विज्ञान संचार का जाना-पहचाना चेहरा : प्रोफेसर यश पाल


लेखक : देवेंद्र मेवाड़ी सर

प्रोफेसर यशपाल लेखक देवेंद्र मेवाड़ी के साथ

प्रोफेसर यश पाल को मैंने पहली बार टेलीविजन के पर्दे पर देखा। उनके पूरे व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि टेलीविजन के पर्दे पर उनका चेहरा एक चहेता चेहरा बनता गया। विज्ञान की दुनिया के ग्लैमर थे वे। दूरदर्शन पर लोग जैसे कई दूसरे मनोरंजक कार्यक्रम या फिल्में देखते, वैसे ही वे पहली बार विज्ञान के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘टर्निंग पाइंट’ को भी देखने लगे। विज्ञान का कोई कार्यक्रम इतना लोकप्रिय पहले कभी नहीं हुआ था। विज्ञान का यह कार्यक्रम देखते हुए प्रोफेसर यश पाल की अपनी सीधी-सरल भाषा और रोचक शैली में देश के लाखों लोग विज्ञान की बातें समझने लगे। दूरदर्शन के दर्शक तब विज्ञान के इस कार्यक्रम का भी अन्य लोकप्रिय कार्यक्रमों की तरह इंतजार किया करते थे। जब मैंने उन्हें पहली बार टेलीविजन के पर्दे पर देखा-सुना तो मेरे लिए प्रोफेसर यश पाल आम जन तक आसानी से विज्ञान की बात पहुंचाने वाले एक विज्ञान संचारक थे।

टेलीविजन के पर्दे के बाहर उनसे मेरी पहली भेंट हुई, जाने-माने फिल्म निर्देशक अरुण कौल के स्टूडियो में, जहां तब हम काॅमेट यानी ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र का निर्माण कर रहे थे। मैंने उस वृत्तचित्र की पटकथा लिखी थी, लेकिन अरुण कौल चाहते थे कि मैं फिल्म के हर चरण से जुड़ा रहूं। उसी बीच उन्होंने कहा कि आकाश और ग्रह-नक्षत्रों को मजेदार तरीके से समझाने के लिए हमें प्रोफेसर यश पाल को बुलाना चाहिए। वे आए। मैंने तब पहली बार उन्हें करीब से देखा, पहचाना- लंबा कुत्र्ता, जींस, कंधे में कपड़े का झोला, लंबे घुंघराले बाल, चश्मा और चेहरे पर एक मोह लेने वाली मुस्कराहट, मानो अभी कोई मजेदार बात करने को उतावले हो रहे हों।

उनसे बातें हुईं। उन्होंने एक परात में पानी मंगवाया, झोले में हाथ डाल कर रामदाने के जैसे बीज निकाले और उन्हें पानी में बुरक दिया। बीज छितर कर पानी की सतह पर फैल गए। वे बच्चों की सी उत्सुकता के साथ हंस कर बोले, ”लो, यह बन गया तारों भरा आकाश!“ हम आश्चर्य से देखते ही रह गए। उसके बाद उन्होंने आकाश के बारे में, तारों के बारे में और धूमकेतु के बारे में अपनी मजेदार शैली में अनेक बातें समझाईं। कैमरा शूट करता रहा। उस फिल्म में वायस ओवर दूरदर्शन की उस समय की चर्चित समाचार वाचिका अविनाश कौर सरीन ने दिया। वह वृत्तचित्र सन् 1997 में विज्ञान प्रसार संस्था के लिए बनाया गया था, जब हेल बाॅप धूमकेतु आसमान में आया था।

उसके बाद मैंने उन्हें 28 फरवरी 2001 को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के सम्मान समारोह में देखा। समारोह में उन्हें विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनके समग्र योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मुझे भी उस दिन मीडिया में विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था। प्रोफेसर यश पाल समारोह में लोगों के लिए आकर्षण बने हुए थे, कुछ वैसा ही आकर्षण जैसा किसी अभिनेता के लिए होता है। इससे यह तो साफ पता लगता था कि आम लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुंचा कर कोई वैज्ञानिक या विज्ञान संचारक भी उनके दिल में अपने लिए जगह बना सकता है। प्रोफेसर यश पाल लाखों लोगों के दिल में अपने लिए यह जगह बखूबी बनाते गए।

