Archive for ‘सौर मंडल’

जुलाई 23, 2015

अंतरग्रहीय अभियान : गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist)

by आशीष श्रीवास्तव

अंतरग्रहीय अभियानो मे विशाल गैस दानव ग्रहो(बृहस्पति, शनि, युरेनस, नेपच्युन) तथा अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के प्रयोग के यानो को गति दी जाती है, इस तरिके को गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) कहते है। इस तरिके मे इंधन का प्रयोग नही होता है और यान की गति बढ़ जाती है।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

वायेजर 1 तथा 2 का पथ। दोनो का पथ इस तरह निर्धारित किया गया था कि वे ग्रहो से गुरुत्विय सहायता(Gravity Assist) लेकर आगे बढे।

अगस्त 1977 मे प्रक्षेपित वायेजर 2 बृहस्पति पहुंचने के बाद उसके गुरुत्वाकर्षण की सहायता से गति प्राप्त की और तेज गति से शनि की ओर पहुंचा। उसके बाद वायेजर 1 भी यही कार्य किया। वायेजर 2 ने शनि से गुरुत्विय सहायता ली और ज्यादा तेज गति से युरेनस पहुंचा, उसके बाद और युरेनस से सहायता ले अधिक तेज गति से नेपच्युन पहुंचा और उसके आगे निकल गया। गैलेलीयो यान ने शुक्र से एक बार, पृथ्वी से दो बार, सूर्य से एक बार सहायता लेकर अपने लक्ष्य बृहस्पति पहुंचा। शनि की परिक्रमा कर रहे कासीनी यान ने शुक्र से दो बार, पृथ्वी से एक बार, बृहस्पति से एक बार सहायता ली और शनि तक पहुंचा।

ध्यान रहे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है, वे एक जगह नही रहते है। इन सभी अभियानो मे इन अंतरिक्ष यानो का पथ इस तरह से बनाया जाता है कि वे निर्धारित समय पर ग्रह के पहुंचने के स्थान पर पहुंच जाये और तेज गति प्राप्त कर अगले पड़ाव पर समय पर पहुंचे ताकि अगले पड़ाव से भी गति त्वरण प्राप्त करने मे सहायता ले सके। इस तरह के पथ बनाने के लिये ग्रहों की स्थिति पर ध्यान मे रख कर पथ बनाया जाता है। वायेजर ने बृहस्पति, शनि, युरेनस से सहायता प्राप्त की थी, लेकिन इस तरह की स्थिति 175 वर्ष मे एक बार होती है। यह स्थिति 1977 मे बनी थी और अब 2152 मे बनेगी।

न्यु हारीजोंस के पथ मे वह केवल बृहस्पति से ही सहायता ले पाया था।

अब यह जानते है कि यह कार्य कैसे करता है :

जुलाई 20, 2015

न्यु हारीजोइन्स : प्लूटो की यात्रा सम्पन्न कर आगे रवाना

by आशीष श्रीवास्तव

न्यु हारीजोन्स

न्यु हारीजोन्स

अंतरिक्ष सदीयों से मानव को आकर्षित करता रहा है। खगोलिय पिंड मानव मन को हमेशा चुनौति देते आये है, और सदियों से मानव उनका निरीक्षण और अध्ययन करता आया है। ज्ञान की इस यात्रा मे महत्वपूर्ण मोड़ 4 अक्टूबर 1957 को आया जब पहली बार कोई मानव निर्मित वस्तु स्पूतनिक उपग्रह के रूप मे पृथ्वी के वातावरण को पार कर अंतरिक्ष मे पंहुची। इसके पश्चात तो अंतरिक्ष अभियानो की एक श्रृंखला प्रारंभ हो गयी।

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

प्लूटो खोज के समय 1930 और न्यु हारीजोंस द्वारा लिया चित्र 2015

अपोलो अभियान के तहत मानव 20 जुलाई 1969 को चांद पर जा पहुंचा। अंतरग्रहीय अभियान के तहत 19 मई 1961 को सोवियत संघ का वेनेरा 1 शुक्र ग्रह के 100,000 किमी दूरी से गुजरा। इस यान के शुक्र के पास पहुंचने से पहले ही संपर्क टूट गया था लेकिन यह पहला अभियान था जब कोई मानव निर्मित यान किसी अन्य ग्रह के पास से गुजरा था। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 2 पहला सफल अभियान था जिसमे दिसंबर 1962 मे शुक्र के 35,000 किमी दूरी से आंकड़े भेजे। सं रा अमरीका का यान मैरीनर 4 जुलाई 1965 को मंगल के पास से गुजरा। मार्च 1966 मे सोवियत संघ का यान वेनेरा 3 शुक्र की सतह से टकरा कर नष्ट हो गया और वह कोई भी सुचना भेजने मे असफल रहा था, लेकिन वह पहला यान था जो किसी अन्य ग्रह की सतह पर पहुंचा था। अक्टूबर 1967 मे सोवियत संघ का वेनेरा 4 किसी अन्य ग्रह की सतह पर उतरने वाला पहला सफल अभियान था।

