सौर मंडल मे नौंवे ग्रह की खोज का दावा


चित्रकार की कल्पना मे नौंवा ग्रह

चित्रकार की कल्पना मे नौंवा ग्रह

कालटेक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको ने नौंवे ग्रह के अस्तित्व का दावा किया है?

कालटेक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको के अनुसार उन्होने सौर मंडल मे एक नये गैस महादानव ग्रह के प्रमाण खोज निकाले है। उनके अनुसार यह ग्रह विचित्र है और उसकी कक्षा बाह्य सौर मंडल मे अत्याधिक खिंची हुयी है। इस ग्रह को शोधकर्ताओं ने ‘प्लेनेट नाईन(Planet Nine)’ नाम दिया है और उनके अनुसार इस ग्रह का द्रव्यमान पृथ्वी से 10 गुणा है तथा उसकी कक्षा नेप्च्यून की कक्षा से 20 गुणा बड़ी है। नेप्च्यून सूर्य की परिक्रमा औसतन 2.8 अरब मील दूरी पर करता है। इस कक्षा मे इस नये ग्रह को सूर्य की केवल एक परिक्रमा करने मे 10,000 से 20,000 वर्ष लगेंगे।

शोध वैज्ञानिको कान्सेटान्टीन बैटीगीन तथा माइक ब्राउन(Konstantin Batygin and Mike Brown) ने इस ग्रह की खोज का दावा गणितिय माडेल तथा कंप्यूटर गणना के आधार पर लिया है लेकिन इस ग्रह को प्रत्यक्ष रूप से देखा नही है।

ब्राउन के अनुसार , यह एक वास्तविक नौंवा ग्रह होगा। माइक ब्राउन ग्रहीय खगोल विज्ञान के रिचर्ड तथा बार्बरा रोशेनबर्ग प्रोफ़ेसर(the Richard and Barbara Rosenberg Professor of Planetary Astronomy) है। उनके अनुसार प्राचीन काल के बाद मे आधुनिक युग मे केवल दो ही ग्रह(युरेसन और नेपच्यून) खोजे गये है और यह तीसरा ग्रह होगा। हमारे सौर मंडल का काफ़ी सारा भाग खोजा जाना बाकी है और यह काफ़ी चुनौतिपुर्ण और मनोरंजक है।

माईक ब्राउन जिन्हे प्लूटो की ग्रह से वामन ग्रह की अवनति के लिये जाना जाता है।

माईक ब्राउन जिन्हे प्लूटो की ग्रह से वामन ग्रह की अवनति के लिये जाना जाता है।

ब्राउन के अनुसार इस नौवें ग्रह का द्रव्यमान प्लूटो से 5000 गुणा अधिक होने से इसके ग्रह होने या ना होने का कोई विवाद उत्पन्न नही होगा। “प्लेनेट नाईन” वामन ग्रहो जैसे प्लूटो, एरीस या मेकमेक की तुलना मे अपनी कक्षा मे अपने गुरुत्वाकर्षण बल से अधिक हावी होगा। तथ्य यह है कि यह ग्रह अपेक्षाकृत रूप से सौर मंडल के अन्य ग्रहों(बृहस्पति, शनि) की तुलना मे अधिक क्षेत्र मे अपने गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव छोड़ता होगा।

बैटीगीन तथा ब्राउन ने इस खोज को आस्ट्रोनामिकल जरनल(Astronomical Journal) के ताजा अंक मे प्रकाशित किया है। इस लेख मे उन्होने दर्शाया है कि यह नौंवा ग्रह किस तरह से सौर मंडल के नेप्च्यून बाह्य काइपर पट्टे के बर्फ़िले पिंडो के विचित्रताओं की व्याख्या करता है।