इसके बाद कई बार कुछ समारोहों या बैठकों में भी प्रोफेसर यश पाल को देखा और सुना। सन् 2006 में वरिष्ठ विज्ञान लेखक बिमान बसु ने अंग्रेजी में उनकी जीवनी लिखी जिसे पुस्तक रूप में विज्ञान प्रसार संस्था ने प्रकाशित किया। मैं तब विज्ञान प्रसार में फैलो के रूप में काम कर रहा था। विज्ञान लेखिका विनीता सिंघल ने उस पुस्तक का अनुवाद किया था। पुस्तक थी ‘यश पाल: विज्ञान को समर्पित जीवन’। उसका भाषा संपादन मैंने किया था। संपादन के दौरान मुझे प्रोफेसर यश पाल के जीवन और उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानने का मौका मिला। उस पुस्तक का लोकार्पण भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इंसा) के सभागार में तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया। तब डाॅ. अब्दुल कलाम ने भी प्रोफेसर यश पाल के व्यक्तित्व और समर्पित रूप से उनके काम करने की विशेषताओं का ज़िक्र किया था।

वर्ष 2015 में विज्ञान प्रसार संस्था ने बच्चों में मलेरिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हिंदी में एक अखिल भारतीय निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया था जिसमें 7000 से अधिक निबंध प्राप्त हुए थे। 25 अप्रैल 2015 को राष्ट्रीय बाल भवन में प्रतियोगिता के विजयी बच्चों को पुरस्कार प्रदान करने के लिए प्रोफेसर यश पाल को आमंत्रित किया गया था। वहां उनसे एक अरसे बाद मेरी भेंट हुई और उनके साथ विज्ञान संचार पर बातें करने का भी मौका मिला था। वे तब कमजोर लग रहे थे। उनके दोनों बेटे, राहुल और अनिल उन्हें सहारा देने के लिए उनके साथ चल रहे थे हालांकि जीवट के धनी प्रोफेसर यश पाल जहां तक संभव हो रहा था बिना सहारे के चलने की कोशिश कर रहे थे। समारोह में बच्चों को उन्होंने पुरस्कार और प्रमाण पत्र तो वितरित किए ही, उनमें से हर बच्चे के साथ कुछ-न-कुछ बातें भी करते रहे। बच्चों के साथ आए अभिभावकों से भी उन्होंने बच्चों का उत्साह बढ़ाते रहने की बातें की।

बच्चों से बात करना और उनके सवालों का जबाब देना प्रोफेसर यश पाल को बहुत प्रिय था। इसलिए जहां भी बच्चे मिलते, वे बच्चों की ही सहज जिज्ञासा से उनसे सवाल पूछते, उनसे उस सवाल के बारे में सोचने को कहते और फिर उस गुत्थी को उलझाते हुए उसका उत्तर देते। उस दिन मलेरिया के बारे में बातें करते हुए भी उन्होंने बच्चों से कहा कि इतनी छोटी जान है मच्छर, लेकिन इसने दुनिया की नाक में दम कर रखा है। इसके कारण पूरी दुनिया में लाखों लोग बीमार पड़ जाते हैं। इसीलिए तो सफाई जरूरी है ताकि मच्छर न पनपें। इनके बारे में अभी बहुत कुछ पता लगाने की कोशिश करनी है, रिसर्च करनी है। बड़े होकर तुम लोग यह काम कर सकते हो।

यश पाल जब बात करते थे तो लगता था वे ज़मीन पर खड़े हैं और ज़मीनी हकीकत बता रहे हैं। सच कहें तो वे आए भी ज़मीन से ही थे। उनका जन्म 26 नवंबर 1926 को झांग में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता का नाम रामप्यारे लाल और मां का नाम श्रीमती लक्ष्मी देवी था। अपनी जीवनी में उन्होंने बिमान बसु को बताया है कि उनका बचपन क्वेटा, बलूचिस्तान में बीता। सन् 1935 में वे जब नौ वर्ष के थे तो क्वेटा में भयंकर भूकंप आया था। उसमें उनका घर और पूरा शहर बुरी तरह ध्वस्त हो गया था। उस आपदा में यश और उनके भाई को ज़मीन में मिट्टी और ईंटों के बीच से खोज कर बाहर निकाला गया। वे बताते हैं कि उन्होंने क्वेटा में ही पहली बार हवाई जहाज देखा। अपने दोस्त लाली के साथ वे साइकिल पर वहां तक गए और पायलट से मिल कर हवाई जहाज के बारे में तमाम बातें पूछीं। उन्हें यह जानकर बहुत अचरज हुआ था कि वह हवाई जहाज कोलकाता से वहां दो दिन बाद पहुंचा था!

