पारिभाषिक शब्दावली


क्ष ज्ञ

ग्रह नक्षत्रो तथा अन्य आकाशीय पिंडो के हिंदी नाम और उनके अंग्रेजी नाम जानने के लिये इस लिंक पर जाये ग्रह-नक्षत्र शब्दावली

अभिकेन्द्र बल- किसी वस्तु को वृत्तीय गति में बनाए रखने के लिए उस पर एक बल वृत्त के केंद्र की ओर कार्य करता है। यह अभिकेंद्र बल कहलाता है। और इसी बल की वजह से वस्तु की गति की दिशा में निरंतर परिवर्तन होने से वह वृत्तीय गति में आती है।

अपकेंद्री बल- वृत्तीय गति में घूमती वस्तु पर कल्पित बल कार्य करने लगता है, जो अपकेन्द्री बल कहलाता है।

अनिश्चितता का सिद्धांत :

हाइसनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत विज्ञान और गणित की उन समस्याओं में से एक है जो अज्ञेय हैं. क्वांटम भौतिकी का यह सिद्धांत कहता है कि हम किसी पार्टिकल की स्थिति और उसकी गति/दिशा को एक साथ नहीं जान सकते.

इसके बारे में सोचने पर बहुत मानसिक उथलपुथल होती है. इसने ब्रह्माण्ड को देखने और समझने के हमारे नज़रिए में बड़ा फेरबदल कर दिया. अभी भी हमारे स्कूलों में परमाणु की संरचना को सौरमंडल जैसी व्यवस्था के रूप में दिखाया जाता है जिसमें केंद्र में नाभिक में प्रोटोन और न्यूट्रौन रहते हैं और बाहर इलेक्ट्रौन उपग्रहों की भांति उनकी परिक्रमा करते हैं. लेकिन परमाणु का ऐसा चित्रण भ्रामक है. नील्स बोर के ज़माने तक सभी लोग परमाणु के ऐसे ही भ्रामक चित्रण को सही मानते थे लेकिन वर्नर हाइसनबर्ग ने अपने अनिश्चितता के सिद्धांत से इसमें भारी उलटफेर कर दिया.

वर्नर हाइसनबर्ग जर्मनी के सैद्धांतिक भौतिकविद थे और उन्होंने 1920 के दशक में नील्स बोर के साथ परमाणुओं और पार्टिकल्स की संरचना के क्षेत्र में साथ में बहुत काम किया था. अपने मौलिक चिंतन से हाइसनबर्ग ने कुछ नवीन निष्पत्तियां कीं. इस सिद्धांत को उन्होंने इस प्रकार बताया:

यह पता कैसे चलेगा कि कोई पार्टिकल कहाँ है? उसे देखने के लिए हमें उसपर प्रकाश फेंकना पड़ेगा अर्थात हमें उसपर फ़ोटॉन डालने होंगे. जब फ़ोटॉन उस पार्टिकल से टकरायेंगे तब उस टक्कर के परिणामस्वरूप पार्टिकल की स्थिति परिवर्तित हो जायेगी. इस तरह हम उसकी स्तिथि को नहीं जान पाएंगे क्योंकि स्थिति को जानने के क्रम में हमने स्तिथि में परिवर्तन कर दिया.

तकनीकी स्तर पर यह सिद्धांत कहता है कि हम पार्टिकल की स्तिथि और उसके संवेग को एक साथ नहीं जान सकते. यह पूरा तो नहीं पर कुछ-कुछ उस ‘ऑब्ज़र्वर’ इफेक्ट की भांति है जहाँ कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जिनमें परीक्षण का परिणाम प्रेक्षक (ऑब्ज़र्वर) की स्तिथि में बदलाव होने से बदल जाता है. इस प्रकार अणुओं और परमाणुओं की सौरमंडलीय व्यवस्था ध्वस्त हो गयी. अब इलेक्ट्रौन को पार्टिकल के रूप में नहीं बल्कि संभाव्यता प्रकार्य (प्रॉबेबिलिटी फंक्शन्स) के रूप में देखा जाता है. हम उनके कहीं होने की संभावना की गणना कर सकते हैं पर यह नहीं बता सकते कि वे कहाँ हैं. वे कहीं और भी हो सकते हैं.

