ऊर्जा संकट : थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर


भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से समस्त विश्व जूझ रहा है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम ऊर्जा की चर्चा में आ गई है। इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है। थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और ‘ग्रीन(पर्यावरण हितैषी)’ है।

समस्त विश्व में थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और यह पूरी पृथ्वी पर लगभग हर जगह उपलब्ध है। किसी परमाणु भट्टी में सक्रिय होने के दौरान इसकी कुछ रासायनिक और भौतिक विशेषताएँ होती हैं जो इसे यूरेनियम से बेहतर बना देती है। परमाणु भट्टियों में थोरियम का प्रयोग यूरेनियम से अधिक सुरक्षित होंता है| जब कोई परमाणु रिएक्टर ज्यादा गर्म हो जाता है और ईंधन की छड़ें श्रृंखलाबद्ध में विस्फोटों का सिलसिला जारी नहीं रख पाती हैं और संकट जारी कहता है। यही फुकुशिमा में हुआ था। लेकिन अगर किसी थोरियम रिएक्टर में कुछ होता है तो तकनीशियन आसानी से उत्प्रेरक को बंद कर सकेंगे और इसकी प्रतिक्रिया ख़ुद ब ख़ुद रुक जाएगी। थोरियम बिना किसी मानवीय दख़ल के बंद हो जाएगा। आपको बस एक स्विच ऑफ़ करना होगा।

परमाणु भट्टियों में थोरियम अधिक सुरक्षित है और इसके ज़रिए बम बनाना भी तक़रीबन नामुमकिन है। ये वो महत्वपूर्ण वजहें हैं जिनकी वजह से दुनिया भविष्य के ईंधन की आपूर्ति की ओर देख रही है।

इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है।

क्या है थोरियम?

थोरियम (Thorium) आवर्त सारणी के ऐक्टिनाइड श्रेणी (actinide series) का प्रथम तत्व है। पहले यह चतुर्थ अंतर्वर्ती समूह (fourth transition group) का अंतिम तत्व माना जाता था, परंतु अब यह ज्ञात है कि जिस प्रकार लैथेनम (La) तत्व के पश्चात् 14 तत्वों की लैथेनाइड शृंखला (lanthanide series) प्रांरभ होती है, उसी प्रकार ऐक्टिनियम (Ac) के पश्चात् 14 तत्वों की दूसरी शृंखला आरंभ होती है, जिसे एक्टिनाइड शृंखला कहते हैं। थोरियम के अयस्क में केवल एक समस्थानिक(द्रव्यमान संख्या 232) पाया जाता है, जो इसका सबसे स्थिर समस्थानिक (अर्ध जीवन अवधि 1.4 x 1010 वर्ष) है। परंतु यूरेनियमरेडियम तथा ऐक्टिनियम अयस्कों में इसके कुछ समस्थानिक सदैव वर्तमान रहते हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 227, 228, 230, 231 तथा 234 हैं। इनके अतिरिक्त 224, 225, 226, 229 एवं 233 द्रव्यमान वाले समस्थानिक कृत्रिम उपायों द्वारा निर्मित हुए हैं।

थोरियम धातु की खोज 1828 ई में बर्ज़ीलियस ने थोराइट अयस्क में की थी। यद्यपि इसके अनेक अयस्क ज्ञात हैं, परंतु मोनेज़ाइट (monazite) इसका सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं, जिसमें थोरियम तथा अन्य विरल मृदाओं के फॉस्फेट रहते हैं। संसार में मोनेज़ाइट का सबसे बड़ा भंडार भारत के केरलराज्य में हैं। बिहार प्रदेश में भी थोरियम अयस्क की उपस्थिति ज्ञात हुई है। इनके अतिरिक्त मोनेज़ाइट अमरीका, आस्ट्रलिया, ब्राज़िल और मलाया में भी प्राप्त है। पढ़ना जारी रखें “ऊर्जा संकट : थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर”

बरमुडा त्रिभुज : रहस्य या एक मिथक (Bermuda Triangle : Mystery or Myth)?


