ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 03 : मूलभूत बल – महा एकीकृत सिद्धांत(GUT)


महा एकीकृत सिद्धांत(Grand Unified Theory) विद्युत-चुंबकिय बल, कमजोर नाभिकिय बल तथा मजबूत नाभिकिय बल के एकीकरण का सिद्धांत है। यह नाम प्रचलित है लेकिन उचित नही है क्योंकि यह महा नही है ना ही एकीकृत है। यह सिद्धांत गुरुत्वाकर्षण का समावेश नही करता है अर्थात पूर्ण एकीकरण नही हुआ है। यह सिद्धांत पूर्ण सिद्धांत भी नही है क्योंकि इस सिद्धांत मे बहुत से कारक ऐसे है जिनके मूल्य की गणना नही की जा सकती है, उल्टे उन्हे प्रयोग की सफलता के लिए चुना जाता है! फिर भी यह पूर्ण एकीकृत सिद्धांत की ओर एक कदम है। पढ़ना जारी रखें “ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 03 : मूलभूत बल – महा एकीकृत सिद्धांत(GUT)”

एन जी सी 5584: हब्बल स्थिरांक की गणना


खूबसूरत आकाशगंगा एन जी सी 5584 यह 50,000 प्रकाशवर्ष चौडी़ है और पृथ्वी से 720 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर कन्या नक्षत्र मे स्थित है। इस महाकाय आकाशगंगा की पेंचदार … पढ़ना जारी रखें एन जी सी 5584: हब्बल स्थिरांक की गणना

सूर्य की परिक्रमा करता हुये प्रस्तावित लीसा के तीन उपग्रह जो लेसर किरणो के प्रयोग से गुरुत्विय तरंगो की जांच करेंगे।

ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 02 : मूलभूत कण और मूलभूत बल


भौतिकी मे विभिन्न कणो द्वारा एक दूसरे कणो पर डाला गया प्रभाव मूलभूत बल कहलाता है। यह प्रभाव दूसरे किसी प्रभाव के द्वारा प्रेरीत नही होना चाहीये। अब तक चार ज्ञात मूलभूत बल है, विद्युत-चुंबकिय बल, कमजोर नाभिकिय बल, मजबूत नाभिकिय बल तथा गुरुत्वाकर्षण

क्वांटम भौतिकी के अनुसार पदार्थ के कणो के मध्य विभिन्न बल पूर्णांक स्पिन(0,1,2) वाले कणो के द्वारा वहन किये जाते है। यह कुछ इस प्रकार है कि जब कोई पदार्थ-कण (इलेक्ट्रान या क्वार्क) किसी बल-वाहक कण(Force Carrying Particle) का उत्सर्जन करता है, इस उत्सर्जन से उस पदार्थ-कण(इलेक्ट्रान या क्वार्क) की गति मे परिवर्तन आता है। बल-वाहक कण किसी पदार्थ कण से टकराकर अवशोषित कर लिया जाता है, इस टकराव से पदार्थ-कण की गति मे परिवर्तन आता है, जैसे इन दोनो पदार्थ कणो के मध्य किसी बल ने अपना प्रभाव दिखाया हो। बल वाहक कण पाली के व्यतिरेक सिद्धांत(Exclusion Principal) का पालन नही करते है अर्थात दो पदार्थ-कणो के मध्य कितने ही बलवाहक कणो का आदान प्रदान हो सकता है, जोकि मजबूत बलो के लिए आवश्यक है। लेकिन अधिक द्रव्यमान वाले बलवाहक कणो का ज्यादा दूरी के पदार्थ कणो के मध्य आदान प्रदान कठिन है, इस कारण इन बलो का प्रभाव कम दूरी पर ही होता है। दूसरी ओर यदि बलवाहक कण का द्रव्यमान न हो तब बल का प्रभाव ज्यादा दूरी पर होगा। पदार्थ कणो के मध्य आदान प्रदान होने वाले इन बल वाहक कणो को आभासी कण(Virtual Particle) कहा जाता है क्योंकि उन्हे वास्तविक कणो की तरह कण जांचको(particle detector) द्वारा पकड़ा नही जा सकता है। हम जानते है कि बल-वाहक कणो का आस्तित्व है क्योंकि इनका मापन करने योग्य प्रभाव होता है तथा वे पदार्थ कणो के मध्य बलो को उत्पन्न करते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों मे 0,1,2 स्पिन के कण वास्तविक कणो की तरह पकड़ा जा सकता है। इन परिस्थितियो मे ये कण तरंगो के जैसे व्यव्हार करते है जैसे प्रकाश किरणे या गुरुत्वाकर्षण की तरंगे। कभी कभी ये कण पदार्थ कणो के मध्य बल-वाहक आभासी(virtual) कणो के आदानप्रदान के दौरान भी उत्सर्जित होते है। उदाहरण के लिए दो इलेक्ट्रान के मध्य विद्युत बल उनके मध्य आभासी फोटानो के आदान प्रदान के कारण होता है जिन्हे देखा नही जा सकता है। लेकिन कोई इलेक्ट्रान किसी दूसरे इलेक्ट्रान के पास से गुजरने पर वास्तविक फोटान को उत्सर्जित कर सकता है जिसे हम प्रकाश किरण के रूप मे देख सकते है। पढ़ना जारी रखें “ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 02 : मूलभूत कण और मूलभूत बल”