सं रा अमरीका का यान मैरीनर 10 पहला अभियान था जो एक बार मे एकाधिक ग्रहो के पास से गुजरा। यह यान फरवरी 1974 मे शुक्र के पास से तथा बुध के पास से तीन बार मार्च , सितंबर 1974 तथा मार्च 1975 मे गुजरा।

इन अभियानो के बाद मानव के सबसे सफल अंतरग्रहीय अभियान वायेजर 1 तथा वायेजर 2 रहे। ये दोनो यानो ने बृहस्पति, शनि, युरेनस तथा नेपच्युन की यात्रा की थी। उसके पश्चात वे सौर मंडल के बाहर की यात्रा पर निकल गये। इस तरह से 2006 प्लूटो के ग्रह माने जाने तक मानव द्वारा सभी ग्रह तक खोजी अंतरिक्ष यान भेजे जा चुके थे केवल प्लूटो ही ऐसा अकेला ’ग्रह’ था जिसपर मानव यान नही भेजा गया था।

USPS_Pluto_Stamp_-_October_19911991 मे सं रा अमरीका डाक विभाग ने प्लूटो ग्रह पर एक डाक टिकट जारी किया, जिस पर लिखा था “Pluto Not Yet Explored”। डाक टिकट पर लिखे इस संदेश ने वैज्ञानिको को प्लूटो पर एक अभियान भेजने के लिये चुनौति दी। इस चुनौति ने न्यु हारीजोंस अभियान का आधार बनाया और 2006 मे यह यान अपनी यात्रा पर रवाना हो गया।

प्लूटो के बारे में हमें जितनी जानकारी है उसे एक डाक-टिकट के पीछे लिखा जा सकता है। इस मिशन के पूरा होने के बाद सौर मंडल संबंधी किताबों को दोबारा लिखे जाने की ज़रूरत होगी।

-2006 मे एक वरिष्ठ नासा अधिकारी कॉलिन हार्टमैन

जुलाई 14, 2015

प्लूटो : न्यु हारीजोंस की प्लूटो यात्रा पर विशेष भाग 1

by आशीष श्रीवास्तव

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

11 जुलाई 2015 को न्यु होरीजोंस द्वारा लिया चित्र

प्लूटो के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यह पहले अपने सौरमंडल का 9वां ग्रह था। लेकिन अब इसे ग्रह नहीं माना जाता। आओ आज प्लूटो के बारे में जानते हैं।

रोमन मिथक कथाओं के अनुसार प्लूटो (ग्रीक मिथक में हेडस) पाताल का देवता है। इस नाम के पीछे दो कारण है, एक तो यह कि सूर्य से काफ़ी दूर होने की वजह से यह एक अंधेरा ग्रह (पाताल) है, दूसरा यह कि प्लूटो का नाम PL से शुरू होता है जो इसके अन्वेषक पर्सीयल लावेल के आद्याक्षर है।

सूर्य की रोशनी को प्लूटो तक पहुंचने में छह घंटे लग जाते है जबकि पृथ्वी तक यही रोशनी महज आठ मिनट में पहुँच जाती है। प्लूटो की दूरी का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। बड़ी कक्षा होने के कारण सूर्य की परिक्रमा के लिए भी प्लूटो को अधिक वर्ष लगते है, 248 पृथ्वी वर्ष। प्लूटो अपनी धूरी के इर्दगिर्द भी घूमता है। यह अपने अक्ष पर छह दिवसों में एक बार घूमता है। प्लूटो की कक्षा अंडाकार है। अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हुए कभी यह नेप्चून की कक्षा को लांघ जाता है। तब नेप्चून की बजाय प्लूटो सूर्य के समीप होता है। हालांकि प्लूटो को यह सौभाग्य केवल बीस वर्षों के लिए मिलता है। 1979 से लेकर 1999 तक प्लूटो आठवां जबकि नेप्चून नौवां ग्रह था।

