2024 भौतिकी नोबेल पुरस्कार: जॉन जे. हॉपफील्ड(John J. Hopfield) और जेफ्री ई. हिंटन (Geoffrey E. Hinton)


रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने जॉन जे. हॉपफील्ड(John J. Hopfield) और जेफ्री ई. हिंटन (Geoffrey E. Hinton) को “कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क(artificial neural network)” के साथ “मशीन लर्निंग(Machine Learning”) को सक्षम करने वाली मूलभूत खोजों और आविष्कारों के लिए” 2024 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार देने का फैसला किया है।

जॉन जे. हॉपफील्ड(John J. Hopfield) और जेफ्री ई. हिंटन (Geoffrey E. Hinton)

इस वर्ष के पुरस्कार विजेताओं ने भौतिकी के उपकरणों का उपयोग करके ऐसे तरीके बनाए जो आज की शक्तिशाली मशीन लर्निंग की नींव रखने में सहायक रहे। जॉन हॉपफील्ड ने एक ऐसी संरचना बनाई जो सूचना को संग्रहीत और पुनर्निर्माण कर सकती है। जेफ्री हिंटन ने एक ऐसी विधि का आविष्कार किया जो डेटा में स्वतंत्र रूप से गुणों की खोज कर सकती है और जो अब उपयोग में आने वाले बड़े कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने सूचना में पैटर्न खोजने के लिए भौतिकी का उपयोग किया

हम लोगो के पास अनुभव हैं कि कंप्यूटर भाषाओं के बीच अनुवाद कर सकते हैं, छवियों की व्याख्या कर सकते हैं और यहां तक वे हमसे उचित बातचीत भी कर सकते हैं। शायद कम ही लोग जानते हैं कि इस तरह की तकनीक लंबे समय से शोध के लिए महत्वपूर्ण रही है, इस तकनीक में बड़ी मात्रा में डेटा को पहचानना और उसका विश्लेषण करना होता है। पिछले पंद्रह से बीस वर्षों में मशीन लर्निंग का विकास बहुत तेज़ी से हुआ है और इसमें आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क नामक संरचना का उपयोग किया जाता है। आजकल, जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा मतलब इसी तरह की तकनीक से होता है।

हालाँकि कंप्यूटर सोच नहीं सकते, लेकिन मशीनें अब स्मरण क्षमता और स्वयं सीखने जैसे कार्यों की नकल करने लगी है। भौतिकी में इस वर्ष के पुरस्कार विजेताओं ने इसे संभव बनाने में मदद की है। भौतिकी की मौलिक अवधारणाओं और विधियों का उपयोग करते हुए, उन्होंने ऐसी तकनीकें विकसित की हैं जो सूचनाओं को संसाधित करने के लिए नेटवर्क संरचनाओं का उपयोग करती हैं।

मशीन लर्निंग पारंपरिक सॉफ़्टवेयर से अलग है, जो एक तरह की चरणबद्ध विधि से काम करता है। सॉफ़्टवेयर को आंकड़े या सूचना देते है , वो उन्हें पूर्व निर्धारित विधि से विश्लेषित करता है और उससे परिणाम उत्पन्न करता है। ये ठीक वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति सामग्री एकत्र करता है और विधि का पालन करके केक बनता है। इसके बजाय, मशीन लर्निंग में कंप्यूटर उदाहरण से सीखता है, जिससे वह उन समस्याओं से निपटने में सक्षम होता है जो बहुत अस्पष्ट और जटिल होती हैं या वे समस्याएं जिन्हे हल करने चरण-दर-चरण निर्देशों नहीं दिए जा सकते है। उसका उदाहरण है कि कंप्यूटर को कोई चित्र देकर उसमे उसमें मौजूद वस्तुओं की पहचान करने के लिए कहना।