हाइसनबर्ग ने जब इस सिद्धांत की घोषणा की तब बहुत विवाद भी हुए. आइन्स्टीन ने अपना प्रसिद्द उद्धरण भी कहा, “ईश्वर पासे नहीं फेंकता”. और इसके साथ ही भौतिकी भी दो भागों में बाँट गयी. एक में तो विस्तार और विहंगमता का अध्ययन किया जाने लगा और दूसरी में अतिसूक्ष्म पदार्थ का. इन दोनों का एकीकरण अभी तक नहीं हो पाया है.

आकार ग्रहण प्रक्रिया(Structure Formation): यह ब्रह्मांड निर्माण भौतिकी का एक मूलभूत अन सुलझा रहस्य है। ब्रह्मांड जैसा की हम ब्रह्मांडीय विकिरण(Cosmic Microvave Background Radiation) के अध्ययन से जानते है, एक अत्यंत घने , अत्यंत गर्म बिन्दु के महा विस्फोट से बना है। लेकिन आज की स्थिती में हर आकार के आकाशीय पिंड मौजूद है, ग्रह से लेकर आकाशगंगाओं से आकार से गैसो के बादल (Cluster) के दानवाकार तक के है। एक शुरूवाती दौर के समांगी ब्रह्मांड से आज का ब्रह्मांड कैसे बना ?

आसंजक बल (adhesive force): दो भिन्न पदार्थों के अणुअों के मध्य लगने वाले आकर्षण-बल को आसंजक बल कहते हैं. आसंजक बल के कारण ही एक वस्तु दूसरी वस्तु से चिपकती है.

आर्किमिडीज़ का सिद्धांत-इस सिद्धांत के अनुसार, जब कोई वस्तु आंशिक रूप  से किसी द्रव में डूबी हो तो उस पर एक उत्प्लावन कार्य करता है जो वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है।

आंतरिक ऊर्जा- पदार्थ के अणु निरंतर गति में होते हैं और इन अणुओं की कुल गतिज व स्थितिज ऊर्जा को पदार्थ की ‘आन्तरिक ऊर्जा’ कहते हैं। आंतरिक ऊर्जा जितनी अधिक होगी पदार्थ उतना ही अधिक गर्म होगा।

आपेक्षिक घनत्व (relative density): वस्तु का घनत्व/4°C पर पानी का घनत्व
आपेक्षिक घनत्व एक अनुपात है। अतः इसका कोई मात्रक नहीं होता है। आपेक्षिक घनत्व को हाइड्रोमीटर से मापा जाता है। सामान्य जल की अपेक्षा समुद्री जल का घनत्व अधिक होता है, इसलिए उसमें तैरना आसान होता है। जब बर्फ पानी में तैरती है, तो उसके आयतन का 1/10 भाग पानी के ऊपर रहता है। किसी बर्तन में पानी भरा है और उस पर बर्फ तैर रही है; जब बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी तो पात्र में पानी का तल बढ़ता नहीं है, पहले के समान ही रहता है। दूध की शुद्धता दुग्यमापी (lactometer) से मापी जाती है।

आयाम (amplitude): दोलन करने वाली वस्तु अपनी साम्य स्थिति की किसी भी ओर जितनी अधिक-से-अधिक दूरी तक जाती है, उस दूरी को दोलन का आयाम कहते हैं.

इलेक्ट्रान – इलेक्ट्रान  मूलभूत परमाण्विक कण है जिसका आवेश ऋणात्मक होता है। इसका द्रव्यमान प्रोटान के द्रव्यमान का १/१८३६ होता है।

उत्प्लावक बल (Buoyant force): द्रव का वह गुण जिसके कारण वह वस्तुओं पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है, उसे उत्क्षेप या उत्प्लावक बल कहते हैं. यह बल वस्तुओं द्वारा हटाए गए द्रव के गुरुत्व-केंद्र पर कार्य करता है, जिसे उत्प्लावक केंद्र (center of buoyancy) कहते हैं. इसका अध्ययन सर्वप्रथम आर्कमिडीज ने किया था.

