2013 में विज्ञान विश्व


2013 की यह वार्षिक  रपट WordPress.com सांख्यिकी विभाग के सहायक बंदरों द्वारा विज्ञान विश्व के लिये तैयार की गयी है.  इस रपट के मुख्य अंश: लुवरे संग्रहालय (The Louvre Museum) में सालाना  85 लाख दर्शक आते है। इस ब्लाग पर 2013 मे  120,000 पाठक आये। यह सँख्या लुवरे संग्रहालय के पाँच दिन की दर्शक संख्या के बराबर है। Click here to see the complete report. पढ़ना जारी रखें 2013 में विज्ञान विश्व

स्वर्ण

स्वर्ण मरिचिका : सोना कितना सोना है?


स्वर्ण
स्वर्ण

सोने से मानव सभ्यता का लगाव दिलचस्प है। रसायन विज्ञान की नज़र से देखें तो यह उतना धातु उदासीन सी है क्योंकि यह शायद ही किसी धातु से अभिक्रिया करता है।

सोना एक धातु एवं तत्व है । शुद्ध सोना चमकदार पीले रंग का होता है जो कि बहुत ही आकर्षक रंग है। यह धातु बहुत मूल्यवान है और प्राचीन काल से सिक्के बनाने, आभूषण बनाने एवं धन के संग्रह के लिये प्रयोग की जाती रही है। सोना घना, मुलायम, चमकदार, सर्वाधिक संपीड्य (malleable) एवं तन्य (ductile) धातु है। रासायनिक रूप से यह एक तत्व है जिसका प्रतीक (symbol) Au एवं परमाणु क्रमांक 79 है। यह एक ट्रांजिशन धातु है। अधिकांश रसायन इससे कोई क्रिया नहीं करते। सोने के आधुनिक औद्योगिक अनुप्रयोग हैं – दन्त-चिकित्सा में, इलेक्ट्रॉनिकी में।

संकेत (Au), परमाणुसंख्या 79, परमाणुभार 196.97, गलनांक 106° से., क्वथनांक 2970° से. घनत्व 19.3 ग्राम प्रति घन सेमी, परमाणु व्यास 2.9 एंग्स्ट्राम A°, आयनीकरण विभव 9.2 इवों, विद्युत प्रतिरोधकता 2.19 माइक्रोओहम्‌ - सेमी.
संकेत (Au),
परमाणुसंख्या 79,
परमाणुभार 196.97,
गलनांक 106° से.,
क्वथनांक 2970° से.
घनत्व 19.3 ग्राम प्रति घन सेमी,
परमाणु व्यास 2.9 एंग्स्ट्राम A°,
आयनीकरण विभव 9.2 इवों,
विद्युत प्रतिरोधकता 2.19 माइक्रोओहम्‌ – सेमी.

स्वर्ण के तेज से मनुष्य अत्यंत पुरातन काल से प्रभावित हुआ है क्योंकि बहुधा यह प्रकृति में मुक्त अवस्था में मिलता है। प्राचीन सभ्यताकाल में भी इस धातु को सम्मान प्राप्त था। ईसा से 2500 वर्ष पूर्व सिंधु घाटी की सभ्यताकाल में (जिसके भग्नावशेष मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिले हैं) स्वर्ण का उपयोग आभूषणों के लिए हुआ करता था। उस समय दक्षिण भारत के मैसूर प्रदेश से यह धातु प्राप्त होती थी। चरकसंहिता में (ईसा से 300 वर्ष पूर्व) स्वर्ण तथा उसके भस्म का औषधि के रूप में वर्णन आया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्वर्ण की खान की पहचान करने के उपाय धातुकर्म, विविध स्थानों से प्राप्त धातु और उसके शोधन के उपाय, स्वर्ण की कसौटी पर परीक्षा तथा स्वर्णशाला में उसके तीन प्रकार के उपयोगों (क्षेपण, गुण और क्षुद्रक) का वर्णन आया है। इन सब वर्णनों से यह ज्ञात होता है कि उस समय भारत में सुवर्णकला का स्तर उच्च था।

इसके अतिरिक्त मिस्रऐसीरिया आदि की सभ्यताओं के इतिहास में भी स्वर्ण के विविध प्रकार के आभूषण बनाए जाने की बात कही गई है और इस कला का उस समय अच्छा ज्ञान था।

आवर्त सारणी(पीरियोडिक टेबल ) के 118 तत्वों में केवल सोना ही एक ऐसा तत्व है, जिसे मानव मुद्रा के रूप में चुनना पसंद करता है। लेकिन क्यों? मानव ओसमियम, क्रोमियम या हीलियम के प्रति ऐसा प्रेम क्यों नहीं दिखाता है? पढ़ना जारी रखें “स्वर्ण मरिचिका : सोना कितना सोना है?”