मस्तिष्क की नक़ल

कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क संपूर्ण नेटवर्क संरचना का उपयोग करके जानकारी संसाधित करता है। इसकी प्रेरणा ही मानव मस्तिष्क के कार्यप्रणाली के अध्ययन से आई है । 1940 के दशक में, शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के न्यूरॉन्स और सिनेप्स के नेटवर्क के पीछे कार्यरत गणित के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। इस पहेली का एक और टुकड़ा मनोविज्ञान से आया था, जब न्यूरोसाइंटिस्ट डोनाल्ड हेब ने पता किया कि मस्तिष्क कैसे सिखता है। इस सीखने की प्रक्रिया में न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन एक साथ काम करते हुए मजबूत होते हैं।

बाद में इस तरिके को कंप्यूटर सिमुलेशन के रूप में कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क बनाकर मस्तिष्क के नेटवर्क के काम करने के तरीके की नक़ल करने की कोशिश की गई। इनमें, मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को अलग अलग मान वाले नोड्स के रूप में माना जाता है, और सिनेप्स को नोड्स के बीच कनेक्शन द्वारा दर्शाया जाता है जिन्हें मजबूत या कमजोर बनाया जा सकता है। डोनाल्ड हेब की परिकल्पना को अभी भी मशीनी प्रशिक्षण (training ) प्रक्रिया के माध्यम से कृत्रिम नेटवर्क को अपडेट करने के लिए बुनियादी नियमों में से एक के रूप में उपयोग किया जाता है।

1960 के दशक के अंत में, कुछ निराशाजनक सैद्धांतिक परिणामों के कारण कई शोधकर्ताओं को लगाने लगा था कि ये कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क कभी भी किसी वास्तविक उपयोग के नहीं होंगे। हालाँकि, 1980 के दशक में कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क में रुचि फिर से जागृत हुई, जब कई नए महत्वपूर्ण विचारों सामने आये , जिसमें इस वर्ष के पुरस्कार विजेताओं का काम भी शामिल था।

कृत्रिम स्मृति

कल्पना करें कि आप एक बहुत ही सामान्य शब्द को याद करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा शब्द जिसका आप शायद ही कभी इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि सिनेमा और व्याख्यान कक्षों में अक्सर पाए जाने वाले ढलान वाले फर्श के लिए। आप अपनी याददाश्त को टटोलते हैं। यह रैंप जैसा कुछ है… शायद स्टेज , स्टेडियम ? नहीं, ऐसा नहीं है। अंत में आप को पता चलता है की इसे ‘रेक(Rake)’कहते है!

सही शब्द खोजने के लिए समान शब्दों के माध्यम से खोज करने की यह प्रक्रिया भौतिक विज्ञानी जॉन हॉपफील्ड ने 1982 में खोजी “सहयोगी स्मृति” के जैसे है। हॉपफील्ड नेटवर्क पैटर्न को संग्रहीत कर सकता है और उन्हें फिर से बना सकता है। इसमें जब नेटवर्क को अधूरा या थोड़ा विकृत पैटर्न दिया जाता है, तो विधि उस संग्रहीत पैटर्न को खोज सकती है जो उस अधूरे पैटर्न से सबसे अधिक समान है।

हॉपफील्ड ने पहले आणविक जीव विज्ञान में सैद्धांतिक समस्याओं का पता लगाने के लिए अपनी भौतिकी पृष्ठभूमि का उपयोग किया था। जब उन्हें तंत्रिका विज्ञान के बारे में एक बैठक में आमंत्रित किया गया तो उन्हें मस्तिष्क की संरचना में शोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने जो सीखा उससे वे प्रभावित हो गए और सरल तंत्रिका नेटवर्क की कार्यप्रणाली के बारे में सोचना शुरू कर दिया। जब न्यूरॉन्स एक साथ काम करते हैं, तो वे नई और शक्तिशाली विशेषताओं को जन्म दे सकते हैं, यदि हम नेटवर्क को सम्पूर्ण रूप से ना देखकर टुकड़ो में देखें तो यहाँ संभव नहीं होगा।

