नई दुनिया का ज्ञान: माया, इंका और प्राचीन अमेरिकी विज्ञान की कथा


संध्या का समय था। आकाश में धीरे-धीरे तारों की झिलमिलाहट उभरने लगी थी। मैं आँगन में बैठा था और मेरे सामने मेरी दोनों पुत्रियाँ,गार्गी और अनुषा,उत्सुकता से मेरी ओर देख रही थीं। अभी कुछ ही दिन पहले हमने यूनान और रोमन सभ्यता के विज्ञान और गणित की यात्रा पूरी की थी। आज वे दोनों एक नए प्रश्न के साथ आई थीं।

“पापा,” गार्गी ने पूछा, “क्या रोमन सभ्यता के बाद दुनिया में कहीं और भी विज्ञान और गणित का विकास हुआ था?”

मैं मुस्कुराया। “हाँ, और वह भी ऐसी जगह, जहाँ उस समय यूरोप के लोग पहुँच भी नहीं पाए थे,अमेरिका की प्राचीन सभ्यताओं में।”

अनुषा की आँखें चमक उठीं,“क्या वहाँ भी खगोलशास्त्र था? क्या वे भी तारों को देखते थे?”

मैंने धीरे से कहा,“केवल देखते ही नहीं थे, वे उन्हें समझते भी थे, गिनते भी थे, और उनके आधार पर समय, जीवन और ब्रह्मांड का अर्थ निकालते थे। आज हम माया, एज्टेक, इंका और अन्य प्राचीन अमेरिकी सभ्यताओं की उस अद्भुत यात्रा पर चलेंगे।”

प्रारंभिक अमेरिकी सभ्यताओं का उदय : माया सभ्यता

“सबसे पहले हमें समय में बहुत पीछे जाना होगा,” मैंने कहना शुरू किया। “लगभग 2000 ईसा पूर्व से ही अमेरिका में सभ्यताओं का विकास शुरू हो चुका था। यहाँ ओल्मेक, फिर माया, उसके बाद एज्टेक और इंका जैसी महान सभ्यताएँ विकसित हुईं।”
गार्गी ने पूछा,“क्या ये सभ्यताएँ एक-दूसरे से जुड़ी थीं?”

“कुछ हद तक,” मैंने उत्तर दिया, “पर अधिकतर उन्होंने स्वतंत्र रूप से ज्ञान विकसित किया। यही बात उन्हें और भी अद्भुत बनाती है।”

“सबसे पहले हम माया सभ्यता की बात करते हैं,” मैंने कहा। “यह सभ्यता लगभग 2000 ईसा पूर्व से लेकर 1500 ईस्वी तक मध्य अमेरिका में विकसित हुई,आज के मेक्सिको, ग्वाटेमाला, बेलीज और होंडुरास के क्षेत्रों में।”

अनुषा ने तुरंत पूछा,“क्या ये वही लोग हैं जिन्होंने पिरामिड बनाए थे?”

मैंने सिर हिलाया,“हाँ, और वे पिरामिड केवल धार्मिक या राजनैतिक प्रतीक नहीं थे, बल्कि वैज्ञानिक उपकरण भी थे।”

मैंने आकाश की ओर इशारा किया,“माया लोग खगोलशास्त्र में इतने उन्नत थे कि उन्होंने सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति का अत्यंत सटीक अध्ययन किया। उनके पिरामिड, विशेष रूप से चिचेन इत्ज़ा का प्रसिद्ध पिरामिड, इस तरह बनाए गए थे कि वर्ष के विशेष दिनों पर सूर्य की किरणें विशेष आकृतियाँ बनाती थीं।”
गार्गी आश्चर्य से बोली,“मतलब पिरामिड एक तरह का कैलेंडर भी था?”

“बिल्कुल,” मैंने कहा। “माया लोग समय को समझने में इतने आगे थे कि उन्होंने कई प्रकार के कैलेंडर बनाए।”

मैंने विस्तार से समझाना शुरू किया,“माया सभ्यता में मुख्यतः तीन प्रकार के कैलेंडर थे,ट्ज़ोल्किन, हाब और लॉन्ग काउंट।”

अनुषा ने पूछा,“इतने सारे क्यों?”

मैंने उत्तर दिया,“क्योंकि वे समय को केवल दिनों की गणना के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उसे ब्रह्मांडीय चक्रों के रूप में समझते थे। ट्ज़ोल्किन धार्मिक और अनुष्ठानों के लिए था, हाब सौर वर्ष के लिए, और लॉन्ग काउंट लंबी अवधि के इतिहास को मापने के लिए।”

गार्गी ने गहराई से पूछा,“क्या उनका कैलेंडर सही था?”

मैंने मुस्कुराकर कहा,“इतना सही कि आधुनिक विज्ञान भी उनकी सटीकता को देखकर चकित रह जाता है। उनका सौर वर्ष लगभग 365.242 दिन का था, जो आज के वैज्ञानिक मान से बहुत करीब है।”

अनुषा ने उत्सुकता से पूछा,“क्या उनके पास भी संख्या प्रणाली थी?”

मैंने कहा,“हाँ, और वह बहुत उन्नत थी। माया लोगों ने शून्य का प्रयोग किया,यह एक ऐसी उपलब्धि है जो विश्व की केवल कुछ ही सभ्यताओं में पाई जाती है, जैसे भारत में।” पढ़ना जारी रखें नई दुनिया का ज्ञान: माया, इंका और प्राचीन अमेरिकी विज्ञान की कथा

विज्ञान यात्रा : शून्य से अनंत की ओर


कल्पना कीजिए एक अंधेरी रात में

मिश्र में नील के किनारे एक मिस्री पुजारी।

गंगा के तट पर एक यज्ञ के लिए वेदी निर्माण की योजना बनाता ऋषि।

बीजिंग में एक खगोल अधिकारी।

माया पिरामिड पर खड़ा एक विद्वान।

एथेंस में प्लेटो का शिष्य।

ये सभी आकाश देख रहे हैं। वे एक दूसरे को नहीं जानते, उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता नहीं। पर वे एक ही काम कर रहे हैं, समय को पकड़ने की कोशिश।

आप प्राचीन मिस्र में हैं। आपके सामने रेगिस्तान फैला है और  दूर बह रही है एक नदी, नील।

हर वर्ष नील उफनती है, बाढ़ आती है। सारे खेत डूब जाते है। सारी सीमाएँ मिट जातीं है। लेकिन नील वरदान दे जाती है , जब पानी उतरता तो भूमि उर्वर हो जाती।

पर समस्या यह थी, सीमाएँ कहाँ थीं? खेत किसका था?

यहीं से गणित की शुरुआत हुई। मिस्र के “रस्सी खींचने वाले” (rope stretchers) लोग लंबी गांठदार रस्सियों से भूमि नापते। वे समकोण बनाते, त्रिभुज बनाते, क्षेत्रफल निकालते। उन्हें पता था, यदि एक त्रिभुज में भुजाओं का अनुपात 3:4:5 हो, तो वह समकोण त्रिभुज है।

आज हम इसे इस रूप में जानते हैं: a2 + b2 = c2

यह सूत्र बाद में यूनान में प्रसिद्ध हुआ, लेकिन मिस्र और भारत में इसका व्यावहारिक उपयोग पहले से ज्ञात था।

यह केवल ज्यामिति नहीं थी। यह कृषि, कर-व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का आधार था।

इन मिस्री पुजारियों के सामने एक और जीवन मरण का प्रश्न था, कि नील  कब बहेगी? पढ़ना जारी रखें विज्ञान यात्रा : शून्य से अनंत की ओर