बैटीगीन जोकि ग्रहीय विज्ञान के सहयोगी प्रोफ़ेसर है, कहते है कि

प्रारंभ मे हम लोग इस नौवें ग्रह के अस्तित्व के बारे मे सशंकित थे, लेकिन जैसे जैसे हमने इस ग्रह की कक्षा का विश्लेषण किया हम इसके अस्तित्व के बारे मे निश्चित होते गये और हम इसके अस्तित्व को स्वीकार करते है। पिछले 150 वर्ष मे पहली बार सौर मंडल के जनसंख्या गणना के पूर्ण होने के ठोस प्रमाण मिले है।

इस सैद्धांतिक खोज की राह सीधी नही थी। 2014 मे ब्राउन के शोध छात्र चाड ट्रुजिलो (Chad Trujillo)तथा उनके सहयोगी स्काट शेफ़र्ड (Scott Sheppard)ने एक शोधपत्र मे काईपर पट्टे(Kiper Belt) के सबसे दूरी पर स्थित 13 पिंडो का उल्लेख किया था। ये 13 पिंड एक समान अस्पष्ट सी कक्षीय समानता रखते है। इस समानता की व्याख्या के लिये उन्होने एक छोटे ग्रह की संभावना व्यक्त की थी। लेकिन ब्राउन ने सोचा कि ऐसे किसी छोटे ग्रह की संभावना न्यूनतम है लेकिन इस विचार ने उत्सुकता जगा दी।

कान्सेटान्टीन बैटीगीन

कान्सेटान्टीन बैटीगीन

अब उन्होने इस समस्या को बैटीगीन के सामने रखा और दोनो इन दूरस्थ पिंडो के निरीक्षण मे डेढ़ वर्ष लंबा सहयोग प्रारंभ किया। एक निरीक्षक तथा सैद्धांतिक वैज्ञानिक के साथ आने से इस खोज को गति मीली। ब्राउन आकाश मे पिंडो का निरीक्षण कर उन्हे इस समस्या के परिप्रेक्ष्य मे रखते थे जबकि बैटीगन उसे सैद्धांतिक और गणितिय कसौटी पर कस कर तय करते थे कि वे ग्रहीय गति के भौतिकीय नियमो का पालन कर रहे है। दोनो की कार्यपद्धति मे यह अंतर दोनो को एक दूसरे की अवधारणाओं को चुनौती देने तथा नयी संभावनाओं पर विचार करने के लिये प्रेरित करता था। ब्राउन कहते है कि

मै निरीक्षण से प्राप्त अवधारणाओं को प्रस्तुत करता था और वे सैद्धांतिक तर्क देते थे। हम दोनो एक दूसरे को प्रेरित करते थे। मै नही सोचता कि इस खींचातानी के बिना यह खोज इतने कम समय मे संभव होती है। शायद यह वर्ष मेरी सौर मंडल संबंधित कार्य मे सबसे मनोरंजक रहा है।

इस समस्या मे कार्य प्रारंभ करने के बाद काफ़ी जल्दी ही बैटीगीन और ब्राउन ने माया कि ट्रुजिलो तथा शेफ़र्ड के छह सबसे अधिक दूरी पर स्थित पिड एक ही दिशा मे दिर्घवृत्ताकार कक्षा का पालन करते है। यह आश्चर्य जनक खोज थी क्योंकि इन पिंडो की कक्षा का बाह्य बिंदु सौर मंडल के चारो ओर घूमता है तथा ये पिंड भिन्न भिन्न गति से गति कर रहे है।

यह किसी घड़ी के छह कांटो द्वारा भिन्न भिन्न गति से गति करने के जैसा था लेकिन जब हमने उन्हे देखा तो वे हमे एक ही जगह पर मिल गये। ऐसा होने की संभावना केवल एक प्रतिशत है। इसके साथ ही इन छह पिंडो की कक्षा क्रांतिवृत्त से एक ही दिशा मे 30 डीग्री मे झुकी हुयी है। ऐसा होने की संभावना भी 0.007 प्रतिशत है। ऐसा अचानक या अनियमित रूप से नही होता है तो वैज्ञानिको को लगा कि इन सभी पिंडो की कक्षा को कोई बड़ा पिंड निर्देशित कर रहा है।