1980 में, हॉपफील्ड ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में अपना पद छोड़ दियाऔर उन्होंने दक्षिणी कैलिफोर्निया के पासाडेना में कैलटेक (कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) में रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान में प्रोफेसर के पद की पेशकश स्वीकार कर ली थी। वहाँ, उनके पास कंप्यूटर संसाधनों तक पहुँच थी जिसका उपयोग वे मुफ़्त प्रयोग के लिए और तंत्रिका नेटवर्क के बारे में अपने विचारों को विकसित करने के लिए कर सकते थे। हालाँकि, उन्होंने भौतिकी में अपनी नींव को नहीं छोड़ा, जहाँ उन्हें इस बात की समझ के लिए प्रेरणा मिली कि कैसे कई छोटे घटकों वाले सिस्टम जो एक साथ काम करने पर नई और दिलचस्प घटनाओं को जन्म दे सकते हैं। वे चुंबकीय पदार्थों के बारे जानते थे, वे जानते थे की परमाणुओं का एकविशिष्ट गुण स्पिन प्रत्येक परमाणु को एक छोटा चुंबक बनाता है। पड़ोसी परमाणुओं के स्पिन एक दूसरे को प्रभावित करते हैं; यह एक ही दिशा में स्पिन के साथ एक संगठन या समूह बनाने की अनुमति दे सकता है। वह भौतिकी का उपयोग करके नोड्स और कनेक्शनों के साथ एक मॉडल नेटवर्क बनाने में सक्षम थे, जो यह बताता है कि जब स्पिन एक दूसरे को प्रभावित करते हैं तो उससे नई सामग्री कैसे विकसित होती है।

छवियों का नेटवर्क के रूप में संग्रहण

हॉपफील्ड द्वारा बनाए गए नेटवर्क में नोड्स हैं अलग-अलग ऊर्जा वाले संबधो के माध्यम से एक साथ जुड़े हुए होते हैं। प्रत्येक नोड एक विशिष्ट मूल्य संग्रहीत कर सकता है – हॉपफील्ड के पहले यह मूल्य या तो 0 या 1 हो सकता था, जैसे कि एक काले और सफेद चित्र में पिक्सेल।

हॉपफील्ड ने नेटवर्क की समग्र अवस्था को एक ऐसे गुण के साथ वर्णित किया जो भौतिकी में पाए जाने वाले स्पिन सिस्टम में ऊर्जा के तुल्य होती है। इस ऊर्जा की गणना एक सूत्र का उपयोग करके की जाती है जो नोड्स के सभी मूल्यों और उनके बीच संबधो के मध्य की समस्त ऊर्जाओं का उपयोग करता है। हॉपफील्ड नेटवर्क को नोड्स को प्रदान किये जाने वाले एक चित्र द्वारा प्रोग्राम किया जाता है, जिसे काला (0) या सफेद (1) का मान दिया जाता है। फिर नेटवर्क के कनेक्शन को ऊर्जा सूत्र का उपयोग करके ऐसे समायोजित किया जाता है, ताकि सहेजी गई छवि को कम ऊर्जा मिले। जब नेटवर्क में एक और पैटर्न डाला जाता है, तो एक नियम का पालन किया जाता है, जिसमे चरणबद्ध तरीके से हर नोड पर जाकर जाँचते है कि क्या उस नोड का मान बदलने पर नेटवर्क में की ऊर्जा कम होगी । अगर यह पता चलता है कि अगर एक काला पिक्सेल सफेद हो जाता है तो ऊर्जा कम हो जाती है, तो यह रंग बदल देता है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि कोई और सुधार कर पाना असंभव न हो जाए। जब यह स्थिति आ जाती है , तो नेटवर्क अक्सर उस मूल छवि को पुन: निर्माण कर चुका होता है जिस पर उसे प्रशिक्षित किया गया था।