ऊर्जा: किसी भौतिक प्रणाली की कार्य करने की क्षमता ऊर्जा कहलाती है। ऊर्जा अनेक रूप जैसे ऊष्मा, गतिज, विद्युत रूप मे रह सकती है। इसके मापन की SI इकाई जुल (J) या न्युटन प्रति मीटर (N*m) है।

ऊर्जा संरक्षण (Energy Conversation)
ऊर्जा को न तो समाप्त तथा न ही उत्पन्न किया जा सकता है, बल्कि  इसे एक से दूसरे रूप में रूपांतरित किया जा सकता है और इस प्रकार कुल ऊर्जा एक समान संरक्षित बनी रहती है।

ऊष्मीय प्रसार- ठोसों, द्रवों व गैसों को गर्म करने पर सामान्यतया उनमें प्रसार और ठंडा करने पर संकुचन होता है।

एक्सीआन(Axions): यह भी एक काल्पनिक मूलभूत कण है, इन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता है और इनका द्रव्यमान काफी कम १०-६ से १०-२ eV/c2 के बीच होना चाहिये। मजबूत चुंबकीय बलों की उपस्थिति में इन्हें फोटान में बदल जाना चाहिये।

काल अंतराल(Space-Time) : काल अंतराल वह स्थान है जहां हर भौतिकी घटना होती है : उदाहरण के लिये ग्रह का सूर्य की परिक्रमा एक विशेष प्रकार के काल अंतराल में होती है या किसी घूर्णन करते तारे से प्रकाश का उत्सर्जन किसी अन्य काल-अंतराल में होना समझा जा सकता है। काल-अंतराल के मूलभूत तत्व घटनायें (Events) है। किसी दिये गये काल-अंतराल में कोई घटना(Event), एक विशेष समय पर एक विशेष स्थिति है। इन घटनाओ के उदाहरण किसी तारे का विस्फोट या ड्रम वाद्ययंत्र पर किया गया कोई प्रहार है।

क्वार्क : क्वार्क पदार्थ को बनाने वाले मूलभूत कण है। क्वार्क मिलकर हेड्रान बनाते है जिनमे प्रोटान और न्युट्रान प्रमुख है।

क्वांटम एन्टेन्गलमेंट(Quantum Entanglement): एन्टेन्गलमेंट का शाब्दिक अर्थ होता है उलझाव, गुंथा होना। यह एक अजीब व्यव्हार है। इसके अंतर्गत जब दो परमाण्विक कण (इलेक्ट्रान, फोटान, क्वार्क, परमाणु अथवा अणु) एक दूसरे से भौतिक रूप से टकरा्ने के पश्चात अलग हो जाते है, वे एक एन्टेंगल्ड(अन्तःगुंथित) अवस्था मे आ जाते है। इन दोनो कणो की क्वां‍टम यांत्रिकी अवस्थायें समान होती है अर्थात उनका स्पिन,संवेग, ध्रुवीय अवस्था समान होती है। एन्टेंगल्ड अवस्था मे आने के बाद यदि एक कण की अवस्था मे परिवर्तन होने पर वह परिवर्तन दूसरे कण पर स्वयं हो जाता है, चाहे दोनो कणो के मध्य कितनी भी दूरी हो। सरल शब्दो मे एन्टेंगल्ड कण-युग्म के एक कण पर आप के द्वारा किया गया परिवर्तन दूसरे कण पर भी परिलक्षित होता है।

कार्य- साधारण बोलचाल में कार्य का अर्थ है कि शारीरिक अथवा मानसिक क्रिया। जब बल लगने पर वस्तु में गति (विस्थापन) हो तो बल द्वारा कार्य किया जाता है और बल व बल की दिशा में विस्थापन का गुणनफल कार्य को व्यक्त करता है।
कार्य = बल & बल की दिशा में चली गई दूरी।
  W = F x d (कार्य का मात्रक जूल है)

केशिकत्व (capillarity tube): एक ऐसी खोखली नली, जिसकी त्रिज्या बहुत कम तथा एक समान होती है, केशनली कहलाता है. केशनली में द्रव के ऊपर चढ़ने या नीचे दबने की घटना को केशिकत्व (capillarity) कहते है.

