसा से 2500 वर्ष पूर्व सिंधु घाटी की सभ्यताकाल में (जिसके भग्नावशेष मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिले हैं) स्वर्ण का उपयोग आभूषणों के लिए हुआ करता था। उस समय दक्षिण भारत के मैसूर प्रदेश से यह धातु प्राप्त होती थी। चरकसंहिता में (ईसा से 300 वर्ष पूर्व) स्वर्ण तथा उसके भस्म का औषधि के रूप में वर्णन आया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्वर्ण की खान की पहचान करने के उपाय धातुकर्म, विविध स्थानों से प्राप्त धातु और उसके शोधन के उपाय, स्वर्ण की कसौटी पर परीक्षा तथा स्वर्णशाला में उसके तीन प्रकार के उपयोगों (क्षेपण, गुण और क्षुद्रक) का वर्णन आया है। इन सब वर्णनों से यह ज्ञात होता है कि उस समय भारत में सुवर्णकला का स्तर उच्च था।
इसके अतिरिक्त मिस्र, ऐसीरिया आदि की सभ्यताओं के इतिहास में भी स्वर्ण के विविध प्रकार के आभूषण बनाए जाने की बात कही गई है और इस कला का उस समय अच्छा ज्ञान था।
आवर्त सारणी(पीरियोडिक टेबल ) के 118 तत्वों में केवल सोना ही एक ऐसा तत्व है, जिसे मानव मुद्रा के रूप में चुनना पसंद करता है। लेकिन क्यों? मानव ओसमियम, क्रोमियम या हीलियम के प्रति ऐसा प्रेम क्यों नहीं दिखाता है? पढ़ना जारी रखें “स्वर्ण मरिचिका : सोना कितना सोना है?”
मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन) भारत की एक महत्वाकांक्षी अन्तरिक्ष परियोजना है। 2008 में चंद्र अभियान की सफलता से ख़ासे उत्साहित भारतीय वैज्ञानिक अब गहरे अंतरिक्ष में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं।
मंगलयान की यात्रा
भारत का मानवरहित चंद्रयान दुनिया के सामने चाँद पर पानी की मौजूदगी के पुख़्ता सबूत लेकर आया था। इसरो की सबसे बड़ी परियोजना चंद्रयान थी। इसरो के वैज्ञानिक बुलंद हौसले के साथ मंगल मिशन की तैयारी में जुट गए। लेकिन मंगल की यात्रा के लिए रवानगी और चाँद की यात्रा में ज़मीन आसमान का अंतर है। चंद्रयान को अपने मिशन तक पहुंचने के लिए सिर्फ़ चार लाख किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी जबकि मंगलयान को चालीस करोड़ किलोमीटर की दूरी तय करनी है। मंगलयान परियोजना के ज़रिए भारत वास्तविकता में गहरे अंतरिक्ष में क़दम बढ़ाने की शुरुआत कर रहा है।
यह यान अपने साथ 15 किलो के पाँच प्रयोग उपकरण ले जायेगा
LAP (लाइमन अल्फा फोटोमीटर) :लाइमन अल्पा फोटोमीटर एक खास तरह का फोटोमीटर है। यह मंगल ग्रह के वायुमंडल में मौजूद ड्यूटेरियम और हाइड्रोजन का पता लगाएगा। इसकी मदद से वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश करेंगे की इस ग्रह से पानी कैसे गायब हुआ।
मिथेन सेंसर मार्स (MSM) :यह सेंसर हवा में मौजूद मिथेन की जांच करेगा।
मार्स इक्सोस्फेरिक न्यूटरल कम्पोजिशन एनालाइडर (MENCA) :यह मंगल ग्रह के वातावरण में मौजूद न्यूट्रल कम्पोजिशन की जांच करेगा।
मार्स कलर कैमरा (MCC): यह कैमरा मंगल ग्रह के सतह की तस्वीरें लेगा। इस कैमरे की तस्वीरों से वैज्ञानिक मंगल ग्रह के मौसम को भी समझ सकेंगे।
थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (TIS) : यह कैमरा मंगल ग्रह ने निकलने वाली गर्मी की तस्वीरें लेगा। इसे दिन और रात दोनों समय इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इसरो के अध्यक्ष के राधाकृष्णन कहते हैं,
“जब हम मंगल की बात करते हैं तो मंगल पर जीवन संभव है या नहीं इस बारे में खोज करना चाहते हैं, इसके साथ साथ हम यह भी जानना चाहेंगे कि मंगल पर मीथेन है या नहीं और अगर मीथेन है तो यह जैविक है या भूगर्भीय। हम मंगल पर कैसा वातावरण है, इसकी भी खोज करेंगे।”
अभियान
5 नवंबर को 2:38 बजे दिन में श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित पीएसएलवी 25 ।
40 मिनट से ज्यादा समय लगे इसे पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने ने ।
20 से 25 दिन अर्थात 30 नवंबर तक पृथ्वी की परिक्रमा कर हर परिक्रमा मे पृथ्वी से अपनी दूरी बढायी।
1 दिसंबर को मंगल के लिए मंगलयान ने अपनी यात्रा शुरू की ।
22 सितंबर 2014 को मंगल के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव मे पहुंचा।
मशीनी मानव। एक ऐसी मानव कल्पना जिसमे मशीनें मानव को विस्थापित कर उसके अधिकतर कार्य करेंगी। मानवों का विस्थापन दोहरा अर्थ रखता है, यदि उसके द्वारा किये गये श्रम का विस्थापन हो तो वह मानव जाति के उत्थान मे सहायक हो सकता है। लेकिन यदि मशीनें मानव जाति को ही विस्थापित करने लग जाये तब यह स्थिति एक दू:स्वप्न को जन्म देती है।
क्या मशीनी मानव संभव है ? क्या मशीने मानव को विस्थापित कर सकती है? क्या मशीने मानव मस्तिष्क के तुल्य हो सकती है? क्या उनमें मानवों जैसी भावनायें आ सकती है? क्या कृत्रिम बुद्धी का निर्माण संभव है ? ढेर सारे प्रश्न है, ढेर सारी संभावनाएं !
