विज्ञान की अद्भुत शाखा : कैओस सिद्धांत


वैज्ञानिक सिद्धांतों विशेषकर आइजैक न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्धांतों की सफलता ने एक कठोर नियतत्ववाद (Rigid determinism) की शुरुआत की, जिसके अनुसार यदि हम प्रकृति के नियमों से वर्तमान में भलीभांति परिचित होंगे तो सैद्धांतिक रूप से ब्रह्मांड में भविष्य में घटित होनेवाली किसी भी घटना की सफल भविष्यवाणी करने में सक्षम होंगे। उदाहरण के लिए यदि हम किसी समय विशेष पर सौरमंडल के ग्रहों की गति और स्थिति (Speed and position) को जानतें हों तो हम बड़ी सटीकता से यह भी भविष्यवाणी कर सकते हैं कि एक वर्ष उपरांत ग्रहों की स्थिति और गति क्या होगी। इस नियतत्ववाद को तब बड़ा झटका लगा जब वर्नर हाइजेनबर्ग ने क्वांटम यांत्रिकी (Quantum mechanics) के एक महत्वपूर्ण पहलू, अनिश्चितता-सिद्धांत (Uncertainty principle) की खोज की। परमाण्विक स्तर (Atomic level) पर यह सिद्धांत कहता है कि हम किसी कण की स्थिति और उसके संवेग (Momentum) को एक साथ नहीं जान सकते। उदाहरण के लिए यदि हम यह जानना चाहते हैं कि परमाणु के भीतर किसी कण की क्या स्थिति है, तो कण की स्थिति जानने के लिए हमें उसपर प्रकाश (फ़ोटॉन) फेंकना पड़ेगा। जब फ़ोटॉन उस कण से टकरायेंगे तब उस टक्कर के परिणामस्वरूप कण की स्थिति और अवस्था परिवर्तित हो जाएगी। इस तरह हम उसकी स्थिति को नहीं जान पाएंगे क्योंकि स्थिति को जानने के क्रम में हमने स्थिति में परिवर्तन कर दिया। क्वांटम भौतिकी में हम किसी कण के कहीं पर होने का पूर्वानुमान लगाने का प्रयास तो कर सकते हैं मगर सटीकता से यह नहीं बता सकते कि वह कहाँ पर हैं। वह कहीं पर भी हो सकता है।

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क्या है कैओस सिद्धांत?
परंतु, यदि हमे किसी कण या पत्थर की स्थिति, उसका संवेग, वायु का घनत्व, उसका वेग, पृथ्वी द्वारा लगाया गुरुत्वाकर्षण बल आदि सबकुछ पता हो और हम उस पत्थर को अंतरिक्ष से पृथ्वी पर फेंक दें तो क्या हम पत्थर के कहीं पर भी गिरने से पहले ही सटीकतापूर्वक यह बता सकते हैं कि वह पत्थर कहाँ पर गिरेगा? सैद्धांतिक रूप से हाँ, मगर हम व्यवहारिक रूप से बिलकुल सटीकतापूर्वक नहीं बता सकते की पत्थर यहीं पर गिरेगा क्योंकि छोटी प्रारंभिक अनियमिता और अनिश्चितता भी पत्थर की गति, स्थिति आदि को प्रभावित करके हमारी भविष्यवाणी को निरर्थक और अव्यवहारिक सिद्ध कर सकती है। ठीक इसी प्रकार से आज हम ग्रहों की गति और स्थिति की भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं, मगर लंबे अर्से के लिए नहीं, हम यह नहीं बता सकते कि आज से पांच हजार वर्ष बाद सूर्य, पृथ्वी और अन्य ग्रहों की क्या स्थिति होगी। हम जानते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी यादृच्छिकता (Randomness) का प्रतीक है, इसलिए आइंस्टाइन ने इसे ‘पासा लुढ़काने वाला सिद्धांत’ कहा था। परंतु पत्थर का फेंकना या ग्रहों की भविष्यवाणी एक स्थूल (विशाल) पैमाने से संबंधित है, जिसे न्यूटन और आइंस्टाइन की भौतिकी को संभालने में सक्षम होना चाहिए। वास्तव में, यह काफी अच्छी तरह से संभालता भी है। मगर, आधुनिक गणित और विज्ञान की एक शाखा ‘कैओस सिद्धांत’ (Chaos Theory) चिरसम्मत भौतिकी (Classical physics) की भविष्यवाणी संबंधी सीमाओं को इंगित करती है। इस सिद्धांत के अनुसार अतिसूक्ष्म परिवर्तन भी बड़े पैमाने पर किसी क्रिया के परिणाम को प्रभावित कर सकता है। आज हम देखतें हैं कि किस प्रकार से अधिकांश मौसम की भविष्यवाणियाँ या पूर्वानुमान गलत साबित हो जाते हैं, फिर भी हम मौसम विज्ञान क्षेत्र की निंदा नहीं करते और न ही बेकार अनुमान लगाने के सिद्धांत के रूप में इसे खारिज कर देते हैं। बल्कि हम यह मानते हैं कि यह एक अपूर्ण विज्ञान है, यह तो केवल हमे किसी विशेष परिणाम (जैसे बारिश होगी या नहीं होगी) की संभावना को ही बताता है। दशकों पहले की तुलना में, आज पूर्वानुमान बहुत बेहतर हैं। मगर, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में चाहें कितनी भी प्रगति हो जाए ‘कैओस सिद्धांत’ के अनुसार मौसम की भविष्यवाणी कभी भी पूरी सटीकता के साथ नहीं की जा सकेगी।