किस सीमा तक द्रव केशनली में चढ़ता या उतरता है, यह केशनली की त्रिज्या पर निर्भर करता है. संकीर्ण नली में द्रव का चढ़ाव अधिक तथा चौड़ी नली में द्रव का चढ़ाव कम होता है. सामान्यतः जो द्रव कांच को भिंगोता है, वह केश नली में ऊपर चढ़ जाता है, और जो द्रव कांच को नही भिंगोता है वह नीचे दब जाता  है.जैसे- जब केशनली को पानी में डुबाया जाता है, तो पानी ऊपर चढ़ जाता है और पानी का सतह केशनली के अंदर धंसा हुआ रहता है. इसके विपरीत केशनली को जब पाने में डुबाया जाता है, तो पारा केशनली में बर्तन में रखे पारे की सतह से नीचे ही रहता है और केशनली में पारा की सतह उभरा हुआ रहता है.

खगोलीय इकाई(AU) : १ AU(खगोलीय इकाई)=१४९,५९७,८७०.७० किमी(पृथ्वी की सूर्य से औसत दूरी)

गुरुत्विय वक्रता (gravitational lensing) :प्रकाश किरणों के में उस समय आई वक्रता होती है जब ये किसी गुरुत्विय लेंस से गुज़रती है। ये गुरुत्विय लेंस श्याम विवर या कोई भी अत्याधिक द्रव्यमान वाला पिंड जैसे तारा भी हो सकता है।

गुरुत्वीय त्वरण : गुरुत्व के कारण होने वाला त्वरण सबसे सामान्य है। पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण का मान लगभग 9.8 मी./से.2 होता है।

गुरुत्व केंद्र- किसी वस्तु का गुरुत्व केंद्र वह बिंदु होता है जिस पर वस्तु का संपूर्ण भार कार्य करता है अथवा केंद्रित होता है। गुरुत्व केंद्र वस्तु के वास्तविक पदार्थ के बाहर भी स्थित हो सकता है।
किसी वस्तु की स्थिरता उसके गुरुत्व केंद्र की स्थिति पर निर्भर करती है। नाव में बैठे यात्रियों को नदी में तैरती नाव में खड़े नहीं होने दिया जाता है, क्योंकि नाव का गुरुत्व केंद्र यात्रियों सहित नाव के आधार पर निकट बना रहता है और नाव स्थिर रहती है।

घनत्व (density): द्रव्यमान/आयतन इसका S.I. मात्रक किलोग्राम मीटर^-3 होता है।

डापलर प्रभाव: यह किसी तरंग(Wave) की तरंगदैधर्य(wavelength) और आवृत्ती(frequency) मे आया वह परिवर्तन है जिसे उस तरंग के श्रोत के पास आते या दूर जाते हुये निरीक्षक द्वारा महसूस किया जाता है। यह प्रभाव आप किसी आप अपने निकट पहुंचते वाहन की ध्वनी और दूर जाते वाहन की ध्वनी मे आ रहे परिवर्तनो से महसूस कर सकते है।

ताप व ऊष्मा- किसी वस्तु का ताप वह मात्रा है जिससे हमें यह ज्ञात होता है कि एक मानक वस्तु की अपेक्षा वह वस्तु कितनी गर्म अथवा ठंडी है। ताप को तापमापी (Thermometer) से मापा जाता है। तापमापी के विïिवध  प्रकार हैं, किंतु सामान्य प्रचलन में काँच की नली में भरे पारे के बने तापमापी में पारे के प्रसार व संकुचन से ताप का मापन किया जाता है।