टर्मीनेटर 2 : जजमेंट डे
“लास एन्जेल्स, वर्ष 2029. सभी स्टील्थ बमवर्षक विमानो मे नये तंत्रिकीय संसाधक(neural processors) लगा दिये गये है और वे पूर्णतः मानव रहित बन गये है। उनमे से एक स्कायनेट ने ज्यामितीय दर से सीखना प्रारंभ किया है। वह 2:14 बजे सुबह पूर्वी अमरीकी समय अगस्त 29 को आत्म चेतन हो गया।
“Los Angeles, year 2029. All stealth bombers are upgraded with neural processors, becoming fully unmanned. One of them, Skynet, begins to learn at a geometric rate. It becomes self-aware at 2:14 a.m. eastern time, August 29.”
यह जेम्स कैमरान द्वारा निर्देशित फ़िल्म “टर्मीनेटर 2- जजमेंट डे” मे दर्शाया गया भविष्य है। स्कायनेट का आत्म-चेतन होना और उसका मानवता पर आक्रमण मानव और रोबोट के मध्य एक युद्ध का आरंभ करता है और यही युद्ध टर्मीनेटर फिल्म श्रृंखला की हर फिल्म का पहला दृश्य होता है।
2000 ए स्पेस ओडीसी का Hal 9000
1950 के दशक के प्रारंभ से ही विज्ञान फतांसी फिल्मो मे रोबोट को मानव निर्मित एक ऐसी परिष्कृत मशीन के रूप मे दर्शाया जाता रहा है जो वह ऐसे जटिल कार्य आसानी से कर सकती है जो मानव के लिये करना कठिन है। उदाहरण स्वरूप गहरी खतरनाक खानो मे खुदायी करना, सागर की तलहटी मे कार्य करना इत्यादि। इन फिल्मो मे अक्सर रोबोट को आकाशगंगाओं के मध्य यात्रा करने वाले अंतरिक्षयानो के चालक और नियंत्रक के रूप मे दर्शाया जाता रहा है। दूसरी ओर इन रोबोटो को एक ऐसे खलनायक के रूप मे भी दर्शाया गया है जो भस्मासूर की तरह अपने निर्माता मानव को ही नष्ट कर देना चाहते है। इसके सबसे बडा उदाहरण आर्थर क्लार्के और स्टेनली कुब्रिक की फिल्म “2001 ए स्पेस ओडीसी” का कंप्यूटर “HAL 9000” है।
इस फिल्म मे HAL सारे अंतरिक्ष यान के परिचालन के अतिरिक्त , अंतरिक्षयात्रीयों से प्यार से बातें करता है, शतरंज खेलता है, चित्रो की सुंदरता का विश्लेष्ण करता है, यानकर्मीयों की भावनाओं को समझ लेता है लेकिन वह अभियान के पूर्व निर्धारित मूल उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह पांच अंतरिक्षयात्रीयों मे से चार की हत्या भी कर देता है। अन्य विज्ञान फंतासी फिल्म जैसे “मैट्रिक्स” और “टर्मीनेटर” मे इससे भी भयावह चित्र का चित्रण किया गया है जिसमे रोबोट बुद्धिमान और आत्म जागृत हो कर मानव जाति को अपना ग़ुलाम बना लेते है।
बहुत कम ही फिल्मो मे रोबोट को एक विश्वसनिय सहयोगी के रूप मे दर्शाया गया है जो मानव के साथ सहयोग करते है और उनके खिलाफ षडयंत्र नही रचते है। राबर्ट वाईज की 1951 मे आई फिल्म “द डे द अर्थ स्टूड स्टिल” मे गार्ट पहला रोबोट(परग्रही रोबोट) है जो कैप्टन कलातु को मानवता को एक संदेश देने मे सहायता करता है। यह फिल्म दोबारा बनी जिसमे कैप्टन कलातु का पात्र किनु रीव्ज(मैट्रीक्स श्रृंखला के नियो) ने निभाया था।