यदि आप केवल एक पैटर्न सहेजते हैं तो यह इतना प्रभावी नहीं लग सकता है। शायद आप सोच रहे हों कि आप केवल छवि को ही क्यों नहीं सहेजते और परीक्षण की जा रही किसी अन्य छवि से इसकी तुलना क्यों नहीं करते, लेकिन हॉपफील्ड की विधि विशेष है क्योंकि एक ही समय में कई चित्रों को सहेजा जा सकता है और नेटवर्क आमतौर पर उनके बीच अंतर कर सकता है।

हॉपफील्ड ने सहेजे गई अवस्था के लिए नेटवर्क की खोज की तुलना चोटियों और घाटियों के परिदृश्य के माध्यम से गेंद को लुढ़काने से की, जिसमें घर्षण इसकी गति को धीमा कर देता है। यदि गेंद को किसी विशेष स्थान पर गिराया जाता है, तो यह निकटतम घाटी में लुढ़क जाएगी और वहीं रुक जाएगी। यदि नेटवर्क को एक पैटर्न दिया जाता है जो सहेजे गए पैटर्न में से किसी एक के करीब है, तो यह उसी तरह आगे बढ़ता रहेगा जब तक कि यह ऊर्जा घाटी के तल पर समाप्त नहीं हो जाता, इस प्रकार यह विधि अपनी स्मृति में निकटतम पैटर्न ढूंढता है।

हॉपफील्ड नेटवर्क का उपयोग उस डेटा को फिर से बनाने के लिए किया जा सकता है जिसमें विकृति होती है या जिसे आंशिक रूप से मिटा दिया गया है।

हॉपफील्ड और अन्य लोगों ने हॉपफील्ड नेटवर्क के काम करने के तरीके को विकसित करना जारी रखा है, अब जिसमें ऐसे नोड शामिल हैं जो सिर्फ़ शून्य या एक ही नहीं, बल्कि कोई भी मान संग्रहीत कर सकते हैं। अगर आप नोड्स को तस्वीर में पिक्सेल के रूप में सोचते हैं, तो उनके अलग-अलग रंग हो सकते हैं, सिर्फ़ काला या सफ़ेद नहीं। बेहतर तरीकों ने ज़्यादा तस्वीरें सहेजना और उनके बीच अंतर करना संभव बना दिया है, भले ही वे काफ़ी हद तक एक जैसे हों। किसी भी जानकारी को पहचानना या उसका पुनर्निर्माण करना उतना ही संभव है, बशर्ते कि इसे कई डेटा बिंदुओं से बनाया गया हो।

उन्नीसवीं सदी के भौतिकी का उपयोग करके वर्गीकरण

किसी छवि को याद रखना एक बात है, लेकिन उसकी व्याख्या करने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

बहुत छोटे बच्चे भी अलग-अलग जानवरों की ओर इशारा करके आत्मविश्वास से बता सकते हैं कि यह कुत्ता है, बिल्ली है या गिलहरी। हो सकता है कि वे कभी-कभी गलत हो जाएं, लेकिन जल्द ही वे लगभग हर बार सही हो जाते हैं। एक बच्चा प्रजाति या स्तनपायी जैसी अवधारणाओं के किसी आरेख या स्पष्टीकरण को देखे बिना भी इसे सीख सकता है। प्रत्येक प्रकार के जानवर के कुछ उदाहरणों का सामना करने के बाद, बच्चे के दिमाग में अलग-अलग श्रेणियाँ आ जाती हैं। लोग अपने आस-पास के वातावरण का अनुभव करके बिल्ली को पहचानना, या किसी शब्द को समझना, या किसी कमरे में प्रवेश करना और यह देखना सीखते हैं कि कुछ बदल गया है।