तापमापी के पैमाने का निर्धारण उसका शून्यांक शुद्ध बर्फ के गलनांक को शून्य मानकर तथा पारे के 760 मिमी के मानक वायुमंडलीय दाब पर उबलते जल से निकलती भाप के ताप को 100 का अंशाकार मानकर, करते हैं। शून्य व 100 बराबर अंशों में विभक्त कर प्रत्येक अंश को एक अंश (डिग्री) मान लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त पैमाना सैल्सियस पैमाना कहलाता है तथा इस पर ताप को अंश (oC) से व्यक्त करते हैं।

फारेनहाइट पैमाने में 0oC को 32o तथा 100oC में 212o अंशांकित किया जाता है। फारेनहाइट से सेल्सियस में ताप गणना के लिए संबंध सूत्र निम्न हैं-

tc = 5/9(tF – 32)
tctF क्रमश: सेल्सियस व फारेनहाइट पैमाने पर संगत ताप हैं।

तरंग (wave): तरंगों को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है:

  1.  यांत्रिक तरंग (mechanical wave)
  2.  अयांत्रिक तरंग (non-mechanical wave)
    1. यांत्रिक तरंग: वे तरंगें जो किसी पदार्थिक माध्यम (ठोस, द्रव, अथवा गैस) में संचरित होती है, यांत्रिक तरंगें कहलाती है. यांत्रिक तरंगों को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है:
      1. अनुदैधर्य तरंग (longitudinal wave): जब तरंग गति की दिशा माध्यम के कणों के कंपन करने की दिशा के समांतर होती है, तो ऐसी तरंग को अनुदैधर्य तरंग कहते है. ध्वनि अनुदैधर्य तरंग का उदाहरण है.
      2. अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave): जब तरंग गति की दिशा माध्यम के कणों के कंपन्न करने की दिशा के लंबवत होती है, तो इस प्रकार की तरंगों को अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं.
    2. अयांत्रिक तरंग या विद्युत चुंबकीय तरंग (electromagnetic waves): वैसे तरंगें जिसके संचरण के लिए किसी भी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है, अथार्त तरंगे निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं, जिन्हें विद्युत चुंबकीय या अयांत्रिक तरंग कहते हैं:

तरंग-गति (wave motion): किसी कारक द्वारा उत्पन्न विक्षोभ के आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को तरंग-गति कहते हैं.

तरंगदैधर्य (wave-length): तरंग गति में समान कला में कंपन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंगदैधर्य कहते हैं. इसे ग्रीक अक्षर λ(लैम्डा) से व्यक्त किया जाता है. अनुप्रस्थ तरंगों में दो पास-पास के श्रंगों अथवा गर्त्तो के बेच की दूरी तथा अनुदैधर्य तरंगों में क्रमागत दो सम्पीडनों या विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैधर्य कहलाती है. सभी प्रकार की तरंगों में तरंग की चाल, तरंगदैधर्य एवं आवृत्ती के बीच निम्न संबंध होता है:-
तरंग-चाल = आवृत्ति x तरंगदैधर्य

निहारिका (Nebula) : ब्रह्मांड में स्थित धूल और गैस के बादल।

न्युट्रान : न्युट्रान  आवेशहीन परमाण्विक कण है। यह परमाणु के केन्द्रक मे प्रोटान के साथ रहता है।

न्युट्रीनो : न्युट्रीनो एक आवेशहीन मूलभूत कण है, यह प्रकाशगति के समान गति से यात्रा करता है। इसका द्रव्यमान कम लेकिन शुन्य से ज्यादा होता है। यह अन्य ज्ञात कणों से कोई क्रिया नही करता है।

न्युटन का तीसरा नियम :  किसी भी क्रिया की विपरित किंतु तुल्य प्रतिक्रिया होती है।