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एडवर्ड लोरेंज़

1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में मौसम विज्ञान के एक प्रोफेसर एडवर्ड लोरेंज अपने कंप्यूटर द्वारा मौसम का पूर्वानुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे। उस समय मौसम को तापमान, दबाव, और वायु वेग जैसे मापने योग्य कारकों के समुच्चय (Set) द्वारा निर्धारित किया जाता था, तत्कालीन पारंपरिक ज्ञान यह था कि एक ठोस मॉडल, डेटा का पूरा समुच्चय और एक शक्तिशाली संख्या-संकुचन उपकरण (Number-crunching device) द्वारा मौसम की सफल भविष्यवाणी की जा सकती है। लोरेंज अपने शोधकार्य के दौरान यह देखकर चकित रह गए कि प्रारंभिक स्थितियों में नगण्य बदलाव भी व्यापक रूप से भिन्न परिणाम देता है। दूसरे शब्दों में, छोटी प्रारंभिक अनिश्चितता और संख्यात्मक गणनाओं में निकटतम त्रुटि भी व्यापक रूप से मौसम के मिजाज़ को प्रभावित करती है।
कैओस सिद्धांत के आरंभिक समर्थकों में से एक थे महान गणितज्ञ हेनरी पॉइंकारे, जिन्होंने बीसवी सदी के आरंभ में ही एडवर्ड लोरेंज का मार्गदर्शन करते हुए कहा था कि प्रारंभिक स्थिति में हो रही छोटी सी असमानताएं भी अंतिम घटना में बहुत बड़ी असमानता उत्पन्न कर सकती है। प्रारंभिक स्थितियों के प्रति संवेदनशीलता का अभिप्राय यह है कि एक कैओटिक प्रणाली (Chaotic System) में प्रत्येक बिंदु, अलग-अलग भविष्य के पथों की बिंदुओं द्वारा अनुमान लगाया जाता है। इस प्रकार, वर्तमान प्रक्षेपवक्र (Trajectory) में एक छोटे (नगण्य) परिवर्तन से भविष्य के व्यवहार में भिन्नता हो सकती है। प्रारंभिक स्थितियों के प्रति संवेदनशीलता का एक परिणाम यह है कि अगर हम किसी प्रणाली (सिस्टम) के बारे में कुछ कम जानकारी के साथ कार्य करना शुरू करते हैं तो एक निश्चित समय के बाद सिस्टम का पूर्वानुमान लगाना असंभव हो सकता है।