जब हॉपफील्ड ने “एसोसिएटिव मेमोरी” पर अपना लेख प्रकाशित किया, तब जेफ्री हिंटन अमेरिका के पिट्सबर्ग में कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय में काम कर रहे थे। उन्होंने पहले इंग्लैंड और स्कॉटलैंड में प्रायोगिक मनोविज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अध्ययन किया था और सोच रहे थे कि क्या मशीनें मनुष्यों के समान पैटर्न को संसाधित करना सीख सकती हैं, सूचना को छांटने और व्याख्या करने के लिए अपनी खुद की श्रेणियाँ ढूँढ़ सकती हैं। अपने सहकर्मी टेरेंस सेजनोवस्की के साथ, हिंटन ने हॉपफील्ड नेटवर्क से शुरुआत की और सांख्यिकीय भौतिकी के विचारों का उपयोग करके कुछ नया बनाने के लिए इसका विस्तार किया।

सांख्यिकीय भौतिकी उन प्रणालियों का वर्णन करती है जो कई समान तत्वों से बनी होती हैं, जैसे कि गैस में अणु। गैस में सभी अलग-अलग अणुओं को ट्रैक करना मुश्किल या असंभव है, लेकिन दबाव या तापमान जैसे गैस के व्यापक गुणों को निर्धारित करने के लिए उन पर सामूहिक रूप से विचार करना संभव है। गैस के अणुओं के लिए अलग-अलग गति से इसके आयतन में फैलने के कई संभावित तरीके हैं और फिर भी परिणाम सामूहिक गुणों का ही होता है।

जिन अवस्थाओं में व्यक्तिगत घटक संयुक्त रूप से मौजूद हो सकते हैं, उनका सांख्यिकीय भौतिकी का उपयोग करके विश्लेषण किया जा सकता है और उनके होने की संभावना की गणना की जा सकती है। कुछ अवस्थाएँ दूसरों की तुलना में अधिक संभावित होती हैं; यह उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा पर निर्भर करता है, जिसका वर्णन उन्नीसवीं सदी के भौतिक विज्ञानी लुडविग बोल्ट्ज़मैन ने एक समीकरण में किया है। हिंटन के नेटवर्क ने उस समीकरण का उपयोग किया और विधि को 1985 में बोल्ट्ज़मैन मशीन के आकर्षक नाम से प्रकाशित किया गया।

एक ही प्रकार के नए उदाहरणों को पहचानना

बोल्ट्ज़मैन मशीन का इस्तेमाल आम तौर पर दो अलग-अलग तरह के नोड्स के साथ किया जाता है। सूचना एक समूह को दी जाती है, जिसे दृश्यमान नोड्स कहा जाता है। अन्य नोड्स एक छिपी हुई परत बनाते हैं। छिपे हुए नोड्स के मान और कनेक्शन भी पूरे नेटवर्क की ऊर्जा में योगदान करते हैं।

मशीन को एक-एक करके नोड्स के मानों को अपडेट करने के लिए एक नियम लागू करके चलाया जाता है। आखिरकार मशीन एक ऐसी स्थिति में प्रवेश करेगी जिसमें नोड्स का पैटर्न बदल सकता है, लेकिन पूरे नेटवर्क के गुण समान रहते हैं। प्रत्येक संभावित पैटर्न में तब एक विशिष्ट संभावना होगी जो बोल्ट्ज़मैन के समीकरण के अनुसार नेटवर्क की ऊर्जा द्वारा निर्धारित की जाती है। जब मशीन रुकती है तो यह एक नया पैटर्न बनाती है, जो बोल्ट्ज़मैन मशीन को एक जनरेटिव मॉडल का प्रारंभिक उदाहरण बनाता है।