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो नीचे दायें चंद्रमा और पृथ्वी की तुलना मे

प्लूटो का आकार हमारे चंद्रमा का एक तिहाई है। यानी हमारे चंद्रमा के तीसरे हिस्से के बराबर है प्लूटो। इसका व्यास लगभग 2,300 किलोमीटर है। पृथ्वी प्लूटो से लगभग 6 गुना बड़ी है। प्लूटो सूर्य से औसतन 6 अरब किलोमीटर दूर है। इस कारण इसे सूर्य का एक चक्कर लगाने में हमारे 248 साल के बराबर समय लग जाता है।

यह नाइट्रोजन की बर्फ, पानी की बर्फ और पत्थरों से बना है। इसके वायुमंडल में नाइट्रोजन, मिथेन और कार्बन मोनोक्साइड गैस है। इस कारण यहां का तापमान काफी कम रहता है। शून्य से 200 डिग्री सेल्सियस नीचे यानी -200 डिग्री सेल्सियस रहता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है यहां कितनी ठंड लगती होगी। इतने कम तापमान में कोई यहां नहीं रह सकता है।

दिसम्बर 11, 2014

मंगल ग्रह पर क्रेटर के मध्य स्थित पर्वत कैसे बना?

by आशीष श्रीवास्तव

141209160749_mars_gale_crater_304x171_esa_nocreditअमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा मंगल ग्रह पर भेजा गया क्यूरियॉसिटी रोवर वहां से जिस तरह की सूचनाएं दे रहा है वे विश्व वैज्ञानिक बिरादरी को चमत्कृत कर देने के लिए काफी हैं। दो साल पहले जिस स्थान पर यह उतरा था, वहां से आसपास की भौगोलिक स्थिति की तस्वीरें उसी समय से मिलने लगी थीं। इन तस्वीरों से पता चला था कि वहां करीब 154 किलोमीटर चौड़ा क्रेटर (उल्कापात से बना गड्ढा) है जिसके बीच में करीब 5 किलोमीटर ऊंचा पहाड़ है। इस बीच खास बात यह हुई कि पृथ्वी से मिल रहे निर्देशों के मुताबिक यह रोवर धीरे-धीरे अपनी जगह से चलकर पहाड़ की जड़ तक पहुंचा और उस पर चढ़ने लगा।

पूरे दो वर्षों की चढ़ाई के बाद वह पहाड़ की चोटी तक जा पहुंचा और इस दौरान क्रेटर और पहाड़ की बनावट के बारे में ऐसी बारीक सूचनाएं भेजीं जो उपग्रहों द्वारा भेजे गए चित्रों से कभी हासिल नहीं की जा सकती थीं। इन सूचनाओं के विस्तृत विश्लेषण का काम वैज्ञानिक समुदाय आने वाले दिनों-वर्षों में करेगा। रोवर से ही आगे मिलने वाली सूचनाएं इस काम में वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन करेंगी। लेकिन, अभी तक मिल चुकी सूचनाएं भी कम क्रांतिकारी नहीं हैं।

141209155523__79600531_curiosity-at-kimberley-sol-613_1a_ken-kremerइन सूचनाओं के आधार पर वैज्ञानिकों को लगता है कि करीब साढ़े तीन अरब साल पहले इस क्रेटर का ज्यादातर हिस्सा पानी से भरा रहा होगा। ये पर्वत करोड़ों वर्षों की अवधि के दौरान एक के बाद एक बनी झीलों के रेत और अन्य तलछट के अवशेषों का बना हो सकता है।बाद में आसपास के मैदान में मिट्टी हवा के ज़रिए उड़ गई और इस तरह पांच किलोमीटर ऊंची चोटी अस्तित्व में आई जो आज हमें दिखती है। अगर यह बात सही है तो मंगल के वातावरण के बारे में अब तक बनी इस धारणा पर सवाल उठ जाता है कि इस ठंडे और सूखे ग्रह पर उष्णता और आर्द्रता क्षणिक और स्थानीय बात ही रही होगी। इसका मतलब ये होगा कि दुनिया पहले दो अरब सालों के दौरान उससे कहीं ज्यादा गर्म और नम रही होगी जितना कि पहले माना जाता था।क्यूरियॉसिटी की टीम का कहना है कि प्राचीन मंगल पर इस तरह की नम परिस्थितियों को बरक़रार रखने के लिए ख़ूब बारिश और बर्फ़बारी होती होगी।