आपको बरमूडा त्रिभुज कोई ऐसा नक्शा नही मिलेगा जो इस क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता हो। कुछ व्यक्तियों की मान्यताओं के अनुसार यह एक ऐसा रहस्यमय क्षेत्र है जहाँ पर वायुयान और जलयान रहस्यमय रूप से लापता होते हैं। 1964 मे एक पत्रिका ने इस क्षेत्र को बरमूडा त्रिभुज नाम दिया था, तब से इस क्षेत्र सनसनीखेज समाचारों/कहानियों के लेखकों की कलम चलती रही है। यह बरमूडा त्रिभुज , जिसे “शैतान के त्रिभुज” के रूप में भी जाना जाता है , उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर का एक क्षेत्र है जिसमे कुछ विमान और सतही जहाज (surface vessels) गायब हो गए हैं. कुछ लोगों का दावा है कि ये गायब होने की बातें “मानव त्रुटि (human error)” या “प्रकृति के कृत्यों (acts of nature)” की सीमाओं के परे है. लोकप्रिय संस्कृति ने गायब होने की कुछ घटनाओं को अपसामान्य (paranormal), भौतिकी के नियमों (laws of physics) के निलंबन, या भूमि से परे की जीवित वस्तुओं (extraterrestrial beings) की गतिविधियों से सम्बद्ध बताया है।लेकिन जब आप इस क्षेत्र की और उससे जुडी दुर्घटनाओं की गहराई से जांच पड़ताल करते है तो पाते है कि इस रहस्यमय क्षेत्र मे कोई रहस्य ही नही है। इस क्षेत्र मे हुयी अधिकतर दुर्घटना का संतोषजनक स्पष्टीकरण उपलब्ध है।

वर्ल्ड वाईड फंड फ़ार नेचर ने 2013 मे समुद्री परिवहन के लिये सबसे खतरनाक दस शीर्ष स्थानों की सूची तैयार की है लेकिन इसमे बरमूडा त्रिभुज नही है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि बरमूडा त्रिभुज मे विचित्र अनुभव के दावे आधारहीन है?

ऐसा भी नही है, वैज्ञानिको ने इस क्षेत्र मे सामान्य समुद्री क्षेत्र की तुलना मे कुछ अलग गुण पाये है और इस क्षेत्र की सागर तलहटी पर कुछ विचित्र संरचनाये भी पायी है। और इस क्षेत्र के कथित रहस्यमय व्यवहार की अवधारणा पर विश्वास करने वालों के लिये इतना ही पर्याप्त है और वे तिल का ताड़ बनाने मे सक्षम है।

इस लेख मे हम इस क्षेत्र से जुड़े कुछ तथ्यों और हुयी दुर्घटनाओं पर चर्चा करेंगे। साथ ही मे हम इस क्षेत्र से जुड़ी हुयी कुछ विचित्र मनगढ़ंत कहानीयाँ जैसे परग्रही द्वारा अपहरण(Alien Abduction), अटलांटीस सभ्यता की मशीनें या श्याम विवर जैसी कहानियो को भी देखेंगे। इसके अतिरिक्त हम इस क्षेत्र मे होने वाली दुर्घटनाओं के साधारण और संभव कारणों की जांच पड़ताल भी करेंगे।

आधिकारिक रूप से बरमूडा त्रिभुज जैसे किसी क्षेत्र का अस्तित्व नही है। सं रा अमरीका का भौगोलिक नामकरण संस्थान किसी भी ऐसे क्षेत्र की उपस्थिति से इंकार करता है। लेकिन आम मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र अटलांटिक महासागर मे सं रां अमरीका के दक्षिणी समूद्री सीमा मे स्थित है और इसके तीन शीर्ष बिंदु बरमूडा द्वीप, फ्लोरिडा राज्य का मियामी शहर और प्युर्टो रीको राज्य का सान जुआन द्वीप है। यह क्षेत्र 500,000 वर्ग मील मे फैला हुआ है।