बोल्ट्ज़मैन मशीन दिए गए उदाहरणों से सीख सकती है। पारम्परिक मशीनों जैसे इसे निर्देश नहीं चाहिए। इसे नेटवर्क के कनेक्शन में मूल्यों को परिवर्तित करके प्रशिक्षित किया जाता है , जिससे मशीन के चलने पर होने की सबसे अधिक संभावित संभावना उन पैटर्न की हो जिसे इसे प्रशिक्षित किए जाने के दौरान दृश्यमान नोड्स को प्रदान किया गया था। यदि इस प्रशिक्षण के दौरान एक ही पैटर्न को कई बार दोहराया जाता है, तो इस पैटर्न की संभावना और भी अधिक होती है। प्रशिक्षण उन नए पैटर्न को उत्पन्न करने की संभावना को भी प्रभावित करता है जो उन मशीन को प्रशिक्षित किये उदाहरणों से मिलते-जुलते हैं।

एक प्रशिक्षित बोल्ट्ज़मैन मशीन जानकारी में परिचित लक्षणों को पहचान सकती है जिसे उसने पहले नहीं देखा है। कल्पना करें कि आप किसी मित्र के भाई-बहन से मिलते हैं, और आप तुरंत देख सकते हैं कि वे संबंधित होने चाहिए। इसी तरह, बोल्ट्ज़मैन मशीन एक पूरी तरह से नए उदाहरण को पहचान सकती है यदि यह प्रशिक्षण सामग्री में पाई जाने वाली श्रेणी से संबंधित है, और इसे असमान सामग्री से अलग करती है।

अपने मूल रूप में, बोल्ट्ज़मैन मशीन काफी धीमी है और समाधान खोजने में लंबा समय लेती है। जब इसे विभिन्न तरीकों से विकसित किया जाता है, तो चीजें अधिक दिलचस्प हो जाती हैं, जिसपर हिंटन अब भी कार्यरत है। बाद के संस्करणों में मोडल के नॉड्स और उनके मध्य संबधो को कम किया गया है,जिससे लगता है कि इससे मशीन अधिक कुशल हो सकती है।

1990 के दशक के दौरान, कई शोधकर्ताओं ने कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क में रुचि खो दी, लेकिन हिंटन उन लोगों में से एक थे जिन्होंने इस क्षेत्र में काम करना जारी रखा। उन्होंने रोमांचक परिणामों ने एक नई क्रान्ति को शुरू करने में भी मदद की; 2006 में उन्होंने और उनके सहयोगियों साइमन ओसिंडेरो, यी व्हाई तेह और रुस्लान सलाखुतदीनोव ने बोल्ट्ज़मैन मशीनों की एक श्रृंखला के साथ एक नेटवर्क को पूर्वप्रशिक्षित करने के लिए एक बहुस्तरीय विधि विकसित की। इस पूर्व प्राक्षिण ने नेटवर्क में कनेक्शन को एक बेहतर शुरुआती बिंदु दिया, जिसने चित्रों में तत्वों को पहचानने के लिए इसके प्रशिक्षण को अनुकूलित किया।

बोल्ट्ज़मैन मशीन का उपयोग अक्सर एक बड़े नेटवर्क के हिस्से के रूप में किया जाता है। उदाहरण के लिए, इसका उपयोग दर्शकों की प्राथमिकताओं के आधार पर फिल्मों या टेलीविज़न सीरीज़ की सिफारिश करने के लिए किया जा सकता है।

मशीन लर्निंग – आज और कल

1980 के दशक और उसके बाद के अपने काम की बदौलत, जॉन हॉपफील्ड और जेफ्री हिंटन ने 2010 के आसपास शुरू हुई मशीन लर्निंग क्रांति की नींव रखने में मदद की है।

हम जो विकास देख रहे हैं, वह नेटवर्क को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले विशाल मात्रा में डेटा तक पहुँच और कंप्यूटिंग शक्ति में भारी वृद्धि के माध्यम से संभव हुआ है। आज के कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क अक्सर बहुत बड़े होते हैं और कई परतों से निर्मित होते हैं। इन्हें डीप न्यूरल नेटवर्क कहा जाता है और जिस तरह से इन्हें प्रशिक्षित किया जाता है उसे डीप लर्निंग कहा जाता है।