सबसे पहली संभावना थी कि कोई दूरस्थ अनिरीक्षित काईपर पट्टे का पिंड अपने गुरुत्वाकर्षण से इन पिंडो को एक गुच्छे के रूप मे रख रहा है। लेकिन वैज्ञानिको ने इस संभावना को नकार दिया क्योंकि इस संभावना के लिये काईपर पट्टे मे उसके ज्ञात द्रव्यमान से 100 गुणा द्रव्यमान चाहिये।

छः काईपर पट्टे के पिंडो की कक्षा तथा ’प्लेनेट नाईन’ की कक्षा। ध्यान दें कि सभी काईपर पट्टे के पिंडो की कक्षा लगभग रैखिक (एक ओर) ही है।

छः काईपर पट्टे के पिंडो की कक्षा तथा ’प्लेनेट नाईन’ की कक्षा। ध्यान दें कि सभी काईपर पट्टे के पिंडो की कक्षा लगभग रैखिक (एक ओर) ही है।

इसके बाद उनके पास केवल एक बड़े ग्रह की संभावना ही बची। उन्होने इस संभावना के लिये कंप्युटर पर एक माडेल बनाया और इस दूरी पर इन छह काईपर पट्टे की कक्षाओ को घेरती हुयी कक्षा पर किसी ग्रह की उपस्थिति तथा प्रभाव को जानने के लिये गणना की। यह गणना इन छः पिंडो पर निरीक्षित प्रभाव की सफ़ल व्याख्या करती है लेकिन उनके कक्षाओं की विकेंद्रता(eccentricities) की व्याख्या नही कर पाती है। यह हल वास्तविकता के निकट था लेकिन हल नही था।

बैटीगीन तथा ब्राउन ने अचानक सोचा कि यदि विपरीत रैखिक कक्षा मे एक भारी ग्रह को लेकर गणना करें जिसकी सूर्य की निकटस्थ स्थिति और पिंडो की सूर्य निकटस्थ स्थिति एक दूसरे की विपरीत स्थिति अर्थात 180 डीग्री दूरी मे हो, तो इन छह पिंडो की गति, कक्षा तथा कक्षा की विकेंद्रिता की सफल व्याख्या होती है। बायें चित्र को देखें। वर्तमान मे इन पिंडो की स्थिति इस गणना के अनुसार ही है अर्थात इस ग्रह को इन पिंडो से 180 डीग्री विपरीत स्थिति मे सूर्य के दूसरी ओर होना चाहिये।
ब्राउन कहते है कि इन नतिजो पर आपकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी कि ऐसी कक्षीय ज्यामिती(orbital geometry) सही नही हो सकती है। ऐसी कक्षा लंबे समय के लिये स्थिर नही हो सकती है क्योंकि कभी ना कभी ये पिंड इस ग्रह से मिलेंगे तथा टकरा जायेंगे। लेकिन “औसत गति अनुनाद(mean-motion resonance)” प्रक्रिया के अनुसार, विपरीत रैखिक स्थिति मे यह नौंवा ग्रह इन पिंडो को टकराने से बचायेगा और उन्हे दूर ही रखेगा। जब ये परिक्रमा करते पिंड एक दूसरे के समीप पहुंचते है तब उनमे ऊर्जा का आदान प्रदान होता है। उदाहरण के लिये जब “प्लेनेट नाईन” चार परिक्रमा पूरी करता है ये पिंड नौ परिक्रमा पूरी करते है और वे कभी नही टकराते है। इसकी बजाये यह नौवा ग्रह किसी पिता की तरह इन पिंडो को नियमित रूप से धकेल कर इस तरह रखता है कि उनकी स्थिति इस ग्रह के संदर्भ मे स्थिर रहती है।