क्वेटा से पिता का तबादला होने के कारण वे जबलपुर, मध्य प्रदेश आ गए और वहां पढ़ाई शुरू की। वहां के अपने एक शिक्षक को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वे गणित, भौतिकी और भूगोल पढ़ाते थे। लेकिन, सबसे बड़ी बात यह थी कि वे रटने पर नहीं समझने पर जोर देते थे। उनका नाम पवार था। यश पाल के मन में उनकी बात बैठ गई और वे भी जीवन भर बच्चों को यही समझाते रहे कि रटो मत, समझो। यश पाल ने 50 वर्ष बाद उन्हें खोजा और उनसे मिले। वे अपने पढ़ाए विद्यार्थी ‘आर्य’ से मिलकर बहुत खुश हुए। लेकिन, आर्य कौन? असल में यश पाल का ही नाम तब यश आर्य था। आर्य इसलिए क्योंकि उनका परिवार आर्य समाजी था।

प्रोफेसर यश पाल की जीवनी में लिखा गया है कि हाईस्कूल में पढ़ते समय स्वत्रंतता आंदोलन की बातों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना नाम यश भारती रख लिया था! पहले यश, फिर यश आर्य, उसके बाद यश भारती, तो वे यश पाल कब बन गए? असल में उच्च शिक्षा के दौरान वे जब शोध पत्र लिखने लगे तो सोचा, शोध पत्र में क्या नाम दूं? उनके घर वाले और दोस्त उन्हें प्यार से ‘पाल’ कहा करते थे। तो, उन्होंने ‘पाल’ को अपने नाम के साथ जोड़ लिया और ‘यश पाल’ हो गए। यशपाल नहीं यश पाल। कुल-नाम भूटानी तो उनके आर्य समाजी परिवार ने अपनाया ही नहीं। वे सदा जाति और मूर्ति पूजा के खिलाफ रहे।

देश का विभाजन होने पर वे दिल्ली आ गए। यश पाल तब पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर में बी.एससी. (आॅनर्स) की पढ़ाई कर रहे थे। दिल्ली आने पर वे प्रोफेसर दौलत सिंह कोठारी की मदद से दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्वी पंजाब विश्वविद्यालय के भौतिकी आॅनर्स स्कूल में पढ़ने लगे। यह सब तब इतना आसान नहीं था लेकिन प्रोफेसर कोठारी और उस समय के डिप्टी कमिश्नर महेंद्र सिंह रंधावा की मदद के कारण यह सब संभव हो सका। यश पाल ने एम. एससी. भौतिकी की पढ़ाई अभी पूरी भी नहीं की थी कि उन्हीं दिनों उन्हें टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआइएफआर), बंबई (अब मुंबई) का एक विज्ञापन दिखाई दिया। विज्ञापन छात्र-शोधार्थी की आवश्यकता के बारे में था। यश पाल ने इसके लिए तुरंत अर्जी भेज दी। वहां उन्होंने इंटरव्यू दिया और उन्हें चुन लिया गया। इस तरह देश की एक शीर्षस्थ संस्था टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च में उनके कॅरियर की शुरूआत हो गई। उन्होंने वहीं रहते हुए अपना एम.एससी. का शोध प्रबंध भी पूरा किया और पंजाब विश्वविद्यालय से एम.एससी. की उपाधि अर्जित की। पांच वर्ष बाद बाद सन् 1954 में पीएच.डी की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका के मैसाच्युसैट्स इंस्टिट्यूट आॅफ टैक्नोलाॅजी (एम आई टी), कैंब्रिज चले गए। वहां से उन्होंने सन् 1959 में पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की।

टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च में रहते हुए उन्होंने काॅस्मिक किरणों का गहन अध्ययन किया। इसके लिए गुब्बारों की मदद ली और ऊंचे आसमान में उड़ते गुब्बारों से लटके वैज्ञानिक उपकरणों के पैलोड से काॅस्मिक किरणों से संबंधित रहस्यों का पता लगाया। यह काम उन्होंने काॅस्मिक किरणों पर शोध के लिए प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी बर्नार्ड पीटर्स के साथ किया। इसमें देवेंद्र लाल भी उनके साथी थे। तब उन दोनों वैज्ञानिकों की जोड़ी ‘लाल और पाल’ के रूप में लोकप्रिय हो गई थी। उन्होंने निर्मल से शादी की जो एम आई टी की प्रयोगशाला में तकनीकी सहायक भी रहीं। मजेदार बात यह है कि यश पाल और निर्मल की शादी में केवल एक ही बाराती था और वे थे बर्नार्ड पीटर्स!