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तितली प्रभाव

यह सिद्धातं मौसम विज्ञान के मामले में सर्वाधिक परिचित है, जो आमतौर पर केवल एक हफ्ते तक का पूर्वानुमान लगा सकता है। दरअसल, किसी भी कैओटिक प्रणाली में, पूर्वानुमान लगाने की अनिश्चितता बीते समय के साथ तेजी से बढ़ जाती है।प्रारंभिक स्थितियों की इस अत्यधिक निर्भरता या संवेदनशीलता (Initial conditions) को लोरेंज द्वारा ‘तितली प्रभाव’ (The butterfly effect) नाम दिया गया। इसका अभिप्राय यह है कि एक जटिल प्रणाली में एक स्थान पर एक छोटा-सा भी बदलाव दूसरे स्थान पर बड़ा प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, उदाहरण के लिए, यदि एक तितली अमेज़न के जंगलों में अपने पंख फड़फड़ाती है तो इसकी वजह से टेक्सास में तूफ़ान आ सकता है। वास्तव में, हम यह जानते हैं कि एक तितली के पंख फड़फड़ाने से कहीं भी तूफ़ान नही आ सकता, मगर इस कथन का मूल अर्थ यह है कि किसी भी सिस्टम (प्रणाली) में एक बेहद मामूली बदलाव भी क्रियाओ की उन श्रंखलाओं को जन्म दे सकता है, जो उस सिस्टम के भविष्य को पूरी तरह बदल देगी। लोरेंज और अन्य वैज्ञानिकों ने इस परिघटना का नेतृत्व किया, जिसको बाद में ‘कैओस सिद्धांत’ (Chaos Theory) के रूप में व्यापक समर्थन मिला। इस सिद्धांत के बारे में एडवर्ड लोरेंज ने संक्षेप कहा था : ‘जब वर्तमान स्थिति भविष्य को निर्धारित करता है, लेकिन अनुमानित वर्तमान भविष्य का निर्धारण नहीं करता है’। इस वजह से किसी भी व्यवहार और गतिविधि की दीर्घकालिक स्थिति की भविष्यवाणी करना असंभव है। यह हमें अजीब लग सकता है, मगर वास्तव में कैओस सिद्धांत के अंतर्गत ऐसे ही व्यवहारों, गतिविधियों और प्रणालियों का अध्ययन किया जाता है जिनका पूर्वानुमान लगाना या जिन पर नियंत्रण करना असंभव है, जैसे कि मौसम और जलवायु, शेयर बाजार, विभिन्न प्रकार की खगोलीय गतिविधियाँ और हमारे मस्तिष्क की स्थितियां आदि।

अनुप्रयोग

‘कैओस’ शब्द का अर्थ है भ्रम, अनिश्चितता, अराजकता और अनियमितता। चूँकि अराजक या अनिश्चित व्यवहार कई प्राकृतिक प्रणालियों (जैसे, मौसम और जलवायु) और कृत्रिम घटकों या सामाजिक व्यवहारों (जैसे, सड़क यातायात या अनियंत्रित भीड़) में मौजूद है, इसलिए कैओस सिद्धांत विश्लेषणात्मक तकनीकों के माध्यम से इनका अध्ययन करता है। अत: कैओस सिद्धांत वर्तमान में वैज्ञानिक अनुसंधान का एक सक्रिय क्षेत्र बना हुआ है।