पदार्थ (matter): ऐसी कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती हो और उसका अपना द्रव्यमान हो पदार्थ कहलाती है।

प्रतिपदार्थ (anti matter): पदार्थ का एक ऐसा प्रकार जो प्रतिकणो जैसे पाजीट्रान, प्रति-प्रोटान,प्रति-न्युट्रान से बना होता है। ये प्रति-प्रोटान और प्रति-न्युट्रान प्रति-क्वार्को से बने होते है। कण और प्रतिकण एक जैसे ही होते है लेकिन उनका विद्युत आवेश विपरीत होता है। कण और प्रतिकण आपस मे टकराकर एक दूसरे को विनष्ट करते हुये ऊर्जा मे परिवर्तित हो जाते है।

ऋणात्मक पदार्थ(Negative Matter):पदार्थ का वह प्रकार जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव मे प्रतिकर्षित हो। यह सैद्धांतिक रूप से प्रस्तावित है लेकिन अभी तक इसे खोजा नही गया है।

प्लैंक काल: मैक्स प्लैंक के नाम पर , ब्रह्मांड के इतिहास मे ० से लेकर १० -४३ (एक प्लैंक ईकाइ समय), जब सभी चारों मूलभूत बल(गुरुत्व बल, विद्युत चुंबकीय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल) एक संयुक्त थे और मूलभूत कणों का अस्तित्व नहीं था।

प्रकाश वर्ष : प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गयी दूरी। लगभग ९,५००,०००,०००,००० किलो मीटर। अंतरिक्ष में दूरी मापने के लिये इस इकाई का प्रयोग किया जाता है।

पृष्ठ तनाव (surface tension): द्रव के स्वतंत्र पृष्ठ में कम-से-कम क्षेत्रफल प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है, जिनके कारण उसका पृष्ठ सदैव तनाव की स्थिति में रहती है. इसे ही पृष्ठ तनाव कहते हैं. किसी द्रव का पृष्ठ तनाव वह बल है, जो द्रव के पृष्ठ पर खींची काल्पनिक रेखा की इकाई लंबाई पर रेखा के लंबवत कार्य करता है. यदि रेखा कि लंबाई (l) पर F बल कार्य करता है, तो पृष्ठ तनाव, T = F/l . पृष्ठ तनाव का S.I. मात्रक न्यूटन/मीटर होता है.

द्रव के पृष्ठ के क्षेत्रफल में एकांक वृद्धि करने के लिए, किया गया कार्य द्रव के पृष्ठ तनाव के बराबर होता है. इनके अनुसार पृष्ठ तनाव का मात्रक जूल/मीटर^२ होगा. द्रव का ताप बढ़ाने पर पृष्ठ तनाव कम हो जाता है और क्रांतिक ताप (critical temp) पर यह शून्य हो जाता है.

प्रणोद(Thrust) : किसी राकेट की शक्ति को प्रणोद(Thrust) कहते है। प्रणोद को मापने के लिए SI इकाई न्युटन (N) है

प्रोटान : प्रोटान परमाण्विक कण है, जिसका आवेश धनात्मक होता है। यह परमाणु के केन्द्रक मे न्युट्रान के साथ रहता है।

प्रतिकण : हर मूलभूत कण का समान द्रव्यमान किंतु विपरीत आवेश का कण होता है जिसे प्रतिकण कहते है।

 

ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory) : यह सिद्धांत अभी अपूर्ण है, इस सिद्धांत से अपेक्षा है कि यह सभी रहस्य को सुलझा कर ब्रह्मांड उत्पत्ति और उसके नियमों की एक सर्वमान्य गणितिय और भौतिकिय व्याख्या देगा।

बायरान : प्रोटान और न्युट्रान को बायरान भी कहा जाता है। विस्तृत जानकारी पदार्थ के मूलभूत कण लेख में।