वे अपने शोध कार्य के सिलसिले में आसमान में गुब्बारे का पीछा भी करते थे। बल्कि, एक बार तो डकोटा विमान में उड़ते हुए वे चार घंटे तक खड़े रह कर उसके पारदर्शी गंुबद से गुब्बारे को देखते रहे। उसे देखते-देखते आगे बढ़े तो पता लगा नेपाल की सीमा आ चुकी है। भारतीय वायुयान को वह सीमा पार करने की अनुमति नहीं थी। गुब्बारा उपकरणों का पेलोड लेकर नेपाल में पोखरा के कहीं आस-पास जा गिरा। बाद में जब वे काठमांडू पहुंचे तो पता लगा पोखरा में गिरी उस रहस्मय वस्तु को बड़ी सावधानी और शंकाओं के साथ काठमांडू ले आया गया था और उस पर नज़र रखी जा रही थी।

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इंसा) द्वारा प्रकाशित ‘बायोग्राॅफिकल डिक्शनरी आॅफ साइंटिस्ट्स’ मुझे बता रही है कि विशेषज्ञता के हिसाब से देखें तो यश पाल को वैज्ञानिक कहा जाएगा। इस रूप में उन्होंने टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च में शोध कार्य करने के दौरान कण भौतिकी के क्षेत्र में भी अनुसंधान किया जिससे के-मेसाॅन कण की खोज संभव हुई। उन्होंने मूलभूत कणों के युगल-उत्पादन का भी पता लगाया। यश पाल के प्रयासों से ही टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च में काॅस्मिक-रे, उच्च ऊर्जा भौतिकी तथा खगोल भौतिकी स्कूल की स्थापना हो सकी। उन्होंने एक्स-रे और गामा-रे पर भी अनुसंधान किया और बैलूनों की मदद से इंफ्रारेड खगोलिकी संबंधी शोध कार्य किया। वैज्ञानिक के रूप में प्रोफेसर यश पाल चाहते थे कि विज्ञान का लाभ आम लोगों को मिलना चाहिए ताकि उनका जीवन सुधर सके। टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च में रहते हुए वे पढ़ाते भी रहे। इसलिए उन्हें प्रोफेसर यश पाल कहा जाता है।

आसमान में गुब्बारों से ब्रह्मांड के रहस्यों का पता लगाने वाले प्रोफेसर यश पाल को सन् 1972 में अंतरिक्ष अनुसंधान की राह को आगे बढ़ाने के लिए अहमदाबाद में स्पेस एप्लिकेशन सेंटर यानी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र की स्थापना के लिए निदेशक नियुक्त किया गया। उन्होंने कुशलतापूर्वक इस केंद्र की स्थापना की। यह उनका संस्था संस्थापक रूप था जिसे उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी से निभाया। उनमें इतना आत्मविश्वास था कि जब उस केंद्र से कुछ वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजने की बात उठी तो प्रोफेसर यश पाल ने कहा, “अमेरिका हमें क्या सिखाएगा? यह काम हम खुद करके दिखाएंगे।” इतिहास गवाह है कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता में उनके द्वारा स्थापित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई है।

प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी प्रोफेसर सतीश धवन ने प्रोफेसर यश पाल से भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए उपग्रह के उपयोग की परियोजना पर काम शुरू करने के लिए कहा। वे जानते थे कि इस कठिन काम को प्रोफेसर यश पाल जैसा वैज्ञानिक ही अपनी दूरदर्शिता, लगन और मेहनत से मूर्त रूप दे सकता है। यही हुआ। हालांकि कई बाधाएं सामने आईं लेकिन प्रोफेसर यश पाल और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों तथा तकनीशियनों की मेहनत रंग लाई। भारत के 2,400 गांवों में पहली बार सामुदायिक टेलीविजन के सेट लगा दिए गए। और, इस तरह अमेरिकी उपग्रह एटीएस-6 के जरिए शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण करके 1 अगस्त 1975 को सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपरिमेंट यानी ‘साइट’ कार्यक्रम शुरू हो गया। उपग्रह से शिक्षा के क्षेत्र में देश में यह पहला सफल प्रयोग था। इस शैक्षिक कार्यक्रम में विज्ञान की शिक्षा पर अधिक जोर दिया गया।