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कैओस सिद्धांत का समीकरण

‘कैओटिक लाइट हार्वेस्टिंग’ जैसे नवीनतम अनुसंधानों से यह भी पता चला है कि कैओस सिद्धांत संबंधी हमारी यह आम धारणा कि यह उपकरणों की कार्य-क्षमता को कम कर देती है, सदैव सच नहीं होती। जैसे-जैसे तकनीक और विकसित होगी उपकरणों की कार्य-क्षमता में भी बढ़ोत्तरी होगी। हालाँकि कैओस सिद्धांत के अनुसार भविष्य में भी, किसी भी प्रणाली में अत्यंत सूक्ष्म कारक की अज्ञानता या थोड़ी-सी अनिश्चितता भी हमारे पूर्वानुमान को गलत सिद्ध कर देगी। कैओस सिद्धांत निश्चितता और अनिश्चितता के बीच परिवर्तन को खोजता है। हम यह कह सकते हैं कि कैओस सिद्धांत मानव जाति के लिए अत्यंत लाभप्रद है। इसका एक सामान्य उदाहरण यही दिया जा सकता कि वर्तमान में मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सक मन-मस्तिष्क की बीमारियों के चिकित्सीय अध्ययन के लिए इस सिद्धांत का उपयोग कर रहे हैं क्योंकि इससे मरीज की प्रारंभिक स्थिति का पता लगाकर उसका यथोचित ईलाज किया जा सकता है।कैओस सिद्धांत का जन्म मौसम के पैटर्न देखने से हुआ था, लेकिन वर्तमान में यह कई अन्य स्थितियों पर लागू हो गया है। कैओस सिद्धांत का इन क्षेत्रों में व्यापक अनुप्रयोग हो रहा है : भूविज्ञान, गणित, सूक्ष्म जीव विज्ञान, जीव विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान, अर्थशास्त्र, इंजीनियरिंग, एल्गोरिथम ट्रेडिंग, पारिस्थितिकी, मौसम विज्ञान, दर्शन, नृविज्ञान, भौतिकी, राजनीति, जनसंख्या गतिशीलता, डीएनए कंप्यूटिंग, मनोविज्ञान, रोबोटिक्स आदि।

इस प्रकार हम यह देखते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी के साथ-साथ प्रकृति, कृत्रिम घटकों और सामाजिक व्यवहारों में भी सूक्ष्म मगर प्रभावी रूप से यादृच्छिकता मौजूद है। अगर आइंस्टाइन जीवित होते तो कैओस सिद्धांत के बारे में कुछ इस प्रकार से टिप्पणी करते : ‘ईश्वर एक से अधिक तरीकों से पासा फेंकता है’।

लेखक परिचय

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प्रदीप

प्रदीप कुमार एक साइंस ब्लॉगर एवं विज्ञान संचारक हैं। ब्रह्मांड विज्ञान, विज्ञान के इतिहास और विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर लिखने में आपकी  रूचि है। विज्ञान से संबंधित आपके लेख-आलेख राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं, जिनमे – टेक्निकल टुडे, स्रोत, विज्ञान आपके लिए, समयांतर, इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए, अक्षय्यम, साइंटिफिक वर्ल्ड, विज्ञान विश्व, शैक्षणिक संदर्भ आदि पत्रिकाएँ सम्मिलित हैं। संप्रति : दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर के विद्यार्थी हैं। आपसे इस ई-मेल पते पर संपर्क किया जा सकता है : pk110043@gmail.com

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9 विचार “विज्ञान की अद्भुत शाखा : कैओस सिद्धांत&rdquo पर;

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ये उस दौर की बात है : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

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  2. बहुत रोचक प्रस्तुति। जगदीश चन्द्र बोस की विज्ञान कथा पालातक तूफान को केआटिक थियरी का उद्गम मान सकते हैं क्योंकि उक्त कहानी में एक तेल के बूंद से भयावह समुद्री तूफान के शान्त होने की कथा है। यह कथा लोरेंज के बटरफ्लाई इफेक्ट से बहुत पहले की है।

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    • धन्यवाद सर। ऐसा नहीं कि कैओस थ्योरी के बारे में लोरेंज के पूर्वर्ती वैज्ञानिकों को मालूम नही था, मगर लोरेंज ने ही इस सिद्धांत को तथ्यात्मक बनाकर गणितीय आधार प्रदान किया। यह पूरी तरह सर सम्भव है कि सर जगदीश चन्द्र बोस ने प्रारम्भिक स्थितियों पर ऐसी निर्भरता को जानकर अपनी विज्ञान कथा पालातक तूफान लिखी हो। हालांकि सर बोस की वैज्ञानिक दक्षता पर कोई भी संदेह नही है। हो सकता है कि उन्होंने गणितीय आधार पर इस संकल्पना को जांचा हो, मगर इसके प्रमाण नहीं हैं।

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