ब्रह्मांडीय सिद्धांत (Cosmological Principle) : यह एक सिद्धांत नहीं एक मान्यता है। इसके अनुसार ब्रह्मांड समांगी(homogeneous) और सावर्तिक(isotrpic) है| एक बड़े पैमाने पर किसी भी जगह से निरीक्षण करने पर ब्रह्मांड हर दिशा में एक ही जैसा प्रतीत होता है।

ब्रह्मांडीय  सूक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB): यह ब्रह्मांड के उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक सम्पूर्ण ब्रह्मांड मे फैला हुआ है। इस विकिरण को आज भी महसूस किया जा सकता है।

भार :किसी वस्तु का भार वह बल है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण उस पर लगता है तथा पृथ्वी के केंद्र की ओर कार्यरत होता है।।  जबकि द्रव्यमान वस्तु में निहित पदार्थ  की मात्रा का माप है। जब हम कहते हैं कि एक व्यक्ति का वजन 60 किग्रा. है तो वास्तव में हम उसका द्रव्यमान बताते हैं न कि भार।

महा विस्फोट केन्द्रीय संश्लेषण(Big Bang Ncleosynthesis) : हायड्रोजन(H1) को छोड़कर अन्य तत्वों के परमाणु केन्द्रक निर्माण की प्रक्रिया।

माचो(अत्यंत विशाल सघन प्रकाशित पिंड)(MACHO: Massive compact halo object): ये उन पिंडों के लिये दिया गया नाम है जो श्याम पदार्थ की उपस्थिति को समझने में मदद कर सकते है। ये श्याम विवर (Black Hole) , न्युट्रान तारे, सफेद वामन तारे या लाल वामन तारे भी हो सकते है।

मूलभूत बल :गुरुत्व बल, विद्युत चुंबकीय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल

मित केंद्र (meta center): तैरती हुई वस्तु द्वारा विस्थापित द्रव के गुरुत्व-केंद्र को उत्प्लावन-केंद्र कहते हैं. उत्प्लावन-केंद्र से जाने वाली उर्ध्व रेखा जिस बिंदु पर वस्तु के गुरुत्व-केंद्र से जाने वाली प्रारंभिक उर्ध्व रेखा को काटती हैं उसे मिट केंद्र कहते हैं.

तैरने वाली वस्तु के स्थायी संतुलन के लिए शर्तें:
(i) मिट केंद्र गुरुत्व-केंद्र के ऊपर होना चाहिए.
(ii) वस्तु का गुरुत्व-केंद्र तथा हटाए गए द्रव का गुरुत्व-केंद्र यानी कि उत्प्लावन केंद्र दोनों को एक ही उर्ध्वाधर रेखा में होना चाहिए.

लाल विचलन(Red Shift): यह वह प्रक्रिया जिसमे किसी पिंड से उत्सर्जीत प्रकाश वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलीत होता है। वैज्ञानिक तौर से यह उत्सर्जीत प्रकाश किरण की तुलना मे निरिक्षित प्रकाश किरण के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी है। दूसरे शब्दो मे प्रकाश श्रोत से प्रकाश के पहुंचने तक प्रकाश किरणो के तरंग दैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी होती है

विम्प(WIMP:weakly interacting massive particles): अभी तक ये काल्पनिक कण है। ये कण कमजोर आणविक बल और गुरुत्वाकर्षण बल से ही प्रतिक्रिया करते है। इनका द्रव्यमान साधारण कणों(बायरान) की तुलना में काफी अधिक होता है। ये साधारण पदार्थ से प्रतिक्रिया नहीं करते जिससे इन्हें देखा और महसूस नहीं किया जा सकता।

वेग :किसी वस्तु द्वारा इकाई समय में निर्दिष्टï दिशा में तय की गई दूरी को वेग कहते हैं।

श्याम पदार्थ (Dark Matter) : एक अदृश्य पदार्थ जो साधारण पदार्थ से क्रिया नही करता है लेकिन गुरुत्वाकर्षण से साधारण पदार्थ को प्रभावित करता है।