1982 से एसोसिएटिव मेमोरी पर हॉपफील्ड के लेख पर एक त्वरित नज़र इस विकास पर कुछ परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। इसमें, उन्होंने 30 नोड्स वाले नेटवर्क का उपयोग किया। यदि सभी नोड्स एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो 435 कनेक्शन हैं। नोड्स के अपने मूल्य हैं, कनेक्शन की अलग-अलग ताकत है और कुल मिलाकर, ट्रैक रखने के लिए 500 से कम पैरामीटर हैं। उन्होंने 100 नोड्स वाले नेटवर्क की भी कोशिश की, लेकिन यह उस समय उनके द्वारा उपयोग किए जा रहे कंप्यूटर को देखते हुए बहुत जटिल था। हम इसकी तुलना आज के बड़े भाषा मॉडल से कर सकते हैं, जो ऐसे नेटवर्क के रूप में बनाए गए हैं जिनमें एक ट्रिलियन (एक मिलियन मिलियन) से ज़्यादा पैरामीटर हो सकते हैं।

अब कई शोधकर्ता मशीन लर्निंग के अनुप्रयोग के क्षेत्रों को विकसित कर रहे हैं। कौन सा सबसे व्यवहार्य होगा, यह देखना बाकी है, जबकि इस तकनीक के विकास और उपयोग से जुड़े नैतिक मुद्दों पर भी व्यापक चर्चा हो रही है।

चूँकि भौतिकी ने मशीन लर्निंग के विकास के लिए उपकरण प्रदान किए हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प है कि कैसे भौतिकी, एक शोध क्षेत्र के रूप में, कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क से भी लाभान्वित हो रही है। मशीन लर्निंग का उपयोग लंबे समय से उन क्षेत्रों में किया जाता रहा है जिनसे हम भौतिकी में पिछले नोबेल पुरस्कारों से परिचित हो सकते हैं। इनमें हिग्स कण की खोज के लिए आवश्यक विशाल मात्रा में डेटा को छानने और संसाधित करने के लिए मशीन लर्निंग का उपयोग शामिल है। अन्य अनुप्रयोगों में ब्लैक होल के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगों के मापन में शोर को कम करना या एक्सोप्लैनेट की खोज शामिल है।

हाल के वर्षों में, इस प्रौद्योगिकी का उपयोग अणुओं और सामग्रियों के गुणों की गणना और भविष्यवाणी करने में भी किया जाने लगा है – जैसे कि प्रोटीन अणुओं की संरचना की गणना करना, जो उनके कार्य को निर्धारित करता है, या यह पता लगाना कि किसी सामग्री के कौन से नए संस्करण में अधिक कुशल सौर कोशिकाओं में उपयोग के लिए सर्वोत्तम गुण हो सकते हैं।

जॉन हॉपफील्ड

जॉन हॉपफील्ड ने एक नेटवर्क का आविष्कार किया जो पैटर्न को सहेजने और फिर से बनाने के लिए एक विशिष्ट विधि का उपयोग करता है। इस विधि में हम नोड्स को पिक्सेल के रूप में कल्पना कर सकते हैं। “हॉपफील्ड नेटवर्क ” क्वांटम भौतिकी के परमाणु स्पिन का उपयोग करता है जिसमे किसी पदार्थ की विशेषताओं को उसके परमाणु स्पिन के द्वारा व्याख्या की जाती है। परमाणु स्पिन एक ऐसा गुण है जो प्रत्येक परमाणु को एक छोटा चुंबक बनाता है। इस विधि में सम्पूर्ण नेटवर्क को भौतिकी वाले स्पिन प्रणाली की पूर्ण ऊर्जा के रूप में दर्शाया जाता है और इस मोडल को प्रशिक्षण देने के लिए इस नेटवर्क की नॉड्स के मध्य के मान को खोजा जाता है जिससे इस तरह संरक्षित की गई छवि में न्यूनतम ऊर्जा का प्रयोग होता है। जबा होपफोल्ड नेटवर्क को आधी या अपूर्ण छवि/चित्र प्रदान किया जाता है तो वह एक विशिष्ट विधि से हर नोड से जाते हुए उनके मान को बदलता है जिससे पूरे नेटवर्क की ऊर्जा कम होती है। इस तरह से यह नेटवर्क चरणबद्ध तरीके से अपूर्ण या अधूरी छवियों का पता लगा लेता है।

