गाडेल का अपूर्णता प्रमेय(Gödel’s incompleteness theorem)

उन्नीसवीं शताब्दी तथा बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे गणितज्ञो का लक्ष्य था कि अंकगणित को कुछ स्वयंसिद्ध नियमों मे बांध दिया जाये। यह युक्लिड के ज्यामितिक नियमो के जैसा ही प्रयास था जिसमे कुछ निर्विवाद स्वयं सिद्ध नियमों के आधार पर हर प्रमेय को सिद्ध किया जा सकता था।
यह एक उत्कृष्ट लक्ष्य था। एक ऐसे सिद्धांत की कल्पना जिसमे पूर्णांको संबधित हर संभव स्वयं सिद्ध कथन(Axiom) का समावेश हो। गाडेल द्वारा प्रस्तावित अपूर्णता प्रमेय ने इस लक्ष्य को असंभव बना दिया।
गाडेल के प्रमेय का गणितीय विवरण देना गणितीय तर्क शास्त्र नही जानने वालों से इस महत्वपूर्ण सहज ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान को छुपाने के तुल्य होगा। इसलिए इसे मै सरल कम्प्युटर की भाषा मे दोहराउंगा।
कल्पना कीजिये हमारे पास एक शक्तिशाली कम्प्यूटर ’आरेकल’ है। जैसे की कम्प्युटर की कार्य विधि है, आरेकल को उपयोगकर्ता कुछ “Input”निर्देश देता है जो कुछ नियमों पर आधारित होते है,आरेकल इसके उत्तर मे उन नियमो के पालन से उत्पन्न’Output’ देता है। समान Input हमेशा समान Output देंगें। आरेकल के Input तथा Output को पूर्णांकों मे लिखा जाता है तथा आरेकल केवल साधारण गणितीय प्रक्रियाएं जैसे जोड़, घटाना, गुणा तथा भाग ही करता है। साधारण कम्प्यूटर के विपरीत हम इस कंप्यूटर से दक्षता या कम समय मे कार्य की आशा नही रखते हैं। आरेकल हमेशा दिये गये निर्देशो का पालन करता है, वह इसमे लगने वाले समय की परवाह नही करता है, आरेकल अपना कार्य निर्देशो के पालन के पश्चात ही बंद करेगा चाहे इसमे लाखों करोड़ो वर्ष लग जायें।[आरेकल (शाब्दिक अर्थ): कोई व्यक्ति या संस्था जो किसी दैवीय शक्ति द्वारा हर प्रश्न का उत्तर देने मे समर्थ है।]
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