बैटीगीन कहते है कि

मै अभी भी सशंकित था, मैने ऐसी ग्रहीय गति कभी देखी नही थी।

लेकिन धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा कर इस माडेल के बाकी गुणधर्मो को देखकर दोनो शोधकर्ताओं का इस अवधारणा पर विश्वास बढ़ता गया। बैटीगीन के अनुसार एक अच्छी अवधारणा ने अपने मूल प्रश्न का हल तो देना चाहीये। और उसे उन प्रश्नो का हल भी देने का प्रयास करना चाहिये जो मूल प्रश्न का भाग नही है, साथ ही किसी भी अवधारणा को जांच करने का अवसर भी प्रदान करना चाहिये।

प्लेनेट नाईन का अस्तित्व इन दूरस्थ काईपर पट्टे(Kiper Belt) के पिंडो(KBO’s) की सरेखना की व्याख्या करता है। साथ ही मे इन पिंडो मे से दो पिंडो की रहस्यमय कक्षा की भी व्याख्या करता है। इन दो पिंडो मे से एक सेडना(Sedna) की खोज ब्राउन ने ही 2003 मे की थी। काइपर पट्टे के अन्य साधारण पिंड नेप्च्यून से धक्का खाकर दूर जाते है और वापस नेप्च्यून के पास आते है, सेडना नेप्च्यून के कभी पास नही आता है। दूसरा पिंड ट्रुजिलो तथा शेफर्ड द्वारा 2014 मे खोजा गया पिंड 2012VP113 है। बैटीगीन तथा ब्राउन ने पाया कि प्लेनेट नाईन की प्रस्तावित कक्षा मे उपस्थिति से सेडना जैसे पिंड अन्य साधारण काईपर पट्टे के पिंडो की तरह नेप्च्यून के पास नही जाते है।

वैज्ञानिक उस समय अत्याधिक उत्साहित हो गये जब उन्होने पाया कि इन गणनाओं के अनुसार कुछ ऐसे काईपर पट्टे के पिंड भी होंगे जिनकी कक्षा क्रांतिवृत्त के लंबवत होगी। बैटीगीन ने ऐसे पिंडो के अस्तित्व की कंप्यूटर गणनाओ मे प्रमाण खोजे और ब्राउन को इन प्रमाणो को दिखाया। ब्राउन ने पाया कि इन गणनाओं के अनुरूप कुछ ऐसे पिंडो का अस्तित्व है। पिछले तीन वर्षो मे ऐसे चार पिंड खोजे गये है जिनकी कक्षा क्रांतिवृत्त के लंबवत है। उन्होने इन पिंडो की स्थिति तथा कक्षा का मानचित्र बनाया और पाया कि वे कंप्यूटर की गणना के अनुरूप है। यह देख कर दोनो वैज्ञानिक चकित रह गये।

बैटीगीन कहते है कि दूरस्थ काईपर पट्टे के पिंड तथा सेडना जैसे पिंडो के साथ इन लंबवत पिंडो की कक्षा की व्याख्या एक तीर से तीन शिकार के जैसे था।

यह “प्लेनेट नाईन” कहाँ से आया और सौर मंडल के बाह्य भाग मे कैसे पहुंचा ?

वैज्ञानिक लंबे समय से मानते आये है कि प्रारंभिक सौर मंडल चार ग्रहीय केंद्रक से प्रारंभ हुआ जिससे समस्त गैस को समेट लिया और चार गैस दानव ग्रह बृहस्पति, शनि, युरेनस तथा नेपच्युन बने। समय के साथ इन ग्रहो के मध्य टकराव और धक्के ने उनकी वर्तमान स्थिति और कक्षा को आकार दिया। लेकिन ऐसा मानने का कोई कारण नही है कि चार की बजाय पांच केंद्रक नही बने है। पांचवां केंद्रक “प्लेनेट नाईन” हो सकता है। हो सकता है कि वह बृहस्पति या शनि के पास चला गया और उसे इस महाकाय ग्रह ने धकेल कर इतनी दूर की कक्षा मे फ़ेंक दिया हो।