जेम्स कैमरान द्वारा निर्देशीत एलीयंस 2 मे ’बिशप” एन्ड्राईड(एन्ड्राईड- मानव सदृश्य रोबोट) का कार्य यात्रा के दौरान अंतरिक्षयान का परिचालन और यात्रीयों की सुरक्षा है। HAL और एलीयन 1 के रोबोट के विपरित बिशप पूरे अभियान के दौरान किसी त्रुटि का शिकार नही होता है और अपने कार्य के लिये ईमानदार रहता है। इस फिल्म के अंतिम दृश्यो मे बिशप को एलीयन दो टुकड़ो मे तोड देता है लेकिन वह एलन रीप्ले को बचाने ले लिये अपना हाथ देता है। जेम्स कैमरान की फिल्मो मे पहली बार किसी रोबोट पर विश्वास किया गया था और उसे एक नायक के रूप मे दर्शाया गया था।
रोबोकाप
1987 मे आयी रोबोकाप मे एक रोबोट कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये मानवता की मदद करता है लेकिन वह पूर्णतः यांत्रिक नही है, वह सायबोर्ग है जोकि यंत्र और जैविक प्रणाली का मिश्रण है; आधा मानव, आधा मशीन।
इन सभी फिल्मो मे मानव मन मे तकनीक पर चल रहे अंतर्द्वद्व को सफलतापूर्वक दर्शाया गया है, एक ओर इन फिल्मो मे मानव की तकनीक से चाहत दर्शायी गयी है; दूसरी ओर मानव मन मे अपनी ही द्वारा निर्मित तकनीक से भय दर्शाया गया है। एक ओर मानव रोबोट को अपनी एक ऐसी चाहत के रूप मे देखता है जो उसे अमरता प्रदाण कर सकती है और एक ऐसे मजबूत और अविनाशी कलेवर मे है जिसकी बुद्धिमत्ता, तंत्रिकातंत्र और क्षमता किसी मानव से कई गुणा बेहतर है। दूसरी ओर उसके मन मे डर समाया हुआ है कि अत्याधुनिक तकनीक जो आम लोगो के लिये रहस्यमयी है ,उसके नियंत्रण से बाहर जा सकती है और अपने ही निर्माता के विरोध मे कार्य कर सकती है, और यही डर HAL 9000, टर्मीनेटर और मैट्रिक्स मे दिखाया गया है। आइजैक आसीमोव द्वारा उनके रोबोटो मे प्रयुक्त पाजीट्रानीक मस्तिष्क मे भी यही भय अंतर्निहीत है, वह ऐसी आधुनिक तकनीक से निर्मित है जिसकी सूक्ष्म स्तर पर कार्यप्रणाली को वर्तमान मे कोई नही जानता है और इन रोबोटो का निर्माण कार्य पूर्णतः स्वचालित है।
कंप्यूटर विज्ञान मे हालिया प्रगति ने नये विज्ञान फतांशी रोबोटो के गुणों को भी प्रभावित किया है। कृत्रिम न्युरल नेटवर्क ने टर्मीनेटर रोबोट पर प्रभाव डाला है, वह बुद्धिमान है तो है ही, साथ ही मे वह अनुभव से सीख भी सकता है।
इस फिल्म मे टर्मीनेटर रोबोट काल्पनिक रोबोट की प्राथमिक अवस्था वाला प्रतिरूप है। वह चल सकता है, बोल सकता है, मानव के जैसे देख और व्यवहार कर सकता है। उसकी बैटरी 120 वर्ष तक ऊर्जा दे सकती है साथ मे ही किसी अप्रत्याशित दुर्घटना की अवस्था मे उसके पास पर्यायी ऊर्जा व्यवस्था है। लेकिन इस सबसे महत्वपूर्ण है कि वह सीख सकता है। उसे नियंत्रण करने के लिये न्युरल-नेट प्रोसेसर है, जो अपने अनुभव से सीखने वाले कंप्यूटर है।
इस फिल्म मे दार्शनिक कोण से सबसे रोचक बात यह है कि यह एक ऐसा न्युरल प्रोसेसर है कि वह घातांकी दर(exponential rate) से सीखता है और कुछ समय पश्चात आत्म-जागृत हो जाता है। इस तरह से यह फिल्म महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है जो कृत्रिम चेतना से संबधित है। क्या रोबोट मे कृत्रिम चेतना आ सकती है, क्या वे आत्म जागृत हो सकते है ? यदि हाँ तो इसके क्या परिणाम होंगे ? इस कृत्रिम चेतना, आत्म जागृति के दुष्परिणामो से कैसे बचा जाये ? पढ़ना जारी रखें “आत्म चेतन मशीन – संभावना, तकनीक और खतरे(Self-aware machine : Possibilities, Technology and associated dangers)”