इस क्षेत्र का नाम इस त्रिभुज के एक शीर्ष बिंदु बरमूडा द्वीप के नाम पर है जिसे किसी समय “शैतान का द्वीप(Devil’s Island)” भी कहा जाता था। इस द्वीप के आस पास देखने में सुरक्षित पर खतरनाक मूंगे की चट्टान है जिनसे टकराकर हर वर्ष कितने ही जहाज क्षतिग्रस्त हो जाते है। पढ़ना जारी रखें “बरमुडा त्रिभुज : रहस्य या एक मिथक (Bermuda Triangle : Mystery or Myth)?”

स्वर्ण

स्वर्ण मरिचिका : सोना कितना सोना है?


स्वर्ण
स्वर्ण

सोने से मानव सभ्यता का लगाव दिलचस्प है। रसायन विज्ञान की नज़र से देखें तो यह उतना धातु उदासीन सी है क्योंकि यह शायद ही किसी धातु से अभिक्रिया करता है।

सोना एक धातु एवं तत्व है । शुद्ध सोना चमकदार पीले रंग का होता है जो कि बहुत ही आकर्षक रंग है। यह धातु बहुत मूल्यवान है और प्राचीन काल से सिक्के बनाने, आभूषण बनाने एवं धन के संग्रह के लिये प्रयोग की जाती रही है। सोना घना, मुलायम, चमकदार, सर्वाधिक संपीड्य (malleable) एवं तन्य (ductile) धातु है। रासायनिक रूप से यह एक तत्व है जिसका प्रतीक (symbol) Au एवं परमाणु क्रमांक 79 है। यह एक ट्रांजिशन धातु है। अधिकांश रसायन इससे कोई क्रिया नहीं करते। सोने के आधुनिक औद्योगिक अनुप्रयोग हैं – दन्त-चिकित्सा में, इलेक्ट्रॉनिकी में।

संकेत (Au), परमाणुसंख्या 79, परमाणुभार 196.97, गलनांक 106° से., क्वथनांक 2970° से. घनत्व 19.3 ग्राम प्रति घन सेमी, परमाणु व्यास 2.9 एंग्स्ट्राम A°, आयनीकरण विभव 9.2 इवों, विद्युत प्रतिरोधकता 2.19 माइक्रोओहम्‌ - सेमी.
संकेत (Au),
परमाणुसंख्या 79,
परमाणुभार 196.97,
गलनांक 106° से.,
क्वथनांक 2970° से.
घनत्व 19.3 ग्राम प्रति घन सेमी,
परमाणु व्यास 2.9 एंग्स्ट्राम A°,
आयनीकरण विभव 9.2 इवों,
विद्युत प्रतिरोधकता 2.19 माइक्रोओहम्‌ – सेमी.

स्वर्ण के तेज से मनुष्य अत्यंत पुरातन काल से प्रभावित हुआ है क्योंकि बहुधा यह प्रकृति में मुक्त अवस्था में मिलता है। प्राचीन सभ्यताकाल में भी इस धातु को सम्मान प्राप्त था। ईसा से 2500 वर्ष पूर्व सिंधु घाटी की सभ्यताकाल में (जिसके भग्नावशेष मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिले हैं) स्वर्ण का उपयोग आभूषणों के लिए हुआ करता था। उस समय दक्षिण भारत के मैसूर प्रदेश से यह धातु प्राप्त होती थी। चरकसंहिता में (ईसा से 300 वर्ष पूर्व) स्वर्ण तथा उसके भस्म का औषधि के रूप में वर्णन आया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्वर्ण की खान की पहचान करने के उपाय धातुकर्म, विविध स्थानों से प्राप्त धातु और उसके शोधन के उपाय, स्वर्ण की कसौटी पर परीक्षा तथा स्वर्णशाला में उसके तीन प्रकार के उपयोगों (क्षेपण, गुण और क्षुद्रक) का वर्णन आया है। इन सब वर्णनों से यह ज्ञात होता है कि उस समय भारत में सुवर्णकला का स्तर उच्च था।