बैटीगीन और ब्राउन ने अपनी कंप्यूटर की गणना काम जारी रखा और इस ग्रह की कक्षा के बारे मे अध्ययन जारी रखा, साथ ही इस ग्रह के नेप्च्यून बाह्य सौर मंडल पर पडने वाले प्रभाव को समझते रहे। इस दौरान ब्राउन और उनके अन्य सहयोगी आकाश मे “प्लेनेट नाईन” की खोज मे लगे रहे है। अभी इस ग्रह की कक्षा का अनुमान ही है, इस ग्रह की वास्तविक स्थिति ज्ञात नही है। यदि यह ग्रह अपनी सूर्य के निकटतम स्थिति मे है तो उसकी तस्वीर किसी ना किसी आकाशीय सर्वे मे होगी। यदि वह सूर्य से दूरस्थ स्थिति मे है तब उसे हवाई द्वीप स्थित सुबारु दूरबीन से देखा जा सकता है। यदि वह इन दोनो स्थिति के मध्य है तब उसे खोजने के लिये कई दूरबीने सक्षम है।

ब्राउन कहते है कि

मुझे उसे खोजने मे आनंद आयेगा लेकिन कोई अन्य भी उसे खोज लेता है तो मुझे खुशी होगी। इसी लिये हम इस शोधपत्र को प्रकाशित कर रहे है कि अन्य लोग भी प्रेरणा लेकर इस प्लेनेट नाईन की खोज मे लग जायें।

सौर मंडल को शेष ब्रह्मांड के संदर्भ मे समझने के लिये दो तरिके है, यह नौआं ग्रह जो हमे बाकि ग्रहो से अलग लग रहा है, हमारे सौर मंडल को अन्य सौर मंडलो के जैसा दिखा सकता है। अभी तक हमारे सौर मंडल जैसा कोई अन्य सौर मंडल नही मिला है। अन्य तारो के पास् सूर्य के समान परिक्रमा करने वाले ग्रह नही है, उनमे कुछ ग्रह अपने तारे के अत्यंत समीप से परिक्रमा कर रहे है जबकि कुछ ग्रह अपने मातृ तारे से अत्याधिक दूरी पर है। साथ अन्य तारो के ग्रहो का द्रव्यमान भी 1-10 पृथ्वी के तुल्य है।

अब तक की खोजो मे सौर मंडल बाह्य अधिकतर ग्रह पृथ्वी तथा नेप्च्यून के मध्य के है। अब तक हम सोच रहे थे कि हमारा सौर मंडल अन्य सौर मंड्लो से भिन्न है और इसमे सबसे सामान्य आकार का ग्रह नही है लेकिन इस खोज ने उसे झुठला दिया है।

ब्राउन जिन्हे प्लूटो को ग्रह के दर्जे से वामन ग्रह के दर्जे मे डालने के लिये जाना जाता है। उन्होने नौ ग्रहों को आठ ग्रह कर दिया था, अब वे इस संख्या को वापिस नौ करने के लिये जुटे है।
इस शोध पत्र का नाम “Evidence for a Distant Giant Planet in the Solar System.” है।

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11 विचार “सौर मंडल मे नौंवे ग्रह की खोज का दावा&rdquo पर;

  1. सर जी , आज मनुष्य के पास हब्बल जैसी शक्तिशाली दूरबीनें हैं , जिनके द्वारा अरबों-खरबों प्रकाशवर्ष दूर स्थित पिंडों को देखकर उनका विश्लेषण किया जाता है..
    फिर भी , अपने ही सौरमंडल के ग्रहों को ज्यादा स्पष्ट क्यों नही देखा जा सकता?

    .(अर्थात,हम जब दूरस्थ पिंडों को देख सकते हैं तो नजदीकी पिंड तो ज्यादा स्पष्ट दिखनी चहिए..सौरमंडल के पिंडों के धूलकण तक दिखने चाहिए..
    प्लेनेट-९ भी स्पष्ट दिखना चाहिए…शायद आप मेरा सवाल समझ गये होंगे?