इससे जुड़ी एक रोचक संभावना ये भी नज़र आती है कि मंगल के धरातल पर कहीं कोई सागर भी रहा होगा।

क्यूरियॉसिटी अभियान से वैज्ञानिक डॉ. अश्विन वासावादा का कहना है, “अगर वहां करोड़ों सालों तक झील रही है, तो पर्यावरणीय नमी के लिए सागर जैसे पानी के स्थायी भंडार का होना जरूरी है।”

दशकों से शोधकर्ता अटकलें लगाते रहे हैं कि मंगल ग्रह के शुरुआती इतिहास में उत्तरी मैदानी इलाकों में एक बड़ा सागर अस्तित्व में रहा होगा।

बहरहाल, हर नई मान्यता अपने साथ सवालों का बवंडर भी लाती है।

अगर प्राचीन काल में मंगल की सतह पर इतनी भारी मात्रा में पानी था तो फिर वहां जीवन की संभावना से इनकार कैसे किया जा सकता है? पुरानी मान्यताओं से उलझना, उनमें से बहुतों को गलत साबित करना और इस प्रक्रिया में उपजे नए सवालों की चुनौतियों से जूझना विज्ञान का स्वभाव रहा है। इस बार खास बात सिर्फ यह है कि मनुष्य के भेजे एक दूत ने जिस तेजी से मंगल की दुनिया के राज खोलने शुरू किए हैं, उसे देखते हुए लगता नहीं कि यह लाल ग्रह ज्यादा समय तक हमारे लिए रहस्य का गोला बना रहेगा।

MarsCrator

जुलाई 18, 2014

सूर्य अपना द्रव्यमान खो रहा है , लेकिन कैसे ?

by आशीष श्रीवास्तव

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य और उसके ग्रह(आकार की तुलना)

सूर्य काफी विशाल है, बहुत ही विशाल। वह चौड़ाई मे पृथ्वी से सौ से भी ज्यादा गुणा है, उसके अंदर 10 लाख से ज्यादा पृथ्वीयाँ समा सकती है। यदि आप पृथ्वी और सूर्य को किसी ब्रह्माण्डीय तराजु पर तौले तो पायेंगे कि सूर्य पृथ्वी से 300,000 गुणा ज्यादा द्रव्यमान रखता है।

लेकिन सूर्य का द्रव्यमान कम हो रहा है। समय के साथ धीमे धीमे उसके द्रव्यमान मे ह्रास हो रहा है, यह दो तरह से हो रहा है, प्रथम है सौर वायु और द्वितीय है द्रव्यमान का ऊर्जा के रूप मे परिवर्तन जिससे सूर्य से प्रकाश और उष्मा का उत्सर्जन होता है।

सूर्य के द्रव्यमान मे उपरोक्त मे से किस विधि से द्रव्यमान ह्रास तेज गति से हो रहा है ? दोनो विधि को विस्तार से देखते है।

जून 7, 2014

चंद्रमा की उत्पत्ति की नयी अवधारणा

by आशीष श्रीवास्तव

'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।

‘थिया’ ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्ति की संभावना है।

चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में एक नया शोध सामने आया है। इसका मानना है कि अरबों साल पहले एक बड़ा ग्रह पृथ्वी से टकराया था। इस टक्कर के फलस्वरूप चंद्रमा का जन्म हुआ। शोधकर्ता अपने इस सिद्धांत के पीछे अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों के ज़रिये चंद्रमा से लाए गए चट्टानों के टुकड़ों का हवाला दे रहे हैं। इन चट्टानी टुकड़ों पर ‘थिया‘ नाम के ग्रह की निशानियां दिखती हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी खोज पुख़्ता करती है कि चंद्रमा की उत्पत्ति टक्कर के बाद हुए भारी बदलाव का नतीजा थी।

'थिया' ग्रह की पृथ्वी से टक्कर से चंद्रमा की उत्पत्तिये अध्ययन एक साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैसे ये कोई नया सिद्धांत नहीं है। ये पहले से माना जाता रहा है कि चंद्रमा का उदय खगोलीय टक्कर के परिणाम स्वरूप हुआ था। हालांकि एक दौर ऐसा भी आया जब कुछ लोग कहने लगे कि ऐसी कोई टक्कर हुई ही नहीं। लेकिन वर्ष 1980 से आसपास से इस सिद्धांत को स्वीकृति मिली हुई है कि 4.5 अरब वर्ष पहले पृथ्वी और थिया के बीच हुई टक्कर ने चंद्रमा की उत्पत्ति की थी।

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