इसके अतिरिक्त मिस्रऐसीरिया आदि की सभ्यताओं के इतिहास में भी स्वर्ण के विविध प्रकार के आभूषण बनाए जाने की बात कही गई है और इस कला का उस समय अच्छा ज्ञान था।

आवर्त सारणी(पीरियोडिक टेबल ) के 118 तत्वों में केवल सोना ही एक ऐसा तत्व है, जिसे मानव मुद्रा के रूप में चुनना पसंद करता है। लेकिन क्यों? मानव ओसमियम, क्रोमियम या हीलियम के प्रति ऐसा प्रेम क्यों नहीं दिखाता है? पढ़ना जारी रखें “स्वर्ण मरिचिका : सोना कितना सोना है?”

नाभिकिय विकिरण कब हानीकारक होता है ?: कुछ तथ्य


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जापानी नाभिकिय दुर्घटना : तथ्यो का अभाव और समाचारो की बाढ़


11 मार्च 2011 को जापान मे आये रिक्टर स्केल पर 9.0 के भूकंप और भूकंप से उत्पन्न सुनामी से हुयी जान माल की हानी से सम्पूर्ण मानव जाति दुखी है। मानवता को हुयी इस क्षति के लिये ये दो कारक भूकंप और सूनामी काफी नही थे कि एक तीसरा संकट आ खड़ा हुआ। जापान के फुकुशीमा के नाभिकिय संयंत्र से नाभिकिय विकिरण का संकट पैदा हो गया है।

नाभिकिय संयंत्र की कार्यप्रणाली
नाभिकिय संयंत्र की कार्यप्रणाली

40 वर्ष पूराने फुकुशीमा के दायची नाभिकिय संयंत्र मे आयी इस गड़बड़ी का कारण वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर का काम ना करना है। यह वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटर नाभिकिय संयंत्र को उसके काम ना करने की स्थिति मे ठंडा रखते है। ठंडा रखने का यह कार्य किसी शीतक को संयंत्र मे पंप कर किया जाता है, यह शीतक पानी भी हो सकता है। सामान्य स्थिति मे नाभिकिय संयत्र से उत्पन्न विद्युत ही उसे ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है लेकिन रखरखाव के समय जब नाभिकिय संयत्र को बंद किया जाता है तब यह वैकल्पिक जनरेटर से उत्पन्न विद्युत ही संयत्र को ठंडा करने के कार्य मे उपयोग की जाती है। इन्ही वैकल्पिक सुरक्षा जनरेटरो को रखरखाव के अतिरिक्त आपातकालीन स्थिति मे प्रयोग किया जाता है। पढ़ना जारी रखें “जापानी नाभिकिय दुर्घटना : तथ्यो का अभाव और समाचारो की बाढ़”

ताराहुमारा धावक

ताराहुमारा : 435 मील मैराथन के धावक


ताराहुमारा धावक
ताराहुमारा धावक

रारामुरी या  ताराहुमारा मेक्सीको के मूल निवासी है। रारामूरी का उनकी भाषा मे अर्थ “पैदल धावक” या “तेज धावक” होता है। ये लोग लंबी दूरी की दौड़ के लिये प्रसिद्ध है। इस जनजाति के धावक 435 मील तक की दौड़ एक बार मे पूरी करते हैं। यह दौड़ 10 मैराथन के बराबर है। 435 मील की मैराथन 2 दिन मे पूरी होती है और नदियो, दर्रो और घाटियो के मध्य से गुजरती है।
ताराहुमारा जनजाति के लोग इतनी लम्बी दूरी कैसे तय कर पाते है? पढ़ना जारी रखें “ताराहुमारा : 435 मील मैराथन के धावक”