कणो की स्पिन

ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 01 : मूलभूत कण और मूलभूत बल



यह श्रंखला पदार्थ और उसकी संरचना पर आधारित है।  इस विषय पर हिन्दी में लेखो का अभाव है ,इन विषय को हिन्दी में उपलब्ध कराना ही इस श्रंखला को लिखे जाने का उद्देश्य है। इन श्रंखला के विषय होंगे:

  • 1. मूलभूत कण(Elementary particles)
  • 2.मूलभूत बल(Elementary Forces)
  • 3.मानक प्रतिकृति(Standard Model)
  • 4.प्रति पदार्थ(Antimatter)
  • 5. ऋणात्मक पदार्थ(Negative Matter)
  • 6. ग्रह, तारे, आकाशगंगा  और निहारिका
  • 7. श्याम वीवर(Black Hole)
  • 8.श्याम  पदार्थ तथा श्याम ऊर्जा (Dark Matter and Dark Energy)
  • 9. ब्रह्मांड का अंत (Death of Universe)

पदार्थ पृथक सूक्ष्म   कणो से बना होता है और उसे मनमाने ढंग से सूक्ष्म  से सूक्ष्मतम रूप मे तोड़ा नही जा सकता है, यह सिद्धांत पिछले सहस्त्र वर्षो से सर्वमान्य है। लेकिन यह सिद्धांत दार्शनिक आधार पर ही था, इसके पिछे प्रयोग और निरिक्षण का सहारा नही था। दर्शनशास्त्र मे इस पृथक सूक्ष्म कण अर्थात परमाणु की प्रकृती विभिन्न संस्कृती और सभ्यताओ मे अलग अलग तरह से परिभाषित की गयी थी। एक परमाणु का मूलभूत सिद्धांत वैज्ञानिको द्वारा रसायन शास्त्र मे नये आविष्कार के पश्चात पिछली कुछ शताब्दी मे मान्य हुआ है। पढ़ना जारी रखें “ब्रह्माण्ड की संरचना भाग 01 : मूलभूत कण और मूलभूत बल”

नाभिकिय विकिरण कब हानीकारक होता है ?: कुछ तथ्य


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जापानी नाभिकिय दुर्घटना : तथ्यो का अभाव और समाचारो की बाढ़


11 मार्च 2011 को जापान मे आये रिक्टर स्केल पर 9.0 के भूकंप और भूकंप से उत्पन्न सुनामी से हुयी जान माल की हानी से सम्पूर्ण मानव जाति दुखी है। मानवता को हुयी इस क्षति के लिये ये दो कारक भूकंप और सूनामी काफी नही थे कि एक तीसरा संकट आ खड़ा हुआ। जापान के फुकुशीमा के नाभिकिय संयंत्र से नाभिकिय विकिरण का संकट पैदा हो गया है।

नाभिकिय संयंत्र की कार्यप्रणाली
नाभिकिय संयंत्र की कार्यप्रणाली

40 वर्ष पूराने फुकुशीमा के दायची नाभिकिय संयंत्र मे आयी इस गड़बड़ी का कारण वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर का काम ना करना है। यह वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर नाभिकिय संयंत्र को उसके काम ना करने की स्थिति मे ठंडा रखते है। ठंडा रखने का यह कार्य किसी शीतक को संयंत्र मे पंप कर किया जाता है, यह शीतक पानी भी हो सकता है। सामान्य स्थिति मे नाभिकिय संयत्र से उत्पन्न विद्युत ही उसे ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है लेकिन रखरखाव के समय जब नाभिकिय संयत्र को बंद किया जाता है तब यह वैकल्पिक जनरेटर से उत्पन्न विद्युत ही संयत्र को ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है। इन्ही वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटरो को रखरखाव के अतिरिक्त आपातकालीन स्थिति मे प्रयोग किया जाता है। पढ़ना जारी रखें “जापानी नाभिकिय दुर्घटना : तथ्यो का अभाव और समाचारो की बाढ़”