प्रोफेसर यश पाल शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन लाना चाहते थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इस दिशा में हर संभव प्रयास भी किए। उन्होंने शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कई नए कार्यक्रमों की शुरूआत की। शोध को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालयी केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया। इसी के परिणाम स्वरूप प्रसिद्ध इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फाॅर एस्ट्रोनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स की स्थापना हुई।

प्रचलित शिक्षा पद्धति पर गहराई से विचार करने पर उन्होंने तो यह सुझाव भी दे दिया था कि सभी कालेजों तथा विश्वविद्यालयों को एक साल तक बंद कर देना चाहिए ताकि शिक्षक समाज में जाएं, लोगों से और विद्यार्थियों से मिलें, उनकी कठिनाइयां समझें और उन्हें किस तरह की शिक्षा की जरूरत है, इस पर गंभीरता से विचार कर सकें। उनका यह सुझाव राजनैतिक परिवर्तन के कारण लागू न हो सका। अगर यह सुझाव लागू हो गया होता तो आज शिक्षा पद्धति का चेहरा शायद कुछ और होता। वे चाहते थे कि शिक्षा बोझ न बने। उन्हें सन् 1993 में शिक्षा के राष्ट्रीय सलाहकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उस समिति की रिपोर्ट ‘लर्निंग विदआउट बर्डन’ को आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ माना जाता है। सन् 2009 में उच्च शिक्षा में सुधार के लिए उनकी अध्यक्षता में सरकार ने एक समिति का गठन किया। तब भी प्रोफेसर यश पाल ने इस बात पर जोर दिया था कि स्कूली बच्चों के भारी-भरकम बस्ते का भार कम करना जरूरी है। विद्यार्थियों से वे कहा करते थे, रटो नहीं, विज्ञान को समझो। वे कोचिंग के कुचक्र को भी शिक्षा के खिलाफ साजिश मानते थे और उसे खत्म करने के लिए उन्होंने सिफारिश की थी। छत्तीसगढ़ के फर्जी विश्वविद्यालयों को बंद कराने का ऐतिहासिक मुकदमा प्रोफेसर यश पाल ने स्वयं लड़ा जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की खंड पीठ ने अप्रैल 2005 में वहां के 112 फर्जी विश्वविद्यालयों को बंद करने का फैसला सुनाया।

प्रोफेसर यश पाल ने वैज्ञानिक, शिक्षक, विज्ञान संचारक और प्रशासक के रूप में जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ कई और उत्तरदायित्व भी संभाले। वे योजना आयोग के प्रमुख सलाहकार और यूनीस्पेस के महासचिव और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के सचिव भी रहे। सन् 2007 से 2012 तक वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चांसलर भी रहे। वे इंडियन फिजिक्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी रहे। प्रोफेसर यश पाल भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, इंडियन एस्ट्रोनोमिकल सोसायटी, गुजरात साइंस एकेडमी आदि कई अकादमियों के फैलो थे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रोफेसर यश पाल को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें सन् 1976 में पद्मभूषण और 2013 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। विज्ञान लोकप्रियकरण के लिए उन्हें 2009 में यूनेस्को का प्रसिद्ध कलिंग पुरस्कार और विज्ञान संचार के क्षेत्र में उनके समग्र योगदान के लिए सन् 2000 के राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (एनसीएसटीसी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार) के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। विज्ञान संचार में उनके योगदान के लिए उन्हें सन् 1994 में आर्थर क्लाक्र्स पुरस्कार भी दिया गया।

जन विज्ञान के चहेते चेहरे वाले, एक में अनेक प्रोफेसर यश पाल 25 जुलाई 2017 को रात्रि लगभग 8 बजे दिल्ली के निकट नोएडा में इस ग्रह से विदा हो गए।

चित्र में : प्रोफेसर यश पाल और विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी

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