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    • हब्बल , चंद्रा या वाइज जैसी दूरबीनों से पिंडो को देखने की एक सीमा है।
      जैसे वाइज दूरबीन प्लॅनेट नाइन की दूरी पर शनि से बड़े ग्रह को देख सकती है, लेकिन यह ग्रह शनि से छोटा नेपच्युन के आकार का है।
      ऐसा ही बाकि दूरबीनों का है अधिक दूरी के पिंड को देखने उसे उतना विशाल होना चाहिए।
      केप्लर दूरबीन सौर मंडल के बाहर अन्य तारो के ग्रहो को अप्रत्यक्ष रूप से देखती है। ये अप्रत्यक्ष तरीको में उस ग्रह द्वारा अपने मातृ तारे पर डाला गुरुत्वार्षण प्रभाव, या मातृ तारे के प्रकाश पर ग्रहण शामिल है।
      प्लॅनेट नाइन के प्रमाण भी अप्रत्यक्ष है।

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    • भौतिकी और रसायन शास्त्र में, प्लाज्मा आंशिक रूप से आयनीकृत एक गैस है, जिसमें इलेक्ट्रॉनों का एक निश्चित अनुपात किसी परमाणु या अणु के साथ बंधे होने के बजाय स्वतंत्र होता है। प्लाज्मा में धनावेश और ऋणावेश की स्वतंत्र रूप से गमन करने की क्षमता प्लाज्मा को विद्युत चालक बनाती है जिसके परिणामस्वरूप यह दृढ़ता से विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों से प्रतिक्रिया कर पाता है।
      प्लाज्मा के गुण ठोस, द्रव या गैस के गुणों से काफी विपरीत हैं और इसलिए इसे पदार्थ की एक भिन्न अवस्था माना जाता है। प्लाज्मा आमतौर पर, एक तटस्थ-गैस के बादलों का रूप ले लेता है, जैसे सितारों में। गैस की तरह प्लाज्मा का कोई निश्चित आकार या निश्चित आयतन नहीं होता जब तक इसे किसी पात्र में बंद न कर दिया जाए लेकिन गैस के विपरीत किसी चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में यह एक फिलामेंट, पुंज या दोहरी परत जैसी संरचनाओं का निर्माण करता है।

      प्लाज़्मा ग्लोब एक सजावटी वस्तु होती है, जिसमें एक कांच के गोले में कई गैसों के मिश्रण में इलेक्ट्रोड द्वारा गोले तक कई रंगों की किरणें चलती दिखाई देती हैं।
      प्लाज्मा की पहचान सबसे पहले एक क्रूक्स नली में १८७९ मे सर विलियम क्रूक्स द्वारा की गई थी उन्होंने इसे “चमकते पदार्थ” का नाम दिया था। क्रूक्स नली की प्रकृति “कैथोड रे” की पहचान इसके बाद ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी सर जे जे थॉमसन द्वारा १८९७ में द्वारा की गयी। १९२८ में इरविंग लैंगम्युइर ने इसे प्लाज्मा नाम दिया,शायद इसने उन्हें रक्त प्लाविका (प्लाज्मा) की याद दिलाई थी।

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    • सेवाराम महोदय, भारतीय ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति , शनि , राहु और केतु है। इसमे सूर्य ग्रह नही है, वह तारा है। चंद्रमा ग्रह ना हो कर पृथ्वी का उपग्रह है। राहु और केतु नामकरण ग्रहो का कोई आस्तित्व नही है, केवल कल्पना मे है। अब कितने ग्रह बचे? केवल पाँच।
      आधुनिक विज्ञान के अनुसार आठ ग्रह है, बुध,शुक्र,पृथ्वी ,मंगल, बृहस्पति ,शनि ,युरेनस और नेप्चयुन । यदि इस ग्रह की पुष्टि हुय तो वह नवमा ग्रह होगा। भारतीय ज्योतिष मे पृथ्वी को ग्रह नही माना गया है और युरेनस, नेप्चयुन के बारे मे कुछ नही है।

      महाशय सच को स्विकारना सीखें , हवा मे तीर ना चलायें।

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