जेफ्री हिंटन

जेफ्री हिंटन ने हॉपफील्ड नेटवर्क का उपयोग एक नए नेटवर्क के लिए आधार के रूप में किया जो एक अलग विधि “बोल्ट्ज़मैन मशीन” का उपयोग करता है। यह किसी दिए गए प्रकार के डेटा में विशिष्ट तत्वों को पहचानना सीख सकता है। हिंटन ने सांख्यिकीय भौतिकी से उपकरणों का उपयोग किया, जो कई समान घटकों से निर्मित प्रणालियों का विज्ञान है। मशीन को ऐसे उदाहरण देकर प्रशिक्षित किया जाता है जिनकी मशीन के चलने पर सामने आने की बहुत संभावना होती है। बोल्ट्ज़मैन मशीन का उपयोग छवियों को वर्गीकृत करने या उस पैटर्न के नए उदाहरण बनाने के लिए किया जा सकता है जिस पर इसे प्रशिक्षित किया गया था। हिंटन ने इस काम को आगे बढ़ाया है, जिससे मशीन लर्निंग के वर्तमान तीव्र विकास को आरंभ करने में मदद मिली है।

नोबेल कमेटी फॉर फिजिक्स के अध्यक्ष एलेन मून्स कहते हैं,

“पुरस्कार विजेताओं का काम पहले से ही सबसे ज़्यादा लाभकारी रहा है। भौतिकी में हम कई क्षेत्रों में कृत्रिम तंत्रिका नेटवर्क का उपयोग करते हैं, जैसे कि विशिष्ट गुणों वाली नई सामग्री विकसित करना।”

क्या आप जानते है ?

  • 1901 से अब तक भौतिकी में 117 नोबेल पुरस्कार प्रदान किये जा चुके हैं।
  • 47 भौतिकी पुरस्कार केवल एक पुरस्कार विजेता को दिए गए हैं।
  • अब तक 5 महिलाओं को भौतिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है: 1903 में मैरी क्यूरी, 1963 में मारिया गोएपर्ट-मेयर, 2018 में डोना स्ट्रिकलैंड ,2020 में एंड्रिया घेज़ और 2023 ऐनी एल’हुइलियर।
  • 1 व्यक्ति, जॉन बार्डीन को दो बार भौतिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
  • अब तक के सबसे कम उम्र के भौतिकी पुरस्कार विजेता लॉरेंस ब्रैग की उम्र 25 वर्ष थी, जब उन्हें अपने पिता के साथ 1915 में भौतिकी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • सबसे उम्रदराज भौतिकी पुरस्कार विजेता आर्थर अश्किन की उम्र 96 वर्ष थी।

भौतिकी नोबेल पुरस्कार विजेता का चयन कौन करता है ?

रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज भौतिकी में नोबेल पुरस्कार विजेताओं के चयन के लिए जिम्मेदार है।

अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत की शर्तों के अनुसार, 1901 से रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा भौतिकी में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाता रहा है।

अकादमी की स्थापना 1739 में हुई थी और आज इसमें लगभग 440 स्वीडिश और 175 विदेशी सदस्य हैं। अकादमी में सदस्यता सफल अनुसंधान उपलब्धियों की विशिष्ट मान्यता है। अकादमी तीन साल के कार्यकाल के लिए नोबेल समिति, कार्यकारी निकाय के सदस्यों की नियुक्ति करती है।

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