श्याम ऊर्जा(dark energy): एक अज्ञात बल जो ब्रह्माण्ड के विस्तार के लिये उत्तरदायी है। श्याम ऊर्जा वह बल है जिससे ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति तेज हो रही है। ज्यादा तकनीकी शब्दो मे श्याम ऊर्जा से ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति मे त्वरण आ रहा है।

शक्ति- कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं,

P =w/t (शक्ति का मात्रक वाट (w) है

 

संसंजक बल (cohesive force): एक ही पदार्थ के अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण-बल को संसंजक बल कहते हैं . ठोसों में संसंजक बल का मान अधिक होता है, फलस्वरूप उनके आकार निश्चित होते हैं. गैसों में संसंजक बल का मान नगण्य होता है.

साधारण पदार्थ(Byaronic Matter): मुख्यतः इलेक्ट्रान, न्युट्रान और प्रोटान से बना होता है। इलेक्ट्रान, न्युट्रान और प्रोटान को बायरान भी कहते है।

सुपरनोवा- कुछ तारों के जीवन काल के अंत में जब उनके पास का सारा इंधन (हायड्रोजन) जला चुका होता है, उनमें एक विस्फोट होता है। यह विस्फोट उन्हें एक बेहद चमकदार तारे में बदल देता है जिसे सुपरनोवा या नोवा कहते है।

न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम- इसके अनुसार, ब्रह्मान्ड का प्रत्येक कण अन्य कणों में प्रत्येक को अपनी ओर एक बल से आकर्षित करता है, इस गुरुत्वाकर्षण बल का समीकरण सूत्र,

    F= G[(m1m2)/r2]

हिग्स बोसान: स्टैंडर्ड माडेल किसी कण के विशिष्ट द्रव्यमान की व्याख्या नही कर पाता है। उदाहरण के लिये W कण और फोटान दोनो बल वाहक कण है लेकिन फोटान शून्य द्रव्यमान का और W कण भारी क्यों है ?

भौतिक वैज्ञानिको के अनुसार एक हिग्स क्षेत्र(Higs Field) का अस्तित्व होता है, जो सैधांतिक रूप से अन्य कणो के साथ प्रतिक्रिया कर उन्हे द्रव्यमान देता है। इस हिग्स क्षेत्र के लिए एक कण चाहीये, जिसे हिग्स बोसान(Higs Bosan) कहते है। यह हिग्स बोसान अभी तक देखा नही गया है लेकिन भौतिक वैज्ञानिक इसकी खोज मे लगे हुये है। इस कण को ’ईश्वर कण(God Particle)’ भी कहते हैं।

क्ष

ज्ञ

Advertisements

11 विचार “पारिभाषिक शब्दावली&rdquo पर;

  1. सर प्रणाम
    सर मैने आपके ब्लॉग अंतरिक्ष की एक पोस्ट को अपने ब्लोग पर एक तथ्य के रूप में प्रयोग किया है लेख है http://antariksh.wordpress.com/2012/05/30/water/ धन्यवाद. मैने इस का लिंक भी दिया है. मेरा ब्लोग है-
    http://interestingfactsinhindi.blogspot.com

    Like

  2. आपने कुछ परिभाषाओं को बहुत सहजता से परिभाषित किया है। इसके लिए आप को बहुत-बहुत बधाई। चन्द्र कुमार मिश्र जी से मैं सहमत हूँ। आप को परिभाषाओं का संग्रह बड़ना चाहिए। ताकि हम उसे आसानी से जान सकें। हम लोग बहुत सी चीजों को जानते हैं। पर उसे परिभाषित नहीं कर पाते। फलस्वरूप हम लोगों को नहीं समझा पाते..।

    कुछ परिभाषाओं को पड़ कर मुझे ऐसा लगा था। जैसे आपने हमारी बातों को प्रमाणित कर दिया हो..।

    Liked by 1 व्यक्ति

इस लेख पर आपकी राय:(टिप्पणी माड़रेशन के कारण आपकी टिप्पणी/प्रश्न प्रकाशित होने मे समय लगेगा, कृपया धीरज रखें)

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s